15/07/2026
Day 2 :
अब योग के अनुशासन अर्थात स्वरूप को बताने वाले ग्रन्थ / शास्त्र को प्रारम्भ किया जाता
है।
व्याख्या: योग शब्द का अर्थ वैसे तो बहुत व्यापक है, लेकिन यहा पर योग का अर्थ समाधि से लिया
गया है।
*समाधि की प्राप्ति कैसे की जाए?*
इसके लिए सर्वप्रथम समाधि को समझना आवश्यक है । समाधि चित्त की सभी भूमियों में रहने
वाला धर्म है।
चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, और निरुद्ध नामक पाँच भूमियाँ हैं। चित्त का
निर्माण सत्त्व, रज, और तम से हुआ है।
जिनमें से किसी भी पदार्थ ( तत्त्व )की अधिकता या न्यूनता होने से चित्त की भूमियाँ बनती रहती है।
यहाँ पर इन सभी चित्त भूमियों को विस्तार से जानने का प्रयास करते है।
(1) क्षिप्त– जब चित्त में रजोगुण की प्रधानता/ अधिकता होती है और सत्त्वगुण व तमोगुण गौण
अवस्था में रहते है। तब रज के प्रभाव से व्यक्ति चञ्चल स्वभाव वाला हो जाता है। चंचलता के कारण
वह अपने चित्त को अनेकों विषयों में चलाता रहता है। इस प्रकार चित्त एकाग्र नही हो पाता जिससे
वह अपने लक्ष्य को निर्धारित ही नही कर पाता है। यह चित्त की क्षिप्त अवस्था है।
(2) मूढ़ – चित्त में तमोगुण के बढ़ने से और सत्त्वगुण व रजोगुण के गौण होने से व्यक्ति में आलस्य,
निद्रा, तंद्रा, व मूर्छा आदि अवगुणों का प्रभाव बढ़ता है। चित्त की इस अवस्था को मूढं कहा है। इसमें
किसी प्रकार के सही – गलत का भान ( ज्ञान ) नही होता है।
(3) विक्षिप्त– जब चित्त में सत्त्वगुण की अल्प मात्रा में प्रधानता होती है और साथ ही कभी – कभी
रजोगुण का प्रभाव भी हो जाता है तो कुछ समय के लिए हमारा चित्त एकाग्र होता है। परन्तु रजोगुण
के कारण वह एकाग्रता भंग हो जाती है। इसमें तमोगुण गौण रहता है। चित्त की इस अवस्था को
विक्षिप्त कहा है।
(4) एकाग्र– जब चित्त में सत्त्वगुण की प्रधानता और रजोगुण व तमोगुण की न्यूनता होती है, तब
व्यक्ति का चित्त किसी भी विषय या पदार्थ लम्बे समय तक एकाग्र होने लगता है। इससे योगी में
विवेक और वैराग्य बढ़ता है। इस अवस्था में ‘सम्प्रज्ञात समाधि’ की प्राप्ति होती है जिससे वह
असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है। चित्त की इस अवस्था को एकाग्र कहा
है।
(5) निरुद्ध– यह चित्त की अन्तिम अवस्था है। जब योगी सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त कर लेता है तो
उसे उसमे भी कुछ दोष दिखाई देते है जिससे उसमे ‘परवैराग्य’ का भाव जागृत होने से चित्त की
समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है। चित्त की इस निरुद्ध अवस्था को ही असम्प्रज्ञात समाधि
कहा गया है।
इस असम्प्रज्ञात समाधि में ध्याता, ध्येय, व ध्यान की त्रिपुटी समाप्त होने से शुद्ध चैतन्य आत्मस्वरूप
ही शेष रहता है। यही योगी के जीवन का अन्तिम लक्ष्य होता है, जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार समाधि
द्वारा होता है।
Day 2 :
अब योग के अनुशासन अर्थात स्वरूप को बताने वाले ग्रन्थ / शास्त्र को प्रारम्भ किया जाता
है।
व्याख्या: योग शब्द का अर्थ वैसे तो बहुत व्यापक है, लेकिन यहा पर योग का अर्थ समाधि से लिया
गया है।
*समाधि की प्राप्ति कैसे की जाए?*
इसके लिए सर्वप्रथम समाधि को समझना आवश्यक है । समाधि चित्त की सभी भूमियों में रहने
वाला धर्म है।
चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, और निरुद्ध नामक पाँच भूमियाँ हैं। चित्त का
निर्माण सत्त्व, रज, और तम से हुआ है।
जिनमें से किसी भी पदार्थ ( तत्त्व )की अधिकता या न्यूनता होने से चित्त की भूमियाँ बनती रहती है।
यहाँ पर इन सभी चित्त भूमियों को विस्तार से जानने का प्रयास करते है।
(1) क्षिप्त– जब चित्त में रजोगुण की प्रधानता/ अधिकता होती है और सत्त्वगुण व तमोगुण गौण
अवस्था में रहते है। तब रज के प्रभाव से व्यक्ति चञ्चल स्वभाव वाला हो जाता है। चंचलता के कारण
वह अपने चित्त को अनेकों विषयों में चलाता रहता है। इस प्रकार चित्त एकाग्र नही हो पाता जिससे
वह अपने लक्ष्य को निर्धारित ही नही कर पाता है। यह चित्त की क्षिप्त अवस्था है।
(2) मूढ़ – चित्त में तमोगुण के बढ़ने से और सत्त्वगुण व रजोगुण के गौण होने से व्यक्ति में आलस्य,
निद्रा, तंद्रा, व मूर्छा आदि अवगुणों का प्रभाव बढ़ता है। चित्त की इस अवस्था को मूढं कहा है। इसमें
किसी प्रकार के सही – गलत का भान ( ज्ञान ) नही होता है।
(3) विक्षिप्त– जब चित्त में सत्त्वगुण की अल्प मात्रा में प्रधानता होती है और साथ ही कभी – कभी
रजोगुण का प्रभाव भी हो जाता है तो कुछ समय के लिए हमारा चित्त एकाग्र होता है। परन्तु रजोगुण
के कारण वह एकाग्रता भंग हो जाती है। इसमें तमोगुण गौण रहता है। चित्त की इस अवस्था को
विक्षिप्त कहा है।
(4) एकाग्र– जब चित्त में सत्त्वगुण की प्रधानता और रजोगुण व तमोगुण की न्यूनता होती है, तब
व्यक्ति का चित्त किसी भी विषय या पदार्थ लम्बे समय तक एकाग्र होने लगता है। इससे योगी में
विवेक और वैराग्य बढ़ता है। इस अवस्था में ‘सम्प्रज्ञात समाधि’ की प्राप्ति होती है जिससे वह
असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है। चित्त की इस अवस्था को एकाग्र कहा
है।
(5) निरुद्ध– यह चित्त की अन्तिम अवस्था है। जब योगी सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त कर लेता है तो
उसे उसमे भी कुछ दोष दिखाई देते है जिससे उसमे ‘परवैराग्य’ का भाव जागृत होने से चित्त की
समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है। चित्त की इस निरुद्ध अवस्था को ही असम्प्रज्ञात समाधि
कहा गया है।
इस असम्प्रज्ञात समाधि में ध्याता, ध्येय, व ध्यान की त्रिपुटी समाप्त होने से शुद्ध चैतन्य आत्मस्वरूप
ही शेष रहता है। यही योगी के जीवन का अन्तिम लक्ष्य होता है, जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार समाधि
द्वारा होता है।