Amrit Ayurveda Panchakarma Hospital

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20/02/2021
08/02/2021

आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा के द्वारा संपूर्ण शरीर का शुद्धिकरण, माइग्रेन का इलाज, मनोरोग का इलाज !
Whole body , , treatment in by by

11/01/2021

पंचकर्म के फायदे

21/06/2020

उदवर्तन (weight Reduction Therapy) - वज़न कम करें और मधुमेह पर नियंत्रण पाएं

उदवर्तन पूरे शरीर पर की जाने वाली शक्तिवर्धक मसाज है, जो हर्बल पाउडर या पेस्ट की मदद से लयबद्ध तरीके से की जाती है। इस पद्धति को अन्य रोगों जैसे डायबटिक न्यूरोपैथी, स्थूलता, लकवा, त्वचा की देखभाल, साइटिका और अपच के लिए अपनाया जा सकता है। इस मसाज से त्वचा की सफाई और पोषण के अतिरिक्त मांसपेशियां और रक्त प्रवाह दुरूस्त होता है। शरीर की अधिक वसा को समाप्त करने के लिए आयुर्वेद में उदवर्तन की सलाह दी जाती है।

सामग्री
उदवर्तन पाउडर में हरड़, बिभितक, आमला, देवदार, कुलथी और नाडि़यों को शक्ति व पोषण देने वाली अन्य जड़ी-बूटियाँ सम्मिलित हैं।

उदवर्तन कैसे किया जाता है
उदवर्तन में पाउडर अथवा पेस्ट (जो तेल में मिश्रण करने पर बनता है।) को पूरे शरीर पर 30-45 मिनट की अवधि के लिए मला जाता है। पाउडर के सोखने के गुण के कारण यह शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को खींच लेता है। मसाज के बाद, एक हर्बल स्वेदन की सलाह दी जाती है, इसके बाद पाउडर या पेस्ट साफ करने के लिए एक स्नान दिया जाता है।

उदवर्तन के लाभ
वज़न कम करने और त्वचा निखारने में मदद करता है।

मानसिक तनाव कम करता है।

रक्त वाहिकाओं में आई रुकावटों को दूर करता है।

वसा के मैटाबोलिज्म को बढ़ाता है।

वात और कफ दोष को संतुलित करता है।

मधुमेह और स्थूलता में अति लाभकारी है।

आम का नाश करता है और पाचन क्षमता को बेहतर बनाता है।

यह कैसे काम करता है
उदवर्तन में ऐसे पाउडरों का इस्तेमाल किया जाता है जिनकी प्रकृति शुष्क और गर्म होती है। पेस्ट के लिए अधिकतर तिल के तेल का इस्तेमाल किया जाता है जिसकी तासीर गर्म होती है। सभी औषधियाँ और तेल शरीर में हल्कापन लाने और रुकावट व अकड़न मिटाने में सहायता करते हैं। जब हर्बल पाउडर और तेल को त्वचा पर एक विशेष प्रकार से मला जाता है तो यह रोम छिद्रों को खोल देता है, नाडि़यों में रुकावट को हटाता है, ऊतकों में उष्मा को बढ़ाता है और चयापचय (मैटाबोलिज्म) को बेहतर करता है।

पेस्ट को शरीर पर मलने के बाद जब मसाज पूरी हो जाती है तो मरीज को एक हर्बल भाप कक्ष में बैठने के लिए कहा जाता है जिसमें व्यक्ति का सिर कक्ष के बाहर रहता है। इस उपचार के दौरान शरीर से बहुत सा अतिरिक्त पानी निकल जाता है और रोम छिद्र खुलने आरंभ हो जाते हैं।

सावधानियां
उदवर्तन हमेशा एक पंचकर्म विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए।

उच्च रक्तचाप और त्वचा के संक्रमण वाले व्यक्तियों को उदवर्तन नहीं कराना चाहिए।




12/06/2020
इम्यूनिटी पावर बढ़ाने का बहुत आसान 100% कारगर तरीके
05/06/2020

इम्यूनिटी पावर बढ़ाने का बहुत आसान 100% कारगर तरीके

आयुष मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इम्यूनिटी बढ़ाने का बहुत आसान परंतु 100% कारगर तरीका | Very easy but 100% effective methos to boost your immunity power By Go...

