Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

"MRI में कभी कभी दिखने वाला क्या है यह उभार या गढ्ढे जैसी रचना ? क्या आप जानते हैं?"कई बार कमर दर्द की जांच के लिए जब MR...
31/07/2026

"MRI में कभी कभी दिखने वाला क्या है यह उभार या गढ्ढे जैसी रचना ? क्या आप जानते हैं?"
कई बार कमर दर्द की जांच के लिए जब MRI कराई जाती है, तो रिपोर्ट में एक नया शब्द लिखा मिलता है—Schmorl's Node। यह नाम पढ़ते ही अधिकांश मरीज घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद रीढ़ की हड्डी में कोई बड़ा छेद हो गया है या गंभीर बीमारी हो गई है। वास्तव में ऐसा नहीं है।
Schmorl's Node रीढ़ की हड्डी (Spine) में होने वाला एक संरचनात्मक परिवर्तन है। हमारी रीढ़ की हड्डियों के बीच एक मुलायम डिस्क होती है, जो झटकों को सहन करने का काम करती है। कभी-कभी इस डिस्क का एक छोटा-सा हिस्सा ऊपर या नीचे की हड्डी के अंदर धँस जाता है। इसी कारण हड्डी में एक छोटे गड्ढे जैसी आकृति बन जाती है, जिसे Schmorl's Node कहा जाता है।

Schmorl's node रीढ़ (spine) की हड्डियों (vertebrae) में होने वाला एक बदलाव है, जिसमें intervertebral disc का नरम भाग (nucleus pulposus) ऊपर या नीचे की कशेरुका (vertebral body) के अंदर धँस जाता है। यह सामान्य डिस्क स्लिप (slipped disc) से अलग होता है क्योंकि इसमें डिस्क नसों पर नहीं, बल्कि हड्डी के अंदर की ओर जाती है।

क्या यह खतरनाक है?
अधिकांश मामलों में Schmorl's node खतरनाक नहीं होता और यह MRI या X-ray में संयोगवश (incidental finding) मिल जाता है।
इससे क्या नुकसान हो सकता है?
• अधिकांश लोगों में कोई लक्षण नहीं होते।
• कुछ लोगों में पीठ दर्द (back pain) हो सकता है, विशेषकर यदि यह नया बना हो या उसके आसपास सूजन (bone marrow edema) हो।
• यदि कई Schmorl's nodes हों या साथ में डिस्क डिजनरेशन (disc degeneration) भी हो, तो लंबे समय में कमर दर्द की संभावना बढ़ सकती है।
• यह आमतौर पर लकवा, नस दबना या चलने-फिरने में गंभीर समस्या का कारण नहीं बनता।

यह क्यों होता है?
• उम्र बढ़ने के साथ डिस्क का घिसना
• भारी वजन उठाना
• रीढ़ पर बार-बार दबाव पड़ना
• चोट (trauma)
• कुछ लोगों में जन्मजात प्रवृत्ति

यदि केवल Schmorl's node है और कोई गंभीर समस्या नहीं है, तो उपचार में सामान्यतः शामिल हैं:
• दर्द होने पर डॉक्टर की सलाह से दवाएं
• Physiotherapy और back-strengthening exercises
• सही बैठने-उठने की आदत (posture)
• वजन नियंत्रित रखना और भारी वजन उठाने से बचना
कब चिंता करनी चाहिए?
यदि पीठ दर्द के साथ:
• पैर में तेज दर्द या सुन्नपन,
• कमजोरी,
• पेशाब या मल पर नियंत्रण में समस्या,
• या रात में बढ़ने वाला/लगातार गंभीर दर्द हो,
तो तुरंत चिकित्सक में मिलकर जांच और इलाज करानी चाहिए, क्योंकि ये लक्षण किसी अन्य समस्या के हो सकते हैं।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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30/07/2026

‘साइलेंट डिजीज’ बन सकता है फैटी लिवर : डॉ. अजय गुप्ता
वाराणसी (काशीवार्ता)। अधिकांश लोगों को लगता है कि फैटी लिवर में केवल जांच की रिपोर्ट खराब आती है और कोई लक्षण नहीं होते। वास्तव में शुरुआती अवस्था में कई मरीजों को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, अनेक प्रकार की समस्याएं होने लगती हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कई मरीजों में फैटी लिवर होने के बावजूद कोई लक्षण नहीं होते। ऐसे लोगों में यह रोग केवल स्वास्थ्य जांच, अल्ट्रासाउंड या फाइब्रोस्कैन के दौरान पता चलता है। ऐसे व्यक्तियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिनकी रिपोर्ट में फैटी लिवर आ रहा है।

फैटी लिवर के मरीजों में कौन-कौन सी जांच जरूरी होती है और इससे कैसे बचाव किया जा सकता है, साथ ही इसमें कौन-सी आयुर्वेदिक दवाएं दी जा सकती हैं, इन सभी विषयों पर काशीवार्ता संवाददाता ने राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी के पूर्व चिकित्सक डॉ. अजय गुप्ता से बातचीत की।

सवाल : डॉक्टर साहब, सबसे पहले यह बताइए कि फैटी लिवर क्या होता है?

