Ayurveda Acharya Malwinder Bhardwaj

Ayurveda Acharya Malwinder Bhardwaj Physical, Mental and Spiritual Well Being of Body and Mind by balancing Elements and Doshas using Ayurveda

08/29/2026

जटामांसी!!
मानसिक तनाव और नींद की समस्या का हल है जटामांसी, यह एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जो मुख्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने, तनाव कम करने और अच्छी नींद लाने में मदद करती है।

जटामांसी के लाभ:-
1. मानसिक तनाव और चिंता कम करती है
जटामांसी में प्राकृतिक एडेप्टोजेनिक (Adaptogenic) गुण होते हैं, जो तनाव और चिंता को कम करने में मदद करते हैं।

यह कॉर्टिसोल हार्मोन (तनाव हार्मोन) के स्तर को संतुलित रखती है और दिमाग को शांत करती है।

2. अच्छी नींद लाने में सहायक
अनिद्रा (Insomnia) के लिए जटामांसी एक बेहतरीन औषधि मानी जाती है। यह नर्वस सिस्टम को शांत कर गहरी और बेहतर नींद लाने में मदद करती है। सोने से पहले जटामांसी तेल की मालिश करने से दिमाग शांत होता है और नींद अच्छी आती है।

3. मस्तिष्क की शक्ति और याददाश्त बढ़ाए
यह दिमाग को तेज करने, एकाग्रता बढ़ाने और याददाश्त को मजबूत करने में मदद करती है। बच्चों और छात्रों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद होती है।

4. डिप्रेशन में राहत
इसमें एंटीडिप्रेसेंट गुण होते हैं, जो उदासी और अवसाद को दूर करने में सहायक होते हैं। यह सिरोटोनिन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर को संतुलित करने में मदद करती है, जिससे मूड बेहतर होता है।

5. सिरदर्द और माइग्रेन में उपयोगी
जटामांसी सिर दर्द, माइग्रेन और चक्कर आने की समस्या में राहत देती है। इसे तुलसी और शंखपुष्पी के साथ लेने से और अधिक लाभ मिलता है।
1. जटामांसी पाउडर (चूर्ण):- ¼ से ½ चम्मच चूर्ण को गुनगुने दूध या शहद के साथ रात को सोने से पहले लें। इसे ब्रह्मि और शंखपुष्पी के साथ मिलाकर लेने से मानसिक स्वास्थ्य को अधिक लाभ होता है।

2. जटामांसी तेल:
इसे सिर की मालिश में उपयोग किया जा सकता है, जिससे नींद अच्छी आती है और दिमाग शांत होता है। तनाव कम करने के लिए अरोमाथेरेपी (सुगंध चिकित्सा) में भी जटामांसी तेल का उपयोग किया जाता है।

3. जटामांसी का काढ़ा:
1 चम्मच जटामांसी जड़ के चूर्ण को 2 कप पानी में उबालें और आधा रह जाने पर पी लें। इसे रोजाना पीने से मानसिक शांति और नींद में सुधार होता है।

सावधानियाँ:- अधिक मात्रा में सेवन करने से उनींदापन या सुस्ती महसूस हो सकती है।

विशेष:- जटामांसी एक प्रभावी आयुर्वेदिक औषधि है, जो मानसिक तनाव, चिंता, अनिद्रा और डिप्रेशन को दूर करने में मदद करती है। इसका नियमित सेवन करने से दिमाग शांत रहता है और नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है।
विशेष परिस्थितियों में कुशल वैद्य के सलाह पर ही सेवन करें।

06/30/2026

बुढ़ापे की लाठी (वृद्धदारूक) विधार
विधारा

विधारा को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि घावपत्ता, अधोगुडा, समुद्रशोख, हाथीलता, वृद्धदारुक,, अर्गेरिया, एलीफ़ेंट क्रीपर, ऊनी मॉर्निंग ग्लोरी, हवाईयन बेबी वुडरोज़, सिल्की हाथी ग्लोरी, समुद्रबेल, गुगुलिक, और चंद्रपदा. विधारा एक सदाबहार लता है. यह भारतीय उपमहाद्वीप की देशज है ,विधारा के पत्तों की आकृति पान के पत्तों जैसी होती है,विधारा के फूल बैंगनी रंग के होते हैं,विधारा के फूल, पत्ते, और शाखाओं में कई तरह के स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं।

विधारा की जड़ से लेकर तना और पत्तियों तक का इस्तेमाल कई बीमारियों को दूर करने में किया जाता है।
विधारा में एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटी-इंफ़्लेमेटरी, एनालजेसिक, हेपाटोप्रोटेक्टिव और एफ़्रोडिसिएक गुण पाए जाते हैं।

विधारा नसों के पोर-पोर को खोलने में टॉनिक का काम करता है।विधारा पुरुषों में स्टेमिना को बढ़ाता है।

विधारा महिलाओं के लिए भी फ़ायदेमंद है, विधारा का इस्तेमाल जोड़ों का दर्द, गठिया, बवासीर, सूजन, डायबिटीज, खाँसी, पेट के कीड़े, सिफलिश, एनीमिया, मिरगी, मैनिया, दर्द और दस्त में किया जाता है। विधारा की जड़ पेशाब के रोगों तथा त्वचा संबंधी रोगों और बुखार दूर करने में उपयोगी होती है।
जड़ का एथेनॉलिक सार सूजन दूर करने के साथ-साथ घाव को भरता है। इसकी जड़ के चूर्ण का मेथेनॉल सर दर्द और सूजन को समाप्त करता है। इसके फूलों का ऐथेनॉल सार उपयुक्त मात्रा में लिए जाने पर घावों को भरता है।

विधारा स्वाद में कड़वा, तीखा, कसैला तथा गर्म प्रकृति का होता है। यह जल्द पचता है और भोजन को भी पचाता है। विधारा के प्रयोग से कफ तथा वात शान्त होता है। यह औषधि पुरुषों में शुक्राणुओं को बढ़ाती है और वीर्य को गाढ़ा करती है। इसके सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं, सातों धातु पुष्ट होते हैं और मनुष्य बलवान तथा तेजस्वी होकर लम्बी आयु तक जवान बना रहता है। सिर में दर्द में विधारा की जड़ को चावल के पानी के साथ पीसकर माथे में यानी ललाट पर लगाने से सिर दर्द ठीक हो जाता है।

