24/09/2026
सात साल। एक ही दवा। फायदा कुछ नहीं हुआ। फिर भी छोड़ी नहीं।
बाल झड़ते गए, और एक दिन पूरे के पूरे चले गए। वजन बढ़ता गया, खुद बताते हैं कि 105 किलो तक पहुंच गया था। और दिमाग ऐसी जगह जा पहुंचा था कि मां खाना देतीं, तो उन्हें लगता कि ये उनका आखिरी खाना है।
ये सब उस आदमी के साथ हो रहा था जिसके गाने के बिना आज भी शादियों में नाच शुरू नहीं होता। "लुंगी डांस" वाला आदमी। "ब्राउन रंग" वाला।
दो-ढाई साल ऐसे गुजरे कि दोपहर साढ़े बारह बजे तक सोते रहते। उधर पापा रोज काम पर निकलते, शाम को लौटते। लौटकर बेटे की तरफ देखते, और जब दोनों की नजरें मिलतीं, तो बेटे को इतनी शर्म आती कि आंख नहीं उठती थी। इस उम्र में पापा कमाने जा रहे हैं और मैं यहां पड़ा हूं... ये बात कैमरे के सामने बताते हुए वो रो पड़े थे।
नाम है हृदेश सिंह।
दुनिया जानती है यो यो हनी सिंह के नाम से।
मैं ये कहानी आज ही क्यों लिख रहा हूं, वो आखिर में बताऊंगा। पहले इतना कह दूं कि उनके गानों पर, उनकी कई बातों पर सवाल उठते रहे हैं, और उठने भी चाहिए। ये पोस्ट उनके गानों की तारीफ में नहीं है। ये एक बीमारी से एक आदमी की लड़ाई की बात है, और उस घर की, जिसने सबसे बुरे वक्त में साथ नहीं छोड़ा।
अब शुरू से शुरू करते हैं...
2012 में "ब्राउन रंग" आया था। उस गाने ने उन्हें हर मोबाइल, हर गाड़ी, हर शादी तक पहुंचा दिया। फिर बड़े-बड़े सितारों की फिल्मों में उनके गाने आने लगे। शो के बाद शो, शहर के बाद शहर। पैसा था, नाम था, भीड़ थी।
और खुशी?
नहीं थी।
ये बात उन्होंने इसी साल मई में एक पॉडकास्ट में खुद कही। कि सब कुछ होने के बाद भी वो अंदर से टूटे हुए थे। कि कम उम्र में इतनी कामयाबी मिली कि चलने-बोलने का ढंग बदल गया, लोगों की इज्जत करना भूल गए, खुद को भगवान समझने लगे। उसी दौर में नशा भी शुरू हो गया।
एक पुराने इंटरव्यू में वो बता चुके हैं कि डेढ़-दो बोतल शराब रोज चलती थी, और सोना तो जैसे बंद ही हो गया था। बाहर वालों को लगता था कि इससे अच्छी जिंदगी क्या होगी। अंदर क्या चल रहा था, किसी को नहीं पता था। खुद उन्हें भी नहीं।
पहला बड़ा झटका अमेरिका के एक टूर पर लगा। शिकागो में शो होना था। अपनी डॉक्यूमेंट्री में वो बताते हैं कि उस दिन उन्होंने साफ कह दिया, मुझे परफॉर्म नहीं करना। सब आते रहे, कहते रहे कि तैयार हो जाओ। वो मना करते रहे। जो आदमी मंच के लिए ही बना था, वो मंच से भाग रहा था, और उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि क्यों।
फिर 2014 में एक टीवी शो का सेट। वहां वो गिर पड़े। बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उसी दिन उन्हें लग गया था कि दिमाग के साथ कुछ हो गया है, और इसे ठीक करना है। घरवालों को फिक्र थी कि कॉन्ट्रैक्ट साइन हैं, केस भी हो सकता है। उनका जवाब था कि पहले खुद को ठीक करना है, बाकी बाद में।
जांच हुई तो बीमारी का नाम आया... बाइपोलर डिसऑर्डर। साथ में साइकोसिस के लक्षण।
ये शब्द सुनने में भारी लगता है, पर है सीधा। बाइ यानी दो, पोल यानी छोर। मन दो छोरों के बीच झूलता रहता है। एक छोर पर इतना ऊपर कि लगे सब कुछ अभी कर डालूं, नींद की जरूरत ही न लगे। दूसरे छोर पर इतना नीचे कि बिस्तर से उठना पहाड़ लगे। और साइकोसिस मतलब, दिमाग ऐसी चीजें देखने-मानने लगे जो असल में हैं ही नहीं। हनी सिंह ने इसे अपने शब्दों में कहा है कि दिमाग आपके काबू से बाहर चला जाता है, और आप जागते हुए भी सपना देखते रहते हैं।
एक बात यहां समझने वाली है। ये स्वभाव की खराबी नहीं है, बीमारी है। जैसे शुगर में शरीर का हिसाब गड़बड़ाता है, वैसे यहां मन का। और जैसे शुगर वाले को कोई ये नहीं कहता कि हिम्मत रखो अपने आप ठीक हो जाएगा, वैसे ही ये भी अपने आप ठीक होने वाली चीज नहीं है।
