05/06/2026
#प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि पेट के निचले हिस्से में मूत्राशय के मुख के ठीक नीचे प्रोस्टेट ग्रंथि स्थित रहती है। युवा पुरुषों में इसका वजन लगभग 20 ग्राम होता है। इस रोग से पीड़ित होने से मतलब यह है कि प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ गई। है। जब यह ग्रंथि बढ़ जाती है, तो इसका वजन 100 ग्राम तक पहुच जाता है। इससे मूत्र नली में अवरोध पैदा हो जाता है। वस्तुतः होता यह है कि मूत्राशय के ठीक नीचे यह ग्रंथि स्थित होती है। जब किन्हीं कारणों से यही ग्रंथि बढ़ जाती है, तो मूत्राशय की गरदन में दबाव पड़ने से मूत्र त्याग में अवरोध आने लगता है। इससे मूत्राशय प्रसारित होने लगता है, परिणाम यह होता है कि बढ़ा हुआ प्रैशर मूत्रवाहिकाओं के माध्यम से किडनी नेफ्रांस तक पहुंच जाता है। परिणाम यह होता है कि गुरदों को हानि पहुंचती है तथा गुरदों के कार्य बाधित होने लगते हैं। यह रोग बहुधा पचास की उम्र के बाद आधे से भी ज्यादा पुरुषों को हो जाता है। यह रोग धीरे-धीरे पनपता है। आरंभ में रोग के लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं।
#कारण -
● लगभग 45 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट के आकार में दिन प्रतिदिन वृद्धि होने लगती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अभी तक इस रोग के कारणों को अज्ञात मानता है। यदि मूत्र इसी प्रकार मूत्राशय में बार-बार रुका हुआ रहता है, तो उसमें तेज गंध पैदा होने लगती है, साथ ही मूत्राशय में पथरियों का निर्माण होना सम्भव है। साथ ही मूत्र नलिका में सूजन आना भी सम्भव है। हां, यदि बहुत ही ज्यादा अवरोध हो जाता है, तो बढ़े हुए दबाव के कारण गुरदों को भी हानि पहुंचती है।
● सरदी एवं एलर्जी की दवाओं का अंधाधुंध सेवन करना अल्सर के उपचार में डिप्रेशन तथा इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के उपचार में दी जाने वाली आधुनिक औषधियां
● हारमोनल असंतुलन बढ़ती उम्र के साथ-साथ पुरुषों में पुरुष हारमोन टेस्टोस्टेरोन में कमी आने लगती है, जिसके कारण प्रोस्टेट बढ़ने लगता है।
#लक्षण -
• रात के समय बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा, जबकि वास्तव में उस समय मूत्र त्याग की आवश्यकता नहीं होती है। रात के समय बार-बार मूत्र त्याग करने के लिए बार-बार बिस्तर से उठने के कारण रोगी अच्छी तरह से नहीं सो पाता है, जिसके परिणाम स्वरूप यह दिन भर थका थका रहता है।
• दिन में भी बार-बार मूत्र त्याग करने के लिए जाना
• मूत्र त्याग के मध्य की अवधि का कम होना
• मूत्र की इच्छा को बिलकुल भी नहीं रोक पाना, जिसके कारण उन्हें मूत्र त्याग करने की हड़बड़ी रहती है। साथ ही उन्हें हमेशा कपड़े खराब होने का डर बना रहता है।
• मूत्र त्याग करने में कठिनाई, मूत्र-प्रवृत्ति के समय जोर लगाना
• मूत्राशय को पूरी तरह खाली करने में असमर्थता, मूत्राशय में कठोरता आना
• मूत्र त्याग करते समय जलन होना
• मूत्र का उचित प्रेशर नहीं रहना तथा मूत्र त्याग के अंत में बूंद-बूंद मूत्र आना
• मूत्र के साथ रक्त आना
• तीव्र अवस्थाओं में मूत्र का अवरोध होना
• खड़े होकर ही अच्छी तरह से मूत्र त्याग कर पाना
• कुछ अवस्थाओं में बुखार, कंपकंपी का होना भी संभव है।
• सैक्स के समय कठिनाई के साथ वीर्यपात होना।
#क्या_कहता_है_आयुर्वेद ?