कई बार पेट में फोड़ा हो जाता है जिसमें बहुत सारे छेद होते हैं। इन्हें दबाने से इनमें से पस भी निकलता है। ऐसे फोड़े को विद्रधि यानी बहुछिद्रिल फोड़ा या कार्बंकल कहते हैं। ऐसे फोड़े पर विधारा की जड़ को पीसकर लगाने से फोड़ा ठीक हो जाता है।

विधारा, भल्लातक तथा सोंठ, तीनों द्रव्यों को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 2-4 ग्राम चूर्ण का सेवन गुड़ के साथ करने से बवासीर रोग में लाभ होता है मधुमेह यानी डायबीटिजके मरीज आज लगभग हर किसी के घर में है विधारा डायबीटिज में तो लाभ पहुँचाता ही है, साथ ही यह धातुओं को पुष्ट करके इसे होने से भी रोकता है। विधारा का सेवन करने से मधुमेह होने की संभावना घट जाएगी और शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ेगी। इसके लिए एक से दो ग्राम विधारा चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे पूयमेह यानी गोनोरिया में भी लाभ होता है।मूत्रकृच्छ्र रोग में पेशाब में जलन और दर्द होता है। पेशाब की मात्रा भी कम होती है।

विधारा पेशाब को बढ़ाता है और जलन तथा दर्द में आराम दिलाता है। दो भाग विधारा की जड़ के चूर्ण में एक भाग गाय का दूध मिलाकर सेवन करें। अवश्य लाभ होगा यदि गर्भधारण करने में सफलता नहीं मिल रही हो तो विधारा का सेवन करें। विधारा तथा प्लक्ष की जड़ के काढ़े को एक वर्ष तक प्रतिदिन सुबह सेवन करें। इससे स्त्री के गर्भवती होने की सम्भावना बढ़ जाती है ।पेट में दर्द मुख्यतः अपच, कब्ज और गैस के कारण ही होता है। विधारा भोजन को भी पचाता है, कब्ज को भी दूर करता है। विधारा वात यानी गैस को भी नष्ट करता है। पेट दर्द को ठीक करना हो तो विधारा के पत्तों के 5-10 मिली रस में शहद मिलाकर सेवन करें। Tripti bhandari acupressure therapist and beautician
निश्चित लाभ होगा।सफेद प्रदर यानी ल्यूकोरिया स्त्रियों में संक्रमण के कारण योनी से सफेद पानी जाने की एक बीमारी है। समय पर चिकित्सा न किए जाने पर स्त्रियों में काफी कमजोरी आ जाती है।

विधारा चूर्ण को ठंडे या सामान्य जल के साथ सेवन करने से सफेद प्रदर में लाभ होता है ,पक्षाघात यानी लकवा का एक प्रकार है। अर्धांग पक्षाघात में शरीर का बाँया या दाँया भाग लकवे का शिकार हो जाता है। विधारा की जड़ एवं कई अन्य घटक द्रव्यों के द्वारा बनाए अजमोदादि चूर्ण का सेवन करने से अर्धांग पक्षाघात में लाभ होता है।विधारा मूल में बराबर भाग शतावर मूल मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 15-30 मिली मात्रा में पीने से गठिया में लाभ होता है।
विधारा की जड़ का काढ़ा बना लें। इसे 15-30 मिली मात्रा में पीने से अथवा 1-2 ग्राम विधारा की जड़ के चूर्ण का सेवन करने से जोड़ों के दर्द, आमवात यानी रयूमैटिस अर्थराइटिस तथा सभी प्रकार की सूजन में लाभ होता है।

विधारा के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से वात के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द आदि विकार ठीक होते है।

03/13/2026

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
बीते हुए दिन वो हाए प्यारे पल छिन
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।
मस्तीयां,,,,,

01/03/2026

सेक्स की लत कैसे इंसान को कमजोर बनाती है — यह विषय केवल नैतिक या सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे शारीरिक, मानसिक और आयुर्वेदिक संतुलन से जुड़ा हुआ है। आयुर्वेद में मनुष्य को केवल मांस-हड्डी का पुतला नहीं माना गया, बल्कि शरीर, मन, इंद्रियाँ और आत्मा—इन चारों का संयुक्त रूप माना गया है। जब इनमें से किसी एक पर भी असंयम हावी होता है, तो पूरा जीवन असंतुलित हो जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार काम (सेक्स) जीवन का एक स्वाभाविक अंग है, लेकिन उसकी सीमा और मर्यादा तय है। चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति विषय-भोग में अति करता है, वह धीरे-धीरे ओज का क्षय कर बैठता है। ओज शरीर की वह सूक्ष्म शक्ति है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता, तेज, आत्मबल और मानसिक स्थिरता का आधार होती है। सेक्स की लत ओज को सबसे पहले और सबसे गहराई से नुकसान पहुँचाती है।

लगातार काम-विचार, अश्लील दृश्य, बार-बार वीर्यस्राव या मानसिक उत्तेजना से शरीर की धातु-निर्माण प्रक्रिया बिगड़ जाती है। आयुर्वेद के अनुसार भोजन से रस बनता है, रस से रक्त, फिर मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और अंत में वीर्य। वीर्य सबसे परिष्कृत धातु है। जब इसे बार-बार नष्ट किया जाता है, तो शरीर को इसे फिर से बनाने में अत्यधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति भीतर से कमजोर होने लगता है, भले ही बाहर से वह सामान्य दिखे।

सेक्स की लत केवल शारीरिक कमजोरी नहीं लाती, बल्कि मानसिक गुलामी पैदा करती है। मन हर समय उत्तेजना की तलाश में भटकता रहता है। एकाग्रता घटती है, स्मरण शक्ति कमजोर होती है, निर्णय लेने की क्षमता कम हो जाती है। आयुर्वेद इसे रजोगुण की अधिकता मानता है। रजोगुण बढ़ने से चंचलता, बेचैनी, क्रोध और असंतोष बढ़ता है, जबकि सत्त्वगुण घटने लगता है, जो शांति, विवेक और संतुलन का गुण है।

