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Sethi Rasayan Shala We are Manufacturers, Suppliers and Exporters of a qualitative range of Ayurvedic Medicines. Our range is well-received in the market.

SETHI RASAYAN SHALA Manufacturers of Ayurvedic & Herbal Medicines | We Share Authentic Ayurvedic Health Tips, Disease Awareness & Natural Healing Knowledge Based on Traditional Principles | Promoting Holistic Wellness & Preventive Healthcare Through Trus Sethi Rasayan Shala established in the year 1980, is a leading manufacturer of Ayurvedic herbal products and pharmaceutical bulk drugs.The factory is established in Indore.

नाना पाटेकर जैसी घटना से सबक लें : हार्ट अटैक में ये गलतियाँ कभी न करें, तत्काल उपचार और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण प्रसिद्ध अ...
27/10/2026

नाना पाटेकर जैसी घटना से सबक लें : हार्ट अटैक में ये गलतियाँ कभी न करें, तत्काल उपचार और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

प्रसिद्ध अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित आवास पर हृदयाघात से निधन हो गया । वे 75 वर्ष के थे। रिपोर्ट्स के अनुसार रात करीब 2:30 बजे उन्होंने तबीयत बिगड़ने और बाईं ओर दर्द की सूचना मित्र को दी ।
संदेश देर से देखने के कारण मित्र सुबह करीब 4 बजे पहुँचे । तब अत्यधिक पसीना और साँस लेने में तकलीफ हो रही थी । एम्बुलेंस बुलाई गई, अस्पताल में 45 मिनट तक सीपीआर दिया गया लेकिन करीब 5:10 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया ।
ऑटोप्सी रिपोर्ट में कारण स्पष्ट हुआ । लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी में ब्लड क्लॉट के कारण एक्यूट मायोकार्डियल इन्फार्क्शन, जो एथेरोस्क्लेरोटिक कोरोनरी आर्टरी डिजीज के कारण हुआ ।
यह घटना हर परिवार को चेतावनी देती है कि सीने में दर्द, ठंडा पसीना, साँस फूलना या अचानक कमजोरी को कभी मामूली न समझें । सुबह का इंतजार या दर्द के खुद ठीक होने की उम्मीद जानलेवा साबित हो सकती है ।

हार्ट अटैक क्या है और यह अचानक क्यों होता है ? ❤️ हृदय की मांसपेशियों को ऑक्सीजन युक्त रक्त कोरोनरी धमनियों से मिलता है। वर्षों की अनियमित जीवनशैली से धमनियों की दीवारों पर कोलेस्ट्रॉल और फैट जमा होकर प्लाक बन जाता है।
प्लाक अचानक फटने पर ब्लड क्लॉट बनता है जो धमनी को आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध कर देता है । इससे हृदय के हिस्से को ऑक्सीजन नहीं मिलता और मांसपेशियाँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। इसे मायोकार्डियल इन्फार्क्शन या हार्ट अटैक कहते हैं ।

प्रमुख जोखिम कारक :* उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ एलडीएल (खराब कोलेस्ट्रॉल), मधुमेह, धूम्रपान वैपिंग तंबाकू सेवन, मोटापा, शारीरिक सक्रियता का अभाव, पुरानी अनिद्रा, अत्यधिक मानसिक तनाव और कम उम्र में हृदय रोग का पारिवारिक इतिहास ।
हार्ट अटैक केवल अस्वस्थ दिखने वालों को ही नहीं आता । बाहर से स्वस्थ और फिट दिखने वाले लोगों को भी हो सकता है । शारीरिक बनावट देखकर हृदय की आंतरिक स्थिति का अंदाजा न लगाएँ ।

हार्ट अटैक के शुरुआती और छुपे हुए लक्षण जिन्हें नजरअंदाज न करें :* लक्षण हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते । छाती के बीच दबाव, भारीपन, जकड़न, तेज दर्द या जलन जो कुछ मिनट रहे या बार-बार लौटे । अचानक साँस फूलना । बिना मेहनत के ठंडा पसीना आना। मतली, उल्टी या गंभीर अपच जैसा अनुभव जिसे लोग गैस समझ लेते हैं । दर्द का एक या दोनों हाथों, कंधे, पीठ, गर्दन या जबड़े तक फैलना ।
अचानक अत्यधिक कमजोरी, तेज चक्कर या बेहोशी । सबसे बड़ी गलती यह सोचना कि यह सिर्फ गैस या एसिडिटी है और खुद ठीक हो जाएगा । महिलाओं, बुजुर्गों और डायबिटीज के मरीजों में कई बार तेज सीने के दर्द के बजाय केवल अत्यधिक थकान, साँस फूलना, जबड़े में जकड़न या मतली जैसे हल्के लक्षण ही दिखते हैं ।

हार्ट अटैक का संदेह होने पर तत्काल क्या करें (गोल्डन आवर के नियम) :* पहले 60 मिनट यानी गोल्डन आवर में सही उपचार जान बचा सकता है ।

पहला कदम :* तुरंत राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर 112 पर कॉल करें या नजदीकी एम्बुलेंस बुलाएँ । मरीज को खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल कभी न ले जाएँ क्योंकि रास्ते में स्थिति बिगड़ सकती है ।

दूसरा कदम :* मरीज को पूर्ण विश्राम दें। चलने-फिरने या सीढ़ियाँ चढ़ने से रोकें । आरामदायक स्थिति में सीधा बैठाएँ या लिटाएँ, तंग कॉलर बेल्ट ढीली करें और अकेला न छोड़ें ।

तीसरा कदम :* बिना डॉक्टर या आपातकालीन ऑपरेटर की सलाह के कोई हृदय संबंधी दवा या घरेलू नुस्खा न दें । एस्पिरिन कुछ मामलों में रक्त पतला करने के लिए दी जाती है लेकिन केवल अनुमति पर ही लेकिन अस्पताल पहुँचने में देरी न करें ।

