Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

थाइरोइड की बीमारी कर सकती है दिल को बीमार ...
24/05/2026

थाइरोइड की बीमारी कर सकती है दिल को बीमार ...

सुबह उठकर तकिये पर टूटे बाल दिखना, नहाने के बाद drain में बालों का गुच्छा जमा होना, या कंघी करते समय मुट्ठी भर बाल निकलन...
24/05/2026

सुबह उठकर तकिये पर टूटे बाल दिखना, नहाने के बाद drain में बालों का गुच्छा जमा होना, या कंघी करते समय मुट्ठी भर बाल निकलना — आज यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रही। युवा, पुरुष, महिलाएँ, यहाँ तक कि कॉलेज जाने वाले बच्चे भी hair fall से परेशान हैं। कई लोग शुरुआत में इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करते हैं, लेकिन जब scalp दिखने लगे, बाल पतले होने लगें या हेयरलाइन पीछे जाने लगे, तब चिंता बढ़ती है। बाल केवल सुंदरता का हिस्सा नहीं हैं।
आयुर्वेद में बालों को शरीर की आंतरिक स्थिति का दर्पण माना गया है। शरीर में पोषण की कमी, तनाव, खराब नींद, अनियमित भोजन, पाचन की गड़बड़ी, हार्मोन असंतुलन और scalp की देखभाल में कमी — ये सब धीरे-धीरे बालों को कमजोर करते हैं।
आखिर बाल झड़ते क्यों हैं?
आज की lifestyle बालों की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी है। देर रात तक जागना, fast food, ज्यादा stress, मोबाइल और स्क्रीन टाइम, pollution और chemical वाले products बालों की जड़ों को कमजोर कर देते हैं।
कुछ सामान्य कारण:
• तनाव और anxiety
• नींद की कमी
• शरीर में iron, protein, vitamin D, B12 की कमी
• thyroid imbalance
• हार्मोनल बदलाव
• ज्यादा chemical treatment और heat styling
• scalp infection और dandruff
• अत्यधिक गर्म प्रकृति और पित्त वृद्धि
आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर में पित्त और वात दोष बढ़ जाते हैं, तो बाल कमजोर होकर टूटने लगते हैं। scalp में dryness, गर्मी और पोषण की कमी hair roots को प्रभावित करती है।
केवल shampoo बदलने से समाधान नहीं -
बहुत लोग हर महीने नया shampoo, serum या cosmetic oil बदलते रहते हैं। कुछ दिनों का temporary improvement मिलता है, लेकिन मूल समस्या वहीं रहती है। क्योंकि बालों की जड़ scalp के अंदर होती है, इसलिए केवल ऊपर से cosmetic coating करने से लंबे समय तक फायदा नहीं मिलता।
यहीं पर पारंपरिक आयुर्वेदिक तेलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

👉 शुद्ध आयुर्वेदिक तेल क्यों अलग होते हैं?
पारंपरिक आयुर्वेदिक hair oil केवल खुशबूदार cosmetic oil नहीं होते। इन्हें विशेष “तैल पाक विधि” से तैयार किया जाता है, जिसमें जड़ी-बूटियों के गुण तेल में उतारे जाते हैं। ऐसे तेल scalp को पोषण देने, जड़ों को मजबूत करने और बालों की प्राकृतिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए बनाए जाते हैं। ऐसी ही एक बहुत ही बेहतरीन तेल है महा भृंगराज तेल जिसके बारे में आज इस पोस्ट में जानेंगे।

🍁 महाभृंगराज तेल
भृंगराज तेल एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधीय तेल माना जाता है, जिसे मुख्य रूप से भृंगराज (Eclipta alba) के साथ अनेक जड़ी-बूटियों को तिल तेल में विशेष “तैल पाक विधि” द्वारा तैयार किया जाता है।
इसमें सामान्यतः भृंगराज, मंजीष्ठा, लोध्र, रक्त चंदन, बला, हल्दी, दारुहल्दी, नागकेशर, प्रियंगु, मुलेठी, कमल पुष्प, अनंतमूल जैसी औषधियाँ सम्मिलित रहती हैं। तिल तेल इसका मुख्य base होता है, जिसे आयुर्वेद में अत्यंत पोषक और सूक्ष्म गुण वाला माना गया है।
भृंगराज को आयुर्वेद में “केशराज” अर्थात बालों का राजा कहा गया है, क्योंकि यह बालों की जड़ों को पोषण देने, scalp को स्वस्थ रखने और बालों की मजबूती बढ़ाने में उपयोगी माना जाता है। मंजीष्ठा और लोध्र scalp की शुद्धि तथा त्वचा के निखार में सहायक मानी जाती हैं, जबकि चंदन और हल्दी scalp की गर्मी, खुजली और irritation को शांत करने में उपयोगी समझी जाती हैं। मुलेठी और बला बालों को nourishment देने में सहायता कर सकती हैं।
आयुर्वेदिक दृष्टि से यह तेल विशेष रूप से बढ़े हुए पित्त और वात दोष को शांत करने हेतु उपयोगी माना जाता है, जो समय से पहले बाल सफेद होना, बाल झड़ना, scalp dryness और रूसी जैसी समस्याओं से जुड़े माने जाते हैं। नियमित रूप से सही विधि से scalp massage करने पर यह तेल बालों की जड़ों में रक्तसंचार सुधारने, dryness कम करने, hair breakage घटाने, scalp को पोषण देने और बालों को घना, मुलायम तथा चमकदार बनाए रखने में सहायक माना जाता है।
साथ ही, सिर पर तेल मालिश मानसिक तनाव कम करने, नींद बेहतर करने और scalp relaxation देने में भी लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि आयुर्वेद में सिर की नियमित अभ्यंग (oil massage) को सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।