इसके बाद वो गायब हो गए।
कई साल।
लोगों ने जो मन में आया, कहा। कोई कहता रिहैब में हैं, कोई कहता करियर खत्म। उन्होंने बाद में खुद सब बताया, और वजह भी दी कि मैं अपनी प्रॉपर्टी नहीं हूं, फैंस की हूं, उन्हें जानने का हक है कि मेरे साथ हुआ क्या था। ये भी बताया कि उनका इलाज घर पर ही चला।
घर का हाल ये था कि किसी को इस बीमारी के बारे में कुछ पता ही नहीं था। उनकी छोटी बहन स्नेहा ने डॉक्यूमेंट्री में बताया है कि जब भाई में लक्षण दिखने शुरू हुए, तब जाकर परिवार ने इसके बारे में पढ़ना-समझना शुरू किया। बीमारी पहले आई, समझ बाद में। ज्यादातर घरों में यही होता है।
और फिर आया सबसे अंधेरा वक्त।
2018 और 2019। उन दो सालों में, उन्हीं के शब्दों में, उन्हें पक्का यकीन हो गया था कि वो मर चुके हैं। कि वो स्वर्ग और नर्क के बीच कहीं अटके हुए हैं। मां खाना देतीं, और वो हर बार सोचते कि ये आखिरी है।
इस तस्वीर को एक बार घरवालों की तरफ से देखिए। वो मां, जो रोज खाना देती थीं, और बेटा हर बार उसे आखिरी मानकर खाता था। वो पापा, जो उस उम्र में भी रोज काम पर निकलते थे। वो बहन, जो समझने में लगी थी कि भाई को हुआ क्या है। बेटे को लगता था कि वो मर चुका है, फिर भी उस घर ने उससे मुंह नहीं मोड़ा।
और दवा?
यहीं इस कहानी की सबसे जरूरी बात है।
हनी सिंह ने बताया है कि वो करीब सात साल तक एक ही दवा लेते रहे। हालत में कोई सुधार नहीं। ऊपर से साइड इफेक्ट। 2020 के एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि दवाओं का असर थायरॉयड पर पड़ा, वजन पर पड़ा। उनकी एक लाइन मुझे याद रह गई... बीमारी से लड़ने के लिए दवा लेता था, और दवा के असर से लड़ने के लिए कसरत करता था, दो तरफ की लड़ाई थी। उसी जिद में दो साल में सोलह किलो घटाया।
कोई भी आदमी ऐसे में दवा से चिढ़ जाए, सब छोड़-छाड़ दे, तो बात समझ आती है। पर उन्होंने दवा नहीं छोड़ी। एक दूसरा काम किया। धीरे-धीरे घर से बाहर निकलना शुरू किया, और डॉक्टर बदल लिया।
नए डॉक्टर ने दवाओं की डोज दोबारा देखी, कुछ दवाएं बदलीं, कुछ नई जोड़ीं। और उनके अपने शब्दों में, करीब चार हफ्ते के अंदर फर्क महसूस होने लगा। जो आदमी सालों से कमरे में था, वो लोगों से मिलने लगा।
सात साल बनाम चार हफ्ते।
फर्क दवा लेने या न लेने का नहीं था। फर्क सही डॉक्टर तक पहुंचने का था।
मुझे एक बात हनी सिंह की उस लाइन में दिखी, जहां वो पापा से नजर मिलने पर शर्म की बात करते हैं। बाहर से बीमार आदमी चिड़चिड़ा दिखता है, गुस्से में दिखता है, जिद्दी दिखता है। पर उस गुस्से के नीचे अक्सर यही होता है... शर्म, कि मैं वो नहीं कर पा रहा जो करना चाहता हूं। मेरी अपनी समझ यही कहती है कि ऐसे वक्त में घरवालों की बहस उसे और दूर करती है, और पास बैठना उसे वापस लाता है।
दिसंबर 2024 में नेटफ्लिक्स पर उनकी डॉक्यूमेंट्री आई, "यो यो हनी सिंह: फेमस"। उसमें उन्होंने बीमारी को छुपाया नहीं। उससे पहले एक बार उन्होंने लिखा था कि उनके बूढ़े मां-बाप और छोटी बहन ने सबसे मुश्किल वक्त में उनका साथ दिया, और यही उनकी दुनिया हैं।
फिर इसी साल मई में उन्होंने वो बात भी कह दी जो कोई स्टार आमतौर पर नहीं कहता। कि वो पूरी तरह गंजे हैं। कि लोग जो बाल देखते हैं, वो विग है। कि ये दवाओं और लंबे इलाज का असर है। उसी बातचीत में उन्होंने अपने पुराने दिनों पर भी बात की। कहा कि उस दौर का अपना वो रूप उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। और अपने गिरने के लिए न इंडस्ट्री को दोष दिया, न शोहरत को। कहा, वो मेरी वजह से हुआ।
मुझे इस पूरी कहानी में सबसे बड़ी बात यही लगी। जो आदमी कभी खुद को भगवान समझता था, वो आज कैमरे के सामने कह रहा है कि मैं गंजा हूं, मैं अपनी वजह से गिरा, मैं बीमार था। ये कमजोरी नहीं है। ठीक होने की शुरुआत यहीं से होती है।