चौथा कदम :* अगर मरीज बेहोश हो जाए और सामान्य साँस न ले रहा हो तो तुरंत एम्बुलेंस को सूचित करें, समतल जमीन पर लिटाएँ और हैंड्स ओनली सीपीआर शुरू करें । छाती के बीचोंबीच हथेलियाँ रखें, 100 से 120 दबाव प्रति मिनट की गति से और 5-6 सेंटीमीटर गहराई तक लगातार दबाएँ । आसपास एईडी हो तो उसके निर्देशों का पालन करें ।
होश में और बात कर रहे व्यक्ति को सीने में दर्द होने पर कभी सीपीआर न दें।

अस्पताल में मिलने वाला जीवन रक्षक उपचार :* अस्पताल पहुँचने पर ईसीजी, ट्रोपोनिन ब्लड टेस्ट और अन्य जाँचें होती हैं । प्राइमरी एंजियोप्लास्टी और स्टेंटिंग से बंद धमनी को कैथेटर और बैलून से खोलकर स्टेंट डाला जाता है ताकि रक्त संचार सुचारू हो । एंजियोप्लास्टी तुरंत उपलब्ध न हो तो थ्रॉम्बोलाइटिक थेरेपी से थक्का गलाने वाली दवाएँ दी जाती हैं ।
केवल दर्द की गोली खाकर दर्द मिटाना इलाज नहीं है । मुख्य लक्ष्य ब्लॉक धमनी खोलकर हृदय की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान से बचाना है ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण : रोकथाम बनाम तत्काल उपचार :* आयुर्वेद में हृदय को शरीर का सबसे संवेदनशील मर्म स्थान माना गया है । यह दीर्घकालिक स्वास्थ्य, जीवनशैली सुधार और कई हृदय रोगों की रोकथाम में अत्यंत प्रभावशाली है लेकिन हार्ट अटैक के आपातकालीन प्रबंधन में आधुनिक चिकित्सा का कोई विकल्प नहीं है ।

हृदय संरक्षण के लिए संतुलित आहार अपनाएँ ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, साबुत अनाज, छिलके वाली दालें और उच्च फाइबर युक्त भोजन । अत्यधिक नमक, रिफाइंड ऑयल, ट्रांस फैट, मैदे की चीजें, कोल्ड ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ । नियमित वॉक या योग करें । प्राणायाम, ध्यान और 7-8 घंटे की नींद से तनाव नियंत्रित रखें ।
समय समय पर ब्लड प्रेशर, शुगर और लिपिड प्रोफाइल की जाँच करवाएँ । अर्जुन की छाल को हृदय टॉनिक माना जाता है जो मांसपेशियों को मजबूती देता है । अश्वगंधा, गिलोय और लहसुन जैसी जड़ी बूटियाँ भी सहायक हैं लेकिन योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही लें ।
महत्वपूर्ण चेतावनी :* अर्जुन छाल, लहसुन, नींबू पानी, शहद या किसी भी घरेलू आयुर्वेदिक दवा कोरोनरी धमनी खुलने पर सहायक होती है । तीव्र लक्षणों पर अस्पताल जाने में देरी न करें । आधुनिक दवाओं के साथ आयुर्वेदिक औषधि योग्य चिकित्सक की निगरानी में ही लें ।

हर परिवार के लिए जरूरी हार्ट सेफ्टी एक्शन प्लान :* घर के सभी सदस्यों को हार्ट अटैक के प्राथमिक लक्षणों के बारे में जागरूक करें । मोबाइल और घर के प्रमुख स्थान पर नजदीकी अस्पताल व एम्बुलेंस के नंबर लिखकर चिपकाएँ । परिवार के कम से कम एक सदस्य को बेसिक लाइफ सपोर्ट और सीपीआर का प्रशिक्षण जरूर दिलाएँ । बुजुर्गों या उच्च जोखिम वाले सदस्यों की नियमित मेडिकल स्क्रीनिंग करवाएँ । डॉक्टर द्वारा लिखी जीवन रक्षक दवाएँ खुद से बंद न करें ।
नाना पाटेकर की यह दुखद घटना सिखाती है कि स्वास्थ्य के प्रति किसी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है । सही समय पर सही पहचान और आधुनिक आपातकालीन चिकित्सा ही जीवन की सच्ची रक्षा करती है ।

वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी
खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक

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उपवास का विज्ञान और आयुर्वेद: क्या भोजन से विराम स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है ?हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं और कब खाते...
25/10/2026

उपवास का विज्ञान और आयुर्वेद: क्या भोजन से विराम स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है ?

हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं और कब खाते हैं । ये तीनों स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करते हैं। आधुनिक चिकित्सा इसे चयापचय, इंसुलिन संवेदनशीलता, कोशिकीय पुनर्चक्रण (ऑटोफैगी), हार्मोनल संतुलन और सर्केडियन रिदम (शरीर की आंतरिक घड़ी) से समझती है। आयुर्वेद इसे अग्नि (पाचन-शक्ति), आम (अपूर्ण पाचन का अवशेष), दोष संतुलन (वात-पित्त-कफ) और दिनचर्या के संदर्भ में देखता है ।

आयुर्वेद में भोजन केवल पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर के धातुओं का पोषण और जीवन का आधार है । इसलिए न लगातार खाते रहना उचित है, न बिना आवश्यकता लंबे समय तक भूखे रहना। आधुनिक शोध और चिकित्सकीय निगरानी में किए गए जल-उपवास (जैसे डॉ. एलन गोल्डहैमर के कार्य) दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि उपवास कुछ स्थितियों में सहायक हो सकता है, पर यह हर बीमारी का इलाज नहीं और हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं ।