👉 भृंगराज को बालों का राजा क्यों कहा जाता है?
आयुर्वेद में भृंगराज को “केशराज” कहा गया है, अर्थात बालों का राजा। माना जाता है कि यह:
• बालों की जड़ों को पोषण देता है
• scalp circulation बेहतर करता है
• dryness कम करता है
• dandruff में सहायता करता है
• बालों को घना और मजबूत बनाने में मदद करता है
• समय से पहले सफेद होने की प्रक्रिया को धीमा करने में सहायक हो सकता है
जब इसे अन्य औषधियों और तिल तेल के साथ पारंपरिक विधि से पकाया जाता है, तो इसका प्रभाव और बढ़ जाता है।
👉 क्या केवल तेल लगाने से नए बाल आ जाते हैं?
यह समझना जरूरी है कि कोई भी तेल जादू नहीं करता। यदि hair fall का कारण गंभीर anemia, thyroid disease, autoimmune problem, genetic baldness या hormonal disorder है, तो केवल तेल पर्याप्त नहीं होगा। लेकिन सही lifestyle, संतुलित आहार और नियमित scalp care के साथ आयुर्वेदिक तेल hair fall कम करने और बालों की quality सुधारने में उपयोगी हो सकते हैं।

👉 तेल लगाने का सही तरीका
बहुत लोग तेल लगाकर तुरंत धो लेते हैं या बहुत ज्यादा तेल scalp पर छोड़ देते हैं। सही तरीका महत्वपूर्ण है।
कैसे लगाएँ?
• तेल को हल्का गुनगुना करें
• उंगलियों के पोरों से scalp पर धीरे-धीरे massage करें
• जोर से रगड़ें नहीं
• 30 मिनट से 1 घंटे तक रहने दें
• फिर mild shampoo से wash करें
सप्ताह में 2–3 बार नियमित उपयोग बेहतर माना जाता है।

👉 केवल तेल नहीं, भोजन भी जरूरी
अगर शरीर अंदर से कमजोर है तो बाहर से लगाया गया कोई भी उत्पाद सीमित असर ही देगा। इसलिए:
• पर्याप्त protein लें
• हरी सब्जियाँ और फल बढ़ाएँ
• पर्याप्त पानी पिएँ
• stress कम करें
• नींद पूरी लें
• junk food और अत्यधिक fried food कम करें
आयुर्वेद में “आहार” को सबसे बड़ी औषधि कहा गया है।
बालों का स्वास्थ्य केवल बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि शरीर के संतुलन का संकेत है। शुद्ध आयुर्वेदिक तेल scalp को पोषण देने और बालों की देखभाल में सहायक हो सकते हैं, विशेषकर जब उन्हें सही जीवनशैली और संतुलित आहार के साथ अपनाया जाए। नियमितता, धैर्य और सही कारण की पहचान — यही स्वस्थ और मजबूत बालों की असली कुंजी है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 02319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

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“डॉक्टर साहब, बाल इतने झड़ रहे हैं कि कंघी करते ही हाथ भर बाल निकल आते हैं… कहीं मैं गंजा तो नहीं हो जाऊँ?”आजकल यह शिकाय...
23/05/2026

“डॉक्टर साहब, बाल इतने झड़ रहे हैं कि कंघी करते ही हाथ भर बाल निकल आते हैं… कहीं मैं गंजा तो नहीं हो जाऊँ?”
आजकल यह शिकायत बहुत आम हो गई है। कम उम्र में भी बाल पतले होना, हेयरलाइन पीछे जाना और तेजी से hair fall बढ़ना लोगों की चिंता का बड़ा कारण बन चुका है। लेकिन बाल झड़ना केवल shampoo बदलने या तेल न लगाने की वजह से नहीं होता। इसके पीछे शरीर के अंदर की कई समस्याएँ छिपी हो सकती हैं।

👉 बाल झड़ने की 5 बड़ी वजह
1. पोषण की कमी (Nutritional Deficiency)
बालों को बढ़ने के लिए protein, iron, zinc, biotin, vitamin D और vitamin B12 की जरूरत होती है।
यदि शरीर में इनकी कमी हो जाए तो बाल कमजोर होकर टूटने लगते हैं।
खासकर:
• crash dieting
• कम खाना
• बार-बार fasting
• anemia
• में hair fall ज्यादा देखा जाता है।