आयुर्वेद में इस रोग को अष्ठीला संज्ञा दी गई है। चूंकि इस रोग में प्रोस्टेट ग्रंथि का स्वरूप लो अथवा बट्टे जैसा हो जाता है, इसीलिए आयुर्वेदज्ञों ने उपमा स्वरूप इस रोग को अष्ठीला नाम दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार मूत्राशय में वायु में नामक दोष प्रकुपित हो जाने से यह रोग पैदा होता है। इस रोग में उस स्थान की पेशियां संकुचित होने लगती हैं तथा उनमें जकड़न पैदा हो जाती है। इस प्रकार आयुर्वेद की मान्यता के अनुसार वायु नामक दोष मूत्राशय एवं गुद प्रदेश में अवरोध पैदा कर उन्हें फुलाकर पाषाणखंड के समान कठोर, चलायमान, लटका हुआ, अत्यंत दर्द-युक्त गंथि को पैदा करके मल एवं मूत्र का अवरोध पैदा करती है।
#आयुर्वेद_सम्मत_कारण -
• किसी भी प्रकार की चोट लगना
• अर्बुद अथवा कैंसर होना
• उस स्थान पर पुराना घाव होना
• बार-बार संक्रमण होना
• अत्यधिक व्यायाम करना
• अत्यधिक सम्भोग करना
• लम्बे समय तक संतुलित
• रूखा-सूखा भोजन करना
• आहार का सेवन नहीं करना
• मल-मूत्र इत्यादि वेगों को रोकना
#आयुर्वेद_में_प्रोस्टेट_की_चिकित्सा -
कांचनार गुग्गुल, गोक्षुरादि गुग्गुल, शोभान्जन वटी, आरोग्यवर्धनी वटी, चन्दनादि वटी, गंडमाला कंडन रस आदि।
एक बार एक रोगी ने पूंछा कि वैद्य जी महाराज क्या मुझको यह सभी औषधियां खानी पड़ेगी। हमने उसको समझाया कि तुम जिस ऑपरेशन को सरल समझ रहे हो असल में वह सच नहीं है। ऑपरेशन करके पेशाब नली में पेशाब करने की जगह बढा दी जाती है। जिससे आसानी से पेशाब निकलने लगता है मगर पेशाब पर नियंत्रण समाप्त हो सकता है एवं प्रोस्टेट फिर से बढ़ सकता है।
#पथ्यापथ्य -
#सेवन_करें -
गेंहू, पुराना चावल, मूंग, कुलथी, जौ का पानी, लहसुन, अदरक, हल्दी, परवल, सहिजन, नारियल, खीरा, तरबूज, धनिया, जीरा, अंगूर, गन्ना
#सेवन_नहीं_करें -
पालक, टमाटर, काले चने, मटर, गुड, तेल, खटाई, गरम मसाले, सरसों, अधिक गरम एवं मसालेदार भोजन, चाय-कॉफी, मदिरा।
#विशेष -
मूत्राशय में मूत्र को धारण करने की शक्ति कम हो जाने पर, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मूत्र-स्राव होता रहता है। विशेषतः यह विकार यकृत की निर्बलता होने के पश्चात होता है। यकृत के निर्बल हो जाने पर घी, तेल एवं शक्कर का यदि अधिक सेवन होता रहेगा, तो मूत्र-यंत्र पर भार पड़ता है, जिससे मूत्राशय को हानि पहुंचती है। यह कारण हो तो घृतादि का सेवन मर्यादित करें।
• सवेरे बिस्तर से उठते ही दो गिलास ठंडा अथवा हलका-गरम पानी अवश्य पिएं। आयुर्वेद में इसे उषापान नाम दिया गया है। दिन भर में आठ से दस गिलास पानी अवश्य पिएं। शाम के समय कम मात्रा में पानी सेवन करें, ताकि रात को सुख-पूर्वक सो सकें। अन्यथा बार-बार पेशाब की हाजत होने से आप सो नहीं पाएंगे।
यह भी याद रखने योग्य बात है कि मल-मूत्र के आवेग को जरा भी नहीं रोकें।
• मदिरा एवं चाय-कॉफी के सेवन से बचें क्योंकि इनके सेवन से मूत्राशय उत्तेजित होता है। विशेष रूप से बीयर का सेवन भूलकर भी नहीं करें। नियमित रूप से अवगाहन अर्थात पानी से भरे हुए टब में बैठना भी लाभप्रद सिद्ध होता है।
#अश्विनी_मुद्रा -
जिस प्रकार घोड़ा लीद करने के बाद अपनी गुदा को अंदर की ओर सिकोड़ता है और तत्पश्चात ढीला छोड़ता है, ठीक उसी प्रकार का अभ्यास करने का नाम अश्विनी मुद्रा है।
#अश्विनी_मुद्रा_की_विधि -
किसी भी आसन में सुख-पूर्वक बैठ जाएं। तत्पश्चात उक्त क्रिया को करें। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब आप गुदा को सिकोड़ते हैं, तो अपने दोनों हाथों की मुट्ठियों को अच्छी तरह से कस कर बांधलें और जब आप गुदा को ढीला छोड़ते हैं, तो हाथों की मुट्ठियां भी खोल लें।
#विशेष - यह मुद्रा नियमित रूप से सुबह-सवेरे खाली पेट की जानी चाहिए। 10 से 20 बार तक धीरे-धीरे, पूरी एकाग्रता के साथ इस मुद्रा का अभ्यास किया जाना चाहिए।
#अश्विनी_मुद्रा_से_होने_वाले_लाभ -
• यह मुद्रा बवासीर के रोगियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। • गर्भाशय-भ्रंश (प्रोलेस्ड यूट्रस) की रुग्णाओं के लिए अमोघ औषधि का कार्य करती है।
• गुद-अंश (काच का निकलना या प्रोलेप्स ऑफ रैक्टम) की शिकायत से पीड़ित होने पर उत्तम लाभ देती है।
• इसका नियमित अभ्यास करने से 'प्रोस्टेट ग्रंथि वृद्धि की शिकायते दूर होने लगती हैं।
• जो लोग इसका नियमित अभ्यास करते है, उन्हें ब्रह्मचर्य पालन करने तथा वीर्य की रक्षा करने में बहुत सहायता मिलती है।
अपने शरीर को किसी भी प्रकार की बीमारी से मुक्त करने के लिए आयुर्वेदिक उपचार अपनाएं।