आधुनिक जीवनशैली और अतिभोजन :*
आज भोजन की उपलब्धता अधिक है, पर शारीरिक गतिविधि कम हो रही है। बार-बार नाश्ता, देर रात भोजन, मीठे पेय, प्रसंस्कृत खाद्य और उच्च कैलोरी वाले पैकेटबंद उत्पाद वजन बढ़ाने, इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाते हैं।
आयुर्वेद में आवश्यकता से अधिक खाना अतिभोजन (अतिमात्रा) है। मात्रा के साथ भोजन की प्रकृति (गुरु-लघु), पाचन क्षमता और समय का भी गहरा महत्व है। क्षमता से अधिक खाने पर भारीपन, अपच, आलस्य और आम का निर्माण हो सकता है। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार लगातार अधिक कैलोरी से मोटापा और चयापचय असंतुलन बढ़ता है। इसलिए शुरुआत कठोर उपवास से नहीं, बल्कि भोजन की मात्रा, गुणवत्ता, विविधता और समय सुधारने से होनी चाहिए।

अग्नि पाचन का आधार :*
आयुर्वेद में अग्नि केवल पेट की आग नहीं, बल्कि भोजन को पोषक तत्वों में बदलने, धातुओं को पोषित करने और अपशिष्ट को निकालने की व्यापक प्रक्रिया है। जब अग्नि संतुलित (सम अग्नि) होती है तो पाचन सहज रहता है, भूख समय पर लगती है और शरीर हल्का महसूस होता है। विषम, मंद या तीव्र अग्नि विभिन्न समस्याओं का कारण बनती है।
आधुनिक विज्ञान इसे एंजाइम, हार्मोन, आंत माइक्रोबायोम और चयापचय दर से समझता है। दोनों की शब्दावली अलग है, इसलिए अग्नि को किसी एक जैविक प्रक्रिया के बराबर नहीं मानना चाहिए।
व्यावहारिक सीख :*
भोजन तभी करें जब पिछला भोजन पच चुका हो और स्वाभाविक भूख लगे। लगातार भूख न लगना या अत्यधिक भूख पाचन शक्ति की समस्या, तनाव, नींद की कमी या अन्य चिकित्सकीय कारण हो सकती है । जाँच आवश्यक है। भोजन के बीच पर्याप्त अंतराल रखना अग्नि को विश्राम और संतुलन देता है।

आम और विसरल फैट में अंतर :*
आयुर्वेद में आम अपूर्ण पाचन से जुड़ी पारंपरिक अवधारणा है। यह किसी एक रसायन का नाम नहीं, बल्कि चिपचिपा, भारी और विषाक्त अवशेष माना जाता है जो स्रोतों को अवरुद्ध कर सकता है। आधुनिक चिकित्सा में विसरल फैट पेट के अंगों के आसपास की वसा है, जिसकी अधिकता सूजन, इंसुलिन प्रतिरोध, हृदय रोग और चयापचय सिंड्रोम से जुड़ी है । दोनों में असंतुलन पर ध्यान देने की समानता है, पर आम और विसरल फैट एक नहीं हैं। विसरल फैट घटाने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और वजन नियंत्रण प्रभावी हैं। उपवास से कुल कैलोरी घट सकती है और कुछ लोगों में विसरल फैट कम हो सकता है, पर केवल “अंदरूनी चर्बी” ही घटेगी । यह दावा अतिरंजित और अधूरा है।

लंघन हल्केपन की व्यापक अवधारणा :*
आयुर्वेद में लंघन शरीर को हल्का करने की विभिन्न पद्धतियाँ हैं। केवल पानी पर भूखे रहना नहीं। इसमें मात्रा कम करना, हल्का भोजन (जैसे खिचड़ी या मुनक्का-पानी), पाचन पर बोझ न डालना, उचित व्यायाम, सूर्यस्नान और कभी-कभी उपवास शामिल है। निर्णय प्रकृति, बल, आयु, ऋतु, दोष और रोग देखकर होता है।
आधुनिक इंटरमिटेंट फास्टिंग (समय-सीमित भोजन/TRE, वैकल्पिक दिन उपवास/ADF, 5:2 आदि) पर 2024-2025 के बड़े मेटा-एनालिसिस और नेटवर्क मेटा-एनालिसिस बताते हैं कि ये विधियाँ वजन घटाने और कुछ कार्डियोमेटाबॉलिक जोखिम कारकों (रक्तचाप, लिपिड, इंसुलिन) में निरंतर कैलोरी प्रतिबंध के लगभग समान लाभ दे सकती हैं । लंबे समय के अध्ययनों में अंतर अक्सर कम हो जाता है। आयुर्वेदिक लंघन और आधुनिक जल-उपवास एक समान नहीं हैं। लंबे जल-उपवास में चिकित्सकीय जोखिम (निर्जलीकरण, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, मांसपेशी हानि आदि) हो सकते हैं और इन्हें केवल चिकित्सकीय निगरानी में ही किया जाना चाहिए।

उपवास के दौरान शरीर में बदलाव ग्लूकोज से वसा की ओर :* भोजन न मिलने पर पहले ग्लूकोज और ग्लाइकोजन उपयोग होते हैं, फिर वसा और कीटोन का उपयोग बढ़ सकता है। यह समय हर व्यक्ति में अलग होता है और उम्र, मांसपेशी मात्रा, गतिविधि तथा स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। इंसुलिन भोजन के बीच इंसुलिन स्तर कम होता है । कुछ अध्ययनों में समय-सीमित भोजन से संवेदनशीलता सुधरने के संकेत मिले हैं, विशेषकर अधिक वजन वाले लोगों में । ऑटोफैगी कोशिकाओं के पुनर्चक्रण और क्षतिग्रस्त भागों की सफाई की प्रक्रिया। उपवास इसे प्रभावित कर सकता है, पर मनुष्यों में लाभ और आवश्यक अवधि अभी पूरी तरह स्थापित नहीं। अधिकांश मजबूत प्रमाण जानवरों के अध्ययनों से आते हैं। मस्तिष्क और BDNF BDNF तंत्रिका कोशिकाओं के विकास और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है । उपवास के प्रभावों पर शोध जारी है। अल्जाइमर या अन्य तंत्रिका रोगों से बचाव का निश्चित दावा अभी उचित नहीं । ये प्रक्रियाएँ व्यक्तिगत भिन्नता रखती हैं और किसी भी व्यक्ति में समान रूप से नहीं होतीं।