2. तनाव और नींद की कमी
लगातार stress शरीर के hormones को प्रभावित करता है।
इसके कारण Telogen Effluvium नाम की स्थिति हो सकती है, जिसमें अचानक बहुत ज्यादा बाल झड़ने लगते हैं।
कम नींद, anxiety और मानसिक तनाव hair fall को काफी बढ़ा सकते हैं।

3. हार्मोनल गड़बड़ी
पुरुषों में androgen hormone और महिलाओं में thyroid, PCOS या hormonal imbalance बाल झड़ने का बड़ा कारण हो सकता है।
लक्षण:
• बाल पतले होना
• hairline पीछे जाना
• scalp दिखना
• महिलाओं में irregular periods

4. गलत Hair Products और Chemical Treatment
बार-बार:
• hair coloring
• rebonding
• heat styling
• harsh shampoo
• gel/spray
का उपयोग बालों की जड़ों को कमजोर कर सकता है।
बहुत ज्यादा tight hairstyle भी traction alopecia पैदा कर सकती है।

5. बीमारी और दवाइयाँ
कुछ diseases और medicines भी hair fall बढ़ाती हैं:
• Thyroid disease
• Diabetes
• Dengue/typhoid के बाद
• Autoimmune disease
• Severe infection
• कुछ BP या cancer medicines
बीमारी के 2–3 महीने बाद अचानक hair fall शुरू हो सकता है।

👉 आयुर्वेद क्या कहता है?
आयुर्वेद में बालों को अस्थि धातु और पित्त दोष से जोड़ा गया है।
अत्यधिक तनाव, खराब आहार, देर रात जागना और पाचन खराब होना बाल झड़ने का कारण माना गया है।
आयुर्वेद में:
• संतुलित आहार
• नींद सुधार
• तनाव नियंत्रण
• scalp care
पर विशेष जोर दिया जाता है।

👉 कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
यदि:
• बहुत तेजी से बाल झड़ रहे हों
• scalp पर patch बन रहे हों
• खुजली/डैंड्रफ बहुत ज्यादा हो
• कमजोरी या वजन घट रहा हो
• महिलाओं में periods irregular हों
• तो जांच करानी चाहिए।

👉 कौन-कौन सी जांच हो सकती हैं?
• CBC
• Iron profile
• Vitamin D
• Vitamin B12
• Thyroid test
• Sugar test
• Hormonal profile

बाल झड़ना केवल cosmetic problem नहीं, बल्कि कई बार शरीर के अंदर की कमी या बीमारी का संकेत भी हो सकता है। सही कारण पहचानना ही सही इलाज की पहली सीढ़ी है।

बाल झड़ने में आयुर्वेद में कई दवाएँ और योग सामान्य रूप से प्रयोग किए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल बालों पर तेल लगाना नहीं, बल्कि पाचन, पोषण, तनाव और दोष संतुलन को सुधारना भी होता है। हालांकि हर व्यक्ति में कारण अलग हो सकता है, इसलिए दवा भी कारण के अनुसार चुनी जाती है।
सामान्य रूप से प्रयोग होने वाली कुछ आयुर्वेदिक औषधियाँ और योग:
• भृंगराज – बालों की जड़ों को पोषण देने और समय से पहले बाल सफेद होने में पारंपरिक रूप से उपयोग
• आंवला – Vitamin C और antioxidant गुणों के कारण बालों के लिए लाभकारी माना जाता है
• ब्राह्मी – तनाव और नींद सुधारने में उपयोगी, stress-related hair fall में सहायक
• अश्वगंधा – तनाव और कमजोरी कम करने के लिए
• यष्टिमधु (मुलेठी) – scalp health के लिए उपयोग
• नारियल तेल + भृंगराज तेल – scalp nourishment के लिए
• त्रिफला – पाचन सुधारने और detox support हेतु
• सप्तामृत लोह / धात्री लोह – iron deficiency या कमजोरी से जुड़े मामलों में चिकित्सकीय सलाह अनुसार

लेकिन यह समझना जरूरी है कि केवल तेल लगाने से हर hair fall नहीं रुकता। यदि कारण:
• Thyroid disease
• Vitamin D deficiency
• Iron deficiency
• PCOS
• Male pattern baldness
• गंभीर तनाव
है, तो उसकी जांच और targeted treatment जरूरी होती है।
आयुर्वेद के साथ ये आदतें भी जरूरी
✔ पर्याप्त protein
✔ हरी सब्जियाँ और फल
✔ देर रात जागना कम करें
✔ stress control
✔ बहुत ज्यादा chemical treatment से बचें
✔ tight hairstyle कम करें
सावधानी
बाजार में “100% बाल उगाने” या “7 दिन में hair fall बंद” जैसे दावे करने वाले products बहुत मिलते हैं। वैज्ञानिक प्रमाण के बिना किसी भी दवा का लंबे समय तक उपयोग न करें। Steroid मिले हुए oils या medicines नुकसान भी कर सकते हैं।
यदि तेजी से बाल झड़ रहे हों, patch बन रहे हों या scalp दिखने लगा हो, तो Dermatologist या योग्य Ayurvedic physician से जांच करवाना बेहतर रहता है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
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More than 20+ Years of Experience
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Ulcerative Colitis एक ऐसी बीमारी है जिसमें बड़ी आंत (Colon) और मलाशय (Re**um) की अंदरूनी परत में लगातार सूजन (Inflammati...
22/05/2026

