Anand A Pandey, Astro Numerology Expert,

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 #मातृभूमि_प्रेम_सर्वोपरि_जानिए_महाबलिदानी #माता_पन्नाधाय_का_सम्पूर्ण_इतिहासमहाबलिदानी माता पन्नाधाय का जन्म चित्तौड़गढ़ क...
18/09/2021

#मातृभूमि_प्रेम_सर्वोपरि_जानिए_महाबलिदानी
#माता_पन्नाधाय_का_सम्पूर्ण_इतिहास

महाबलिदानी माता पन्नाधाय का जन्म चित्तौड़गढ़ के निकट माताजी की पांडोली नामक गांव में हुआ.. इनके पिता का नाम हरचंद सांखला था.. पन्नाधाय का विवाह आमेट के निकट स्थित कमेरी गांव में रहने वाले सूरजमल चौहान से हुआ...||

1527 ई. में खानवा के युद्ध के बाद 1528 ई. में महाराणा सांगा का स्वर्गवास हो गया.. 1531 ई. तक महाराणा सांगा के पुत्र महाराणा रतनसिंह मेवाड़ के शासक रहे.. फिर महाराणा विक्रमादित्य मेवाड़ की गद्दी पर बैठे.. जो कि एक कमजोर शासक थे...||

1534 ई. में जब गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया.. तब राजमाता कर्णावती ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली.. पन्नाधाय इन्हीं राजमाता कर्णावती की सेवा में नियुक्त थीं...||

राजमाता कर्णावती ने पन्नाधाय को बुलाया और कहा कि “मेरे दोनों पुत्र विक्रमादित्य और उदयसिंह को अब मैं तुम्हें सौंपती हूँ.. इनको इनके ननिहाल बूंदी लेकर जाना और जब चित्तौड़ से शत्रु खदेड़ दिए जाएं .. तभी इनको वापिस लाना”

राजमाता कर्णावती ने हज़ारों राजपूतानियों के साथ जौहर किया.. बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ जीत लिया.. फिर मेवाड़ के सामन्तों के जोर-शोर से फिर से चित्तौड़गढ़ पर मेवाड़ का अधिकार हो गया...||

महाराणा सांगा के बड़े भाई उड़न पृथ्वीराज की दासी पूतलदे से उनका एक बेटा हुआ.. जिसका नाम बनवीर था.. महाराणा सांगा ने बनवीर को बदचलनी के सबब से मेवाड़ से निकाल दिया था.. मौका देखकर ये फिर मेवाड़ आया...||

1535 ई. में बनवीर ने चित्तौड़ के कई खास सरदारों को अपनी तरफ मिलाया और तलवार से महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी.. फिर बनवीर ने कुंवर उदयसिंह को मारने के लिए उनके कक्ष में प्रवेश किया...||

पन्नाधाय ने कुंवर उदयसिंह के वस्त्र अपने पुत्र चन्दन को पहनाकर उसको कुंवर उदयसिंह के स्थान पर लिटा दिया.. राजगद्दी के नशे में चूर बनवीर कुँवर उदयसिंह को ढूंढते हुए महलों में आया और पन्नाधाय से पूछा कि “उदयसिंह कहाँ है पन्ना.. आज मेवाड़ की राजगद्दी और मेरे बीच आने वाले उस आख़िरी कांटे को भी निकाल फेंकने आया हूँ”

पन्नाधाय ने जान बूझकर बनवीर को रोकने का प्रयास किया.. ताकि बनवीर को शक ना हो.. बनवीर ने पन्नाधाय को हटाया और चन्दन को ही कुंवर उदयसिंह समझकर पन्नाधाय की आँखों के सामने तलवार से चन्दन के दो टुकड़े कर दिये...||

अपने पुत्र के दो टुकड़े होते देख भी पन्नाधाय उफ़ तक न कर सकीं.. उनका हृदय जैसे थम सा गया..बनवीर खुशी के मारे राजगद्दी की तरफ गया.. पन्नाधाय कीरत बारी (वाल्मीकि) के सेवक के ज़रिए बड़े टोकरे में पत्तलों से ढंककर कुंवर उदयसिंह को छुपाकर निकलीं...||

बहुत से लोग अज्ञानवश इस समय कुँवर उदयसिंह को एक दुधमुंहा बालक बताते हैं.. जबकि वास्तविकता में कुँवर की आयु इस समय 13-14 वर्ष थी...||

पन्नाधाय नदी किनारे पहुंची और यहीं अपने पुत्र चंदन का अंतिम संस्कार किया.. एक माँ को इस समय आत्मग्लानि में डूबकर पश्चाताप करना चाहिए था.. परन्तु प्रश्न मातृभूमि का था.. पन्नाधाय यहां नहीं रुकीं.. क्योंकि अभी कुँवर उदयसिंह के प्राणों का संकट टला नहीं था...||