वात, पित्त, कफ क्या एक जैसा उपवास सबके लिए ?आयुर्वेद में दोष शरीर की कार्यप्रणालियों को समझने का पारंपरिक ढाँचा है। एक ही भोजन या उपवास सबके लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। वात प्रधान व्यक्तियों में लंबे उपवास से कमजोरी, चक्कर, बेचैनी, कब्ज और वात वृद्धि हो सकती है। पित्त प्रधान में गर्मी, जलन या चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
कफ प्रधान में हल्का लंघन अक्सर अधिक अनुकूल माना जाता है। लंबे समय भूखे रहने से कमजोरी, चक्कर, बेचैनी हो सकती है । इसे केवल दोष असंतुलन मानकर अनदेखा न करें। यह निम्न रक्त शर्करा, निर्जलीकरण या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन भी हो सकता है । आधुनिक चिकित्सा भी कहती है । उपवास की उपयुक्तता उम्र, दवाओं, बीमारियों, गर्भावस्था और पोषण स्थिति पर निर्भर है। प्रकृति को दिनचर्या समझने का पारंपरिक तरीका मानें, चिकित्सकीय जाँच का विकल्प नहीं।

भोजन का समय और दिनचर्या :*
आयुर्वेद में नियमित दिनचर्या महत्वपूर्ण है । समय पर भोजन, नींद और सक्रियता । आधुनिक शोध सर्केडियन रिदम और भोजन समय के संबंध को मजबूत करता है। देर रात खाने से बचना, दिन के पहले हिस्से में अधिक ऊर्जा लेना और रात के खाने तथा सोने के बीच 2-3 घंटे का अंतराल कई अध्ययनों में हृदय चयापचय स्वास्थ्य के लिए सहायक पाया गया है । कुछ शोध में रात-सुबह के भोजन में लगभग 12 घंटे का अंतराल कई स्वस्थ वयस्कों के लिए सरल और टिकाऊ शुरुआत दिखा ।

सरल दिनचर्या सुझाव :*
जरूरत अनुसार सादा पानी दिन में संतुलित और नियमित भोजन रात का भोजन सोने से 2-3 घंटे पहले भोजन बाद हल्की सैर नियमित नींद और शारीरिक गतिविधि संभव हो तो भोजन खिड़की को दिन के पहले हिस्से में केंद्रित करना

नमक, तेल, चीनी और प्रसंस्कृत खाद्य में संयम :* अधिक नमक, चीनी, ट्रांस वसा और कैलोरी वाले पैकेटबंद खाद्य नियमित रूप से नुकसानदायक हैं। आयुर्वेद विविधता, मौसमी भोजन और उचित मात्रा पर जोर देता है। इन्हें पूरी तरह विष मानना सही नहीं वसा भी संतुलित आहार का आवश्यक हिस्सा है । दालें, साबुत अनाज, सब्जियाँ, मौसमी फल, पर्याप्त प्रोटीन (दाल, दही, अंडे, मछली आदि) और सीमित स्वस्थ वसा (घी, तिल का तेल, नट्स) लें। मीठे पेय, फ्राइड खाद्य और प्रसंस्कृत उत्पाद कम करें।

बीमारियों में सावधानी और contraindications :* वजन घटने और खानपान सुधारने से रक्तचाप तथा शर्करा में सुधार हो सकता है, पर उपवास इनका निश्चित इलाज नहीं। आयुर्वेदिक पद्धति अपनाते हुए भी निर्धारित उपचार जारी रखें और चिकित्सक से परामर्श लें । लंबे उपवास में निर्जलीकरण, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, निम्न रक्तचाप, कमजोरी, मांसपेशी हानि और रिफीडिंग सिंड्रोम का जोखिम है । मधुमेह की दवा लेने वालों में शर्करा खतरनाक रूप से गिर सकती है। कैंसर, ऑटोइम्यून रोग, PCOS या अन्य स्थितियों में लाभ के दावे अभी निश्चित और व्यापक प्रमाण नहीं रखते ।

निम्नलिखित लोग बिना चिकित्सकीय सलाह उपवास न करें :* गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, कम वजन वाले, कुपोषित या भोजन विकार वाले, टाइप-1 मधुमेह या अस्थिर टाइप-2 मधुमेह वाले, गुर्दे, लीवर या हृदय की गंभीर बीमारी वाले, बुजुर्ग कमजोर व्यक्ति और बच्चे ।

चिकित्सकीय निगरानी में किए गए जल उपवास जैसे कुछ विशेष केंद्रों में कुछ स्थितियों उच्च रक्तचाप आदि में सहायक बताए गए हैं, पर घर पर स्वयं प्रयोग जोखिम भरा है ।

उपवास का सही, सुरक्षित और व्यावहारिक तरीका :* लंबे कठोर उपवास से शुरुआत जरूरी नहीं ।व्यावहारिक और सुरक्षित उपाय भूख और गतिविधि के अनुसार पौष्टिक, संतुलित भोजन । संभव हो तो रात और सुबह के भोजन में लगभग 12 घंटे का अंतराल। अपच या भारीपन पर मात्रा गुणवत्ता देखें; लगातार लक्षण पर डॉक्टर से मिलें । प्रोटीन, फाइबर, विटामिन खनिज और पर्याप्त तरल पूरा करें । कई दिन केवल पानी पर रहने का प्रयोग स्वयं न करें । लंबे उपवास के बाद अचानक अधिक खाना खतरनाक हो सकता है । धीरे धीरे और हल्का भोजन शुरू करें ।
आयुर्वेदिक लंघन के रूप में खिचड़ी या हल्के भोजन के 1-3 दिन कई लोगों के लिए सुरक्षित विकल्प हो सकते हैं ।

