30/08/2026
रात के 11:30 बज चुके थे और रूम में फैली सन्नाटे की धुंध को सिर्फ एक ही चीज़ चीर रही थी—समीर और अनन्या के बीच खिंची एक अदृश्य दीवार।
वजह? हमेशा की तरह बेहद संगीन थी—"आज डिनर में क्या बनेगा?"
समीर का कहना था कि हफ्ते में चार बार पनीर खाना संविधान के खिलाफ होना चाहिए, और अनन्या की दलील थी कि रात को जंक फूड खाना सीधे-सीधे अपनी उम्र कम करना है। बहस का अंत इस बात पर हुआ कि दोनों ने एक-दूसरे की तरफ पीठ घुमा ली।
तभी बाहर डोरबेल बजी।
समीर ने चौंककर घड़ी देखी। डिलीवरी बॉय ने हाथ में गरमा-गरम, भाप छोड़ता हुआ एक 'लार्ज चीज़ी बस्ट पिज्ज़ा' का डिब्बा पकड़ा दिया।
"तुमने मंगाया?" अनन्या ने भौंहें सिकोड़कर पूछा, हालांकि उसकी नाक पिज्ज़ा की उस कातिलाना खुशबू को हवा में ही सूंघ चुकी थी।
"नहीं, तुमने मंगाया होगा?" समीर ने रक्षात्मक अंदाज़ में कहा।
तभी समीर के फोन पर एक मैसेज चमका—“सॉरी सर, गलत फ्लैट का ऑर्डर आपके पास चला गया। कैंसिल कर दिया है, आप रख लीजिए।”
दोनों ने डिब्बे की तरफ ऐसे देखा जैसे उसमें कोई छिपा हुआ खज़ाना रखा हो। रसोई का फीका खाना एक तरफ और सामने पिघले हुए चीज़ से लथपथ पिज्ज़ा दूसरी तरफ।
समीर ने धीरे से डिब्बा खोला। आठ त्रिकोणीय टुकड़ों पर चिली फ्लेक्स और ओरेगानो की ऐसी चमक थी कि अनन्या का सारा 'हेल्थ-कॉन्शियस' ज्ञान एक पल में हवा हो गया।
"वैसे... बर्बादी पाप है," अनन्या ने अपनी पलकें झपकाते हुए कहा, और अपनी कसमों को ताक पर रखकर पिज्ज़ा का पहला स्लाइस उठा लिया।
समीर ने भी मुस्कुराते हुए दूसरा टुकड़ा उठाया, "बिल्कुल, धर्मशास्त्रों में अन्न का अनादर मना है।"
जैसे ही दोनों ने पहला बाइट लिया, पिज्ज़ा का पिघला हुआ चीज़ इतना लंबा खिंचा कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। समीर ने सिर पीछे किया, अनन्या ने सिर दाईं तरफ घुमाया, लेकिन चीज़ का वो तार दोनों के होठों के बीच झूला झूलता रहा।
दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे—मुंह में ठूंसा हुआ पिज्ज़ा, ठुड्डी पर लगा सॉस और बीच में खींची हुई चीज़ की एक बेतुकी रस्सी।
अनन्या अपनी हंसी नहीं रोक पाई। उसके हंसते ही पिज्ज़ा का थोड़ा सा सॉस उसकी नाक पर लग गया। समीर भी ठहाका मारकर हंस पड़ा। वो गुस्सा, वो खामोशी, वो 'पनीर बनाम जंक फूड' की जंग—सब उस एक चीज़ी मुस्कान में बह गई।
"तुम नाक पर सॉस लगाकर बिल्कुल एक दुखी जोकर जैसी लग रही हो," समीर ने हंसते हुए टिश्यू पेपर उठाया।
"और तुम इस चीज़ के तार को ऐसे संभाल रहे हो जैसे इसरो का कोई रॉकेट लॉन्च कर रहे हो," अनन्या ने उसका हाथ पकड़कर अपनी नाक साफ की।
दोनों कालीन पर बैठकर एक के बाद एक स्लाइस खत्म करने लगे। हर बाइट के साथ शाम की पूरी कड़वाहट मिठास में बदलती गई।
आखिरी टुकड़ा डिब्बे में अकेला बचा था।
समीर ने हाथ आगे बढ़ाया, फिर रुक गया। उसने पिज्ज़ा अनन्या की तरफ खिसका दिया, "तुम खा लो। वैसे भी आज तुम्हें ज़्यादा गुस्सा आया था, तो कैलरी जल चुकी होंगी।"
अनन्या ने उस टुकड़े के दो बराबर हिस्से किए। एक हिस्सा समीर के मुंह में ठूंसा और दूसरा खुद खाया।
"सुनो समीर..." अनन्या ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, "हम कितना लड़ते हैं न? छोटी-छोटी बातों पर पूरे घर को कुरुक्षेत्र बना देते हैं।"
"हां, बनाते तो हैं," समीर ने उसकी आंखों में झांकते हुए धीरे से कहा, "लेकिन जब तक पिज्ज़ा बांटने के लिए तुम मेरे साथ हो, तब तक इस कुरुक्षेत्र में भी शांति बनी रहेगी।"
अनन्या ने मुस्कुराकर अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। खाली डिब्बे पर अब भी पिज्ज़ा की महक बाकी थी, और कमरे में फैली खामोशी अब किसी दूरी की वजह नहीं, बल्कि दो दिलों के सुकू़न की आवाज़ थी।
सच ही तो है, कभी-कभी बड़े-बड़े रिश्तों के धागे, पिज्ज़ा के एक छोटे से चीज़-बर्स्ट से जुड़ जाते हैं।