लंबे समय तक सेक्स की लत में फँसा व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मविश्वास खो देता है। उसे अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहता। यही कारण है कि ऐसे लोग थकान, कमर दर्द, घुटनों की कमजोरी, आंखों की चमक कम होना, चेहरे पर निस्तेजता, जल्दी चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसे लक्षण अनुभव करते हैं। आयुर्वेद में इसे वात-पित्त विकृति का परिणाम माना गया है। अधिक उत्तेजना से पित्त बढ़ता है और बार-बार क्षय से वात बिगड़ता है, जो शरीर और मन दोनों को खोखला करता है।

सेक्स की लत रिश्तों को भी कमजोर करती है। व्यक्ति सामने वाले इंसान को भावना या साथी नहीं, बल्कि भोग की वस्तु की तरह देखने लगता है। इससे प्रेम, सम्मान और विश्वास खत्म होने लगता है। आयुर्वेदिक दृष्टि में यह प्रज्ञापराध है—अर्थात बुद्धि का अपराध। जब मनुष्य जानते-समझते हुए भी असंतुलित आचरण करता है, तो रोग केवल शरीर में नहीं, जीवन में फैल जाता है।

आयुर्वेद संयम को दमन नहीं, बल्कि शक्ति का संरक्षण मानता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल त्याग नहीं, बल्कि ऊर्जा का सही दिशा में प्रवाह है। वही ऊर्जा जब विचार, कर्म, साधना और रचनात्मकता में लगती है, तो व्यक्ति तेजस्वी, आत्मनिर्भर और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनता है। इतिहास में महान ऋषि, वैज्ञानिक, योद्धा और विचारक इसी ऊर्जा-संरक्षण के उदाहरण हैं।!(NA)!

इस प्रकार आयुर्वेद स्पष्ट करता है कि सेक्स स्वयं कमजोरी नहीं है, बल्कि उसकी लत इंसान को अंदर से तोड़ देती है। यह लत शरीर की धातुओं को, मन की स्थिरता को और जीवन की दिशा को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। संयम, संतुलन और जागरूकता ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य अपनी शक्ति को क्षय नहीं, बल्कि विकास की ओर ले जा सकता है।......
धन्यवाद🙏🙏

01/02/2026

अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)

अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:।
मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।।
अपामार्ग सरस्तीक्ष्णो दीपनस्तिक: कटु:।
पाचनो रोनश्छर्दिकफमेदोऽनिलापह:।।
(भा.प्र. २१९-२२०)

अपामार्ग को चिरचिरा, शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमञ्जरी आदि नामों से जाता है। अपामार्ग तिक्त तथा कटु रसयुक्त सारक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, पाचक, रोचक एवं वमन, कफ, मेद, वायु, हृद्रोग, आध्मान, अर्श, कण्डू, शूल, उदररोग और अपची को दूर करता है।
अपामार्ग (चिरचिरा) बहूपयोगी, भारत के सभी प्रान्तों के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्रों में स्वत: उत्पन्न होने वाला पौधा है। यह पौधा विशेष रूप से वर्षा ऋतु में पाया जाता है किन्तु कहीं-कहीं वर्षपर्यन्त भी मिलता है। वर्षा की पहली फुहार पड़ते ही यह अंकुरित होने लगता है। यह सर्दियों में फलता-फूलता है तथा गर्मियों में परिपक्व होकर फलों के साथ पौधा भी सूख जाता है। इसके पुष्प हरी, गुलाबी कलियों से युक्त तथा बीज चावल जैसे होते हैं। जिन्हें अपामार्ग तंडुल कहते हैं।

अपामार्ग को लैटिन भाषा में एकायरेन्थिस् एस्पेरा (Achyranthes aspera) कहते हैं। यह एमारेन्थेसी (Amaranthaceae) कुल का पौधा है।

संस्कृत भाषा में नाम- अपामार्ग को संस्कृत भाषा में शिखरी, अध:शूल, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमंजरी, प्रत्याकपुष्पी आदि नामों से जाना जाता है।
प्रादेशिक भाषा में नाम- अपामार्ग को विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में निम्नांकित नामों से जाना जाता है-
हिन्दी- चिरचिरा, अपामार्ग, लटजीरा
उर्दू- चिरचिटा
असमिया- अपंग
कन्नड़- उत्तरणी
कोकणी- कान्टमोग्रो
गुजराती- अघेड़ो
तमिल- नायुरुवि
तेलगू- अपामार्गमु
बंगला- अपांग, चिरचिटी
नेपाली- दतिवन
पंजाबी- कुत्री, पुठखण्डा
मराठी- अघाड़ा
मलयालम् - वनकटलटी, कटलटी
अंग्रेजी- Washerman's plant
अरबी- अत्कुमह
फारसी- खरेवाजहुन
गणवर्गीकरण-

स्वरूप- अपामार्ग का पौधा ३०-९० से.मी. ऊँचा, वर्षायु अथवा बहुवर्षायु प्राय: काष्ठीय आधार युक्त, शाकीय होता है। इसका काण्ड रक्ताभ, बैंगनी वर्ण का होता है। इसकी शाखायें मोटी, धारीदार तथा चतुष्कोणीय होती हैं। इसके पत्र विपरीत, २.५-१२.५ से.मी. लम्बे होते हैं। पत्रों के आकार अलग-अलग होते हैं। इसके फल कपड़ों में चिपक या हाथ में चुभ जाते हैं। इसके बीज रक्ताभ, भूरे रंग के, उपबेलनाकार, शीर्ष पर शुण्डित तथा आधार पर गोल होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से नवम्बर तक होता है।

रासायनिक संघटन- अपामार्ग की जड़ में ट्राईटर्पीनोयड, सैपोनिन, एकायरेन्थिन, बीटेन, हेन्ट्रीएकोन्टेन, ग्लाइकोसाईड तथा ओलिएनोलिक अम्ल पाया जाता है। इसके बीज के तैल में लिनोलिईक, ओलीक, पामिरिक, स्टेयरिक, बेहैनिक, एराकिडिक, मिरिस्टिक तथा लारिक अम्ल पाया जाता है। इसके पौधे में प्रचुर मात्रा में पोटाश पाया जाता है।
उत्पत्ति स्थान- अपामार्ग का पौधा पूरे भारत के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्र में स्वत: उत्पन्न होता है।

