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02/10/2026

पंचकर्म कराने से पहले इसे जरूर सुनें

🚨 कैंसर का शर्तिया इलाज और जाँच से परहेज! आखिर क्यों?कैंसर ठीक करने की गारंटी देने वाले कुछ आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक चि...
28/09/2026

🚨 कैंसर का शर्तिया इलाज और जाँच से परहेज! आखिर क्यों?

कैंसर ठीक करने की गारंटी देने वाले कुछ आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक चिकित्सकों का एक नया चलन सामने आ रहा है। किसी भी अवस्था का कैंसर हो, इलाज का दावा किया जाता है, लेकिन मरीज को बार-बार जाँच कराने से रोका जाता है।

मरीज को कुछ राहत मिलती है, शरीर में ताकत महसूस होती है और उसे लगता है कि बीमारी ठीक हो रही है। लेकिन क्या केवल आराम मिलना कैंसर के ठीक होने का प्रमाण है?

अगर इलाज सही है, तो उसकी पुष्टि जाँच से क्यों नहीं होनी चाहिए?

कैंसर के उपचार में पुरानी और नई जाँचों की तुलना करके ही पता लगाया जा सकता है कि बीमारी घट रही है, बढ़ रही है या स्थिर है। पीईटी स्कैन, सीटी स्कैन और अन्य आवश्यक जाँचों से बचना मरीज को भ्रम में रखने जैसा है।

याद रखिए, राहत मिलना और कैंसर का खत्म होना दो अलग-अलग बातें हैं।

जो चिकित्सक इलाज के बाद भी जाँच कराने से रोकता है, उसके दावों पर सवाल उठाना जरूरी है। कैंसर में शर्तिया इलाज नहीं, प्रमाण आधारित उपचार और नियमित निगरानी जरूरी है।

आयुर्वेद दिवस सिर्फ एक दिन नहीं है…गर्भ से लेकर ग्रेवयार्ड तक, हमारी पूरी जीवन-यात्रा आयुर्वेद से जुड़ी है।गर्भावस्था से...
23/09/2026

आयुर्वेद दिवस सिर्फ एक दिन नहीं है…
गर्भ से लेकर ग्रेवयार्ड तक, हमारी पूरी जीवन-यात्रा आयुर्वेद से जुड़ी है।

गर्भावस्था से लेकर जन्म, बचपन, युवावस्था, बुढ़ापा और जीवन की अंतिम अवस्था तक—शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ी हमारी कितनी ही परंपराएँ जाने-अनजाने आयुर्वेद की ही सोच का हिस्सा हैं।

क्या खाना है, कैसे खाना है, भोजन कैसे बनाना है, किस ऋतु में क्या खाना है, बीमारी में क्या सावधानी रखनी है—यह सब “स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा” की उसी आयुर्वेदिक सोच से जुड़ा है।

और जब रोग हो जाए, तो उसका शमन और उपचार—आयुर्वेद के दूसरे उद्देश्य का हिस्सा है।

समय बदलता है, समस्याएँ भी बदलती हैं। आज अत्यधिक स्क्रीन, रील्स और आभासी दुनिया बच्चों के स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं।

इसलिए आयुर्वेद दिवस साल में एक दिन नहीं—जन्म से मृत्यु तक, हर दिन और हर क्षण आयुर्वेद दिवस है।

आप आयुर्वेद को मानते हैं या नहीं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।क्योंकि आप पैदा होने से पहले ही आयुर्वेद के दायरे में आ चुके थ...
23/09/2026

आप आयुर्वेद को मानते हैं या नहीं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
क्योंकि आप पैदा होने से पहले ही आयुर्वेद के दायरे में आ चुके थे।
और शायद मृत्यु तक उससे बाहर नहीं निकल पाएँगे।

गर्भ से लेकर जन्म, बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मृत्यु शय्या तक—शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ी हमारी जीवन-व्यवस्था में आयुर्वेद कहीं न कहीं मौजूद है।

