Dr. Brijendra

Dr. Brijendra Dr.BK Upadhyay , Official Account
Nadivaid, Health advisor , Director, Bharatmulticare

13/04/2026
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31/03/2026

Today is a day of great joy. Today the textile division of Bharatmulticare and the company outlet were inaugurated by Dr BKupadhyaya, founder, Bharat Group and Sony Upadhyay, Director, Bharat textile.

आप सभी का आभार
bharatmulticare द्वारा दवाओं के उत्पाद एवं चिकित्सा के साथ- साथ
आज Textile industry में अपने दो नए उपक्रम को सफलता पूर्वक प्रारम्भ किया गया है
धन्यवाद


भारत में रीढ़ की हड्डी (Spine) के रोगियों की सटीक संख्या बता पाना मुश्किल है, क्योंकि यह एक व्यापक समस्या है जिसमें दर्द...
13/01/2026

भारत में रीढ़ की हड्डी (Spine) के रोगियों की सटीक संख्या बता पाना मुश्किल है, क्योंकि यह एक व्यापक समस्या है जिसमें दर्द, चोट, डिस्क प्रॉब्लम, टेढ़ापन (Scoliosis) आदि शामिल हैं, लेकिन यह एक आम समस्या है और लाखों लोग इससे प्रभावित होते हैं, खासकर सड़क दुर्घटनाओं (लगभग 4.5 लाख सालाना) 15 लाख का अनुमान है, और उम्र बढ़ने के कारण। रीढ़ की हड्डी के विकार (Spinal disorders) जैसे दर्द, सुन्नपन, कमजोरी और विकृति (Deformity) आम हैं, और इसके इलाज के लिए कई अस्पताल और विशेषज्ञ मौजूद हैं, लेकिन कोई निश्चित राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं है।
क्यों कि आरोप सीधे सरकार पर और नौकरशाहो पर तय होगा




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10/01/2026

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योषापस्मार (Hysteria) समाज में स्त्री का महत्व ज्यों-ज्यों गिरता गया, ज्यों-ज्यों स्वतंत्रता के अभाव में स्त्री जीवन भी ...
09/01/2026

योषापस्मार (Hysteria)

समाज में स्त्री का महत्व ज्यों-ज्यों गिरता गया, ज्यों-ज्यों स्वतंत्रता के अभाव में स्त्री जीवन भी जकड़ता गया। अनेक प्रकार की चिन्ताओं, योग्य प्रेमी का अभाव, शोक, कामुक, वातावरण का प्रभाव आदि कारणों से स्त्रियों में अनेक मानसिक विकार देखे जाते हैं। इनमें से योषापस्मार बहुत सामान्य व्याधि है। यद्यपि यह अपस्मार का ही एक स्वरूप है तथापि स्त्रियों में विशेष रूप से पाये जाने के कारण योषापस्मार कहलाता है।

किसी-किसी विद्वान ने इसे अपतंत्रक रोग भी माना है। जब तक स्त्रियों में रजदर्शन होता रहता है अर्थात् १२ से ५० वर्ष की आयु तक इस रोग के होने की संभावना रहती है। इसके बाद प्राय: नहीं होता। सम्भवत: आर्तव प्रवृत्ति से इसका कोई सम्बन्ध अवश्य घटित होता है। इस रोग को उत्पत्ति में कुलजता भी पायी जाती है। यौवनारम्भ और मासिक धर्म बंद होने के समय इसके उत्पन्न होने की अधिक आशंका रहती है, क्योंकि इन कालों में स्त्री की मानसिक दशा में स्वभाविक रूप से कुछ परिवर्तन अवश्य पाये जाते हैं। जिन स्त्रियों में मानसिक परिश्रम करने और भावनाओं पर अनियंत्रण की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है वे प्राय: इससे पीड़ित हो जाती हैं। स्वार्थी होकर दूसरे को प्रभावित करने की मानसिक दशा भी इसे उत्पन्न करने में सहायक होती है।