डॉक्टर : फैटी लिवर वह स्थिति है, जिसमें यकृत (लिवर) की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक वसा (फैट) जमा हो जाती है। जब लिवर के कुल वजन का लगभग 5 प्रतिशत या उससे अधिक भाग वसा से भर जाता है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है। शुरुआत में यह एक साधारण समस्या हो सकती है, लेकिन यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो इसमें लिवर में सूजन (स्टीटोहेपेटाइटिस), लिवर फाइब्रोसिस, सिरोसिस और कुछ मामलों में लिवर कैंसर तक होने का खतरा बढ़ सकता है।

सवाल : आम लोगों को सबसे पहले कौन-कौन सी परेशानियां होती हैं?

डॉक्टर : कई मरीजों में शुरुआत में कोई लक्षण नहीं होते, इसलिए इसे ‘साइलेंट डिजीज’ भी कहा जाता है। लेकिन धीरे-धीरे मरीज को हमेशा थकान रहना, पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में भारीपन या दर्द, गैस, अपच, पेट फूलना, भूख न लगना, थोड़ा खाने पर पेट भर जाना और शरीर में सुस्ती जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

सवाल : क्या फैटी लिवर केवल शराब पीने वालों को ही होता है?

डॉक्टर : बिल्कुल नहीं। आज अधिकांश मरीज ऐसे हैं, जो शराब का सेवन नहीं करते। मोटापा, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल, अनियमित खान-पान, जंक फूड, मीठे पेय और शारीरिक श्रम की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।

सवाल : क्या दुबले-पतले लोगों को भी फैटी लिवर हो सकता है?

डॉक्टर : जी हां। यदि किसी व्यक्ति को मधुमेह है, रक्त में वसा अधिक है या भोजन एवं जीवनशैली असंतुलित है, तो सामान्य वजन होने पर भी फैटी लिवर हो सकता है।

सवाल : मरीज को कैसे पता चले कि उसे फैटी लिवर है?

डॉक्टर : कई बार यह बीमारी सामान्य स्वास्थ्य जांच में ही पकड़ में आती है। अल्ट्रासाउंड, फाइब्रोस्कैन और आवश्यकता होने पर अन्य जांचों से इसकी पुष्टि की जाती है।

सवाल : यदि इलाज न कराया जाए तो क्या खतरे हो सकते हैं?

डॉक्टर : शुरुआत में केवल वसा जमा होती है। बाद में लिवर में सूजन (स्टीटोहेपेटाइटिस), फिर फाइब्रोसिस, सिरोसिस, लिवर फेल होने की स्थिति और कुछ मरीजों में लिवर कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है।

सवाल : क्या फैटी लिवर पूरी तरह ठीक हो सकता है?

डॉक्टर : यदि शुरुआती अवस्था में पहचान हो जाए और मरीज वजन नियंत्रित करे, नियमित व्यायाम करे, संतुलित आहार ले, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखे तथा चिकित्सक की सलाह का पालन करे, तो अधिकांश मरीजों में फैटी लिवर में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

सवाल : डॉक्टर साहब, क्या आयुर्वेद में फैटी लिवर का उपचार उपलब्ध है?

डॉक्टर : जी हां। आयुर्वेद में फैटी लिवर का उपचार केवल दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि रोग के कारणों को दूर करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। आहार, विहार, व्यायाम, पंचकर्म तथा औषधियों का समन्वित उपयोग किया जाता है।

सवाल : फैटी लिवर में आयुर्वेद की कौन-कौन सी दवाएं उपयोगी मानी जाती हैं?

डॉक्टर : रोगी की प्रकृति, रोग की अवस्था और अन्य बीमारियों को देखकर औषधि का चयन किया जाता है। सामान्यतः निम्न आयुर्वेदिक औषधियों का चिकित्सकीय परामर्श से उपयोग किया जाता है—
भूम्यामलकी
कालमेघ
भृंगराज
कटुकी
पुनर्नवा
त्रिफला
आरोग्यवर्धिनी वटी
कालमेघासव
इनका उपयोग चिकित्सकीय परामर्श से किया जाना चाहिए।

सवाल : क्या सभी मरीज एक ही दवा ले सकते हैं?

डॉक्टर : बिल्कुल नहीं। आयुर्वेद में प्रत्येक रोगी का उपचार व्यक्तिगत होता है। बिना जांच और चिकित्सकीय सलाह के कोई भी दवा स्वयं नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि हर मरीज की प्रकृति, रोग की अवस्था और अन्य बीमारियां अलग होती हैं।

सवाल : क्या केवल दवा लेने से फैटी लिवर ठीक हो जाएगा?

डॉक्टर : नहीं। यदि मरीज जंक फूड, मीठे पेय, अत्यधिक तेल-घी और निष्क्रिय जीवनशैली नहीं छोड़ता, तो केवल दवा से अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन कम करना और मधुमेह व कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी उतना ही आवश्यक है।

सवाल : अंत में आम जनता के लिए आपका क्या संदेश है?