जाति भेद- जाति भेद से अपामार्ग श्वेत, रक्त अपामार्ग, गिरी अपामार्ग, रक्तपुष्पामार्ग, पक्ष पत्रापामार्ग प्रकार का पाया जाता है।
रस पंचक-
रस- तिक्त, कटु
गुण- लघु
वीर्य- शीत वीर्य
विपाक- कटु
प्रभाव- रेचक, दीपन
प्रयोज्यांग- पत्र, मूल तथा पंचांग
मात्रा- स्वरस १०-२० मि.ली.
मूल चूर्ण- ३-६ ग्राम, क्षार १/२-२ ग्राम।
दोषघ्नता- कफवात शामक, कफपित्त संशोधक।
कर्मघ्नता- शोथहर, वेदना स्थापक, लेखन, विषघ्न, त्वकदोषहर, व्रणशोधक, शिरोविरेचक, रेचन, दीपन, पाचन, पित्तसारक, कृमिघ्न, रक्तशोधक, रक्तवर्धक, शोथहर, मूत्रल, अश्मरीहर, स्वेदजनन, कुष्ठघ्न।
रोगघ्नता- अश्मरी, शर्करा, वातविकार, मूत्रकृच्छ्र, कृमिकुष्ठ, यकृत प्लीहा, विसूचिका, भस्मक, अर्श, वृक्कशूल, योनिशूल।

रोगानुसार प्रयोग
माइग्रेन में- अपामार्ग के बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से आधा सीसी दर्द में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अन्दर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के जरिये निकल जाता है।

नेत्र विकार में- २ ग्राम अपामार्ग चूर्ण में २ चम्मच शहद मिलाकर २-२ बूँद आँख में डालने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।

नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, नेत्रकण्डू, नेत्रस्राव, नेत्रों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में अपामार्ग की स्वच्छ मूल को साफ तांबे के बर्तन में थोड़ा सा सेंधा नमक मिले हुये दही के पानी के साथ घिसकर अंजन के रूप में लगाने से लाभ होता है।

बहरेपन में- अपामार्ग की साफ, धोई हुई जड़ का रस निकालकर उसमें बराबर मात्रा में तिल का तैल मिलाकर आग में पका लें। जब केवल तैल शेष रहे तब उतार लें, छानकर शीशी में रख लें। इस तैल को गर्म करके हर रोज २-३ बूँद कान में डालने से कान का बहरापन व कर्णपूय दूर हो जाता है।

¬ अपामार्ग क्षार का घोल तथा अपामार्ग पत्र कल्क में चार गुना तैल मिलाकर तैल पाक कर प्राप्त तैल से कर्णपूरण करने से कर्णनाद एवं बहरापन दूर होता है।
दाँत के दर्द में- अपामार्ग के २-३ पत्तों के स्वरस को रूई के फाहे में डालकर दाँत में लगाने से दाँत का दर्द दूर हो जाता है। अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दाँत मोती की तरह चमकने लगते हैं। दन्तशूल, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुँह की दुर्गन्ध भी दूर हो जाती है।
श्वास-कास में- अपामार्ग की जड़ में बलगम युक्त खाँसी और दमे को नष्ट करने का चमत्कारिक गुण होता है। इसके ८-१० सूखे पत्ते को हुक्के में रखकर पीने से श्वास रोग में आराम मिलता है।

¬ लगभग १०-२५ मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार में शहद मिलाकर प्रात:-सायं चटाने से बच्चों की श्वास नली तथा वक्ष:स्थल में संचित कफ दूर होकर बाल कास दूर होता है।

¬ खाँसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लसलसा हो गया हो या न्यूमोनिया हो तो १२५-२५० मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार व सममात्रा में चीनी मिलाकर ३० मि.ली. गर्म जल से सुबह-शाम सेवन करने से ७ दिन में लाभ होता है।
६ मि.ली. अपामार्ग की जड़ का चूर्ण व ७ नग कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम ताजे जल से सेवन करने पर खाँसी दूर हो जाती है।

¬ अपामार्ग के पंचांग की भस्म बनाकर ५०० मि.ग्रा. भस्म में शहद मिलाकर चाटने से कुक्कुर खाँसी में राहत मिलती है।
विसूचिका में- २-३ ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को दिन में २-३ बार शीतल जल के साथ सेवन करने से विसूचिका तुरन्त नष्ट हो जाती है। अपामार्ग के ४-५ पत्तों का रस निकालकर थोड़ा सा मिश्री मिलाकर सेवन करने से भी विसूचिका में लाभ मिलता है।

उदर विकार में- २० ग्राम अपामार्ग पंचांग को लेकर ४०० मि.ली. पानी में पकाने और काली मिर्च मिलाकर दिन में ३ बार सेवन करने से उदरशूल मिट जाता है।

भस्मक रोगों में- भस्मक रोग में अपामार्ग का चूर्ण ३ ग्राम दिन में दो बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करने से निश्चित् रूप से लाभ होता है। अपामार्ग के ५-१० ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिकतम ३ बार करने से ही रोग ठीक होता है। इसके ५-१० ग्राम बीजों का सेवन करने से भी भस्मक रोग में आराम मिलता है और अर्श में लाभ होता है।

अर्श में- अपामार्ग की ६ पत्तियाँ तथा ५ नग कालीमिर्च को पानी के साथ पीसकर छानकर प्रात: सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है और उससे निकलने वाला रक्तार्श बन्द हो जाता है। १०-२० ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से पित्तज या कफज रक्तार्श में लाभ होता है।

यकृत प्लीहा में- ५०-६० मि.ली. अपामार्ग पंचांग क्वाथ को भोजन से पूर्व सेवन करने से पाचक रस में वृद्धि होकर शूल कम होता है। भोजन के २-३ घण्टे पश्चात् अपामार्ग पंचांग पीने से अम्लता कम होती है तथा स्राव उचित मात्रा में होता है जिससे पित्ताश्मरी का शमन हो जाता है।