इस रोग में वास्तविक रचनात्मक विकृति कुछ भी नहीं पायी जाती है। सभी लक्षण क्रियात्मक विकृति के कारण ही उत्पन्न होते हैं जो निम्नलिखित में से सारे या कुछ हो सकते हैं-
१. रक्तनाश २. तीव्र या जीर्ण अजीर्ण ३. उद्वेग ४. कोष्ठबद्धता ५. शोक, निराश, चिन्ता, भय आदि मानसिक आघातकर भाव ६. रज:क्षय ७. गर्भाशय (जरायु) की विकृति ८. परिवार के अन्य व्यक्तियों का निर्दयतापूर्ण व्यवहार ९. दुर्बल प्रकृति १०. पति का प्रीतिरहित व्यवहार ११. अत्याधिक मनोग्लानि या आत्मनिर्भरता से यह रोग उत्पन्न हो जाता है। रोगी की प्रवृत्ति सदैव आत्मव्यंजक होती है, वह चाहता है कि उसका विकृत रूप में अन्य व्यक्तियों पर प्रभाव पड़े।

रोगी में बहुत ही विचित्र लक्षण पाये जाते हैं। इसी कारण निश्चित रूप में इस रोग के लक्षण बताना बहुत कठिन है। अपनी कठिनाइयों के निराकरण हेतु स्वयं ही रोगी लक्षण उत्पन्न करता है। उसे वस्तुत: इन लक्षणों के कारणों के विषय में स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। ये सब काम उसकी अज्ञानता में ही होते चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में वह जिस समय जिन लक्षणों का ध्यान करता है वे उस समय प्रकट हो जाते हैं। यही कारण है कि इस रोग से पीड़ित रुग्ण या रुग्णा में प्राय: वे ही लक्षण देखने को मिलते हैं, जिनको उसने पूर्व में देखा सुना या पढ़ा हो। कुछ लक्षण अनायास और कल्पित भी होते हैं।

फिर भी इसमें कुछ ऐसे लक्षण अवश्य पाये जाते हैं जो साधारणतया सभी स्त्रियों में देखने को मिलता है। इन लक्षणों को सुविधा के लिए दो भागों में बाँट देते हैं- मानसिक और २. शारीरिक।

१. मानसिक लक्षण- वास्तविक मानसिक लक्षण बहुत कम पाये जाते हैं। विभिन्न प्रकार के हावभावों का प्रदर्शन, आत्महत्या का प्रयत्न या दूसरों को आत्महत्या का भय दिखाना, प्रलाप करना, अपूर्णमूर्च्छा आदि मानसिक लक्षण होते हैं।

२. शारीरिक लक्षण- १. पेशियों में कठोरता हो जाना। २. विभिन्न पेशियों में विचित्र गतियाँ होना। ३. पैरों में लकवे जैसी स्थिति हो जाना, जिससे रोगी पैर घसीटते चलता है।
४. शरीर कम्प कभी-कभी हस्त-कम्प और पादकम्प। ५. बोलने में कष्ट ६. त्वचा में असह्यता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कभी-कभी यह संज्ञानाश सीमित और पैरों के निचले भाग तक ही पाया जाता है। ७. सूंघने की शक्ति जाती रहती है। ८. इसी प्रकार दृष्टि शक्ति का भी धीरे-धीरे नाश होता है। ९. धीरे बहरापन उत्पन्न हो जाता है। १०. पाचन के लक्षण प्राय: अरुचि उत्पन्न हो जाती है। अथवा किसी विशिष्ट वस्तु को देखकर वमन हो जाता है। भूख नहीं लगती, जल्दबाजी और आग्रहपूर्वक खा लेने पर पाचन ठीक से नहीं हो पाता। कण्ठ में भारीपन और कुछ चुभने जैसा लगता है। आक्षेपक की स्थिति में इस रोग में सामान्य अपस्मार रोग की अपेक्षा आक्षेप के वेग की दशा में कुछ विशेषतायें पायी जाती हैं इसी आधार पर इसे अपस्मार या अपतंत्रक से भिन्न माना जाता है। ये विशेषतायें निम्नांकित हैं-
१. आक्षेपक प्राय: प्रतिदिन और एक ही समय पर (वह भी बहुत कुछ निश्चित सा होता है) होते हैं। २. वेग का आक्रमण एकान्त में नहीं होता, दूसरों के उपस्थित होने पर ही होता है। ३. यह निद्रा की स्थिति में कभी नहीं होता। ४. गिरने से पूर्व भी रोगी अपने को पूर्णतया संभाल लेता है, अतएव उसे चोट नहीं लगती तथा जिह्वा भी नहीं कटती। ५. नेत्र ऊपर की ओर स्थिर हो जाते हैं तथा दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बंध जाती हैं।
६. रोगी कभी हँसता है, कभी रोता है ये क्रियायें अनैच्छिक होती हैं।
७. मल-मूत्र की प्रवृत्ति अनैच्छिक नहीं होती।
८. वेग बहुत धीमी गति से प्रारम्भ होता है।
९. जल्दी ही होश आता है, मूर्च्छा देरी तक बनी रहती है।