डॉक्टर : फैटी लिवर को हल्के में न लें। यदि आपको लगातार थकान, पेट में भारीपन, मोटापा, मधुमेह या बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल है, तो एक बार लिवर की जांच अवश्य कराएं। समय पर पहचान और जीवनशैली में सुधार ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।

Dr Vaidya Dr. Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
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जब लड़खड़ाते कदमों से आया एक युवक, फिर आत्मविश्वास से चलकर घर लौटाओपीडी का एक सामान्य दिन था। तभी लगभग 20–22 वर्ष का एक ...
29/07/2026

जब लड़खड़ाते कदमों से आया एक युवक, फिर आत्मविश्वास से चलकर घर लौटा
ओपीडी का एक सामान्य दिन था। तभी लगभग 20–22 वर्ष का एक युवक अपने परिजनों के सहारे धीरे-धीरे, लड़खड़ाते कदमों से मेरे कक्ष में आया। उसके चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा था। कमर और पीठ में लगातार रहने वाला दर्द, सुबह उठने पर कई घंटों तक रहने वाली जकड़न तथा चलने-फिरने में कठिनाई ने उसकी दिनचर्या लगभग छीन ली थी। कुछ कदम चलना भी उसके लिए चुनौती बन गया था।

जांच और पूर्व चिकित्सा अभिलेखों के आधार पर उसे Ankylosing Spondylitis का निदान किया गया था। लंबे समय से दवाएं लेने के बावजूद उसे अपेक्षित राहत नहीं मिल रही थी। परिवार चिंतित था और युवक भी निराश हो चुका था।
उसकी प्रकृति, रोगावस्था और दोष-दुष्य के सम्यक् आकलन के बाद आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार उपचार प्रारंभ किया गया। उपचार में उपयुक्त औषधियों के साथ आहार-विहार, नियमित व्यायाम तथा आवश्यकतानुसार पंचकर्म की योजना बनाई गई। उपचार के दौरान उसकी नियमित फॉलो-अप जांच और लक्षणों का मूल्यांकन भी किया जाता रहा।

धीरे-धीरे उसके दर्द और सुबह की जकड़न में कमी आने लगी। चलने की क्षमता में सुधार हुआ, रीढ़ की गतिशीलता बेहतर हुई और उसका आत्मविश्वास लौटने लगा। कुछ समय बाद वही युवक, जो पहली बार लड़खड़ाते हुए ओपीडी में आया था, बिना सहारे सामान्य रूप से चलकर मेरे सामने आया। उसके चेहरे पर दर्द की जगह मुस्कान थी। उसने कहा, "डॉक्टर साहब, अब मैं अपने रोज़मर्रा के काम आसानी से कर लेता हूँ।"

ऐसे अनुभव चिकित्सक के लिए अत्यंत संतोषजनक होते हैं। यह हमें याद दिलाते हैं कि सही रोगी का चयन, समय पर निदान, नियमित फॉलो-अप और आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार अनेक रोगियों में लक्षणों को नियंत्रित करने, कार्यक्षमता बढ़ाने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

👉 एंकाइलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) में निम्नलिखित जांचें महत्वपूर्ण होती हैं:
1. रक्त की जांच (Blood Tests)
• HLA-B27 – रोग के निदान में सहायक (सभी मरीजों में पॉजिटिव नहीं होता)
• ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) – सूजन का स्तर
• CRP (C-Reactive Protein) – सक्रिय सूजन का बेहतर संकेतक
• CBC (Complete Blood Count) – एनीमिया या संक्रमण का आकलन
• Liver Function Test (LFT) – दवा शुरू करने से पहले और उपचार के दौरान
• Kidney Function Test (KFT) – दवाओं की सुरक्षा के लिए
• Vitamin D – कमी होने पर दर्द और कमजोरी बढ़ सकती है
• Serum Calcium, Phosphorus, ALP – हड्डियों के स्वास्थ्य का आकलन

2. इमेजिंग
• X-ray Sacroiliac (SI) Joints – प्रारंभिक जांच; सैक्रोइलाइटिस देखने के लिए
• X-ray Lumbosacral Spine – रीढ़ में परिवर्तन देखने के लिए
• MRI Sacroiliac Joints – शुरुआती अवस्था में सबसे महत्वपूर्ण जांच; X-ray सामान्य होने पर भी सूजन पकड़ सकती है
• MRI Spine – आवश्यकता होने पर

व्यावहारिक रूप से, यदि किसी 20–30 वर्ष के युवक में 3 महीने से अधिक समय से कमर दर्द, सुबह की जकड़न और आराम से दर्द बढ़ता तथा व्यायाम से कम होता है, तो सबसे पहले ESR, CRP, HLA-B27 और MRI Sacroiliac Joints कराना अत्यंत उपयोगी रहता है। यदि MRI उपलब्ध न हो, तो X-ray SI joints से शुरुआत की जा सकती है।