क्या खाना है, कैसे खाना है, भोजन कैसे बनाना है, किस ऋतु में क्या खाना है और बीमारी में क्या सावधानी रखनी है—ये सब केवल परंपराएँ नहीं, स्वास्थ्य की रक्षा की उसी सोच से जुड़े हैं जिसे आयुर्वेद ने बहुत पहले व्यवस्थित रूप दिया।

आयुर्वेद का एक उद्देश्य है—स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना। दूसरा है—रोगी के रोग का शमन करना।

समय बदला तो रोग और समस्याएँ भी बदलीं। आज अत्यधिक स्क्रीन, रील्स और आभासी दुनिया बच्चों के लिए नई स्वास्थ्य चुनौतियाँ बन रही हैं।

इसलिए आयुर्वेद दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।

गर्भ से ग्रेवयार्ड तक—हर दिन, हर क्षण आयुर्वेद दिवस है।

20/09/2026

19/09/2026

ए1 और ए2 दूध की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन घी के मामले में तस्वीर अलग है। ए1 और ए2 का मूल अंतर दूध के प्रोटीन से जुड़ा है, इसलिए दूध और उससे बने दही में यह अंतर बना रह सकता है। लेकिन घी बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश प्रोटीन अलग हो जाते हैं और घी में उनकी मात्रा नगण्य रह जाती है। इसलिए केवल ए1 या ए2 नाम देखकर घी को बेहतर या खराब मानना उचित नहीं है। अगली बार घी खरीदते समय इस अंतर को जरूर समझें।

18/09/2026

आजकल लोग शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर सीधे अल्ट्रासाउंड और कोलोनोस्कोपी जैसी जांचों की ओर भागते हैं, जबकि रिपोर्ट अक्सर सामान्य आती हैं। यदि वे अपने शरीर के लक्षणों और विशेषकर मल की स्थिति पर ध्यान दें, तो पाचन तंत्र की गड़बड़ी आसानी से समझ में आ सकती है।
ग्रहणी व IBS के मुख्य लक्षण: मल का कभी बहुत कड़ा (कब्ज) तो कभी पतला (दस्त) होना, मल में आंव या बलगम (म्यूकस) आना, भोजन का बिना पचे निकलना, और पेट में लगातार गैस या ऐंठन रहना।

13/09/2026

चिकित्सा एक पवित्र सेवा है, व्यापार नहीं। किसी मरीज को मजबूरी में अपना बंधुआ ग्राहक बनाना पूरी तरह से अनैतिक (Unethical) है।
एक सही और पारदर्शी चिकित्सीय प्रक्रिया में ये बातें जरूर होनी चाहिए:
साफ और पठनीय पर्चा: डॉक्टर मरीज की जांच के बाद कंसल्टेशन फीस लें और ऐसा पर्चा (Prescription) लिखकर दें जिसे मरीज और सामान्य व्यक्ति भी आसानी से पढ़ सके।
दवा चुनने की आजादी: पर्चे में लिखी दवाएं मरीज अपनी सुविधा अनुसार डॉक्टर के क्लिनिक से ले या बाहर किसी भी केमिस्ट से, यह पूरी तरह से मरीज का अधिकार है।
यदि कोई डॉक्टर दवाओं के कोड या नाम बदलकर मरीज को केवल अपने ही क्लिनिक से दवा लेने पर मजबूर करता है, तो यह सरासर गलत है।
इसे ऐसे समझें—चिकित्सक अगर स्वास्थ्य के लिए 'भैंस का दूध' पीने की सलाह दे, तो भैंस किसी की भी हो सकती है। लेकिन अगर वो जिद करे कि दूध सिर्फ 'रामू की ही भैंस' का होना चाहिए, तो समझ जाइए कि नीयत में खोट है।
आइए, एथिकल मेडिकल प्रैक्टिस का समर्थन करें और मरीजों के अधिकारों की रक्षा करें।

12/09/2026

मरीज़ बनकर डॉक्टर के पास जाइए
ग्राहक बनकर पंचकर्म कराने मत जाइए
आप ठगे जा सकते हैं!

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