इस प्रकार लक्षणों के आधार पर योषाऽपस्मार ‘हिस्टीरिया’ को पहचाना जाता है।

जैसा कि पूर्व में बताया गया है, इसके लक्षणों में स्थिरता और एकरूपता नहीं पायी जाती। एक ही रोगी में विभिन्न वेगकालों में भिन्न-भिन्न लक्षणों का प्रदुर्भाव होना तक देखा गया है। इसी दृष्टि से इस रोग की चिकित्सा भी अनेक रूप से की जाती है।

यह भी देखा जाता है कि कभी-कभी परिस्थितियों के बदल जाने पर रोगी की अचानक निवृत्ति हो जाती है और रोगी पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है। पुन: रोग का आक्रमण कभी भी हो सकता है। अथवा रोगी इस रोग से आजीवन मुक्त भी रह सकता है।

इस रोग की चिकित्सा में मनोयोग की बहुत आवश्यकता होती है। यद्यपि इसका कोई सफल प्रयोग निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता, क्योंकि किसी रोगी में कोई औषधि तो किसी अन्य में कोई लागू होती है।

इसकी चिकित्सा में दो बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिये
१. रोगी को मानसिक चिन्ताओं से दूर रखा जाय।
२. शारीरिक शुद्धि बराबर होती रहे।
१. तात्कालिक उपाय- वेग के समय मूर्च्छा को दूर करने के लिए तीक्ष्ण नस्य दिया जाना चाहिए इसके लिए-
१. चूने और नौसादर को मिलाकर सूंघना, इसके कारण तीक्ष्ण गंधी वायु के नासा प्रवेश से तीव्र छींक आकर बेहोशी दूर हो जाती है।
२. प्याज के रस की दो बूँदें नासा पुटों में डालना
३. थोड़ा सा नमक पानी में घोलकर ४-५ बूँदें नासा पुटों में डालनी चाहिये।
ये सभी क्रियायें बेहोशी को दूर करती हैं, समय पर जो उपलब्ध हो उसे करना चाहिए।
२. शामक उपाय- मानसिक शान्ति के लिये सान्त्वना, धार्मिक कृत्यों में संलग्न करना आदि क्रियाकारी हैं। अन्य उपाय निम्नवत हैं-
१. शिर पर नवनीत या शतधौत घृत की मालिश करना चाहिए।
२. बदन पर चंदन, धनियाँ, नेत्रबला, खस, कपूर और जटामांसी का लेप करना चाहिये।
३. बालवचा ४-५ रत्ती चूर्ण, कालीमिर्च ५-७ दाने पीसकर खट्टे दही के ४-५ तोला की मात्रा के साथ प्रात:-सायं सेवन करें।
४. जुन्द वेदस्तर, घृतभ्रष्ट हींग, कूचला, जटामांसी और वचा प्रत्येक १-१ तोला लेकर चूर्णकर, ब्रह्मी स्वरस की भावना दें। १-१ रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें। प्रात:-सायं १ गोली को दूध के साथ खा जायें।
५. शरीर पर नारायण तैल की मालिश करनी चाहिए।
६. सप्ताह में एक बार या दो बार मृदु विरेचन लेने से कोष्ठ शुद्धि होने से रोगी को आराम मालूम होता है।
निम्नलिखित शास्त्रीय घृतों में से किसी एक का प्रयोग निरन्तर रोगनिवृत्ति पर्यन्त चलाना चाहिये।
१. ब्राह्मी घृत- ब्राह्मी स्वरस ४ सेर, वच, कूठ, शंखपुष्पी इन तीनों द्रव्यों का कल्क १ पाव और गोघृत (पुराना हो तो उत्तम है) १ सेर लेकर घृत सिद्ध करें। इसकी मात्रा १ तोला दुग्धानुपान।
२. सेंधवाद्यघृत- सेंधा नमक, हींग, पिप्पली इनका कल्क १ भाग, गोघृत ४ भाग, गोमूत्र १६ भाग लेकर घृत सिद्ध करें। इस घृत को १/२-१ तोले की मात्रा में लेकर करना चाहिये।