आयुर्वेद का उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि शरीर की जरूरत समझकर संतुलित, नियमित और विवेकपूर्ण जीवन है। स्वास्थ्य का आधार संतुलित आहार, नियमित गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और आवश्यक चिकित्सा है। केवल भोजन से विराम नहीं अंधानुकरण नहीं, ज्ञान, व्यक्तिगत स्थिति और विवेक अपनाएँ । स्वस्थ रहें, जागरूक रहें ।
वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी
परंपरागत आयुर्वेदिक चिकित्सक

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शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं
25/10/2026

शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

विजयदशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
20/10/2026

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18/10/2026

दूध-घी ही काफी नहीं : बुजुर्गों की शक्ति का असली आधार क्या है ?
भारतीय संस्कृति में दूध, घी और पारंपरिक भोजन को सेहत की नींव माना जाता है, फिर भी कई भारतीय बुजुर्गों में कमजोरी और चलने-फिरने में कठिनाई पश्चिमी देशों की तुलना में जल्दी क्यों दिखती है ?

इस पर आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से समझना जरूरी है । अंतर का कारण केवल दूध-घी नहीं, बल्कि संपूर्ण पोषण, शारीरिक सक्रियता, नींद, जीवनशैली और उम्र के साथ होने वाले जैविक बदलाव हैं।

आयुर्वेद के अनुसार कमजोरी के 4 प्रमुख कारण :*
1.रस और मांस धातु का अपूर्ण पोषण आयुर्वेद में 'रस धातु' और 'मांस धातु' को बल का आधार माना गया है। यदि आहार में केवल कैलोरी हो और पर्याप्त गुणवत्ता वाला प्रोटीन, विटामिन और खनिज न हों, तो उम्र के साथ मांसपेशियां स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगती हैं। केवल दूध-घी इस कमी को पूरा नहीं करते ।

2.व्यायाम और शारीरिक श्रम की कमी नियमित टहलना, सीढ़ियाँ चढ़ना, हल्के शक्ति-वर्धक और संतुलन के व्यायाम कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखते हैं। आयुर्वेद में उचित व्यायाम को बल और फुर्ती के लिए अनिवार्य माना गया है।

3.वात दोष की स्वाभाविक वृद्धि वृद्धावस्था वात-प्रधान होती है। इससे रूखापन, जकड़न, जोड़ों में तकलीफ और नींद में बदलाव आ सकते हैं । लेकिन हर कमजोरी को केवल वात दोष न मानें - एनीमिया, मधुमेह, थायराइड, विटामिन-B12/D की कमी या नसों की कमजोरी जैसे कारणों की जाँच जरूरी है ।

4.नींद, तनाव और अनियमित दिनचर्या अपर्याप्त नींद, लगातार तनाव, सामाजिक अलगाव और दिनभर निष्क्रिय रहना ऊर्जा को गंभीर रूप से घटाते हैं । आयुर्वेद में नियमित दिनचर्या और विश्राम को स्वास्थ्य का स्तंभ माना गया है ।

भारतीय और पश्चिमी बुजुर्गों में फिटनेस अंतर और संभावित कारण
विषय- आम समस्या- सुधार का व्यावहारिक उपाय
भोजन केवल घी-दूध-कैलोरी पर निर्भरता संतुलित थाली और पर्याप्त प्रोटीन
व्यायाम उम्र के साथ सक्रियता कम करना रोज टहलना + हफ्ते में 2 दिन शक्ति-व्यायाम धूप धूप में कम समय बिताना सुरक्षित समय पर धूप और विटामिन-D जाँच
दिनचर्या देर रात जागना, अनियमित नींद सोने-जागने का निश्चित समय रोग पहचान मधुमेह, एनीमिया की देर से पहचान नियमित हेल्थ चेकअप ।

हालांकि सभी अमेरिकी बुजुर्ग फिट हों ऐसा नहीं है । WHO के अनुसार स्वस्थ वृद्धावस्था का आधार है । सक्रियता, संतुलित पोषण और कार्यक्षमता बनाए रखना।

बुजुर्गों के लिए आयुर्वेद सम्मत आहार व्यक्तिगत प्रकृति के अनुसार
दूध : यदि आसानी से पचे और चिकित्सकीय मनाही न हो।
घी : सीमित मात्रा में, इसे कमजोरी का एकमात्र उपाय न समझें।
शाकाहारी प्रोटीन : मूंग, मसूर, ताज़ा दही, पनीर।
सूखे मेवे: बादाम, अखरोट - ऊर्जा और स्वस्थ वसा के लिए।
हरी सब्जियां और मौसमी फल: विटामिन, खनिज, फाइबर के लिए।

विशेष ध्यान :* किडनी रोग में प्रोटीन की मात्रा हमेशा डॉक्टर की सलाह से तय करें।

क्या रसायन चिकित्सा से कमजोरी दूर हो सकती है?
रसायन का उद्देश्य बल और जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायता करना है, वृद्धावस्था को पूरी तरह रोकना नहीं।
अश्वगंधा : बल और तनाव प्रबंधन में पारंपरिक उपयोग, आधुनिक शोध में नींद-तनाव पर लाभ के संकेत, पर मांसपेशी क्षय पर अभी व्यापक प्रमाण बाकी।
आँवला : उत्तम रसायन और आहार में उपयोगी, पर अकेले जादुई उपाय नहीं।
हरितकी / त्रिफला: मुख्यतः पाचन सुधार के लिए, हर कमजोरी में जरूरी नहीं। अधिक सेवन से दस्त या डिहाइड्रेशन हो सकता है।

विशेष सावधानी : किसी भी भस्म, रसौषधि या स्वर्णयुक्त औषधि का सेवन केवल प्रमाणित गुणवत्ता और अनुभवी वैद्य की देखरेख में ही करें। स्वयं से दीर्घकालीन सेवन न करें।