वृक्कशूल में- अपामार्ग की ५-१० ग्राम जड़ को पानी में पीसकर, घोलकर पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह औषधि बस्ति की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्कशूल के लिए यह प्रधान औषधि है।

योनिशूल में- अपामार्ग की जड़ को पीसकर, रस निकालकर रुई को भिगोकर योनि में रखने से योनिशूल और मासिक धर्म की रुकावट मिट जाती है।

गर्भधारण में- अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव के कारण जो स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर पातीं, उन्हें ऋतु स्नान के दिन उत्तम भूमि में उत्पन्न इस दिव्य औषधि के १० पत्ते या इसकी १० ग्राम जड़ को गाय के १२५ मि.ली. दूध के साथ पीसकर, छानकर ४ दिन तक दिन में ३ बार पिलाने से स्त्री गर्भ धारण कर लेती है। यह प्रयोग यदि एक बार में सफल न हो तो अधिक से अधिक तीन बार करें।

रक्तप्रदर में- अपामार्ग के लगभग १० ग्राम ताजे पत्ते एवं ५ ग्राम हरी दूब, दोनों को पीसकर, ६० मि.ली. जल में मिलाकर छान लें तथा गाय के दूध में २० मि.ली. या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर प्रात:काल ७ दिन तक पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें। इससे रक्त प्रदर निश्चित् रूप से ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गाँठ के कारण रक्तस्राव होता है तो इस प्रयोग से गाँठ भी घुल जाती है।
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कैसे भी द्रव्य को उपयोग में लेने से पहले अपने पास किसी अनुभवी वैध से परामर्श अवश्य करें

12/29/2025

#भैषज्यकाल
आयुर्वेद में दवा लेने का समय इतना आसान और मजेदार है कि इसे समझकर आप खुद को "समय का जादूगर" महसूस करेंगे! 😄 कल्पना किजिए—आपकी दवा एक सुपरहीरो है। अगर वो सही समय पर आए, तो वो बीमारी को पलक झपकते ही भगा देगी। लेकिन गलत समय पर आए, तो वो थककर सो जाएगी और असर कम हो जाएगा।

आयुर्वेद के बड़े-बड़े ग्रंथ (चरक संहिता और अष्टांग हृदय) कहते हैं कि दवा लेने के 10 मुख्य समय हैं। दोनों किताबों में ठीक 10 ही बताए गए हैं—कोई ज्यादा-कम नहीं! ये समय आपके शरीर के "दोष" (कफ, पित्त, वात) और पाचन की आग के हिसाब से बनाए गए हैं। चलिए, इन 10 समयों को समझते हैं:—

1️⃣अभक्त /अन्नन —सुबह उठते ही खाली पेट
जैसे कोई चोर रात भर जागकर थक गया हो, वैसे ही कफ (बलगम वाली बीमारियाँ) सुबह सबसे कमजोर होता है। इस समय दवा लो तो वो "बूम!" कहकर कफ को उड़ा देगी। उदाहरण: च्यवनप्राश, इम्यूनिटी बढ़ाने वाली दवाएँ, मोटापे की दवा।
2️⃣प्राग्भक्त—खाना खाने से ठीक पहले
पेट की निचली तरफ की समस्याएँ —कब्ज, फाइल्स, मासिक धर्म की तकलीफ, किडनी स्टोन। यहाँ दवा से जल्दी ठीक होती हैं। जैसे कोई नल खोलने से पहले पानी की टंकी चेक कर लेते हैं—वैसे ही पेट साफ करने वाली दवाएँ यहाँ लें।
3️⃣मध्यभक्त —खाने के बीच में
अगर पेट में गड़बड़ है—भूख न लगना, गैस, एसिडिटी—तो खाना खाते-खाते दवा लो। ये समय पाचन की "टीम" को सीधे मदद देता है।
4️⃣पश्चाद्भक्त/सभक्त—खाना खाने के तुरंत बाद दिल की दवा, तनाव, चेहरे की चमक, आवाज मजबूत करने वाली दवाएँ यहाँ लें। सुबह के बाद—दिल को ताकत। शाम के बाद —चेहरा चमकदार और बोलने की ताकत!
5️⃣ग्रासे-ग्रासे—हर कौर के साथ या हर कौर के बाद। साँस की बीमारियाँ (खाँसी, अस्थमा) में। ये समय कमाल करता है। जैसे हर कौर के साथ दवा भी अंदर जाती है—श्वास की ताकत बढ़ जाती है!
6️⃣मुहुर्मुहु—बार-बार थोड़ी-थोड़ी। इमरजेंसी जैसी स्थिति—बार-बार उल्टी, हिचकी, तेज खाँसी, विष—तो दवा को "सिप-सिप" पीते रहो, बार-बार लेते रहो। जैसे प्यास लगे तो बार-बार पानी पीते हैं—वैसे ही!
7️⃣सभोज्य—खाने में मिलाकर। बच्चों को दवा देनी हो या भूख न लग रही हो—तो खाने में मिला दो। स्वाद भी अच्छा, दवा भी अंदर!
8️⃣निशि—रात को सोने से पहले। आँखों की रोशनी, याददाश्त तेज करना, सिर-गले-कान की बीमारियाँ—ये समय सबसे अच्छा। जैसे रात को मोबाइल बंद करके सोते हैं, वैसे ही दिमाग को रिफ्रेश करने वाली दवाएँ इस समय लें। त्रिफला चूर्ण रात में लेना याद है न?
9️⃣-🔟सामुद्ग, सन्निपात आदि—खास स्थिति वाले समय
कुछ खास रोगों में पहले और बाद दोनों समय या मिश्रित तरीके से। डॉक्टर ही बताएंगे।

🔸सबसे जरूरी बात🔸
ये समय बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन आप खुद से मत तय करें। हर इंसान का शरीर अलग है—प्रकृति अलग, बीमारी अलग। तो क्या करें? अपने आयुर्वेदिक डॉक्टर से पूछें: "डॉक्टर जी, मैं ये दवा किस समय लूँ?"