नोट: एंकाइलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस एक दीर्घकालिक रोग है। प्रत्येक मरीज में उपचार का परिणाम अलग हो सकता है। इसलिए किसी भी प्रकार का उपचार योग्य चिकित्सक की सलाह और नियमित निगरानी में ही कराया जाना चाहिए।

Dr Ajay Gupta
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29/07/2026

✨ शीघ्रपतन (Premature Ej*******on): एक सामान्य लेकिन उपचार योग्य समस्या ✨

पुरुषों के यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में शीघ्रपतन (Premature Ej*******on) एक सामान्य स्थिति है। यह ऐसी समस्या है, जिसके बारे में लोग अक्सर खुलकर बात करने में संकोच करते हैं। परिणामस्वरूप कई लोग अनावश्यक चिंता, मानसिक तनाव और भ्रम का सामना करते हैं। जबकि सही जानकारी और उचित चिकित्सा से अधिकांश मामलों में इसका प्रभावी समाधान संभव है।

👉 शीघ्रपतन क्या है?
जब किसी पुरुष में दाम्पत्य संबंध के दौरान उसकी इच्छा या अपेक्षा से पहले वीर्यपात हो जाता है, और इसके कारण उसे या उसके जीवनसाथी को असंतोष अथवा मानसिक परेशानी का अनुभव होता है, तो इस स्थिति को शीघ्रपतन कहा जाता है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कभी-कभी ऐसा हो जाना सामान्य हो सकता है। यदि यह समस्या लगातार बनी रहे और वैवाहिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तभी इसे चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

👉 इसके संभावित कारण क्या हैं?
शीघ्रपतन के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
• मानसिक तनाव या चिंता
• दाम्पत्य जीवन में तनाव
• अत्यधिक कार्यभार या नींद की कमी
• कुछ हार्मोनल या जैविक कारण
• प्रोस्टेट अथवा मूत्रमार्ग की कुछ समस्याएँ
• कुछ मामलों में आनुवंशिक प्रवृत्ति
अक्सर यह समस्या किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई कारणों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है।

👉 क्या यह कमजोरी का संकेत है?
नहीं। शीघ्रपतन का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर है या उसकी पुरुषत्व क्षमता में कोई कमी है। यह एक सामान्य चिकित्सकीय स्थिति है, जिसका उचित उपचार उपलब्ध है।

👉 क्या इसका उपचार संभव है?
हाँ, अधिकांश रोगियों में उचित उपचार से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। उपचार में निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं—
• सही परामर्श एवं यौन स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा
• तनाव कम करने के उपाय
• जीवनशैली में सुधार
• आवश्यक होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा दवाओं का प्रयोग
• दम्पत्ति परामर्श (Couple Counseling)

आयुर्वेद में भी रोगी की प्रकृति, मानसिक अवस्था तथा अन्य कारणों का सम्यक् मूल्यांकन कर औषधि, आहार, विहार और जीवनशैली संबंधी उचित मार्गदर्शन दिया जाता है।

👉 कब चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए?
यदि यह समस्या बार-बार हो रही हो, वैवाहिक जीवन प्रभावित हो रहा हो, आत्मविश्वास में कमी महसूस हो रही हो या इसके साथ अन्य यौन समस्याएँ भी हों, तो बिना संकोच किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना उचित है।

क्या नहीं करना चाहिए?
• विज्ञापनों में बताए गए चमत्कारी उपचारों पर विश्वास न करें।
• बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा का सेवन न करें।
• अप्रमाणित या भ्रामक जानकारी के आधार पर स्वयं उपचार करने से बचें।

✨✨आयुर्वेद में शीघ्रपतन की अवधारणा एवं उपचार✨✨
आयुर्वेद में शीघ्रपतन को मुख्यतः "शुक्रगत विकार" तथा "शुक्रक्षय", "धातु-दौर्बल्य" और वात दोष, विशेषकर अपान वायु की विकृति से संबंधित माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर, मन और इन्द्रियों के असंतुलन का प्रभाव यौन स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इसलिए उपचार केवल किसी एक लक्षण पर नहीं, बल्कि पूरे व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

👉 आयुर्वेदिक उपचार के प्रमुख सिद्धांत
1. कारणों का निवारण (निदान परिवर्जन)
सबसे पहले उन कारणों को दूर करने का प्रयास किया जाता है जो समस्या को बढ़ाते हैं, जैसे—अत्यधिक मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या, अपर्याप्त नींद, असंतुलित आहार तथा नशीले पदार्थों का सेवन।
2. दोषों का संतुलन
रोगी की प्रकृति और दोषों की स्थिति का मूल्यांकन कर विशेष रूप से वात दोष को संतुलित करने का प्रयास किया जाता है।
3. धातुओं का पोषण (बृंहण चिकित्सा)
यदि शरीर में कमजोरी या धातु-क्षय के लक्षण हों, तो पोषक आहार, बल्य एवं बृंहण चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है, जिससे शरीर की समग्र शक्ति और सहनशीलता में सुधार हो।
4. वाजीकरण चिकित्सा
आयुर्वेद के आठ प्रमुख चिकित्सा अंगों में वाजीकरण का विशेष स्थान है। इसका उद्देश्य केवल यौन क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वस्थ शुक्रधातु, मानसिक प्रसन्नता, संतुलित दाम्पत्य जीवन और स्वस्थ संतति की प्राप्ति भी है।
5. मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण (सत्त्वावजय चिकित्सा)
चिंता, भय, तनाव और आत्मविश्वास की कमी जैसी मानसिक अवस्थाओं का उचित परामर्श, योग, ध्यान एवं प्राणायाम के माध्यम से प्रबंधन किया जाता है।

