22/06/2026
यसलाई महासंयोग भनौँ कि महायोगायोग,
वा हाम्रा प्रिय सद्गुरु ओशोको अद्भुत दूरदृष्टि भनौँ कि उहाँले यही २१ जुन कै दिन यो पत्र लेख्नुभएको थियो! ।।
आचार्य रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
जबलपुर (म.प्र.)
२१ जून १९६२
प्रिय मां,
कल प्रभात कुछ साध्वियां आई थीं। योग पर उनसे चर्चा हुई है। पूर्वीय संस्कृति ने विश्व को श्रेष्ठतम देन दी है, वह योग है। धर्म आते हैं, चले जाते हैं। सम्प्रदाय बनते हैं, मिट जाते हैं। योग सनातन है।
यह सनातन योग दो प्रकार का है। शक्ति और शांति का। शक्ति का योग एकाग्रता से प्रारम्भ होता है। उससे मन की प्रच्छन्न शक्तियां जागती हैं और मनुष्य को अपने भीतर सिद्धियों का नया आयाम उपलब्ध हो जाता है। यह योग विज्ञान का ही विस्तार है, विज्ञान जो बाहर करता है, शक्तियोग वही कार्य भीतर करता है। यह योग आध्यात्मिक नहीं है।
दूसरा योग शांति योग है। इसकी साधना विचार-शून्यता की है। इसमें पाना नहीं, खोना है। इनको खोकर शून्य उपलब्ध होता है। यह शून्य निर्वाण है। शांति योग ही वस्तुतः आध्यात्मिक है।
शांति-योग की साधना कोई क्रिया, कोई अभ्यास नहीं है। समस्त क्रियाएं और समस्त अभ्यास मन के हैं। शांतियोग तो मन के अतीत में चलता है। शक्ति चाहना वासना है। मन से जो भी उठता है, वह सब वासना है। शांति चाह नहीं है—जब कोई चाह नहीं होती, तब जो होता है वह शांति है। इसलिए, शांति को चाहा नहीं जाता, साधा नहीं जाता; वरन् मन की क्रियाएं जब नहीं होती हैं तब अनायास उसे पा लिया जाता है। जब मन नहीं होता है, तब वह हो आती है।
शक्ति साधना है, शांति सहज उपलब्धि है।
रजनीश के प्रणाम
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