Ulcerative Colitis एक ऐसी बीमारी है जिसमें बड़ी आंत (Colon) और मलाशय (Re**um) की अंदरूनी परत में लगातार सूजन (Inflammation) और घाव (Ulcers) बनने लगते हैं। यह एक प्रकार की Inflammatory Bowel Disease (IBD) है। इसमें रोग लंबे समय तक चलता है और कभी लक्षण बढ़ जाते हैं तो कभी कम हो जाते हैं।

👉 यह बीमारी कैसे समझें?
सामान्य भाषा में कहें तो बड़ी आंत की भीतरी सतह “छिल” जाती है और उसमें सूजन आ जाती है। इसके कारण बार-बार दस्त, पेट दर्द और मल में खून आने जैसी समस्याएँ होती हैं।

👉 मुख्य लक्षण
• बार-बार पतले दस्त आना
• मल में खून या म्यूकस (चिकनाहट) आना
• पेट में मरोड़ या दर्द
• बार-बार शौच की इच्छा होना
• कमजोरी और थकान
• वजन कम होना
• भूख कम लगना
• कभी-कभी बुखार
गंभीर मामलों में शरीर में खून की कमी, डिहाइड्रेशन और कमजोरी बहुत बढ़ सकती है।

👉 इसके कारण क्या माने जाते हैं?
सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन कई बातें जुड़ी मानी जाती हैं:
• शरीर की Immunity का आंत पर गलत हमला
• Genetic tendency (परिवार में इतिहास)
• तनाव और खराब जीवनशैली
• अत्यधिक Processed food
• धूम्रपान छोड़ने के बाद कुछ लोगों में जोखिम बढ़ना
• आंत के Microbiome में गड़बड़ी

👉 कौन-कौन सी जांच होती हैं?
• Colonoscopy
• Biopsy
• Stool examination
• CBC और Inflammatory markers
• CRP, ESR
• कभी-कभी CT scan या MRI

👉 क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकती है?
यह बीमारी अक्सर Chronic होती है, यानी लंबे समय तक चल सकती है। लेकिन सही इलाज, खान-पान और जीवनशैली से इसे काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।

👉 एलोपैथी में उपचार
• Anti-inflammatory medicines
• Steroids
• Immunosuppressive drugs
• Biologics
• गंभीर मामलों में Surgery

👉 आयुर्वेद की दृष्टि से
आयुर्वेद में इसे सीधे इसी नाम से नहीं बताया गया, लेकिन इसके लक्षण Grahani Roga, Raktatisara और पित्तप्रधान आंत्र विकारों से मिलते हैं।
आयुर्वेद में अग्नि सुधार, आहार नियंत्रण, तनाव कम करना और आंत को शांत करने वाली औषधियों पर ध्यान दिया जाता है। जैसे:
• बेल
• मुस्ता
• नागकेसर
• यष्टिमधु
• शतावरी
• तक्र (Buttermilk therapy)
लेकिन बिना विशेषज्ञ सलाह के दवाएँ नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि हर मरीज की अवस्था अलग होती है।

👉 किन बातों का ध्यान रखें?
• बहुत मसालेदार और जंक फूड कम करें
• पर्याप्त पानी पिएँ
• तनाव कम करें
• धूम्रपान और शराब से बचें
• डॉक्टर की दवा अचानक बंद न करें
• बार-बार खून आने पर तुरंत जांच कराएँ
यदि लंबे समय से खून वाले दस्त, पेट दर्द या वजन कम हो रहा हो तो Gastroenterologist से जांच जरूर करानी चाहिए।

👉 Crohn’s Disease और इसमे क्या अंतर है ?
ये दोनों ही आंतों में होने वाली सूजन संबंधी बीमारियाँ हैं, जिन्हें IBD (Inflammatory Bowel Disease) कहा जाता है, लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर होता है। Ulcerative Colitis मुख्यतः बड़ी आंत (Colon) और Re**um तक सीमित रहती है तथा इसमें आंत की केवल अंदरूनी परत में सूजन और घाव बनते हैं। इसलिए मरीजों में बार-बार खून वाले दस्त, म्यूकस और शौच की तीव्र इच्छा अधिक देखने को मिलती है।

इसके विपरीत Crohn’s Disease पाचन तंत्र के किसी भी भाग—मुंह से लेकर गुदा तक—को प्रभावित कर सकती है और इसमें सूजन आंत की पूरी मोटाई तक पहुंच जाती है। इसी कारण Crohn’s में आंत सिकुड़ना, Fistula, Abscess और आंत में रुकावट जैसी जटिलताएँ अधिक हो सकती हैं।

Crohn’s Disease में पेट दर्द, वजन कम होना, कमजोरी, पोषण की कमी और लंबे समय तक दस्त अधिक सामान्य होते हैं, जबकि Ulcerative Colitis में रक्तयुक्त दस्त प्रमुख लक्षण माना जाता है।

