27/06/2026
🪷 अभिधम्म में 52 चेतसिक (Cetasikas) 🪷
चित्त के सहचर मानसिक कारकों का विश्लेषण
अभिधम्म में मन (चित्त) का अत्यंत सूक्ष्म, गहन एवं वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। चित्त कभी भी अकेले उत्पन्न नहीं होता, उसके साथ अनेक मानसिक गुण, प्रवृत्तियाँ और अवस्थाएँ भी उत्पन्न होती हैं। इन्हीं मानसिक सहचरों को चेतसिक (Cetasika) कहा जाता है।
चेतसिक क्या है?
चेतसिक वे मानसिक तत्व हैं जो—
➡️चित्त के साथ उत्पन्न होते हैं,
➡️चित्त के साथ ही निरुद्ध होते हैं,
➡️उसी आलम्बन (विषय) को ग्रहण करते हैं,
➡️ उसी आधार (वत्थु) पर आश्रित रहते हैं।
इस प्रकार चेतसिक चित्त के स्वभाव, गुणवत्ता एवं नैतिक स्वरूप को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अभिधम्म के अनुसार कुल 52 चेतसिक हैं, जिन्हें तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है।
1️⃣अन्यसमान चेतसिक (Aññasamāna Cetasikas) — 13
ये स्वभावतः न कुशल होते हैं और न अकुशल। जिस चित्त के साथ उत्पन्न होते हैं, उसी के अनुरूप कार्य करते हैं।
अन्यसमान चेतसिक दो प्रकार में विभाजित होते हो
1️⃣ सब्बचित्त-साधारण — 7
ये चेतसिका प्रत्येक चित्त में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते हैं।
1. फस्स (Phassa) — स्पर्श / संपर्क
2. वेदना (Vedanā) — अनुभूति
3. सञ्ञा (Saññā) — पहचान
4. चेतना (Cetanā) — संकल्प
5. एकग्गता (Ekaggatā) — एकाग्रता
6. जीविता (Jivita) — मानसिक जीवन-शक्ति
7. मनसिकार (Manasikāra) — मन लगाना
2️⃣पकिण्णक — 6
ये विशेष परिस्थितियों में उत्पन्न होते हैं।
8. वितक्क (Vitakka) — विषय पर मन को लगाना
9. विचार (Vicāra) — विषय पर मन को टिकाए रखना
10. अधिमोक्ख (Adhimokkha) — निश्चय
11. वीरिय (Viriya) — प्रयत्न
12. पीति (Pīti) — प्रसन्नता
13. छन्द (Chanda) — करने की इच्छा
2️⃣अकुशल चेतसिक (Akusala Cetasikas) — 14
ये मानसिक अशुद्धियाँ हैं जो दुःख, क्लेश एवं संसार-बंधन को बढ़ाती हैं।
1️⃣ मोह-चतुक्क — 4
14. मोह (Moha) — अज्ञान
15. अहिरिक (Ahirika) — पाप से लज्जा का अभाव
16. अनोत्तप्प (Anottappa) — पापफल का भय न होना
17. उद्धच्च (Uddhacca) — चंचलता
2️⃣ लोभ-तिक — 3
18. लोभ (Lobha) — आसक्ति
19. दिट्ठि (Diṭṭhi) — मिथ्या दृष्टि
20. मान (Māna) — अहंकार
3️⃣ दोस-चतुक्क — 4
21. दोस (Dosa) — द्वेष
22. इस्सा (Issā) — ईर्ष्या
23. मच्छरिय (Macchariya) — कंजूसी
24. कुक्कुच्च (Kukkucca) — ग्लानि
4️⃣थीदुका चेतासिक
25. थीन (Thīna) — मानसिक आलस्य
26. मिद्ध (Middha) — जड़ता
5️⃣विचिकिच्छा चेतसिका
विचिकिच्छा (Vicikicchā) — संशय
3️⃣शोभन चेतसिक (Sobhana Cetasikas) — 25
ये मन को शुद्ध, शांत, निर्मल एवं कल्याणकारी बनाते हैं। ये तीन प्रकार से विभाजित की जाती है l
1️⃣ शोभन-साधारण — 19
28. सद्धा — श्रद्धा
29. सति — स्मृति / सजगता
30. हिरि — पाप से लज्जा
31. ओत्तप्प — पापफल का भय
32. अलोभ — अनासक्ति
33. अदोस — मैत्री
34. तत्रमज्झत्तता — समता
35. कायपस्सद्धि — मानसिक शांति
36. चित्तपस्सद्धि — चित्त की शांति
37. कायलहुता — हल्कापन
38. चित्तलहुता — चित्त का हल्कापन
39. कायमुदुता — कोमलता
40. चित्तमुदुता — चित्त की कोमलता
41. कायकम्मञ्ञता — कर्मण्यता
42. चित्तकम्मञ्ञता — चित्त की कर्मण्यता
43. कायपागुञ्ञता — निपुणता
44. चित्तपागुञ्ञता — चित्त की निपुणता
45. कायुजुकता — ऋजुता
46. चित्तुजुकता — चित्त की ऋजुता
2️⃣विरति — 3
47. सम्मावाचा — सम्यक वाणी
48. सम्माकम्मन्त — सम्यक कर्म
49. सम्माआजीव — सम्यक आजीविका
3️⃣अप्पमञ्ञा — 2
50. करुणा — दुःखियों के प्रति करुणा
51. मुदिता — दूसरों के सुख में प्रसन्नता
4️⃣पञ्ञिन्द्रिय — 1
52. पञ्ञा (Paññā) — प्रज्ञा, यथार्थ ज्ञान
इन 52 चेतसिकाके माध्यम से साधक यह समझ सकता है कि किसी भी क्षण उसके मन में कौन-से मानसिक कारक कार्य कर रहे हैं।
🪷 "जो चेतसिकों को समझता है, वह चित्त को समझता है; और जो चित्त को समझता है, वह मुक्ति के मार्ग को समझता है।" 🪷
सबका मंगल हो 🌹 🙏