जटामांसी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वचा, कूठ, पीपलामूल, रास्ना, शतावरी, अश्वगंधा आदि द्रव्य दोषापस्मार को दूर करने वाले होते हैं।
रसयोगों में- स्मृतिसागर रस (यो.र.) योग्रन्द्ररस आदि।

अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:। मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।। अपामार्ग सरस्त...
08/01/2026

अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)

अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:।
मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।।
अपामार्ग सरस्तीक्ष्णो दीपनस्तिक: कटु:।
पाचनो रोनश्छर्दिकफमेदोऽनिलापह:।।
(भा.प्र. २१९-२२०)

अपामार्ग को चिरचिरा, शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमञ्जरी आदि नामों से जाता है। अपामार्ग तिक्त तथा कटु रसयुक्त सारक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, पाचक, रोचक एवं वमन, कफ, मेद, वायु, हृद्रोग, आध्मान, अर्श, कण्डू, शूल, उदररोग और अपची को दूर करता है।
अपामार्ग (चिरचिरा) बहूपयोगी, भारत के सभी प्रान्तों के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्रों में स्वत: उत्पन्न होने वाला पौधा है। यह पौधा विशेष रूप से वर्षा ऋतु में पाया जाता है किन्तु कहीं-कहीं वर्षपर्यन्त भी मिलता है। वर्षा की पहली फुहार पड़ते ही यह अंकुरित होने लगता है। यह सर्दियों में फलता-फूलता है तथा गर्मियों में परिपक्व होकर फलों के साथ पौधा भी सूख जाता है। इसके पुष्प हरी, गुलाबी कलियों से युक्त तथा बीज चावल जैसे होते हैं। जिन्हें अपामार्ग तंडुल कहते हैं।

अपामार्ग को लैटिन भाषा में एकायरेन्थिस् एस्पेरा (Achyranthes aspera) कहते हैं। यह एमारेन्थेसी (Amaranthaceae) कुल का पौधा है।

संस्कृत भाषा में नाम- अपामार्ग को संस्कृत भाषा में शिखरी, अध:शूल, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमंजरी, प्रत्याकपुष्पी आदि नामों से जाना जाता है।
प्रादेशिक भाषा में नाम- अपामार्ग को विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में निम्नांकित नामों से जाना जाता है-
हिन्दी- चिरचिरा, अपामार्ग, लटजीरा
उर्दू- चिरचिटा
असमिया- अपंग
कन्नड़- उत्तरणी
कोकणी- कान्टमोग्रो
गुजराती- अघेड़ो
तमिल- नायुरुवि
तेलगू- अपामार्गमु
बंगला- अपांग, चिरचिटी
नेपाली- दतिवन
पंजाबी- कुत्री, पुठखण्डा
मराठी- अघाड़ा
मलयालम् - वनकटलटी, कटलटी
अंग्रेजी- Washerman's plant
अरबी- अत्कुमह
फारसी- खरेवाजहुन
गणवर्गीकरण-

स्वरूप- अपामार्ग का पौधा ३०-९० से.मी. ऊँचा, वर्षायु अथवा बहुवर्षायु प्राय: काष्ठीय आधार युक्त, शाकीय होता है। इसका काण्ड रक्ताभ, बैंगनी वर्ण का होता है। इसकी शाखायें मोटी, धारीदार तथा चतुष्कोणीय होती हैं। इसके पत्र विपरीत, २.५-१२.५ से.मी. लम्बे होते हैं। पत्रों के आकार अलग-अलग होते हैं। इसके फल कपड़ों में चिपक या हाथ में चुभ जाते हैं। इसके बीज रक्ताभ, भूरे रंग के, उपबेलनाकार, शीर्ष पर शुण्डित तथा आधार पर गोल होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से नवम्बर तक होता है।