Colonoscopy में भी दोनों का पैटर्न अलग दिखता है; Ulcerative Colitis में सूजन लगातार होती है, जबकि Crohn’s में बीच-बीच में स्वस्थ भाग छोड़कर सूजन दिखाई देती है, जिसे “Skip lesions” कहा जाता है। Smoking भी दोनों रोगों में अलग प्रभाव डालती है—Crohn’s Disease में धूम्रपान बीमारी को अधिक गंभीर बना सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से दोनों रोगों के लक्षण , और से मिलते-जुलते माने जा सकते हैं, जहाँ अग्नि विकृति, पाचन तंत्र की सूजन और अनुचित आहार-विहार को महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। सही उपचार, नियंत्रित भोजन, तनाव कम करना और नियमित चिकित्सकीय निगरानी दोनों ही रोगों में अत्यंत आवश्यक है।

👉 आयुर्वेदिक उपचार:-
Ulcerative Colitis और Crohn's Disease जैसी आंत्र सूजन संबंधी बीमारियों में आयुर्वेद का उद्देश्य केवल दस्त रोकना नहीं होता, बल्कि पाचन अग्नि को संतुलित करना, आंतों की सूजन कम करना, शरीर की दुर्बलता घटाना और पुनः पाचन शक्ति को सुधारना होता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह स्थिति प्रायः Grahani Roga, Atisara तथा Raktatisara से संबंधित मानी जा सकती है।
उपचार में सबसे पहले आहार-विहार सुधार पर जोर दिया जाता है। बहुत तीखा, मसालेदार, तला हुआ, पैकेट फूड, अत्यधिक चाय-कॉफी और शराब से बचने की सलाह दी जाती है। हल्का, सुपाच्य और ताजा भोजन जैसे मूंग की खिचड़ी, पुराना चावल, बेल का सेवन, दही से बना पतला तक्र (Buttermilk), अनार, इसबगोल और पर्याप्त जल लाभकारी माने जाते हैं। कई मरीजों में तनाव बढ़ने से लक्षण बढ़ते हैं, इसलिए योग, ध्यान और पर्याप्त नींद भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
औषधियों में बेल, मुस्ता, नागकेसर, कुटज, यष्टिमधु, शतावरी, लोध्र, मोचरस तथा प्रवाल पिष्टी जैसी दवाएँ विभिन्न अवस्थाओं में उपयोग की जाती हैं। विशेषकर Kutajghan Vati को अतिसार और आंतों की सूजन में उपयोग किया जाता है। रक्तयुक्त दस्त में नागकेसर और लोध्र जैसी औषधियाँ सहायक मानी जाती हैं, जबकि यष्टिमधु और शतावरी आंतों की जलन कम करने और healing में मदद कर सकती हैं।
हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गंभीर Ulcerative Colitis या Crohn’s Disease में स्वयं दवा लेना खतरनाक हो सकता है। अत्यधिक रक्तस्राव, तेज बुखार, वजन तेजी से घटना, डिहाइड्रेशन या आंत में जटिलताओं की स्थिति में तुरंत Gastroenterologist और अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक दोनों की निगरानी आवश्यक होती है। कई मामलों में आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का संतुलित समन्वय बेहतर परिणाम दे सकता है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
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📱 मोबाइल का ज्यादा उपयोग: सुविधा या धीरे-धीरे बढ़ती बीमारी?आज मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से...
22/05/2026

📱 मोबाइल का ज्यादा उपयोग: सुविधा या धीरे-धीरे बढ़ती बीमारी?
आज मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक हम लगातार स्क्रीन से जुड़े रहते हैं। पढ़ाई, नौकरी, सोशल मीडिया, गेम, वीडियो और ऑनलाइन काम ने मोबाइल को जरूरी बना दिया है। लेकिन जरूरत से ज्यादा मोबाइल का उपयोग शरीर और मन दोनों पर गंभीर असर डाल रहा है। धीरे-धीरे कई ऐसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं जिन्हें लोग सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

👀 1. आँखों की बीमारी – डिजिटल आई स्ट्रेन
लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन देखने से आँखों पर लगातार दबाव पड़ता है। इससे आँखों में जलन, सूखापन, धुंधलापन, पानी आना और सिरदर्द जैसी समस्याएँ होती हैं। इसे “Digital Eye Strain” कहा जाता है। रात में अंधेरे में मोबाइल देखने से समस्या और बढ़ जाती है।

😣 2. गर्दन और कंधे का दर्द – टेक्स्ट नेक सिंड्रोम
मोबाइल देखते समय गर्दन को नीचे झुकाकर रखने की आदत से गर्दन की मांसपेशियों और रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे गर्दन दर्द, कंधों में जकड़न और सिरदर्द होने लगता है। लंबे समय तक यही स्थिति रहने पर सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस जैसी समस्या भी हो सकती है।

✋ 3. हाथ और उंगलियों की समस्या
लगातार मोबाइल पकड़ना, टाइपिंग करना और स्क्रॉलिंग करने से अंगूठे, कलाई और उंगलियों की नसों व मांसपेशियों पर असर पड़ता है। इससे:
Gamer’s Thumb
Carpal Tunnel Syndrome
कलाई दर्द और झनझनाहट
जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