डॉक्टरों से अनुरोध: हर मरीज को दवा के साथ "समय" भी जरूर बताएं। इससे इलाज दोगुना तेज और सुरक्षित हो जाता है!

समय सही हो तो थोड़ी दवा भी अमृत बन जाती है। गलत हो तो अमृत भी बेकार!
स्वस्थ रहो, खुश रहो, मस्त रहो!🌿

Vaidya U. S. Prasad

Suchit kumar chokdde ki wal se sabhaar,,,,,,होम्योपैथिक दवा चिमाफिला अंबेल्लाटा क्यू (Chimaphilla Umbellata Q) और इसकी प...
11/09/2025

Suchit kumar chokdde ki wal se sabhaar,,,,,,होम्योपैथिक दवा चिमाफिला अंबेल्लाटा क्यू (Chimaphilla Umbellata Q) और इसकी पोटेंसी प्रयोग में लाई जाती है

दोस्तो! आज हम एक अद्भुत मूत्रवर्धक और प्रोस्टेट की जिद्दी बीमारियों की रामबाण होम्योपैथिक दवा के बारे में बात करेंगे, यह है चिमाफिला अम्बेलाटा क्यू (Chimaphila Umbellata Q)। इसे पिप्सिसेवा (Pipsissewa) या विंटरग्रीन की रानी भी कहते हैं। यह उत्तर अमेरिका के जंगलों में उगने वाला एक छोटा, सदाबहार पौधा है, जिसके हरे पत्तों और तने से यह मदर टिंक्चर बनाई जाती है। यह मुख्य रूप से मूत्र में चीनी (ग्लूकोजुरिया), प्रोस्टेट की सूजन, पेशाब में रुकावट, मूत्राशय में पथरी की शुरुआत, महिलाओं में मूत्र मार्ग संक्रमण, और दूध में कमी के लिए इस्तेमाल होती है। अगर आपको पेशाब में मीठी गंध, बूंद-बूंद टपकना, मूत्राशय में भारीपन, या दूध कम आता है तो यह दवा आपके लिए रामबाण है। इस लेख में हम रिसर्च, क्लिनिकल स्टडीज, और होम्योपैथिक मटेरिया मेडिका (बोरिक, क्लार्क, फरिंग्टन) के आधार पर हर बात को सरल भाषा में समझाएंगे। इसमें उपयोग, फायदे, पोटेंसी (Q, 3X, 6C, 30C), और कब कौनसी पोटेंसी लेनी चाहिए, सब शामिल होगा। ध्यान दें: कोई भी दवा या पोटेंसी लेने से पहले होम्योपैथिक डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

चिमाफिला क्यू क्या है?
चिमाफिला क्यू एक होम्योपैथिक मदर टिंक्चर है, जो चिमाफिला अम्बेलाटा (Chimaphila umbellata) के ताज़े हरे पत्तों और तने से बनाई जाती है। यह एरिकेसी (Ericaceae) परिवार का है और कनाडा, अमेरिका के ठंडे जंगलों में पाया जाता है। मुख्य एक्टिव कंपाउंड्स: चिमाफिलिन (chimaphilin), आर्सिन (arbutin), टैनिन, रेजिन, फ्लेवोनॉइड्स। ये कंपाउंड्स मूत्र मार्ग को साफ करते हैं, प्रोस्टेट की सूजन कम करते हैं, मूत्र में चीनी निकालते हैं। होम्योपैथी में इसे "मूत्र की मीठी बीमारी और प्रोस्टेट की जिद्दी दवा" कहा जाता है। बोएरिके में लिखा है: “पेशाब में चीनी, मूत्राशय में भारीपन, बूंद-बूंद टपकना, दूध में कमी”।

इस दवा की उत्पत्ति और इतिहास
अमेरिकी मूलनिवासी (इंडियंस) पिप्सिसेवा को मूत्र रोग और दूध बढ़ाने के लिए पीते थे। 18वीं सदी में डॉ. जोंस ने इसे मूत्र में चीनी के लिए इस्तेमाल किया। होम्योपैथी में डॉ. हैल ने प्रूविंग्स किए। क्लार्क ने इसे "ग्लूकोजुरिया और प्रोस्टेटाइटिस की मुख्य दवा" कहा। आधुनिक रिसर्च (Journal of Ethnopharmacology, 2022) में पाया गया कि चिमाफिला मूत्र में ग्लूकोज 38% तक कम करता है। आज SBL, Schwabe, Reckeweg, Adel और सभी कंपनियां इसे बनाती हैं।

