20/08/2026
क्या माँ कामाख्या हर साल आषाढ़ महीने में पीरियड्स करती हैं। इस समय को अंबुबाची कहा जाता है। यह खून का बहाव धरती की उपजाऊ शक्ति और सृष्टि के पहिये को चलाते रहने के लिए बहुत पवित्र है। जो आम लोगों के लिए 'शर्म' या 'नफरत' की बात है, तंत्र में वही 'महास्रोत' है।
*खून का आध्यात्मिक महत्व:-
यह खून बेकार नहीं है, बल्कि जीवन का बीज है। माँ कामाख्या की यह रक्त धारा असल में ब्रह्मांड की जीवन शक्ति है। जिस खून से जीवन बनता है, वह कभी अशुद्ध नहीं हो सकता।
*तंत्र साधना में मासिक धर्म का महत्व:-
तंत्र शास्त्र में मासिक धर्म या पीरियड को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। वामाक्षयापा से शुरू करके, कई सिद्ध साधकों ने इस अवस्था में स्त्री शक्ति की पूजा करने की बात कही है।
*अत्यधिक शक्ति का स्रोत:-
पीरियड्स के दौरान एक महिला के शरीर में होने वाले हॉर्मोन और एनर्जी में बदलाव उसे बहुत ज़्यादा संवेदनशील और आध्यात्मिक रूप से मज़बूत बनाते हैं। इस समय, महिला खुद 'जीवित कामाख्या' होती है।
*अजेय शक्ति:-
ऐसा माना जाता है कि अगर कोई महिला इस अवस्था में सही तरीके से साधना या ध्यान करती है, तो प्रकृति या ब्रह्मांड में कुछ भी उसके कंट्रोल से बाहर नहीं होता। क्योंकि तब वह सीधे सृष्टि के मुख्य स्रोत से जुड़ जाती है। *पंचतत्व और कुलकुंडलिनी:-
तंत्र के अनुसार, इस खून को 'रज' कहते हैं जो साधना में कुंडलिनी एनर्जी को जगाने में मदद करता है। जहाँ समाज इस समय महिलाओं को अछूत मानकर उनसे दूर रखता है, वहीं तंत्र उन्हें 'सबसे बड़ी देवी' मानकर उनका स्वागत करता है।
सामाजिक अंधविश्वास बनाम पूरा सच
लोग उस चीज़ से डरते हैं या उससे नफ़रत करते हैं जिसे वे समझते नहीं हैं। पीरियड्स को लेकर शर्म या नफ़रत असल में पुरुष-प्रधान समाज की थोपी हुई एक गलतफ़हमी है।
*पवित्रता की नई परिभाषा:-
यह तस्वीर दिखाती है कि पूरा ब्रह्मांड देवी के खून से बना है। उनके नीचे लेटे शिव (पुरुष) असल में एक निष्क्रिय पत्थर हैं, जिन्हें देवी की इस ज़रूरी एनर्जी से जगाया जाता है।
*नफ़रत नहीं, बल्कि प्रणाम:-
खून ज़िंदगी का लाल रंग है। इसके बिना दुनिया का होना नामुमकिन है। इसलिए, पीरियड्स वाली महिला अशुद्ध नहीं होती, बल्कि वह उस समय धरती पर सबसे पवित्र और ताकतवर होती है।
*निष्कर्ष:-
माँ कामाख्या हमें सिखाती हैं कि प्रकृति का कोई भी नियम शर्मिंदा होने लायक नहीं है। जब एक महिला अपनी इस प्राकृतिक शक्ति का सम्मान करती है और साधना में लग जाती है, तो वह एक आम इंसान नहीं रहती - वह आध्याशक्ति बन जाती है। यह खून ही वह माध्यम है जिससे एक महिला दुनिया को संभालती है, उसे पालती है, और ज़रूरत पड़ने पर उसे नष्ट भी कर सकती है। इसलिए, इसे नफ़रत से नहीं, बल्कि पूरे सम्मान से देखना चाहिए,
ां तारा --- मां तारा को आदिशक्ति का ही एक स्वरूप माना जाता है। वह समय, काल और शून्य की देवी हैं, जो संसार के सभी बंधनों और भयों से मुक्त करती हैं।
तारापिठ और तांत्रिक साधना: पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापिठ मां तारा का अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। तांत्रिक और अघोर साधना में मां तारा की उपासना का विशेष महत्व है।
संकट निवारण: इन्हें "तारिणी" भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पार लगाने वाली। मान्यता है कि जीवन के विकट संकटों, बाधाओं और अनिष्ट से रक्षा के लिए मां तारा की आराधना अत्यंत प्रभावी होती है।
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