बुजुर्गों की शक्ति के लिए 5 व्यावहारिक नियम
1.प्रतिदिन चलना - क्षमता अनुसार शुरू करें, धीरे-धीरे बढ़ाएं।
2.शक्ति-वर्धक व्यायाम - हफ्ते में 2 दिन कुर्सी से उठना-बैठना जैसे हल्के प्रतिरोध अभ्यास, फिजियोथेरेपिस्ट की मदद लें।
3.संतुलन अभ्यास - गिरने से बचने के लिए सहारे के साथ अभ्यास।
4.पर्याप्त भोजन और नींद - वजन लगातार घटे या भूख कम हो तो कारण की जाँच कराएं।
5.नियमित जाँच - हीमोग्लोबिन, शुगर, थायराइड, B12 और D की जाँच।

WHO वृद्धों के लिए हफ्ते में 150-300 मिनट मध्यम एरोबिक गतिविधि, 2 दिन शक्ति-व्यायाम और संतुलन अभ्यास की सलाह देता है। कमजोर बुजुर्ग बहुत धीमी शुरुआत करें।

बुजुर्गों की कमजोरी का हल सिर्फ घी-दूध बढ़ाना या कोई एक रसायन नहीं है । पर्याप्त पोषण, नियमित गति, अच्छी नींद, मजबूत पाचन और रोगों की समय पर पहचान । इन सभी को साथ लेकर चलना ही आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों का समन्वित मार्ग है ।

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी नए आहार, व्यायाम या औषधि को शुरू करने से पहले अपने वैद्य / चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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11/10/2026
कर्णबाधिर्य और आयुर्वेद: कम सुनाई देने के कारण, बचाव और आयुर्वेदिक समाधानकम सुनाई देना या श्रवण शक्ति कमजोर होना केवल बढ...
03/10/2026

कर्णबाधिर्य और आयुर्वेद: कम सुनाई देने के कारण, बचाव और आयुर्वेदिक समाधान

कम सुनाई देना या श्रवण शक्ति कमजोर होना केवल बढ़ती उम्र की समस्या नहीं है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, तेज आवाज में संगीत सुनना, ईयरफोन-हेडफोन का अत्यधिक उपयोग और प्रदूषण युवाओं में भी इस समस्या को तेजी से बढ़ा रहे हैं ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण और दोष संतुलन :* आयुर्वेद में कर्णबाधिर्य को वात प्रधान रोग माना जाता है। चरक संहिता में इसे वातज नानात्मज व्याधियों में गिना गया है । सुश्रुत संहिता में बाधिर्य, कर्णनाद, कर्णशूल और कर्णक्ष्वेड को समान चिकित्सा सिद्धांत से जोड़कर देखा गया है ।

यदि समय रहते उपचार न किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है । आयुर्वेद में इस स्थिति को मुख्य रूप से कर्ण बाधिर्य या बाधिर्य कहा जाता है ।
आयुर्वेद के अनुसार यह समस्या मुख्य रूप से वात दोष के बिगड़ने से होती है । शरीर में उम्र बढ़ने के साथ धातु क्षय और शब्दावह स्रोत श्रवण मार्ग में रुकावट आने से सुनने की क्षमता प्रभावित होती है ।

सुश्रुत संहिता में स्पष्ट उल्लेख है कि जब वात दोष शब्दावह स्रोतों को ढक लेता है तो बाधिर्य उत्पन्न होता है।

कई बार कफ दोष भी वात के साथ मिलकर इस स्थिति को बढ़ा देता है । कम सुनाई देने की समस्या को केवल उम्र का सामान्य प्रभाव मानकर छोड़ देना उचित नहीं है ।

सबसे पहले कारण की सही पहचान करें, ऑडियोमेट्री टेस्ट कराएं और उसके बाद ही आयुर्वेदिक औषधि एवं चिकित्सा पद्धति का चयन करें ।

कम सुनाई देने के मुख्य कारण :* ईयर फोन या हेडफोन का तेज आवाज में लंबे समय तक उपयोग। विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के अनुसार वॉल्यूम हमेशा 60 प्रतिशत से कम रखना चाहिए ।

कान में मैल (ईयर वैक्स) जमना या बार-बार कान में संक्रमण होना । उम्र बढ़ने के साथ श्रवण तंत्रिकाओं का कमजोर होना प्रेस्बाइक्यूसिस। तेज ध्वनि वाले वातावरण में लंबे समय तक काम करना जैसे फैक्ट्री, निर्माण स्थल या संगीत कार्यक्रम ।

कुछ आधुनिक औषधियों के दुष्प्रभाव ओटोटॉक्सिक दवाएं । सिर में चोट, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या थायरॉइड संबंधी समस्याएं।

ठंडे पानी में नहाना, अत्यधिक तैराकी या कान में पानी जाना । मानसिक तनाव, अनियमित नींद और वात बढ़ाने वाले आहार का सेवन ।

मुख्य लक्षण :* बातचीत सुनने में कठिनाई होना और बार-बार दोहराने को कहना। कान में सीटी, गूंज या भनभनाहट की आवाज आना कर्णनाद या टिनिटस।

भीड़भाड़ वाली जगह पर आवाजें स्पष्ट न समझ आना। टीवी या मोबाइल की आवाज सामान्य से अधिक तेज करके सुनना । एक या दोनों कानों में सुनाई कम होना। कभी-कभी चक्कर आना या संतुलन बिगड़ना ।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण और दोष संतुलन :* आयुर्वेद में कर्णबाधिर्य को वात प्रधान रोग माना जाता है। चरक संहिता में इसे वातज नानात्मज व्याधियों में गिना गया है । खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार सुश्रुत संहिता में बाधिर्य, कर्णनाद, कर्णशूल और कर्णक्ष्वेड को समान चिकित्सा सिद्धांत से जोड़कर देखा गया है । यदि समय रहते उपचार न किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है ।

उपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां :* सारिवादी वटी : कर्णबाधिर्य और कर्णनाद के प्रबंधन में प्रमुख रूप से उपयोगी । यह स्रोतों की रुकावट दूर करने और वात-कफ को संतुलित करने में सहायक मानी जाती है ।
अश्वगंधा : वात दोष शांत करने, तंत्रिका तंत्र को बल देने और रसायन के रूप में प्रयोग की जाती है ।
दशमूलारिष्ट : वात प्रधान स्थितियों में सुधार के लिए चिकित्सकीय देखरेख में दी जाती है ।
बिल्वादि तैल, कर्ण पुष्पा इयर ड्रॉप यह कान के दर्द, खुजली, सूजन, पानी या मवाद आने और बहरापन जैसी समस्याओं में इस्तेमाल किए जाते हैं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रक्रियाएं :*
कर्ण पूरण :* कान में औषधीय तेल डालने की विधि। औषधि तैल तेल से यह प्रक्रिया की जाती है। यह श्रवण मार्ग को पोषण देती है और वात को शांत करती है ।
नस्य :* नाक के माध्यम से औषधि देना। क्षीरबला तैल या अनु तैल से नस्य वात-कफ को संतुलित करने में उपयोगी है ।
अभ्यंग और स्वेदन :* शरीर पर तेल मालिश और हल्का स्वेदन वात को शांत करता है।
रसायन चिकित्सा : अश्वगंधा, बला आदि से शरीर और इंद्रियों को बल प्रदान करना ।

दैनिक जीवन में अपनाने योग्य घरेलू उपाय :* प्रतिदिन 20 से 30 मिनट हल्की सैर करें । इससे रक्त संचार बेहतर होता है । पर्याप्त नींद लें और मानसिक तनाव को नियंत्रित रखें । पाचन क्षमता के अनुसार दूध, दही, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजा फल और मेवे आहार में शामिल करें ।

परहेज : वात बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ जैसे अति सूखे, ठंडे, बासी और ज्यादा तीखे भोजन से परहेज करें । कान के बाहरी हिस्से और आसपास हल्की मालिश तिल के तेल से करें । कान के छेद के अंदर स्वयं तेल कभी न डालें मोबाइल या ईयरफोन का उपयोग करते समय वॉल्यूम हमेशा 60 प्रतिशत से कम रखें ।

सहायक एवं सरल अभ्यास :* भ्रामरी प्राणायाम : सुखासन में बैठकर गहरी सांस लें और सांस छोड़ते हुए धीमी म्... की ध्वनि निकालें । इसे 5 से 7 बार करें । यह तनाव कम करने और कान के आसपास रक्त संचार सुधारने में मदद करता है ।

जबड़े का व्यायाम :* मुंह को धीरे-धीरे खोलें और बंद करें। फिर जबड़े को हल्के हाथ से दाएं-बाएं चलाएं। इसे 5 से 10 बार दोहराएं ।
गर्दन का हल्का व्यायाम :* गर्दन को बिना जोर लगाए धीरे-धीरे दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं । यदि चक्कर या दर्द महसूस हो तो तुरंत रोक दें ।

कान की सुरक्षा के लिए जरूरी सावधानियां :* कान में कॉटन बड, पिन, माचिस की तीली या कोई भी घरेलू चीज स्वयं न डालें । कान में मैल जमने पर केवल प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी या ईएनटी डॉक्टर से साफ करवाएं ।

तेज आवाज वाले माहौल में काम करते समय ईयर प्लग का उपयोग करें। उम्र से संबंधित अंदरूनी कान की कमजोरी में आधुनिक चिकित्सा के उपकरण जैसे हियरिंग एड्स भी एक प्रभावी और सुरक्षित विकल्प हैं ।

नियमित रूप से कान की जांच कराते रहें, खासकर यदि परिवार में सुनने की समस्या का इतिहास हो। यदि आपके या किसी परिजन के साथ नीचे दी गई स्थितियां अचानक उत्पन्न हों तो केवल घरेलू या उपचार के भरोसे न बैठें । तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ को दिखाएं ।

अचानक एक या दोनों कानों से सुनाई देना बंद या बहुत कम हो जाना । कान के साथ-साथ तेज चक्कर आना या उल्टी जैसी अनुभूति होना । कान में अचानक तेज दर्द या तेज सीटी जैसी आवाज शुरू होना। कान से मवाद, खून या असामान्य स्राव आना। बुखार के साथ कान में दर्द होना ।

कर्णबाधिर्य को समय रहते पहचानना और सही उपचार शुरू करना बहुत जरूरी है ।

आयुर्वेद वात दोष को संतुलित करके, स्रोतों की रुकावट दूर करके और श्रवण तंत्र को पोषण देकर इस समस्या के प्रबंधन में सहायक होता है ।

लेकिन किसी भी आयुर्वेदिक उपचार को शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें । आधुनिक जांच और आयुर्वेदिक चिकित्सा का संयोजन कई मामलों में बेहतर परिणाम देता है ।

अपने कानों की देखभाल करें, स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और सुनने की शक्ति को बनाए रखें ।

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❤️ विश्व हृदय दिवस : दिल को सिर्फ प्यार नहीं, देखभाल भी चाहिएहर धड़कन जिंदगी की कहानी कहती है… लेकिन क्या हम अपने दिल की...
29/09/2026

❤️ विश्व हृदय दिवस : दिल को सिर्फ प्यार नहीं, देखभाल भी चाहिए

हर धड़कन जिंदगी की कहानी कहती है… लेकिन क्या हम अपने दिल की सेहत के लिए उतना ही समय निकालते हैं ? ❤️

29 सितंबर, विश्व हृदय दिवस हमें याद दिलाता है कि हृदय की सुरक्षा केवल बीमारी के बाद दवा लेने से नहीं, बल्कि रोज की अच्छी आदतों से भी होती है।

आयुर्वेद में हृदय का विशेष महत्व :* आयुर्वेद में हृदय को शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना गया है। चरक संहिता में हृदय को ओज का आश्रय बताया गया है और इसे मन तथा चेतना से भी जोड़ा गया है।

खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार, आयुर्वेद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह केवल रोग होने के बाद उपचार पर जोर नहीं देता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा को भी महत्वपूर्ण मानता है।

💚 दिल को स्वस्थ रखने के लिए छोटी-छोटी आदतें अपनाएं :* 🥗 संतुलित और पौष्टिक भोजन लें 🧂 नमक और अत्यधिक चीनी कम करें । 🚶 रोज अपनी क्षमता के अनुसार पैदल चलें 🧘 योग, प्राणायाम और ध्यान को दिनचर्या में शामिल करें। 😴 पर्याप्त और नियमित नींद लें 🚭 धूम्रपान से दूरी रखें । ⚖️ वजन, रक्तचाप, शुगर और कोलेस्ट्रॉल पर नजर रखें । 🩺 समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करवाएं ।

तनाव को भी नजरअंदाज न करें । लगातार तनाव हमारी नींद, खान-पान और रक्तचाप सहित स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है ।

अगर लंबे समय से शारीरिक गतिविधि नहीं की है, तो अचानक बहुत अधिक व्यायाम करने के बजाय धीरे-धीरे शुरुआत करें ।

सीने में दर्द, सांस फूलना, चक्कर या व्यायाम के दौरान असामान्य थकान जैसे लक्षण हों तो चिकित्सकीय सलाह जरूर लें ।

आयुर्वेद का संदेश सरल है :* संतुलित आहार + नियमित शारीरिक गतिविधि + पर्याप्त नींद + तनाव प्रबंधन + नशे से दूरी + नियमित स्वास्थ्य जांच

इन अच्छी आदतों को जीवन का हिस्सा बनाना ही हृदय की बेहतर देखभाल की मजबूत नींव है । इस विश्व हृदय दिवस पर अपने दिल से एक वादा करे । आज से अपनी जीवनशैली में कम से कम एक अच्छा बदलाव जरूर लाएंगे। ❤️ स्वस्थ हृदय • स्वस्थ शरीर • स्वस्थ जीवन

#विश्वहृदयदिवस

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29/09/2026

मन जैसा होगा, शरीर भी वैसा ही प्रतिक्रिया देगा : मन और शरीर का आयुर्वेदिक संबंध

हम अक्सर मन और शरीर को दो अलग-अलग चीजें समझते हैं, लेकिन आयुर्वेद की दृष्टि में दोनों का संबंध बहुत गहरा है ।

मन में उत्पन्न होने वाले भाव, चिंता, क्रोध, भय, तनाव, निराशा और असंतोष हमारी दिनचर्या, नींद, पाचन, भूख और ऊर्जा पर प्रभाव डाल सकते हैं । इसी तरह स्वस्थ शरीर, उचित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम मन को प्रसन्न रखने में सहायता करते हैं ।

आयुर्वेद में मन की अवस्था को शरीर के स्वास्थ्य से अलग नहीं देखा गया है । मन की असंतुलित अवस्था वात, पित्त और कफ के संतुलन, अग्नि तथा ओज पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है ।

तनाव और चिंता का प्रभाव :* लगातार तनाव रहने पर बेचैनी, नींद में परेशानी, थकान, सिरदर्द और पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

आयुर्वेद में मानसिक शांति के लिए नियमित दिनचर्या, सात्त्विक आहार, पर्याप्त विश्राम और ध्यान को महत्व दिया गया है ।

क्रोध और चिड़चिड़ापन :* अत्यधिक क्रोध और उत्तेजना शरीर में तनाव की प्रतिक्रिया बढ़ा सकते हैं। आयुर्वेदिक दृष्टि से पित्त की प्रकृति और मानसिक उत्तेजना के बीच संबंध माना गया है।

शांत वातावरण, शीतल एवं संतुलित आहार और प्राणायाम उपयोगी उपाय होते हैं ।

भय और असुरक्षा :* लगातार डर या असुरक्षा की भावना व्यक्ति को बेचैन, अस्थिर और थका हुआ महसूस करा सकती है ।

आयुर्वेद में वात संतुलन के लिए नियमित भोजन, पर्याप्त नींद, अभ्यंग और स्थिर दिनचर्या को महत्व दिया जाता है ।

निराशा और नकारात्मक विचार :* लगातार नकारात्मक सोच व्यक्ति की प्रेरणा, नींद, भूख और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है।

ऐसे समय में अकेले रहने के बजाय परिवार और विश्वसनीय लोगों से संवाद करना तथा आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता लेना महत्वपूर्ण है ।

शरीर को सक्रिय रखें :* नियमित पैदल चलना, योग, प्राणायाम और अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम शरीर में स्वस्थ रहने से जुड़े जैविक परिवर्तनों को बढ़ावा देते हैं और मनोदशा बेहतर करने में मदद कर सकते हैं।

इसलिए व्यायाम केवल शरीर को मजबूत करने का माध्यम नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हितकर आहार, नियमित :* दिनचर्या, पर्याप्त नींद, व्यायाम, ध्यान, प्रसन्नचित्त रहना और सकारात्मक सामाजिक संबंध ये सभी स्वस्थ जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।

आयुर्वेद में स्वस्थ जीवन केवल रोग न होने को नहीं, बल्कि शरीर, इंद्रियों, मन और आत्मा के संतुलन से जोड़कर देखा गया है।

मन को स्वस्थ रखिए शरीर का भी साथ दीजिए :* हर नकारात्मक विचार बीमारी का कारण नहीं होता और किसी एक भावना को किसी विशेष अंग की बीमारी का सीधा कारण मानना उचित नहीं है ।

लेकिन लंबे समय तक बना तनाव और मानसिक असंतुलन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है । इसलिए भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझना, स्वीकार करना और आवश्यकता पड़ने पर सही सहायता लेना जरूरी है ।

खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. सेठी आयुर्वेदिक चिकित्सक एवं आयुर्वेदिक औषधि निर्माता

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