🧠 4. मोबाइल एडिक्शन और मानसिक तनाव
मोबाइल की लत आज बड़ी मानसिक समस्या बनती जा रही है। बार-बार नोटिफिकेशन देखना, सोशल मीडिया पर तुलना करना और लगातार ऑनलाइन रहना तनाव, चिंता और चिड़चिड़ापन बढ़ाता है। कई लोगों को मोबाइल दूर होने पर बेचैनी होने लगती है, जिसे “Nomophobia” कहा जाता है।

😴 5. नींद की समस्या (Sleep Disorder)
रात में देर तक मोबाइल चलाने से नींद खराब होती है। मोबाइल की नीली रोशनी (Blue Light) मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जिससे नींद देर से आती है या बार-बार टूटती है। लगातार खराब नींद से थकान, कमजोर याददाश्त और मानसिक तनाव बढ़ता है।

⚖️ 6. मोटापा और शारीरिक कमजोरी
मोबाइल पर घंटों बैठे रहने से शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है। इससे वजन बढ़ना, पेट निकलना, मांसपेशियों की कमजोरी और शरीर में सुस्ती आने लगती है। बच्चों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है क्योंकि आउटडोर खेल कम हो गए हैं।

❤️ 7. हृदय और ब्लड प्रेशर पर असर
लगातार स्क्रीन टाइम, तनाव और कम शारीरिक गतिविधि हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकती है। देर रात तक जागना और मानसिक तनाव भी हृदय स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है।

🧒 8. बच्चों पर मोबाइल का असर
छोटे बच्चों में ज्यादा मोबाइल देखने से:
ध्यान कम लगना
पढ़ाई में कमजोरी
चिड़चिड़ापन
बोलने में देरी
सामाजिक व्यवहार में कमी
जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। बच्चों का अत्यधिक स्क्रीन टाइम उनके मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकता है।

👂 9. कान की समस्या और टिनिटस
लगातार तेज आवाज में ईयरफोन या हेडफोन लगाने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। कई लोगों को कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज सुनाई देने लगती है, जिसे Tinnitus कहा जाता है।

⚠️ कब हो जाएं सावधान?
यदि आपको ये लक्षण बार-बार हों:
- आँखों में जलन या धुंधलापन
- गर्दन या कलाई में दर्द
- नींद न आना
- सिरदर्द
- मोबाइल बिना बेचैनी
- लगातार थकान
तो स्क्रीन टाइम कम करना जरूरी है।

✅ बचाव कैसे करें?
-हर 20 मिनट बाद स्क्रीन से नजर हटाएँ
-मोबाइल आँखों से उचित दूरी पर रखें
-रात में सोने से 1 घंटा पहले मोबाइल बंद करें
-सही पोस्चर में बैठें
-नियमित व्यायाम और योग करें
-बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखें
-बिना जरूरत लगातार स्क्रॉलिंग से बचें

मोबाइल तकनीक का उपयोग जीवन को आसान बनाता है, लेकिन अत्यधिक उपयोग धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए “स्मार्टफोन” का उपयोग करें, लेकिन अपनी सेहत की कीमत पर नहीं। संतुलित स्क्रीन टाइम ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

आज मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई, मनोरंजन—सब कुछ स्क्रीन पर आ गया है। लेकिन क्या...
22/05/2026

आज मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई, मनोरंजन—सब कुछ स्क्रीन पर आ गया है। लेकिन क्या आपने ध्यान दिया है कि लगातार स्क्रीन देखने से शरीर धीरे-धीरे कई समस्याओं का शिकार हो रहा है?

सुबह उठते ही मोबाइल, खाना खाते समय मोबाइल, रात में सोने से पहले मोबाइल… यह आदत अब सिर्फ आदत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए खतरा बनती जा रही है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों में जलन, धुंधलापन, सिरदर्द और “डिजिटल आई स्ट्रेन” जैसी समस्याएँ होने लगती हैं। कई लोग गर्दन और कंधे के दर्द को सामान्य समझकर नजरअंदाज करते हैं, जबकि यह “टेक्स्ट नेक सिंड्रोम” का संकेत हो सकता है।

घंटों मोबाइल पकड़कर बैठने से हाथों की नसों पर दबाव बढ़ता है, जिससे कार्पल टनल सिंड्रोम, उंगलियों में झनझनाहट और कलाई दर्द की समस्या हो सकती है। लगातार बैठे रहने से कमर दर्द, मोटापा और मांसपेशियों में जकड़न भी बढ़ती है।
सबसे ज्यादा असर नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। रात में स्क्रीन की नीली रोशनी (Blue Light) मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जिससे नींद खराब होती है। धीरे-धीरे चिड़चिड़ापन, तनाव, चिंता और मोबाइल की लत (Nomophobia) बढ़ने लगती है। बच्चों में यह समस्या और तेजी से बढ़ रही है—बाहर खेलने की जगह अब स्क्रीन ने ले ली है।

⚠️ कब हो जाएं सावधान?
• आँखों में जलन या धुंधलापन
• गर्दन, कंधे या कलाई में दर्द
• बार-बार सिरदर्द
• रात में नींद न आना
• मोबाइल दूर होने पर बेचैनी
• लगातार थकान और ध्यान कम लगना