02/06/2020

हृदय बस्ति

पिछले कुछ वर्षो में जितनी तेजी से आधुनिक चिकित्सा पर आधारित हृदय रोग उपचार केन्द्र खुले हैं रोगी भी उतने ही बढ़े हैं, कम नहीं हुए। जानिए क्या आयुर्वेद से उरोबस्ति सहायक हो सकती है?

हृदय रोग बढ़ते जा रहे हैं और इसका उपचार भी बेहद महंगा है। ऐसे मामलों में उरोबस्ती बहुत किफायती और रोग की रोकथाम करने वाला उपचार है। संस्कृत में उरो का अर्थ है, छाती और बस्ती का मतलब होता है; जिसमें कुछ रखा जाए (container)। इस तरह उरोबस्ती, हृदय का तेल से किया जाने वाला उपचार है। इसमें आयुर्वेदिक तेल को गरम करके या फिर ताजा हर्बल काढ़ा बना कर हृदय और इसके आसपास डाला जाता है।

यह ऐसे काम करता है
आयुर्वेद में तेल को वात दोषों के प्रमुख उपचार में से एक है। यह वात दोष के कारण होने वाले ज्यादातर हृदय रोगों के उपचार में प्रमुख भूमिका निभाता है। गरम तेल को छाती पर हृदय के आसपास के हिस्से पर स्थिर रखा जाता है। ऐसा करने से यह त्वचा के रोम छिद्रों से होता हुआ गहराई तक हृदय के ऊतकों तक पहुंचता है। हृदय के आवरण को चिकनाहट प्रदान करता है, हृदय की कोशिकाओं को पोषण देता है और बढ़े हुए वात दोष को शांत करता है। बार-बार ऐसा करने से हृदय के ऊतकों में नई शक्ति का संचार होता है और ओजस भी मजबूत होता है।

विधि:
जिस व्यक्ति को उरोबस्ती उपचार दिया जाता है, उसे मालिश करने वाली टेबल, द्रोणी पर लिटा देते हैं।

काले चने या गेहूं के आटे को गूंथ लिया जाता है। फिर इससे छाती पर हृदय के चारों ओर 4-5 इंच व्यास का एक घेरा बना दिया जाता है।

कुछ पानी या चिपचिपा पदार्थ लगा कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि औषधीय तेल इससे बाहर न बहे। अब इसके अंदर धीरे-धीरे गुनगुना औषधीय तेल या हर्बल काढ़ा डाला जाता है। ठंडा हो जाने पर इसे हटा कर, नया तेल या काढ़ा भरा जाता है।

इस विधि के अंत में गुंथे हुए आटे को भी हटा दिया जाता है और उस हिस्से पर हल्की मालिश की जाती है। इसके बाद व्यक्ति कोे कुछ समय तक आराम करने की सलाह दी जाती है।

उरोबस्ती के लाभ

हृदय के दर्द को दूर करता है।

हृदय के ऊतकों को ऊर्जा प्रदान करता है और हृदय के संकुचन (cardiac contractions) को बेहतर करता है।

हृदय को पोषण मिलने के साथ-साथ पम्पिंग बेहतर होती है।

मानसिक तनाव के कारण हृदय पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को दूर करता है।

हृदय को सामान्य रूप से स्वस्थ करता है और विशेष प्रकार के हृदय रोगों से बचाव करता है।

सावधानियां
बुखार, खांसी, अस्थमा और हिचकियों के दौरान उरोबस्ती नहीं करना चाहिए।

फेफड़ों में पानी भरा होने पर भी यह उपचार नहीं करना चाहिए।

उपचार का समय, चिकित्सक के परामर्श/मार्गदर्शन अनुसार निश्चित किया जाना चाहिए।




02/06/2020

उत्तर बस्ति थेरेपी

बात चाहें पुरातन काल की हो या आधुनिक विज्ञान वाले युग की, सृष्टि को चलाने के लिए मानव उत्पत्ति अनिवार्य है। ऐसी प्रजनन क्रिया के लिए दाम्पत्य जीवन में स्वस्थ व सक्रिय यौन संबंध ज़रूरी है। यौन जीवन की इसी खुशहाली के लिए पंचकर्म में उत्तरवस्ति नामक ट्रीटमेंट है।