रासायनिक संघटन- अपामार्ग की जड़ में ट्राईटर्पीनोयड, सैपोनिन, एकायरेन्थिन, बीटेन, हेन्ट्रीएकोन्टेन, ग्लाइकोसाईड तथा ओलिएनोलिक अम्ल पाया जाता है। इसके बीज के तैल में लिनोलिईक, ओलीक, पामिरिक, स्टेयरिक, बेहैनिक, एराकिडिक, मिरिस्टिक तथा लारिक अम्ल पाया जाता है। इसके पौधे में प्रचुर मात्रा में पोटाश पाया जाता है।
उत्पत्ति स्थान- अपामार्ग का पौधा पूरे भारत के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्र में स्वत: उत्पन्न होता है।

जाति भेद- जाति भेद से अपामार्ग श्वेत, रक्त अपामार्ग, गिरी अपामार्ग, रक्तपुष्पामार्ग, पक्ष पत्रापामार्ग प्रकार का पाया जाता है।
रस पंचक-
रस- तिक्त, कटु
गुण- लघु
वीर्य- शीत वीर्य
विपाक- कटु
प्रभाव- रेचक, दीपन
प्रयोज्यांग- पत्र, मूल तथा पंचांग
मात्रा- स्वरस १०-२० मि.ली.
मूल चूर्ण- ३-६ ग्राम, क्षार १/२-२ ग्राम।
दोषघ्नता- कफवात शामक, कफपित्त संशोधक।
कर्मघ्नता- शोथहर, वेदना स्थापक, लेखन, विषघ्न, त्वकदोषहर, व्रणशोधक, शिरोविरेचक, रेचन, दीपन, पाचन, पित्तसारक, कृमिघ्न, रक्तशोधक, रक्तवर्धक, शोथहर, मूत्रल, अश्मरीहर, स्वेदजनन, कुष्ठघ्न।
रोगघ्नता- अश्मरी, शर्करा, वातविकार, मूत्रकृच्छ्र, कृमिकुष्ठ, यकृत प्लीहा, विसूचिका, भस्मक, अर्श, वृक्कशूल, योनिशूल।

रोगानुसार प्रयोग
माइग्रेन में- अपामार्ग के बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से आधा सीसी दर्द में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अन्दर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के जरिये निकल जाता है।

नेत्र विकार में- २ ग्राम अपामार्ग चूर्ण में २ चम्मच शहद मिलाकर २-२ बूँद आँख में डालने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।

नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, नेत्रकण्डू, नेत्रस्राव, नेत्रों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में अपामार्ग की स्वच्छ मूल को साफ तांबे के बर्तन में थोड़ा सा सेंधा नमक मिले हुये दही के पानी के साथ घिसकर अंजन के रूप में लगाने से लाभ होता है।

बहरेपन में- अपामार्ग की साफ, धोई हुई जड़ का रस निकालकर उसमें बराबर मात्रा में तिल का तैल मिलाकर आग में पका लें। जब केवल तैल शेष रहे तब उतार लें, छानकर शीशी में रख लें। इस तैल को गर्म करके हर रोज २-३ बूँद कान में डालने से कान का बहरापन व कर्णपूय दूर हो जाता है।

¬ अपामार्ग क्षार का घोल तथा अपामार्ग पत्र कल्क में चार गुना तैल मिलाकर तैल पाक कर प्राप्त तैल से कर्णपूरण करने से कर्णनाद एवं बहरापन दूर होता है।
दाँत के दर्द में- अपामार्ग के २-३ पत्तों के स्वरस को रूई के फाहे में डालकर दाँत में लगाने से दाँत का दर्द दूर हो जाता है। अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दाँत मोती की तरह चमकने लगते हैं। दन्तशूल, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुँह की दुर्गन्ध भी दूर हो जाती है।
श्वास-कास में- अपामार्ग की जड़ में बलगम युक्त खाँसी और दमे को नष्ट करने का चमत्कारिक गुण होता है। इसके ८-१० सूखे पत्ते को हुक्के में रखकर पीने से श्वास रोग में आराम मिलता है।