✅ क्या करें?
• हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए दूर देखें (20-20-20 Rule)
• स्क्रीन से उचित दूरी रखें
• रात में सोने से 1 घंटा पहले मोबाइल बंद करें
• सही पोस्चर में बैठें
• बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करें
• रोज थोड़ी शारीरिक गतिविधि और योग जरूर करें
तकनीक जरूरी है, लेकिन स्वास्थ्य उससे भी ज्यादा जरूरी है।
मोबाइल का उपयोग करें, लेकिन खुद मोबाइल के “गुलाम” न बनें।

📱 स्क्रीन से जुड़ी बीमारियाँ
1. कार्पल टनल सिंड्रोम (Carpal Tunnel Syndrome)
की-बोर्ड और माउस का लंबे समय तक उपयोग करने से कलाई की नसों पर दबाव पड़ता है। इससे हाथों में दर्द, झनझनाहट और सुन्नपन महसूस हो सकता है।
2. कंप्यूटर हंच (Computer Hunch)
लगातार झुककर लैपटॉप या मोबाइल देखने से गर्दन और पीठ की प्राकृतिक बनावट प्रभावित होती है। इससे आगे की ओर झुकाव और पीठ दर्द बढ़ता है।
3. माउस आर्म / टेनिस एल्बो (Mouse Arm / Tennis Elbow)
माउस का लगातार उपयोग करने से कलाई और कोहनी की मांसपेशियों में सूजन और दर्द हो सकता है।
4. डिजिटल आई स्ट्रेन (Digital Eye Strain)
मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन को लगातार देखने से आँखों में सूखापन, जलन, धुंधलापन और सिरदर्द की समस्या होती है।
5. टेक्स्ट नेक सिंड्रोम (Text Neck Syndrome)
मोबाइल देखते समय गर्दन को लगातार नीचे झुकाकर रखने से गर्दन, कंधों और रीढ़ पर दबाव बढ़ता है, जिससे दर्द और अकड़न होती है।
6. गेमर थंब (Gamer’s Thumb)
मोबाइल गेमिंग और अत्यधिक स्क्रॉलिंग के कारण अंगूठे के जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द तथा सूजन हो सकती है।
7. डेड बट सिंड्रोम (Dead Butt Syndrome)
बहुत देर तक बैठे रहने से कूल्हों और पैरों की मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, जिससे चलने-उठने में दर्द और असहजता होती है।
8. नोमोफोबिया (Nomophobia)
मोबाइल फोन पास न होने या नेटवर्क खत्म होने पर बेचैनी, डर और तनाव महसूस होना मोबाइल एडिक्शन का संकेत है।
9. स्लीप डिसऑर्डर (Sleep Disorder)
रात में देर तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होती है। स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को कम कर देती है, जिससे अनिद्रा की समस्या बढ़ती है।
10. रिंगिंग सिंड्रोम / टिनिटस (Ringing Syndrome / Tinnitus)
लगातार तेज आवाज में ईयरफोन या हेडफोन इस्तेमाल करने से कानों में घंटी जैसी आवाज सुनाई दे सकती है।
11. सोशल आइसोलेशन / सोशल लाइफ पर असर
तकनीक और स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने से शारीरिक गतिविधियाँ कम होती हैं और लोगों से मिलना-जुलना घटने लगता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।

स्क्रीन का सीमित और सही तरीके से उपयोग जरूरी है। लगातार लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप और गेमिंग से आँखों, गर्दन, हाथों, नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। नियमित ब्रेक, सही पोस्चर, पर्याप्त नींद और डिजिटल डिटॉक्स इन समस्याओं से बचाव में मदद करते हैं।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 8299302319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

“डॉक्टर साहब, मेरी नींद हर रात टूट जाती है… बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है। पहले लगा ज्यादा पानी पीने की वजह होगी, ल...
22/05/2026

“डॉक्टर साहब, मेरी नींद हर रात टूट जाती है… बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है। पहले लगा ज्यादा पानी पीने की वजह होगी, लेकिन अब तो रात में 3–4 बार उठना पड़ता है। सुबह उठते ही थकान रहती है, नींद पूरी नहीं होती…”
OPD में बैठे लगभग 56 वर्षीय मरीज ने चिंता भरे स्वर में यह बात कही। उनके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्होंने इस समस्या को सामान्य समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन धीरे-धीरे रात की नींद खराब होने लगी। दिनभर चिड़चिड़ापन, कमजोरी और काम में ध्यान कम लगने लगा।

बहुत से लोग रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मान लेते हैं, जबकि कई बार यह शरीर की किसी अंदरूनी बीमारी का संकेत हो सकता है। मेडिकल भाषा में इसे Nocturia कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति रात में बार-बार पेशाब के लिए उठता है, खासकर 2 बार से अधिक, और यह नियमित होने लगे, तो कारण जानना जरूरी हो जाता है।