पंचकर्म का अर्थ पांच विभिन्न चिकित्सकीय प्रक्रियाओं का सम्मिश्रण है। पंचकर्म का प्रयोग कर शरीर को बीमारियों एवं कुपोषण द्वारा छोड़े गए विषैले पदार्थों से निर्मल करने के लिए होता है। पंचकर्म में इन 5 चिकित्सा प्रणालियों वमन, विरेचन, नस्य, रक्तमोक्षण व वस्ति का मेल है, जिसमें उत्तरवस्ति वस्ति का ही भाग है।

क्या है उत्तरवस्ति:

उत्तरवस्ति को दो और तरीकों से समझाया जा सकता है-
पहला तरीका यह है कि प्रजनन व मूत्रवह संस्थान से संबंधित कई विकारों में उत्तरवस्ति पंचकर्म चिकित्सा का एक प्रभावी व महत्वपूर्ण हिस्सा है जो स्त्री व पुरूषों दोनों में ही प्रयोग की जाती है।
दूसरा यह है कि ये श्रेष्ठ गुणों के साथ अच्छा परिणाम देता है। इसलिए एक व्यवहारिक उद्देश्य के लिए हम उत्तरवस्ति को निम्नलिखित प्रकार से विभाजित कर सकते हैं।

स्त्री रोग:

डिम्बवाहिनी में अवरोध
गर्भाशय में फाइब्रॉइड
एण्डोमेट्रियोसिस
इन्फर्टिलिटी
असामान्य रक्त स्त्राव

पुरूष रोग:

मूत्राशय के विकार
प्रोस्टेट का बढ़ना
मूत्रवाहिनी में अवरोध
शुक्र धातु की क्षीणता
मूत्रमार्ग का संक्रमण

प्रक्रिया:
उत्तरवस्ति एक आयुर्वेदिक चिकित्सा है जिसमें औषधीय तेल, घी को सीरिंज के साथ मूत्रमार्ग में प्रविष्ट कराया जाता है। उत्तरवस्ति कम दर्द के साथ बिना सर्जरी की प्रक्रिया है इसलिए इसमें एनसथीसिया की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह प्रक्रिया सभी सावधानियों के साथ एक विशेषज्ञ के द्वारा की जाती है और इससे मूत्रमार्ग को संक्रमण से बचाया जाता है।

उत्तरवस्ति के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां:

ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए जिससे यूरिन पानी की तरफ साफ हो।

यूरिन को कभी भी टालना नहीं चाहिए और ना ही जबरदस्ती करनी चाहिए।

उत्तरवस्ति के दौरान या बाद में कुछ दिनों तक शारीरिक संबंध बनाने से बचना चाहिए।

आहार हल्का, ताजा, सुपाच्य जैसे तरल या दलिया-खिचड़ी इत्यादि लेना चाहिए।

अवधि:
उत्तरवस्ति की प्रक्रिया को एक सप्ताह में 2-3 बार किया जाता है। इन दिनों में दवा की मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ा दिया जाता है। दस दिन का अंतराल रखने के बाद इस ट्रीटमेंट को दोहराया जा सकता है। इस आयुर्वेदिक प्रक्रिया में दवा और ट्रीटमेंट की अवधि को मरीज व रोग की हालत के अनुसार निर्धारित किया जाता है।

परिणाम:
उत्तरवस्ति के परिणाम को क्लीनिकली देखा जा सकता है। इलाज से पहले व इलाज के बाद व्यक्ति अपनी हालत में तुलना कर खुद अंतर महसूस कर सकता है। इसका असर उपचार के दौरान ही प्रतीत होने लग जाता है।




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