पुत्र की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी.. कि पन्नाधाय अपने पति सूरजमल के साथ कुंवर उदयसिंह को लेकर देवलिया पहुंची.. देवलिया के रावत रायसिंह सिसोदिया ने इनकी बड़ी खातिरदारी की, पर जब पन्नाधाय ने कुंवर उदयसिंह को देवलिया में शरण देने की बात कही..तो रावत रायसिंह ने बनवीर के खौफ से ये काम न किया...||

रावत रायसिंह ने पन्नाधाय को एक घोड़ा देकर विदा किया.. पन्नाधाय कुंवर उदयसिंह को लेकर डूंगरपुर पहुंची.. डूंगरपुर के रावल आसकरण ने भी बनवीर के डर से उन्हें शरण नहीं दी.. रावल आसकरण ने उन्हें खर्च व सवारी देकर विदा किया...||

आखिरकार पन्नाधाय कुम्भलगढ़ पहुंची.. जहाँ उन्हें शरण मिली.. कुम्भलगढ़ के किलेदार आशा देवपुरा ने अपनी माँ से इजाजत लेने के बाद कुंवर उदयसिंह को अपने यहाँ रखना स्वीकार किया...||

भला एक माँ द्वारा दिया गया ऐसा अद्वितीय बलिदान व्यर्थ कैसे जाता.. धीरे-धीरे यह ख़बर फैलती गई ..कि महाराणा उदयसिंह जीवित हैं.. सामन्तों ने महाराणा उदयसिंह का राज्याभिषेक कर दिया.. 1540 ई. में महाराणा उदयसिंह ने महाराणा विक्रमादित्य व चन्दन के हत्यारे बनवीर को चित्तौड़गढ़ के युद्ध में परास्त करके उसका अस्तित्व ही नष्ट कर दिया...||

महाराणा उदयसिंह ने पन्नाधाय को चित्तौड़गढ़ में बुलवाया.. लेकिन पन्नाधाय वहां फिर कभी न आई..महाराणा उदयसिंह जानते थे.. कि पन्नाधाय के बलिदान के सामने उनके लिए कुछ भी कर पाना सूरज को रोशनी दिखाने के बराबर है.. लेकिन फिर भी वे पन्नाधाय के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहते थे...||

इसलिए 1564 ई. में चांदरास गाँव में महाराणा उदयसिंह ने साह आसकर्ण देवपुरा (आशा देवपुरा) को धाय माता पन्नाधाय की सुरक्षा के लिए 451 बीघा भूमि का ताम्रपत्र प्रदान किया.. मेवाड़ में इतने बड़े भूभाग के अनुदान का यही एक मात्र लेख है.. इस ताम्रपत्र पर “संवत् 1621 आसोज सुदी नवमी” अंकित है...||

18/09/2021

ब्रह्म मुहूर्त में जगे बिना भक्ति हो ही नहीं सकती ।

सूर्योदय से पहले का समय जिसे अमृतवेला या ब्रह्म मुहूर्त भी कहते हैं। सभी प्राचीन ग्रंथों में ब्रह्म मुहूर्त की बड़ी महिमा बखान की गई है।

ब्रह्म मुहूर्त में हमारे सभी विचार सोए हुए होते हैं, उस समय जो भी मुख्य विचार जागृत होता है वह रानी मक्खी की तरह होता है, उसी के पीछे सारे विचार चलते हैं, जैसे रानी मक्खी के पीछे सारी मक्खियां चलना शुरू हो जाती हैं। परमात्मा के उसी सात्विक विचार के प्रभाव के तले हमारे सारे विचार होते हैं, जिस से वे पवित्रता की ओर जाते रहते हैं। इस से हमसे दिनभर पवित्र कर्म ही होते रहते हैं।
क्योंकि जैसे विचार होते हैं, वैसे ही कर्म होते हैं।

सूरज उगने के बाद भी जो सोए रहते हैं उनका तेज खत्म हो जाता है।
उद्यन्त् सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे। -अथर्ववेद- 7/16/२

ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।
“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी।"

ब्रह्म मुहूर्त में जगने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता है।
"वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।
ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥"

अंग्रेज़ी में भी कहा गया है Early to bed and early to rise.
makes a man healthy wealthy and wise.
मगर early to rise तभी संभव होगा, जब early to bed होगा। क्योंकि जब तक जल्दी सोएंगे नहीं, नींद पूरी होगी नहीं। और नींद पूरी होगी नहीं, तो जलदी उठ नहीं पाएंगे।

ब्रह्म महूर्त में हमें परमात्मा का नाम, कथा,भजन आदि श्रवण करना चाहिए।
ब्रह्म महूर्त में की गई भक्ति, उपासना का प्रभाव कई हज़ार गुना अधिक होता है।

रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे।

13/09/2021

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07/09/2021


कृष्ण बलराम मथुरा के पास पहुँच भी नहीं पाए थे कि गहरी रात हो गयी। अभी जंगल का रास्ता खत्म नहीं हुआ था। कृष्ण ने बलराम से कहा - दाऊ, मैं बहुत थक गया हूँ रात भर नहीं चल सकता। यहीं सो जाते हैं, सुबह जाग कर बाकी यात्रा पूरी कर लेंगे। बलराम ने आसमान देखा और कहा - रात के दो पहर निकल चुके, सो जानें में ही लाभ है। अब तुम सो जाओ, मैं जाग कर रखवाली करता हूँ।
कृष्ण खुश हो गए, झटपट सोने लायक ऊँची जगह देखी और दाऊ को शुभ रात्रि कहा। देखते देखते कृष्ण गहरी नींद में सो गए। बलराम उन्हें सोते देखते रहे - "इसे तो क्षण भर भी नहीं लगती नींद आने में, चाहे मिट्टी पर सोना हो या पत्थर पर। जागा रहे तो एकदम चैतन्य जैसे आलस्य से जन्मों की दुश्मनी हो और सोने को तैयार हुआ तो क्षण भर में बेहोश। विलक्षण है ये कान्हा। " रात गहरी होने लगी और अन्धेरा बढ़ने लगा। तभी कहीं से दहाड़ने के स्वर ने एकदम चौंका दिया बलराम को। झटके से पीछे मुड़े तो देखा - एक विशाल दैत्य खड़ा है। लाल लाल जलती हुई आँखें और लम्बे बाल। बलराम काँप उठे, तभी वह दोगुना बड़ा हो कर फिर चिंघाड़ कर आगे बढ़ा। बलराम भाग कर कृष्ण के पास पहुँचे, तब तक वह दैत्य कई गुना बड़ा हो कर चीेख रहा था। बलराम ने कृष्ण को झकझोरा और गिर कर बेहोश हों गये।
कृष्ण एकदम जागे और बलराम को सम्हाला। तभी पीछे खड़े दैत्य की चीख फिर गूँजी। कृष्ण चौंक कर मुड़े और दैत्य कॉ देख कर उचक ख़ड़े हों गये। दो कदम आगे बढ़ कर उन्होंने पूछा - क्या चाहता है ? क्यों आया है ? दैत्य अचानक आधे आकार का हो गया पर फ़िर दहाड़ा। अब कृष्ण एकदम झपट पड़े - आखिर तू हमें परेशान क्यों कर रहा है ? क्या मुझसे युद्ध करना चाहता है ? कृष्ण उस दैत्य से लिपट पड़ने को तैयार हो गए। देखते-देखते दैत्य छोटा और छोटा होता हुआ अंगूठे भर का रह गया। कृष्ण ने उठा कर उसे अपने अंगोछे के किनारे से बाँध लिया और बलराम के पास मजे से सो गये।
सुबह जब बलराम की आँखें खुली तो रात की याद से वे एकदम सहम उठे। कृष्ण को उठा कर उन्होंने रात की घटना बताई। " अच्छा ! वो दैत्य कहीं ये तो नहीं था ?" कृष्ण ने अंगोछे का किनारा खोला जिसमेँ बंधा वह छोटे कीड़े सा दैत्य कुनमुना रहा था। बलराम ने नजदीक से देखा - " हाँ, था तो ऐसा ही पर यह तो बहुत बड़ा और भयानक था। "
कृष्ण हँसे - " दाऊ, आपने ही तो बताया था, डर की ओर दौड़ पड़ो और डर छोटा होने लगता है। जितना भागो उतना ही भय भयानक होता जाता है और हमें भगाता है। मैंने तो आपकी बात याद रखी पर लगता है आप स्वयँ भूल गए !"

01/08/2021

*इस पोस्ट को रोजाना एक-दो बार अवश्य पढ़ें।🙏🙏👇🏿👇🏼*

*विधि का विधान*

*श्री राम का विवाह और राज्याभिषेक, दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किए गए थे; फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक!*

*और जब मुनि वशिष्ठ से इसका उत्तर मांगा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया*

*"सुनहु भरत भावी प्रबल,*
*बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।*
*हानि लाभ, जीवन मरण,*
*यश अपयश विधि हाथ।।"*

*अर्थात - जो विधि ने निर्धारित किया है, वही होकर रहेगा!*

*न राम के जीवन को बदला जा सका, न कृष्ण के!*

*न ही महादेव शिव जी सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है!*

*न गुरु अर्जुन देव जी, और न ही गुरु तेग बहादुर साहब जी, और दश्मेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी, अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे!*

*रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके!*

*न रावण अपने जीवन को बदल पाया, न ही कंस, जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी!*

*मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश-स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है!*

*इसलिए सरल रहें, सहज, मन, वचन और कर्म से सद्कर्म में लीन रहें!*

*मुहूर्त न जन्म लेने का है, न मृत्यु का, फिर शेष अर्थहीन है!*

*सदैव प्रभुमय रहें, आनन्दित रहें!* 🌹
🙏🏾जय श्री राम जी🙏🏾

14/07/2021

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