¬ लगभग १०-२५ मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार में शहद मिलाकर प्रात:-सायं चटाने से बच्चों की श्वास नली तथा वक्ष:स्थल में संचित कफ दूर होकर बाल कास दूर होता है।

¬ खाँसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लसलसा हो गया हो या न्यूमोनिया हो तो १२५-२५० मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार व सममात्रा में चीनी मिलाकर ३० मि.ली. गर्म जल से सुबह-शाम सेवन करने से ७ दिन में लाभ होता है।
६ मि.ली. अपामार्ग की जड़ का चूर्ण व ७ नग कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम ताजे जल से सेवन करने पर खाँसी दूर हो जाती है।

¬ अपामार्ग के पंचांग की भस्म बनाकर ५०० मि.ग्रा. भस्म में शहद मिलाकर चाटने से कुक्कुर खाँसी में राहत मिलती है।
विसूचिका में- २-३ ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को दिन में २-३ बार शीतल जल के साथ सेवन करने से विसूचिका तुरन्त नष्ट हो जाती है। अपामार्ग के ४-५ पत्तों का रस निकालकर थोड़ा सा मिश्री मिलाकर सेवन करने से भी विसूचिका में लाभ मिलता है।

उदर विकार में- २० ग्राम अपामार्ग पंचांग को लेकर ४०० मि.ली. पानी में पकाने और काली मिर्च मिलाकर दिन में ३ बार सेवन करने से उदरशूल मिट जाता है।

भस्मक रोगों में- भस्मक रोग में अपामार्ग का चूर्ण ३ ग्राम दिन में दो बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करने से निश्चित् रूप से लाभ होता है। अपामार्ग के ५-१० ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिकतम ३ बार करने से ही रोग ठीक होता है। इसके ५-१० ग्राम बीजों का सेवन करने से भी भस्मक रोग में आराम मिलता है और अर्श में लाभ होता है।

अर्श में- अपामार्ग की ६ पत्तियाँ तथा ५ नग कालीमिर्च को पानी के साथ पीसकर छानकर प्रात: सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है और उससे निकलने वाला रक्तार्श बन्द हो जाता है। १०-२० ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से पित्तज या कफज रक्तार्श में लाभ होता है।

यकृत प्लीहा में- ५०-६० मि.ली. अपामार्ग पंचांग क्वाथ को भोजन से पूर्व सेवन करने से पाचक रस में वृद्धि होकर शूल कम होता है। भोजन के २-३ घण्टे पश्चात् अपामार्ग पंचांग पीने से अम्लता कम होती है तथा स्राव उचित मात्रा में होता है जिससे पित्ताश्मरी का शमन हो जाता है।

वृक्कशूल में- अपामार्ग की ५-१० ग्राम जड़ को पानी में पीसकर, घोलकर पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह औषधि बस्ति की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्कशूल के लिए यह प्रधान औषधि है।

योनिशूल में- अपामार्ग की जड़ को पीसकर, रस निकालकर रुई को भिगोकर योनि में रखने से योनिशूल और मासिक धर्म की रुकावट मिट जाती है।

गर्भधारण में- अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव के कारण जो स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर पातीं, उन्हें ऋतु स्नान के दिन उत्तम भूमि में उत्पन्न इस दिव्य औषधि के १० पत्ते या इसकी १० ग्राम जड़ को गाय के १२५ मि.ली. दूध के साथ पीसकर, छानकर ४ दिन तक दिन में ३ बार पिलाने से स्त्री गर्भ धारण कर लेती है। यह प्रयोग यदि एक बार में सफल न हो तो अधिक से अधिक तीन बार करें।

रक्तप्रदर में- अपामार्ग के लगभग १० ग्राम ताजे पत्ते एवं ५ ग्राम हरी दूब, दोनों को पीसकर, ६० मि.ली. जल में मिलाकर छान लें तथा गाय के दूध में २० मि.ली. या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर प्रात:काल ७ दिन तक पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें। इससे रक्त प्रदर निश्चित् रूप से ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गाँठ के कारण रक्तस्राव होता है तो इस प्रयोग से गाँठ भी घुल जाती है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस के मुख्य लक्षणों में खूनी दस्त (डायरिया), पेट में दर्द और ऐंठन, मल त्यागने की तीव्र और बार-बार इच्छा,...
23/12/2025