✨ आयुर्वेदिक औषधियाँ✨
रोगी की प्रकृति, आयु, रोग की अवधि तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखकर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक आवश्यकतानुसार अश्वगंधा, कपिकच्छु, शतावरी, विदारीकन्द, गोक्षुर, कौंच, सफेद मूसली तथा विभिन्न वाजीकरण योगों का चयन कर सकते हैं। किसी भी औषधि का सेवन स्वयं से नहीं करना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक रोगी के लिए उपचार अलग हो सकता है।

💐 आहार एवं जीवनशैली 💐
• संतुलित एवं पौष्टिक आहार लें।
• पर्याप्त एवं नियमित नींद लें।
• नियमित व्यायाम, योग और प्राणायाम करें।
• मानसिक तनाव कम करने का प्रयास करें।
• धूम्रपान, शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों से बचें।
• दाम्पत्य जीवन में आपसी संवाद, विश्वास और धैर्य बनाए रखें।

आयुर्वेद के अनुसार शीघ्रपतन केवल एक शारीरिक समस्या नहीं है, बल्कि शरीर, मन और जीवनशैली के असंतुलन का परिणाम भी हो सकता है। इसलिए इसका उपचार भी समग्र (Holistic) दृष्टिकोण से किया जाता है। उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा, संतुलित आहार-विहार, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल तथा आवश्यक होने पर आधुनिक चिकित्सा के समन्वय से अधिकांश रोगियों में अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
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#शीघ्रपतन *******on

फैटी लिवर पर प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र "काशीवार्ता" की विशेष प्रस्तुति । Fatty Liver and Ayurveda
29/07/2026

फैटी लिवर पर प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र "काशीवार्ता" की विशेष प्रस्तुति । Fatty Liver and Ayurveda

Fatty Liver
28/07/2026

Fatty Liver

28/07/2026

फैटी लिवर: एक साइलेंट बीमारी, जिसे समय रहते पहचानना और रोकना जरूरी है
28 जुलाई को पूरी दुनिया में विश्व हेपेटाइटिस दिवस (World Hepatitis Day) मनाया जाता है। इस अवसर पर लोगों को लिवर (यकृत) से संबंधित बीमारियों के प्रति जागरूक किया जाता है। आज हेपेटाइटिस के साथ-साथ फैटी लिवर भी तेजी से बढ़ती हुई एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश लोगों को तब तक इसका पता नहीं चलता, जब तक लिवर को काफी नुकसान नहीं हो चुका होता।

पहले जानिए, मरीज को क्या-क्या परेशानी होती है?
फैटी लिवर के शुरुआती चरण में कई मरीजों को कोई विशेष लक्षण नहीं होते। इसलिए इसे "साइलेंट डिजीज" भी कहा जाता है। लेकिन जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, मरीज को हमेशा थकान रहना, शरीर में कमजोरी, पेट के दाहिने ऊपरी भाग में भारीपन या हल्का दर्द, गैस, अपच, पेट फूलना, भूख कम लगना, थोड़ा-सा खाने पर ही पेट भर जाना, सुस्ती और काम में मन न लगना जैसी समस्याएँ होने लगती हैं। कई मरीजों में मोटापा, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड भी साथ में पाए जाते हैं।

फैटी लिवर क्या है?
जब लिवर की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक वसा (Fat) जमा होने लगती है, तो उसे फैटी लिवर कहा जाता है। यदि समय पर इसका उपचार न किया जाए, तो यह साधारण वसा जमाव से आगे बढ़कर लिवर में सूजन (Steatohepatitis), फाइब्रोसिस, सिरोसिस और कुछ मामलों में लिवर कैंसर तक का कारण बन सकता है।

किन लोगों को अधिक खतरा है?
• मोटापा या पेट का बढ़ना।
• मधुमेह (Diabetes)।
• रक्त में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बढ़ना।
• जंक फूड, तला-भुना और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन।
• शारीरिक श्रम और व्यायाम की कमी।
• कुछ मामलों में शराब का अत्यधिक सेवन।
यह ध्यान रखना चाहिए कि दुबले-पतले लोगों को भी फैटी लिवर हो सकता है।

जांच कैसे होती है?
फैटी लिवर का पता सामान्यतः Liver Function Test (LFT), Ultrasound, FibroScan तथा आवश्यकता होने पर अन्य रक्त जांचों से लगाया जाता है। जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर लिवर की जांच करानी चाहिए।

