09/08/2026
वह कंबल जो कभी खोया ही नहीं…
बाबा श्री नीब करौरी महाराज जी के चरणों में एक भावपूर्ण समर्पण
कैंची धाम की वह ठिठुरती हुई सर्द शाम…
हिमालय की ठंडी हवाएँ जैसे शरीर को ही नहीं, मन को भी कंपा रही थीं। आश्रम में भक्त बाबा के चारों ओर बैठे थे। किसी के कंधे पर ऊनी शॉल थी, तो कोई ठंड से बचने के लिए अपने वस्त्रों में सिमटा हुआ था।
और बाबा श्री नीब करौरी महाराज जी…
अपनी सहज मुस्कान के साथ अपनी लकड़ी की चौकी पर विराजमान थे।
तभी एक गरीब ग्रामीण आश्रम में आया।
उसके कपड़े पुराने और फटे हुए थे। ठंड से उसके हाथ काँप रहे थे। वह बाबा के सामने पहुँचा, हाथ जोड़कर सिर झुका दिया।
उसने कुछ माँगा नहीं।
लेकिन बाबा को माँगने की आवश्यकता भी कहाँ थी?
बाबा तो बिना कहे ही हृदय पढ़ लेते थे।
महाराज जी ने अपने कंधों पर ओढ़ा हुआ गर्म कंबल उतारा और उस व्यक्ति के हाथों में दे दिया।
वह व्यक्ति कुछ क्षण बाबा को देखता रहा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कंबल को अपने सीने से लगाया और बाबा के चरणों में झुककर वहाँ से चला गया।
पास बैठे कुछ शिष्य चिंतित हो उठे।
एक शिष्य ने धीरे से कहा—
“बाबा, यह तो आपका एकमात्र कंबल था। रात बहुत ठंडी है। हम आपके लिए दूसरा कंबल ले आएँगे।”
बाबा मुस्कुराए।
कुछ नहीं बोले।
जैसे कह रहे हों—
“जिसने उसे भेजा है, वही मुझे भी देगा।”
अगली सुबह आश्रम में एक संपन्न व्यक्ति पहुँचा।
वह दूर दिल्ली से आया था। उसने बताया कि कई दिनों से उसके मन में बाबा के दर्शन करने की तीव्र इच्छा उठ रही थी और वह स्वयं को रोक नहीं पाया।
वह बाबा के सामने पहुँचा और श्रद्धापूर्वक कई नए गर्म कंबल अर्पित कर दिए।
शिष्य एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
कल बाबा ने अपना कंबल दे दिया था…
और आज बाबा के पास कई कंबल स्वयं आ गए थे।
बाबा हँस पड़े।
फिर अत्यंत सहज भाव से बोले—
“तुम लोग आश्चर्य क्यों करते हो?
जो उसकी देखभाल करता है, वही मेरी भी देखभाल करता है।”
बस…
यही तो बाबा की शिक्षा थी।
जहाँ संसार हिसाब लगाता है, वहाँ संत विश्वास रखते हैं।
हम सोचते हैं—
“अगर मैंने यह दे दिया तो मेरे पास क्या बचेगा?”
बाबा सिखाते हैं—
“तुम प्रेम से दो, जो तुम्हारे लिए आवश्यक होगा, वह तुम्हें मिल जाएगा।”
वास्तव में कंबल कभी खोया ही नहीं था।
वह केवल एक व्यक्ति के शरीर से दूसरे व्यक्ति के शरीर तक पहुँचा था।
वस्तु गई थी, लेकिन सेवा बढ़ गई थी।
कंबल गया था, लेकिन करुणा लौट आई थी।
और शायद यही बाबा के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य था—
त्याग करने वाला कभी खाली नहीं होता,
यदि उसका त्याग प्रेम से किया गया हो।
बाबा के लिए दान कोई प्रदर्शन नहीं था।
सेवा कोई उपकार नहीं थी।
त्याग कोई बोझ नहीं था।
सब कुछ सहज था…
क्योंकि बाबा जानते थे कि इस संसार में हमारा अपना वास्तव में कुछ भी नहीं है।
जो मिला है, उसी का दिया हुआ है।
और जो आवश्यकता में किसी को दे दिया जाता है, वह नष्ट नहीं होता—
वह किसी न किसी रूप में कृपा बनकर लौटता है।
कभी धन बनकर…
कभी भोजन बनकर…
कभी किसी अनजान व्यक्ति की सहायता बनकर…
और कभी ऐसी शांति बनकर, जिसे संसार की कोई संपत्ति खरीद नहीं सकती।
बाबा हमें यही तो सिखाते हैं—
ईश्वर पर भरोसा रखो।
जिसे आवश्यकता है, उसकी सहायता करो।
और देने के बाद उसका हिसाब मत रखो।
क्योंकि जब देने वाला अहंकार छोड़ देता है, तभी सेवा पूजा बन जाती है।
आज भी जब बाबा के भक्त कैंची धाम की ओर देखते हैं, तो उन्हें केवल एक आश्रम दिखाई नहीं देता।
उन्हें दिखाई देती है—
एक ऐसी चेतना,
जहाँ भूखे को भोजन मिलता है,
ठिठुरते को कंबल मिलता है,
दुखी को सहारा मिलता है,
और टूटे हुए मन को बाबा के चरणों में शांति मिलती है।
बाबा श्री नीब करौरी महाराज जी के चरणों में यही प्रार्थना है—
हे महाराज जी,
हमारे भीतर इतना प्रेम भर दीजिए कि हम किसी की आवश्यकता को उसके कहने से पहले समझ सकें।
इतनी करुणा दीजिए कि किसी दुखी को देखकर हमारा हृदय स्वयं सेवा के लिए आगे बढ़े।
इतना विश्वास दीजिए कि देने के बाद हमें अपने कल की चिंता न रहे।
और इतना समर्पण दीजिए कि हर जीव में आपका ही स्वरूप दिखाई देने लगे।
हमारे हाथ सेवा के लिए उठें,
हमारे शब्द किसी को दुःख न दें,
हमारा मन अहंकार से मुक्त हो,
और हमारा जीवन आपके चरणों में समर्पित हो जाए।
क्योंकि अंततः…
कंबल तो एक दिन पुराना हो जाएगा,
धन भी समाप्त हो जाएगा,
शरीर भी मिट्टी में मिल जाएगा—
लेकिन प्रेम से की गई सेवा…
वह कभी नष्ट नहीं होती।
वह किसी न किसी हृदय में जीवित रहती है।
और शायद यही उस कंबल की सच्ची कहानी है—
वह कंबल कभी खोया ही नहीं था…
वह बाबा की कृपा बनकर लौट आया था।
जय श्री राम।
जय हनुमान।
जय बाबा नीब करौरी महाराज जी।
🙏 महाराज जी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏
“प्रेम करो, सेवा करो और प्रभु को स्मरण करते रहो।”
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