सबसे सामान्य कारणों में रात में ज्यादा पानी, चाय या कॉफी पीना शामिल है। लेकिन हर बार कारण इतना साधारण नहीं होता। मधुमेह (Diabetes) में शरीर अतिरिक्त शुगर को urine के माध्यम से बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे पेशाब ज्यादा बनने लगता है। कई मरीजों में अत्यधिक प्यास और बार-बार पेशाब आना diabetes का शुरुआती संकेत होता है।

पुरुषों में 50 वर्ष की उम्र के बाद Prostate gland का बढ़ना भी एक बड़ा कारण है। इसमें पेशाब की धार कमजोर होना, बार-बार washroom जाना, पेशाब रुक-रुक कर आना और bladder पूरी तरह खाली न होने की शिकायत होती है। कई मरीज रातभर कई बार उठते हैं और नींद बुरी तरह प्रभावित हो जाती है।

इसके अलावा kidney disease, urine infection, overactive bladder, sleep apnea, heart failure और कुछ दवाइयाँ भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकती हैं। High blood pressure या heart disease की कुछ medicines urine output बढ़ाती हैं, जिससे रात में washroom जाना बढ़ सकता है।

कई बार पैरों में दिनभर जमा fluid रात में लेटने पर वापस blood circulation में आता है और kidney ज्यादा urine बनाने लगती है। यही कारण है कि कुछ heart और kidney मरीजों में रात में पेशाब ज्यादा आता है।

आयुर्वेद में इस समस्या को मूत्रवह स्रोतस की विकृति, वात वृद्धि, मधुमेह तथा बस्ति दोष से जोड़ा गया है। आयुर्वेद शरीर की प्रकृति, पाचन और दोष संतुलन को ध्यान में रखकर उपचार पर जोर देता है।
यदि रात में बार-बार पेशाब आने के साथ ये लक्षण भी हों, तो तुरंत जांच करवानी चाहिए:
• अत्यधिक प्यास
• पेशाब में जलन
• पेशाब में झाग
• पैरों में सूजन
• वजन घटना
• कमजोरी
• पेशाब में खून
• बुखार
ऐसी स्थिति में Blood Sugar, Urine Test, Kidney Function Test, Ultrasound और पुरुषों में Prostate evaluation आवश्यक हो सकता है।

क्या करें?
• सोने से 2 घंटे पहले ज्यादा पानी न पिएँ
• रात में चाय, कॉफी और alcohol कम करें
• Diabetes और BP नियंत्रित रखें
• पेशाब को लंबे समय तक न रोकें
• वजन नियंत्रित रखें
• यदि समस्या लगातार बनी रहे तो डॉक्टर से सलाह लें
रात में बार-बार पेशाब आना केवल “छोटी परेशानी” नहीं है। कई बार शरीर इसी तरह संकेत देता है कि अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है। समय रहते कारण पहचानना और उपचार लेना बहुत जरूरी है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

आपको भी जब फैटी लिवर (Fatty Liver) या हेपटाइटिस संबंधित समस्या होती है तो डॉक्टर आपको fibroscan कराने की सलाह देते है। ज...
21/05/2026

आपको भी जब फैटी लिवर (Fatty Liver) या हेपटाइटिस संबंधित समस्या होती है तो डॉक्टर आपको fibroscan कराने की सलाह देते है। जांच के बाद आपको एक रिपोर्ट मिलती है जैसा कि नीचे फ़ोटो संलग्न है। इसको समझने के लिए फिर आपको डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। लेकिन आज इसी रिपोर्ट के आधार पर आसान भाषा मे आपको कुछ उपाय बताउगा जिससे आप स्वयं इसको समझ पाएंगे।

यह एक FibroScan रिपोर्ट है, जो लिवर में
• चर्बी (Fatty Liver)
• और कठोरता/फाइब्रोसिस (Fibrosis/Cirrhosis)
को मापने के लिए की जाती है।
आपकी रिपोर्ट में जो मुख्य बातें दिख रही हैं, उन्हें आसान भाषा में समझिए:

यहाँ संलग्न रिपोर्ट का सरल मतलब
1️⃣ Liver Stiffness (E = 68.3 kPa)
यह सबसे महत्वपूर्ण संख्या है।
• सामान्य लिवर: लगभग 2–7 kPa
• हल्का नुकसान: 7–10 kPa
• गंभीर फाइब्रोसिस: 10–15 kPa
• सिरोसिस (Cirrhosis): >15–20 kPa
आपकी रिपोर्ट में है - 68.3 kPa
यह बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है। आमतौर पर यह बहुत गंभीर लिवर स्कारिंग / Advanced Cirrhosis की तरफ संकेत करता है।
इसका मतलब:
• लिवर काफी कठोर हो चुका है
• लंबे समय से बीमारी चल रही हो सकती है
• Portal hypertension का खतरा हो सकता है
• आगे चलकर पेट में पानी, खून की उल्टी, सूजन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं

2️⃣ CAP Score = 231 dB/m
यह बताता है कि लिवर में कितनी चर्बी जमा है।

Address

Varanasi
221002

Website

https://www.amazon.in/shop/ayushvani-healthtechnology?ref_=cm_sw_r_apann_aipsfshop_K

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