आयुर्वेद क्या कहता है?
आयुर्वेद में यह स्थिति मुख्यतः कफ, मेद धातु तथा यकृत की कार्यविकृति से संबंधित मानी जाती है। उपचार का उद्देश्य केवल लिवर में जमा वसा कम करना नहीं, बल्कि शरीर के चयापचय (Metabolism) को संतुलित करना भी होता है।
रोगी की प्रकृति और रोग की अवस्था के अनुसार आयुर्वेद में भूम्यामलकी, कालमेघ, कटुकी, गुडूची, पुनर्नवा, भृंगराज, त्रिफला, आरोग्यवर्धिनी वटी जैसी औषधियों का उपयोग योग्य चिकित्सक के निर्देशन में किया जाता है।

केवल दवा नहीं, जीवनशैली भी बदलनी होगी
फैटी लिवर के उपचार में दवा जितनी आवश्यक है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है जीवनशैली में सुधार। संतुलित भोजन करें, नियमित व्यायाम करें, वजन नियंत्रित रखें, मीठे पेय और जंक फूड से बचें, पर्याप्त नींद लें तथा मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें।

विश्व हेपेटाइटिस दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वस्थ लिवर ही स्वस्थ जीवन का आधार है। चाहे हेपेटाइटिस हो या फैटी लिवर, समय पर जांच, सही जीवनशैली और उचित चिकित्सा से अधिकांश गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है।
याद रखें—लिवर दर्द नहीं करता, लेकिन जब तक दर्द शुरू होता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका हो सकता है। इसलिए अपने लिवर का ध्यान रखें, नियमित जांच कराएं और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं।

Dr Vaidya Dr. Ajay Gupta
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#विश्व_हेपेटाइटिस_दिवस #फैटी_लिवर #स्वस्थ_यकृत #आयुर्वेद #स्वस्थ_जीवन #जनजागरूकता

Ayurvedic Doctor
27/07/2026

Ayurvedic Doctor

25/07/2026

"डॉक्टर साहब, मेरी कमर का दर्द कोई साधारण दर्द नहीं है..."
मरीज अक्सर अपनी परेशानी कुछ इस तरह बताता है—
"डॉक्टर साहब, मेरी कमर के निचले हिस्से में कई महीनों से दर्द रहता है। सुबह जब बिस्तर से उठता हूँ तो कमर और पीठ इतनी अकड़ी रहती है कि सीधा खड़ा होने में भी समय लगता है। आधा घंटा या उससे ज़्यादा चलने-फिरने के बाद थोड़ी राहत मिलती है।"

"अगर मैं ज़्यादा देर बैठा रहूँ या आराम करूँ तो दर्द और बढ़ जाता है, लेकिन जैसे ही टहलता हूँ या थोड़ा व्यायाम करता हूँ तो आराम महसूस होता है। रात में भी दर्द के कारण नींद खुल जाती है, खासकर सुबह के समय।"

"धीरे-धीरे दर्द कमर से कूल्हों, नितंबों और पीठ के ऊपरी हिस्से तक पहुँचने लगा है। कभी-कभी गर्दन भी अकड़ जाती है। पहले जितना झुक पाता था, अब उतना नहीं झुक पाता। सीना भी पहले जैसा नहीं फैलता, गहरी सांस लेने पर खिंचाव और दर्द महसूस होता है।"

"कभी-कभी एड़ी में भी बहुत दर्द होता है, जैसे कोई कील चुभ रही हो। कई बार आंख लाल हो जाती है, दर्द होता है और रोशनी चुभती है।"

"दर्द की वजह से काम करने में परेशानी होती है। लंबे समय तक बाइक चलाना, कुर्सी पर बैठना या यात्रा करना मुश्किल हो जाता है।"

✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस क्या है?✨
यह एक दीर्घकालिक (Chronic) सूजन संबंधी ऑटोइम्यून रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से रीढ़ की हड्डी (Spine) और सैक्रोइलियक (Sacroiliac) जोड़ में सूजन पैदा कर देती है।
यदि समय पर उपचार न मिले, तो रीढ़ की हड्डियाँ आपस में जुड़ (Fusion) सकती हैं, जिससे पीठ और गर्दन की लचक कम हो जाती है और शरीर झुक सकता है।

👉 मुख्य लक्षण
• कमर के निचले हिस्से में 3 महीने से अधिक समय तक दर्द
• सुबह कमर और पीठ में अकड़न (30 मिनट या उससे अधिक)
• आराम करने से दर्द बढ़ना
• चलने-फिरने या व्यायाम से आराम मिलना
• रात के दूसरे हिस्से में दर्द बढ़ना
• नितंबों में एक तरफ या दोनों तरफ दर्द
• गर्दन और पीठ में अकड़न
• झुकने और मुड़ने में कठिनाई
• गहरी सांस लेने पर सीने में दर्द या जकड़न
• एड़ी में दर्द
• आंख लाल होना, दर्द और धुंधला दिखना
• थकान और कमजोरी

