20/07/2026
वह है मिर्ज़ा जान-ए-जाना वली
जिगर गोशा व नूर-ए-चश्म-ए-अलीؓ
शाह नईमुल्लाह बहराइची रह०
हज़रत शाह नईमुल्लाह बहराइची रह० की विलादत 1738 ई० मुताबिक़ 1153 हिजरी में ज़िला बहराइच के मौज़ा भदवानी, फ़ख़रपुर में हुई। इब्तिदाई तालीम शैख़ मुहम्मद रोशन बहराइची से हासिल करने के बाद हुसूल-ए-इल्म के लिए शाहजहाँपुर, लखनऊ और दिल्ली का सफ़र फ़रमाया।
1189 हिजरी मुताबिक़ 1775 ई० में दिल्ली हाज़िर होकर हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जाना शहीद देहलवी रह० के दस्त-ए-हक़ परस्त पर बैअत की और चार साल तक सोहबत-ए-मुर्शिद में रहकर ख़िर्क़ा-ए-ख़िलाफ़त व इजाज़त हासिल फ़रमाई। आपको नक़्शबंदिया, क़ादरिया, चिश्तिया, सुहरवर्दिया समेत कई सिलसिलों की ख़िलाफ़त हासिल हुई। 1193 हिजरी मुताबिक़ 1779 ई० में बहराइच वापस तशरीफ़ लाए।
हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जाना रह० का आपके बारे में मशहूर क़ौल है:
"तुम्हारी चार साल की सोहबत दूसरों की बारह साल की सोहबत के बराबर है।"
हज़रत शाह नईमुल्लाह बहराइची रह० अपने पीर व मुर्शिद के अव्वलीन सवानिह निगार थे। आपने "बशारात-ए-मज़हरिया" और "मामूलात-ए-मज़हरिया" जैसी अहम तसानीफ़ यादगार छोड़ीं, जबकि आपकी दीगर कई किताबें भी इल्मी ज़ख़ीरे का हिस्सा हैं।
आपका विसाल 5 सफ़र 1218 हिजरी मुताबिक़ 27 मई 1803 ई० बरोज़ जुमा नमाज़-ए-असर की तीसरी रकअत के सज्दे में ख़ानक़ाह की मस्जिद-ए-मलसरी में हुआ। आपकी तदफ़ीन अहाता-ए-शाह नईमुल्लाह बहराइची (गेंद घर मैदान) में हुई। आपके मज़ार की तामीर 1811 ई० में उसी नक़्शे के मुताबिक़ हुई जिसके मुताबिक़ हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जाना रह० के मज़ार की तामीर कराई गई थी, और आज भी अपनी असल हालत में मौजूद है।
हर साल 5 सफ़र-उल-मुज़फ़्फ़र को आपका सालाना उर्स मनाया जाता है, जिसमें सिलसिला-ए-नक़्शबंदिया मुजद्दिदिया मज़हरिया नईमिया से वाबस्ता अफ़राद शरीअत के आदाब के साथ शिरकत करते हैं। मज़ार-ए-अक़दस पर क़ुल शरीफ़, नमाज़-ए-बा-जमाअत और तबर्रुक की तक़सीम की जाती है।
तारीख़-ए-ख़ानक़ाह नईमिया बहराइच — एक इल्मी व तहक़ीकी सफ़र
इसी अज़ीम रूहानी व इल्मी विरसे को महफ़ूज़ करने के लिए राक़िम गुज़िश्ता कई बरसों से "तारीख़-ए-ख़ानक़ाह नईमिया बहराइच" की तदवीन व तहक़ीक़ में मसरूफ़ है। यह इल्मी काम इंशाअल्लाह तीन ज़ख़ीम जिल्दों में शाया होगा।
पहली जिल्द में मशाइख़-ए-ख़ानक़ाह नईमिया बहराइच के हालात, ज़िंदगी के अहवाल और इल्मी, दीनी व रूहानी ख़िदमात को मुस्तनद हवाले के साथ जमा किया गया है, जो अल्हम्दुलिल्लाह मुकम्मल हो चुकी है।
दूसरी जिल्द में ख़ानक़ाह के महफ़ूज़ नादिर व नायाब मकातिब शामिल किए जा रहे हैं, जिनमें हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जाना, हज़रत क़ाज़ी सना-उल्लाह पानीपती, हज़रत शाह नईमुल्लाह बहराइची, हज़रत शाह ग़ुलाम अली देहलवी और दीगर अकाबिर के ख़ुतूत शामिल हैं। यह जिल्द भी तकमील के क़रीब है।
तीसरी जिल्द में ग़ैर मतबूआ फ़ारसी क़लमी मकातिब का असल मतन शामिल किया जाएगा, जो तारीख़-ए-तसव्वुफ़ के मुहक़्क़िक़ीन के लिए क़ीमती सरमाया साबित होगा।
अल्लाह तआला के फ़ज़्ल व करम से यह अज़ीम इल्मी मंसूबा तकमील की जानिब गामज़न है। इस मौक़े पर ख़ानक़ाह-ए-नईमिया बहराइच के सज्जादा नशीन हज़रत मौलाना सैयद शाह ज़फ़र अहसन बडनी मज़हरी नईमी बहराइची दामत बरकातुहुमुल आलिया का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि हज़रत ने रहनुमाई, सरपरस्ती और नादिर इल्मी ज़ख़ीरे तक रसाई फ़राहम फ़रमा कर इस ख़िदमत को मुमकिन बनाया।
अल्लाह तआला इस अज़ीम इल्मी अमानत को शरफ़-ए-क़बूल अता फ़रमाए। आमीन।