25/05/2026
एक मरीज़ मेरे पास OPD में आये चलते हुए जिनकी सांस फूल रही थी । मैंने जाँच और निदान कर के बताया की ये हार्ट फेलियर के लक्षण हैं । इसमें तुरंत भर्ती होने की आवशयकता है । मैंने यह भी बताया की हो सकता है दवा से ठीक हो जायें घर पर । परंतु अचानक बहुत ज़्यादा साँस उखड़ने की संभावना है , तब भागे भागे आना पड़ेगा , और तब कंट्रोल कर पाएंगे या नहीं हमे नहीं पता।
मरीज़ ने कहा हम कल आयेंगे । मैंने कहा जैसी मर्जी ।
मैं जितना बता सकता था बता दिया । पर्चे पर लिख दिया की मरीज़ को भर्ती बताया गया है , मरीज़ ने माना कर दिया । ज़्यादा ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं करी जाती , फिर डॉक्टर को लालची बोला जाता है। हमारा काम बता कर और लिख कर ख़त्म, बाक़ी मरीज़ की मर्ज़ी ।
मेरी क्लिनिक से जाने के कुछ घंटे बाद ही मरीज़ बुरी तरह साँस फुलाते हुए और अचेत अवस्था में अस्पताल पहुँचे । वहाँ उनका CPR किया गया । वेंटीलेटर पर डाला गया । हालत बहुत नाज़ुक थी । बताया गया कि प्रयास करते हैं , बचेंगे को नहीं पता नहीं।
बहराल आज 4 दिन बाद मरीज़ वेंटीलेटर से बाहर हैं। और काफ़ी सुधार है, बात चीत कर रहे हैं ।
इसमें सीखने वाली बात ये है की-
1. हार्ट की बीमारी में कई बार अचानक , पल पल में चीज़ें बदल जाती हैं। और बाहर से देखने में मरीज़ और तीमारदार को एहसास नहीं होता कि अंदर क्या चल रहा है, उसे तो लगता है की मामला गंभीर नहीं है , हमारा मरीज़ तो होश में है, बैठा है, बोल रहा है। डाक्टर कहाँ से गंभीर बता रहा।
2. यही मरीज़ हो सकता था की घर पर दवाई खा के भी बेहतर हो जाता , तो भी तीमारदार कहते हैं अरे बच गए , डॉक्टर तो बेवकूफ बना रहा था , भर्ती की सलाह दे रहा था , अच्छा हुआ भर्ती नहीं हुए , इन्हें तो वैसे ही आराम हो गया ।
इसलिए डाक्टर नपे तुले शब्दों का प्रयोग करता है । डाक्टर ने भर्ती बता कर अपना काम भी किया , और ज़बरदस्ती ना कर के लोभी लालची के इल्ज़ाम से भी बचा।
अक़्लमंदी इसी में है की जब भर्ती की सलाह दी जाए , तो बड़ी विपदा से बचने के लिए 1-2 दिन भर्ती हो जाया जाए । क्युकी हार्ट की बीमारी में बड़ी अनिश्चितताएं हैं। और पल पल में चीज़ें बदल जाती हैं।