👉 किसे अधिक होता है?
• प्रायः 15–40 वर्ष की आयु में शुरुआत
• पुरुषों में अपेक्षाकृत अधिक
• परिवार में किसी को यह रोग होने पर जोखिम बढ़ जाता है
• HLA-B27 जीन वाले लोगों में संभावना अधिक होती है, हालांकि यह सभी में नहीं पाया जाता।

😫 कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
यदि कमर का दर्द 3 महीने से अधिक समय से हो, सुबह अकड़न रहती हो, आराम करने से दर्द बढ़ता हो और चलने से आराम मिलता हो, तो इसे सामान्य कमर दर्द समझकर नज़रअंदाज़ न करें। समय पर जांच और उपचार से रोग की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस में कौन-कौन सी जांच करानी चाहिए और कब करानी चाहिए? ✨
एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) का निदान केवल एक जांच से नहीं होता। मरीज के लक्षण, शारीरिक परीक्षण और विभिन्न जांचों को मिलाकर रोग की पुष्टि की जाती है।
1. शुरुआती जांच (जब पहली बार रोग का संदेह हो)
यदि कमर में 3 महीने से अधिक समय से दर्द हो, सुबह अकड़न रहती हो और चलने से आराम मिलता हो, तो ये जांच करानी चाहिए—
• ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) – शरीर में सूजन का स्तर जानने के लिए।
• CRP (C-Reactive Protein) – सक्रिय सूजन का अधिक संवेदनशील संकेत।
• CBC (Complete Blood Count) – एनीमिया या संक्रमण का आकलन।
• Liver Function Test (LFT) – दवाएं शुरू करने से पहले।
• Kidney Function Test (KFT) – दवाओं के सुरक्षित उपयोग के लिए।
• Vitamin D और Vitamin B12 – यदि हड्डियों या मांसपेशियों की कमजोरी का संदेह हो।
• HLA-B27 – निदान में सहायक, लेकिन केवल इसी के आधार पर रोग की पुष्टि नहीं होती।

2. इमेजिंग (X-ray और MRI)
X-ray Sacroiliac Joint
• सबसे पहले यही जांच कराई जाती है।
• यदि रोग पुराना है, तो इसमें जोड़ में परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
MRI Sacroiliac Joint
• यदि X-ray सामान्य हो लेकिन लक्षण स्पष्ट हों।
• शुरुआती अवस्था में सूजन पकड़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जांच।
X-ray Spine
• जब गर्दन या पूरी रीढ़ में दर्द, अकड़न या झुकाव बढ़ रहा हो।

3. उपचार शुरू होने के बाद फॉलो-अप
यदि केवल दर्द की दवा (NSAIDs) चल रही हो—
• ESR, CRP: हर 3–6 महीने में (या आवश्यकता अनुसार)।
यदि Sulfasalazine जैसी DMARD दवा चल रही हो—
• CBC, LFT: पहले 3 महीने तक हर महीने, फिर हर 3 महीने।
• KFT: हर 3–6 महीने।
यदि Methotrexate दिया जा रहा हो (विशेष परिस्थितियों में)—
• CBC, LFT, KFT: पहले 1–3 महीने तक हर 2–4 सप्ताह, फिर हर 8–12 सप्ताह।
यदि Biological Therapy (जैसे TNF inhibitors या IL-17 inhibitors) चल रही हो— उपचार शुरू करने से पहले—
• CBC
• LFT
• KFT
• HBsAg, Anti-HCV
• HIV
• TB Screening (Mantoux/IGRA एवं Chest X-ray)
उपचार के दौरान—
• CBC, LFT, KFT: हर 3–6 महीने
• ESR, CRP: रोग की सक्रियता के अनुसार।

4. अन्य जांच
• DEXA Scan (Bone Mineral Density): यदि लंबे समय से रोग हो, बार-बार स्टेरॉयड लिया हो या ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम हो।
• Vitamin D: आवश्यकता अनुसार दोबारा।
• Eye Examination: यदि आंख लाल हो, दर्द हो या धुंधला दिखाई दे।
• ECG / Echocardiography: यदि हृदय संबंधी लक्षण हों।
• Pulmonary Function Test (PFT): यदि सांस लेने में तकलीफ हो या सीने का फैलाव कम हो।

✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) में एलोपैथी की दवाएं – कब और किस स्थिति में दी जाती हैं? ✨
एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस एक दीर्घकालिक सूजन (Chronic Inflammatory Disease) है। आधुनिक चिकित्सा में उपलब्ध दवाओं का मुख्य उद्देश्य दर्द और सूजन कम करना, रीढ़ की कार्यक्षमता बनाए रखना तथा रोग की प्रगति को धीमा करना है। वर्तमान में कोई दवा इस रोग का स्थायी इलाज (Cure) सिद्ध नहीं हुई है।
1. NSAIDs (दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं)
कब दी जाती हैं?
• रोग की शुरुआत में।
• हल्के से मध्यम दर्द और अकड़न होने पर।
• अधिकांश मरीजों में यही प्रथम (First-line) उपचार होता है।
उदाहरण
• Naproxen
• Indomethacin
• Diclofenac
• Etoricoxib
• Celecoxib
सावधानी
• गैस्ट्रिक अल्सर, किडनी रोग, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप या हृदय रोग में सावधानी।
• लंबे समय तक उपयोग में किडनी, पेट और हृदय संबंधी दुष्प्रभावों का जोखिम बढ़ सकता है।