अल्सरेटिव कोलाइटिस के मुख्य लक्षणों में खूनी दस्त (डायरिया), पेट में दर्द और ऐंठन, मल त्यागने की तीव्र और बार-बार इच्छा, और मलाशय से रक्तस्राव (खून आना) शामिल हैं, जिनके साथ अक्सर थकान, वजन घटना, और बुखार जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं, क्योंकि यह बड़ी आंत (कोलन) की अंदरूनी परत की सूजन होती है.
सामान्य लक्षण:
दस्त (Diarrhea): पानी जैसे, पतला मल, जिसमें अक्सर खून और मवाद (pus) होता है.
रक्तस्राव (Bleeding): मल के साथ थोड़ी मात्रा में या बहुत ज़्यादा खून आना, जो मलाशय से भी हो सकता है.
पेट में दर्द और ऐंठन (Abdominal Pain/Cramps): यह दर्द पेट के निचले हिस्से या बाईं ओर ज़्यादा हो सकता है, और मल त्यागने के बाद थोड़ा आराम मिल सकता है.
मल त्यागने की तात्कालिकता (Urgency): मल त्यागने की ज़बरदस्त इच्छा होना, लेकिन कभी-कभी मल न आना (Tenesmus).
थकान (Fatigue): अत्यधिक थकान और ऊर्जा की कमी महसूस होना.
वजन घटना (Weight Loss): भूख न लगने के कारण या बीमारी की गंभीरता से वज़न कम होना.
बुखार (Fever): हल्का या तेज़ बुखार आना.
भूख न लगना (Loss of Appetite): खाने की इच्छा कम होना.
लक्षणों की गंभीरता:
लक्षण हल्के, मध्यम या गंभीर हो सकते हैं, और ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि आंत के कितने हिस्से में सूजन है और कितनी गंभीर है.
कुछ समय के लिए लक्षण गायब हो सकते हैं (Remission period), फिर वापस आ सकते हैं (Flare-up).
यदि आपको ये लक्षण महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि यह एक गंभीर स्थिति है जिसके सही इलाज की ज़रूरत होती है.



सिंगरौली (मध्य प्रदेश) - जंगल के 6 लाख देशी पेड़|हसदेव (छत्तीसगढ़) - कम से कम 6 लाख पेड़|अंडमान - कम से कम 10 लाख पेड़|बागेश...
21/12/2025

सिंगरौली (मध्य प्रदेश) - जंगल के 6 लाख देशी पेड़|
हसदेव (छत्तीसगढ़) - कम से कम 6 लाख पेड़|
अंडमान - कम से कम 10 लाख पेड़|
बागेश्वरधाम - 5700 पेड़|
उत्तराखंड में ही कहीं अन्यत्र - 6000 से अधिक देवदार के पेड़|
हरियाणा - 30,000 से अधिक (कथित रूप से यूकलिप्टस के) पेड़|
भागलपुर (बिहार) - 10000 आम के पेड़|
राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश - संसार की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में एक अरावली की पहाड़ियां और जंगल|
उड़ीसा - बाल्दा की पहाड़ी और प्रसिद्ध गुफा|
लद्दाख - इकलौता बड़ा चारागाह|

गाय, भैंस, नीलगाय, जंगली सुअर के बाद अब कुत्ते और कबूतर (और परोक्ष रूप से बाकी सभी जीव भी)

दुनिया प्राकृतिक संसाधनों और विरासतों को हजारों साल तक सँभाल कर रखती है और यहाँ कारखाने लगवाने, सड़क, बिजली, मेट्रो, ट्रेन के लिए वही जगह मिलती है, जबकि दुनिया में सबसे विरल जंगल यहीं बचे हैं, पेड़ों के लगभग सबसे कम घनत्व|

पैसों के लिए, कथित आर्थिक विकास के लिए क्या क्या बर्बाद करोगे और क्या क्या निगल जाओगे, अपनी अगली पीढ़ी की साँस भी? शर्म है कि आती ही नहीं|

सबकुछ का अभी दोहन कर लो, जेब भर लो, फिर साँस लेने के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर का प्लांट भी लगवा लेना|

✊🏔️🏔️⛰️⛰️✊

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