पिछले साल जुलाई में दुबई में एक अखबार से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इंसान के तौर पर बदल गया हूं। अपने अच्छे हिस्से रख लिए, बाकी डिलीट कर दिए। भगवान की तरफ मुड़ा, दोस्ती की तरफ, प्यार की तरफ, यही अब चलाता है। अब पार्टियों में नहीं जाता, रोज दो गाने बनाता हूं, तीन बीट बनाता हूं।
और ये बात हवा में नहीं है। पिछले साल सितंबर में उन्होंने एक ही दिन में 51 गानों का एल्बम निकाला। इस साल दिल्ली, मुंबई में उनके शो हुए, भीड़ उमड़ी। वही आदमी जिसे लगता था कि वो मर चुका है।
दुबई वाली उसी बातचीत में एक छोटी सी बात और थी, जो मुझे सबसे प्यारी लगी। उनकी पहली घड़ी पापा ने दिलाई थी, टाइटन की। पिछले साल उन्होंने अपनी घड़ियों का ब्रांड शुरू किया, और उसकी शुरुआत तब हुई जब उनके पार्टनर ने उनके जन्मदिन पर मां-पापा के लिए खास घड़ियां डिजाइन करवाकर सरप्राइज दिया। और आगे का सपना पूछा गया, तो बोले कि एक बेटी चाहिए, जिसे मां और बहन जैसा बनाना है।
जिस बेटे के कई साल एक कमरे में रुक गए थे, आज उसके नाम की घड़ियां बिकती हैं।
बाल नहीं लौटे।
वक्त लौट आया।
अब वो बात, जो शुरू में अधूरी छोड़ी थी... ये कहानी आज क्यों।
दरअसल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस है। इसी दिन, 2022 में, भारत सरकार ने बेंगलुरु के निमहांस से एक हेल्पलाइन शुरू की थी, टेली-मानस। मैं आज से 10 अक्टूबर रोजाना जो भी पोस्ट कहानियां यहां डालूंगा, सबका संबंध मानसिक स्वास्थ्य से ही होगा, ताकि इस विषय में अधिक अधिक जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे और आवश्यक लोगों को जीवन सुंदर बनाने में सहयोगी हो।
आपको बता दें कि सरकार के अपने राष्ट्रीय सर्वे में ये सामने आया था कि मन की बीमारी से जूझ रहे ज्यादातर लोग इलाज तक पहुंचते ही नहीं। शर्म में, डर में, या इस सोच में कि ये तो मिजाज की बात है, अपने आप ठीक हो जाएगा।
हनी सिंह के पास पैसा था, नाम था। फिर भी सात साल लग गए सही इलाज तक पहुंचने में। जिनके पास इतना कुछ नहीं है, उनके घरों में ये सफर कितना लंबा होता होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
अगर ये पढ़ते हुए किसी को लग रहा है कि ये उसकी अपनी बात है, कि उसके भीतर भी आंधी चल रही है, कि दुनिया में सब उलटा लग रहा है और कोई समझ नहीं रहा... तो आप अकेले नहीं हैं, और आप खराब इंसान नहीं हैं। हो सकता है आप बहुत थके हुए हों, या बीमार हों, और दोनों का इलाज होता है। दवा से शिकायत हो, तो वो शिकायत डॉक्टर के सामने रखने की चीज है। दवा चुपचाप छोड़ने की नहीं।
और अगर आप उस घर में हैं जहां कोई ऐसी आंधी से गुजर रहा है, तो आप भी थके हैं। ये भी सच है। हनी सिंह की मां ने रोज खाना दिया, बहन ने बीमारी को पढ़ा, पापा ने काम नहीं छोड़ा। मुझे उस घर में कोई बड़ा चमत्कार नहीं दिखा। बस इतना दिखा कि किसी ने साथ नहीं छोड़ा।
दवा छोड़ना और डॉक्टर बदलना बाहर से एक जैसे दिखते हैं। बीच में पूरी जिंदगी का फासला है।
टेली-मानस: 14416। दूसरा टोल फ्री नंबर 1-800-891-4416। सरकारी, मुफ्त, चौबीसों घंटे, बीस भाषाओं में। बीमार इंसान खुद भी बात कर सकता है, और घरवाले भी, कि ऐसे वक्त में मरीज को कैसे संभालें। वहां से जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक तक भी बात पहुंचती है।
ये कहानी उस घर तक पहुंचनी चाहिए जहां कोई अपने भीतर की आंधी से अकेला लड़ रहा है, और घरवाले समझ नहीं पा रहे कि उसके पास कैसे बैठें।
इस पन्ने पर जो नाम आता है, वो असली होता है, और जो बात आती है, वो उसी इंसान के मुंह से कही हुई।
आपकी नजर में, हमारे घरों में मन की बीमारी पर इतनी चुप्पी क्यों रहती है?
#मानसिकस्वास्थ्य