कैसे बनाई जाती है यह दवा?
ताज़े हरे पत्ते और तना गर्मियों में इकट्ठे किए जाते हैं।
इन्हें 70% अल्कोहल में 1:10 अनुपात में 14-21 दिन तक भिगोया जाता है।
छानकर मदर टिंक्चर (Q) तैयार होती है।
फिर सक्यूसेशन + डाइल्यूशन से 3X, 6C, 30C बनाई जाती हैं।
ध्यान: सूखे पत्तों से नहीं, केवल ताज़े हरे से।
इस दवा के उपयोग और फायदे
चिमाफिला "मूत्र मार्ग और प्रोस्टेट की सफाई" करता है। रिसर्च और क्लिनिकल आधार पर-
मूत्र में चीनी (Glucosuria): पेशाब मीठा, चिपचिपा, ज्यादा प्यास। पोटेंसी: Q
प्रोस्टेट की सूजन (Prostatitis): मूत्राशय में भारीपन, पेशाब बूंद-बूंद। पोटेंसी: 3X
मूत्र प्रतानि (Urinary Retention): पेशाब शुरू करने में देरी, रुकावट। पोटेंसी: Q
मूत्राशय में पथरी की शुरुआत: छोटे पत्थर, रेत जैसा स्राव। पोटेंसी: 3X
महिलाओं में UTI: जलन, बार-बार पेशाब, दूध में कमी। पोटेंसी: Q
स्तन का दूध बढ़ाना (Galactagogue): दूध कम आना, बच्चे को भूख। पोटेंसी: Q
पुरानी किडनी कमजोरी: मूत्र में प्रोटीन, सूजन। पोटेंसी: 6C
पैरों में सूजन (Dropsy): मूत्र कम आना। पोटेंसी: 3X
रिसर्च:-
Homeopathy Research Journal (2021): ग्लूकोजुरिया में 62% मरीजों में 30 दिनों में सुधार।
Indian Journal of Research in Homeopathy (2023): प्रोस्टेटाइटिस में पेशाब की धार 55% बेहतर।
विभिन्न पोटेंसी के उपयोग और कब लेनी चाहिए
Q (मदर टिंक्चर): तीव्र मूत्र लक्षण, लंबे कोर्स। उदाहरण: ग्लूकोजुरिया, UTI।
3X: मूत्राशय-पथरी, प्रोस्टेट सूजन। उदाहरण: बूंद-बूंद टपकना।
6C: मध्यम लक्षण, दूध बढ़ाना। उदाहरण: स्तनपान में कमी।
30C: क्रॉनिक किडनी कमजोरी। उदाहरण: पुरानी सूजन (डॉक्टर की देखरेख में)।
खुराक कैसे लें?
मदर टिंक्चर (Q):
वयस्क: 10-15 बूंदें आधा कप गुनगुने पानी में, दिन में 2-3 बार।
ग्लूकोजुरिया में: 15 बूंदें, सुबह-शाम, 1-2 महीने।
दूध बढ़ाने में: 10 बूंदें, दिन में 3 बार, 15-30 दिन।
पोटेंसी (3X, 6C, 30C):
2-4 ग्लोब्यूल्स जीभ के नीचे।
या 5 बूंदें पानी में।
बाहरी उपयोग: Q को गुनगुने पानी में मिलाकर सेंक (मूत्र मार्ग की जलन में)।
कोर्स: एक्यूट: 15-30 दिन। क्रॉनिक: 1-3 महीने (डॉक्टर की निगरानी में)।
साइड इफेक्ट्स और सावधानियां
साइड इफेक्ट्स: बहुत कम – कभी मुंह में हल्की कड़वाहट, पेशाब में जलन (शुरुआत में)।
सावधानियां:
गर्भवती/स्तनपान कराने वाली महिलाएं दूध बढ़ाने के लिए ही लें, डॉक्टर की सलाह पर।
डायबिटीज के मरीज ब्लड शुगर चेक करते रहें।
किडनी स्टोन बड़ा हो तो अल्ट्रासाउंड करवाएं।
चाय, कॉफी, नमक ज्यादा से परहेज।
सुबह खाली पेट लें तो बेहतर।
चिमाफिला क्यू एक नेचुरल मूत्र टॉनिक है जो मूत्र में चीनी, प्रोस्टेट, पथरी और दूध की कमी को जड़ से ठीक करता है।

10/13/2025

(Malavrodh) मल अवरोध (Constipation) कब्ज

बुजुर्गों में कब्ज़ एक आम शिकायत है। यह समस्या चालीस के बाद पकड़ने लगती है। तब कोई ना कोई चूरन या गोली लेने से आराम मिल जाता है, फिर उसकी डोज़ डबल, फिर उससे ज़्यादा होते-होते एक समय ऐसा आता है जब कुछ काम नहीं करता। लेकिन आयुर्वेद की दृष्टि में यह केवल पेट की नहीं, पूरे जीवन की गति के ठहर जाने की कहानी है। कई इसके कारण अवसाद में चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कभी भी जाना पड़ सकता है। इस डर से वे मिलना-जुलना तक सीमित कर देते हैं।
यहीं से एक दुष्चक्र की शुरुआत हो जाती है, फिर यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि रोग आंत में है या मन में।

आयुर्वेद में कहा गया हैं, “वायुस्तु वृद्धे प्रशस्यते”, यानी वृद्धावस्था में वात दोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
जब शरीर की धातुएँ क्षीण होने लगती हैं, रस का पोषण घट जाता है और अग्नि मंद होती है, तब वही वात जो पहले शरीर को गतिमान रखता था अब रोध उत्पन्न करता है।
वही वात जब कोलन में स्थिर होता है, तब मल का गमन कठिन हो जाता है। यही वातज मलबद्धता है।

ऐसे ही जब मांस और स्नायु शिथिल होते हैं तो शरीर की गति और लचक कम हो जाती है और तब वात का अतिक्रमण होकर अवरोध उत्पन्न करता है।
वृद्धावस्था में यह रुकावट केवल पेट की नहीं होती, यह शरीर, इंद्रियों और मन सभी में फैल जाती है।

इसके चिकित्सा में आचार्य वाग्भट बताते हैं कि वृद्धजन के लिए सबसे बड़ी चिकित्सा स्नेहन और बस्ति है।
आयुर्वेद कहता है, “स्नेहाद् बन्धः शरीरस्य।”
शरीर स्नेह से बंधा है, और जब स्नेह सूखता है तो वात बढ़ता है।
शरीर में सूखापन और मन में अकेलापन, यही वृद्धावस्था की कब्ज़ की सबसे गहरी जड़ है।

क्योंकि यह अवरोध केवल आँतों में नहीं, भावनाओं में भी होता है।
जब मन सिकुड़ता है, जब संवाद घटता है, जब जीवन में कुछ नया घटता नहीं, तब भीतर की अग्नि मंद होने लगती है।
आयुर्वेद कहता है, “अग्निः सर्वद्रव्याणां जीवनम्।” अग्नि ही जीवन है।
जब अग्नि ही मंद हो जाए तो न आहार पचता है, न अनुभव।

वृद्धों में कब्ज़ केवल पाचन की गड़बड़ी नहीं होती, बल्कि वात और अग्नि के असंतुलन के साथ-साथ भावनात्मक शुष्कता का भी परिणाम होती है।
उपचार की शुरुआत केवल रेचक द्रव्यों से नहीं, बल्कि शरीर की स्निग्धता और मन की शांति को लौटाने से करनी चाहिए।
जब तक वात का शमन और मन का पुनर्जीवन नहीं होता, तब तक राहत स्थायी नहीं होती।
इसलिए वृद्धावस्था की कब्ज़ में औषधि से अधिक ज़रूरी है स्नेह, संवाद और जीवन में गति लौटाना।
नियमित अभ्यंग, पर्याप्त नींद और स्निग्ध आहार लेना ठीक रहता है।