2. Proton Pump Inhibitors (PPI)
कब दी जाती हैं?
• यदि NSAIDs लंबे समय तक चलानी हों।
• पेट में अल्सर या एसिडिटी का जोखिम हो।
उदाहरण
• Pantoprazole
• Rabeprazole
• Esomeprazole

3. DMARDs (Disease Modifying Anti-Rheumatic Drugs)
Sulfasalazine
कब दी जाती है?
• जब हाथ-पैर के जोड़ों (Peripheral Arthritis) में सूजन हो।
• केवल रीढ़ की बीमारी (Axial Disease) में इसका लाभ सीमित माना जाता है।
Methotrexate
• केवल विशेष परिस्थितियों में, विशेषकर यदि अन्य जोड़ों की सूजन हो।
• केवल रीढ़ के रोग में सामान्यतः प्रभावी नहीं माना जाता।

4. Corticosteroids (स्टेरॉयड)
कब दिए जाते हैं?
• किसी विशेष जोड़ में अत्यधिक सूजन होने पर स्थानीय इंजेक्शन के रूप में।
• आंख की सूजन (Uveitis) जैसी जटिलताओं में विशेषज्ञ की सलाह से।
• लंबे समय तक नियमित रूप से मुंह से स्टेरॉयड देना एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस के नियमित उपचार का हिस्सा नहीं माना जाता।
उदाहरण
• Prednisolone
• Methylprednisolone
• Triamcinolone (Joint Injection)

5. Biologic DMARDs (जैविक दवाएं)
कब दी जाती हैं?
• जब NSAIDs से पर्याप्त लाभ न मिले।
• MRI या अन्य जांचों में सक्रिय सूजन हो।
• रोग बहुत सक्रिय हो और दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा हो।
TNF-alpha Inhibitors
• Adalimumab
• Infliximab
• Etanercept
IL-17 Inhibitors
• Secukinumab
• Ixekizumab
उपचार शुरू करने से पहले
• TB की जांच
• Hepatitis B, Hepatitis C
• HIV
• CBC, LFT, KFT

6. JAK Inhibitors
कब दिए जाते हैं?
• यदि Biologics प्रभावी न हों या उपयुक्त न हों।
• कुछ मरीजों में विशेषज्ञ द्वारा चयनित स्थिति में।
उदाहरण
• Upadacitinib

7. दर्द नियंत्रित करने की सहायक दवाएं
यदि मांसपेशियों में ऐंठन या अतिरिक्त दर्द हो तो चिकित्सक आवश्यकता अनुसार अल्प अवधि के लिए मांसपेशी शिथिलक (Muscle Relaxants) या साधारण दर्द निवारक दवाएं दे सकते हैं।

👉 महत्वपूर्ण बातें
• नियमित व्यायाम और फिजियोथेरेपी उपचार का अनिवार्य हिस्सा हैं।
• धूम्रपान रोग की प्रगति को तेज कर सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।
• किसी भी दवा को बिना चिकित्सकीय सलाह के शुरू या बंद नहीं करना चाहिए।
• Biologic और JAK inhibitors प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकते हैं, इसलिए उपचार के दौरान नियमित फॉलो-अप और जांच आवश्यक होती है।

✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस में आयुर्वेदिक उपचार ✨
आयुर्वेद में यह रोग मुख्यतः आमवात, वातव्याधि, कटिग्रह एवं त्रिकग्रह के अंतर्गत समझा जाता है। रोग की अवस्था के अनुसार दवाओं का चयन किया जाता है। यहाँ बताई गई किसी भी दवा का प्रयोग बिना चिकित्सक की सलाह लिये नही करना है, क्योंकि मात्रा और कैसे लेनी है इसके लिए परामर्श जरूरी है

1. आम अवस्था (दर्द, सूजन, सुबह अधिक अकड़न)
• सिंहनाद गुग्गुलु
• आमवातारि रस
• रास्ना सप्तक क्वाथ
• दशमूल क्वाथ
• एरण्डमूल क्वाथ

2. निराम अवस्था (सूजन कम होने के बाद)
• महायोगराज गुग्गुलु
• योगराज गुग्गुलु
• अश्वगंधा
• गुडूची
• दशमूलारिष्ट / अश्वगंधारिष्ट (आवश्यकतानुसार)

3. जीवनशैली
• नियमित व्यायाम एवं योग
• गर्म पानी
• हल्का एवं सुपाच्य भोजन
• ठंडे, तले-भुने और बासी भोजन से परहेज
ध्यान दें: दवाओं का चयन रोग की अवस्था, प्रकृति और अन्य रोगों को देखकर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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