26/08/2026
Gita Acharan in the Punjab Kesari
*238. विचार से कर्म तक*
https://open.spotify.com/episode/4qMdGoDadMmB5SM68rnaTc?si=r6N-tqqIR8-5Y8KnTdFmyA&utm_source=copy-link
जब हम (ज्ञाता) किसी फूल (ज्ञान के विषय) को देखते हैं तो हम उसके रंग और सुगंध (ज्ञान) सहित अनेक गुणों को ग्रहण करते हैं। यह स्थिति एक कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए कोई कवि उस फूल की सुंदरता का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है। कवि कर्ता है, कलम उसका साधन (उपकरण) है, और कविता लिखना उसका कर्म है। इसी प्रकार कोई भक्त उस फूल को अपने इष्ट देवता को अर्पित करने के लिए तोड़ सकता है; कोई प्रेमी उसी फूल को अपने प्रियजन को देने के लिए तोड़ सकता है; और कोई वनस्पतिशास्त्री (Botanist) उस फूल की प्रकृति का अध्ययन करने में जुट जाता है।
इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं “ज्ञान, ज्ञेय (ज्ञान का विषय) और ज्ञाता -ये तीन तत्व कर्म को प्रेरित करते हैं। कर्म के उपकरण, स्वयं कर्म और कर्ता-ये तीन कर्म के घटक हैं” (18.18)। अर्थात् प्रत्येक कर्म की उत्पत्ति पहले मानसिक स्तर पर होती है और उसके पश्चात् वह भौतिक स्तर पर प्रकट होता है।
गीता के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं मनुष्य को केवल अपने कर्म करने का अधिकार है परंतु उनके फल (कर्मफल) पर उसका अधिकार नहीं है। आगे चलकर वे समझाते हैं कि दैवम् (दैवी इच्छा या अस्तित्व की इच्छा) भी किसी कर्म के फल के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है। यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि परिणामों को प्रभावित करने वाली एक ऐसी शक्ति भी है जो हमारे नियंत्रण से परे है। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण एक अन्य श्लोक में बताते हैं कि कर्म को प्रेरित करने वाले तीन प्रमुख तत्व हैं। जैसा कि पहले पुष्प के उदाहरण से स्पष्ट किया गया, ज्ञाता द्वारा किसी वस्तु के संबंध में प्राप्त ज्ञान अत्यन्त व्यक्तिनिष्ठ होता है। यही व्यक्तिनिष्ठता बताती है कि एक ही परिस्थिति में विभिन्न व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और भिन्न-भिन्न कर्म करते हैं।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “तीन गुणों के भेद के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता तीन-तीन प्रकार के बताए गए हैं (18.19)। जिस ज्ञान से मनुष्य समस्त प्राणियों में एक अविनाशी परमात्मा को अविभक्त रूप में देखता है उस ज्ञान को सात्विक माना जाता है (18.20)। जिस ज्ञान से मनुष्य अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न जीवों को स्वतंत्र और असंबद्ध रूप में देखता है, वह ज्ञान राजसिक कहा गया है (18.21)। और जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है जो बिना कारण के, बिना तत्त्व के और असत्य पर आधारित है, उसे तामसिक कहा गया है” (18.22)।