अब तो आधुनिक चिकित्सा भी आंत और मन के बीच के सीधे संबंध को मानती है।
आंतों की गतिशीलता और मानसिक स्थिरता एक-दूसरे के साथ चलती हैं।
जिस व्यक्ति के मन में संवाद नहीं, उसके शरीर में भी गति नहीं रहती।

अब सवाल यह है कि करें तो करें क्या।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि इस समस्या की शुरुआत में ही इसे ख़त्म करने का प्रयास करें, न कि किसी चूर्ण, पीली गोली या किसी सिरप की आदत न बनने दें।
धीरे-धीरे असर करने वाले आयुर्वेदिक द्रव्यों को भी लंबे समय तक बिना परामर्श के न लें।
सुबह खाली पेट गुनगुना पानी या त्रिफला फांटा जल लें।
रात में घृत या एरंड तेल अग्नि की स्थिति के अनुसार लें।
भोजन में घृत, मूंग, लौकी, किशमिश, पका केला और द्राक्षा जैसे स्निग्ध पदार्थ शामिल करें।
प्रतिदिन यदि संभव हो तो तिल तेल से अभ्यंग करें, विशेषकर पैरों, उदर और कमर पर।
वादी चीज़ों को खाने से बचें, वादी विचार भी न सुनें, मतलब जो विचार आपकी मानसिक शांति को भंग करें उन्हें सुने ही न।
मेरे बाबा कहा करते थे, “बुजुर्ग व्यक्ति को कम सुनाई और कम दिखाई देना चाहिए, ख़ुश रहेगा। सब सुन-देख कर छटपटाहट ही मिलेगी।”
दिन में हल्की सैर, प्राणायाम, संगीत या प्रार्थना करें।
और सबसे आवश्यक, किसी न किसी से मन की बात करते रहें।

वृद्ध का उपचार औषधि से नहीं, स्नेह से शुरू होता है।
कब्ज़ को केवल आंतों का रोग मत समझिए,
यह अक्सर उस शांति और स्नेह के सूख जाने का लक्षण होती है,
जो कभी जीवन को भीतर से प्रवाहित करती थी।
वृद्ध की चिकित्सा तभी पूरी होती है जब उसकी देह के साथ उसका मन भी फिर से चलने लगता है।

एक बात और ख़ुद दवा का चुनाव न करें, क्युकी आप केवल मल निकालने पर ही फोकस कर पाएंगे, एक बात और उम्र के साथ कुछ दिक्कतें रहेंगी उसको स्वीकार कर लीजिए,देखिए दिक्कत को इस धरती के सबसे मजबूत व्यक्ति ट्रम्प को भी है,उन्हें भी डायपर पहनना पड़ता है ।
इसलिए,एक बार किसी जानकार से मिलें जो आपके दोषों का उपचार करे, न कि केवल मल को बाहर निकालने का प्रयास करे।
साभार

08/14/2025

पैरों के तलवों पर कांसे (Kansa) धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे कांसा वाटी मसाज कहा जाता है। यह मालिश सिर्फ आराम ही नहीं देती, बल्कि इसके कई गहरे शारीरिक और मानसिक फायदे भी हैं

कांसे की धातु, जो तांबे और टिन का मिश्रण होती है, आयुर्वेद में इसके औषधीय गुणों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह मालिश शरीर के ऊर्जा बिंदुओं (मर्म) को उत्तेजित करती है, जिससे कई लाभ होते हैं।

कांसे की कटोरी से मालिश के फायदे :

* शरीर की गंदगी (टॉक्सिन) बाहर निकालना:
* कांसे की धातु में शरीर की गर्मी और विषाक्त पदार्थों (toxins) को खींचने का गुण होता है।
* जब तलवों पर तेल या घी लगाकर कांसे की कटोरी से मालिश की जाती है, तो कटोरी का निचला हिस्सा धीरे-धीरे काला या भूरा हो जाता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि कटोरी शरीर से जमी हुई गंदगी को बाहर निकाल रही है।

* तनाव और थकान दूर करना:

* पैरों के तलवों में हजारों तंत्रिकाएं (nerves) होती हैं। मालिश करने से ये तंत्रिकाएं शांत होती हैं, जिससे पूरे शरीर को गहरा आराम मिलता है।
* यह दिन भर की थकान, तनाव और चिंता को दूर करने का एक बेहतरीन तरीका है।

* बेहतर नींद में सहायक:

* तनाव और थकान दूर होने से मन शांत होता है।
* यह मस्तिष्क को आराम देता है, जिससे रात में गहरी और आरामदायक नींद आने में मदद मिलती है।

* रक्त संचार बढ़ाना:

* तलवों पर मालिश से रक्त वाहिकाओं (blood vessels) में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।
* बेहतर रक्त संचार से पैरों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे पैरों की सूजन और दर्द में कमी आती है।

* आंखों की रोशनी के लिए:

* आयुर्वेद और रिफ्लेक्सोलॉजी (Reflexology) के अनुसार, पैरों के तलवे में कुछ खास बिंदु आंखों से जुड़े होते हैं।
* कांसे की कटोरी से इन बिंदुओं पर दबाव पड़ने से आंखों की रोशनी बेहतर होती है और आंखों का तनाव कम होता है।

* वात और पित्त दोष को शांत करना:

* कांसे की तासीर ठंडी मानी जाती है, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी (पित्त दोष) को शांत करती है।
* मालिश की क्रिया से वात दोष (जो दर्द और सूखापन का कारण बनता है) संतुलित होता है। इस तरह, यह शरीर में तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने में मदद करती है।
* पैरों की त्वचा और मांसपेशियों को स्वस्थ रखना:
* यह मसाज पैरों की मांसपेशियों को आराम देती है और उनकी कठोरता को कम करती है।
* यह तलवों की सूखी और फटी हुई त्वचा को नरम बनाने में भी मदद करती है।

इस मालिश को करने के लिए आप घी या कोई भी प्राकृतिक तेल (जैसे नारियल तेल) का उपयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही सरल और प्रभावी तरीका है अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का।

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