Saptrishi health Care

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SAPTRISHI HEALTH CARE AND ACCUPREASURE CENTER AMMAN GURUWAR
ADDRESS-NEW HANUMANT NAGAR NIKAT-GONDA TIRAHA,SHIV SHAKTI NARSING HOME KE NICHE ,BARABANKI (UP)

TREATMENT कोलेस्ट्रॉल, , घुटनों का दर्द, कमर दर्द,,सर्वाइकल, आदि रोग

Good morning
15/07/2026

Good morning

14/07/2026
कमर दर्द : कारण व निवारणआयुर्वेद विज्ञान सदा ही मानव का हितचिन्तक रहा है इसके अंतर्गत वर्णित दिनचर्या, रात्रिचर्या, त्रऋ...
22/05/2026

कमर दर्द : कारण व निवारण

आयुर्वेद विज्ञान सदा ही मानव का हितचिन्तक रहा है इसके अंतर्गत वर्णित दिनचर्या, रात्रिचर्या, त्रऋतुचर्या, सदवृत्त आचार आदि का पालन कर मनुष्य सुखी एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है किन्तु वर्तमान में भौतिकवादी एवं विलासितापूर्ण जीवन जीने के कारण आयुर्वेद में वर्णित परिचर्याओं का पालन नहीं हो रहा है। फलस्वरूप विभिन्न रोग पैदा हो रहे हैं, उन्हीं में से कमर दर्द भी एक है।

लगभग 80 से 90 प्रतिशत लोग जिन्दगी में कभी न कभी कमरदर्द का अनुभव करते हैं।

कारण - रीढ़ की हड्डी के निर्माण में अस्थियाँ, वातनाड़ियाँ, जोड़, मांसपेशियों, स्नायु, कंडरा आदि संरचनायें होती हैं। कमरदर्द का मुख्य कारण मांसपेशियों में तनाव, संधियों में तनाव खिंचाव व चोट लगना है। रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाले रोग यथा ऑस्टियोआर्द्रराइटिस, यूमेटॉइडआर्ब्रराइटिस, ऑस्टयोपोरोसिस, ऑस्टिओमैलेशिया, एन्क्लिोजिंगस्पॉन्डिलाइटिस, हड्डियों की टी.बी. तथा स्त्रियों सम्बन्धी रोग यथा कष्टार्तव, फाइब्रायड्स, एन्डिमेट्रिओसिस, गर्भाशय अंश, उम्र के साथ शरीर में होने वाले क्षयजन्य (Degeneration) रोग यथा गद्दी का हास (Degeneration of Disc) जोड़ों में परिवर्तन तथा स्नायुओं की जीर्णता, शारीरिक विकृतियाँ, जैसे स्कोलिओसिस के मुख्य कारण शरीर की नित्य रूप से की जाने वाली दोषपूर्ण गतिविधियाँ जैसे गलत तरीके से खड़ा होना, बैठना व सोना, वजन उठाना, झटके से मुड़ना, ऊँचाई से कूदना, कुर्सी व टेबल का दोषपूर्ण डिजाइन तथा व्यायाम में लगातार कमी आदि हैं।

आईबीएस, कब्ज, गुर्दे की बीमारी, प्रोस्टेट का बढ़ना, विटामिन बी-12 तथा विटामिन सी की कमी, सूर्य की रोशनी का अभाव एवं मानसिक तनाव से भी कमर में पीड़ा का अनुभव होता है। आजकल अधिकांश व्यक्तियों में स्लिप डिस्क (नाड़ी शोथ, साइटिका) की बीमारी देखने को मिल रही है इसका मुख्य कारण चोट लगना, अचानक भारी वजन उठाना, वाहन चलाते समय जर्क लगना, व्यायाम की कमी के कारण कमर की मांसपेशियों में शक्ति की कमी है। रोगी को प्रमुख रूप से कमर, दोनों या एक नितंब में तीव्र शूल दर्द तथा दर्द का एक पैर या दोनों पैरों तक जाना, झनझनाहट होना, कभी कभी सुत्र होना आदि का भी अनुभव होता हैं।

चिकित्सा - कमर दर्द को दूर करने हेतु जो दवाइयों दी जाती हैं वह पूरी तरह से समस्या का समाधान तो नहीं करतीं पर दवाइयों की आदत अवश्य पड़ जाती है। इसके लिए सबसे आवश्यक कार्य कमर सम्बन्धी व्यायाम करना है जिससे स्पाइन डिस्क को पोषक द्रव्यों की आपूर्ति हो सके जिससे कि आयु के साथ-साथ रीढ़ की हड्डियों में होने वाले क्षय (De-terioration) को विलंबित (Delay) किया जा सके।

रोग के कारण के अनुरूप ही चिकित्सा व्यवस्था करनी होती है सामान्यतया 2 से 3 सप्ताह विश्राम करने से लाभ हो जाता है। फिजियोथैरपी तथा कुछ योगासन यथा भुजंगासन, नौकासन, शलभासन भी लाभप्रद हैं। आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा में इस रोग का बहुत अच्छा इलाज है। 25 वर्षों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कमरदर्द के अधिकांश रोगियों को पंचकर्म चिकित्सा, मर्म चिकित्सा, लेप व बंधन चिकित्सा से स्थाई रूप से ठीक किया जा सकता है।

यदि किसी रोगी को ट्यूमर, फ्रैक्चर आदि से कारण मल व मूत्र पर नियंत्रण नहीं हो. पक्षाघात की स्थिति हो तो इस अवस्था में तुरन्त शल्य किया करवाना चाहिए। आजकल अधिकता लोगों को स्लिप डिस्क होने पर ऑपरेशन की सलाह दी जाती है परन्तु तथ्य यह है कि 95 प्रतिशत लोगों को सर्जरी से बचाया जा सकता है। रोग की स्थिति के अनुसार 3 से 4 सप्ता तक वातनाशक तैलों से मृदु अभ्यंग, कटिषिङ्ग है। या कटिबस्ति, नाड़ी स्वेद या सर्वांग भाप सार मर्म गुटिका का लेप तथा बंधन करने एवं चिकित्सा के प्रयोग में रोगी लीक हो औषधियों में विशेषतः रास्नासप्तकर सहचरादि क्वाथ त्रयोदशांगली रस आदि का प्रयोग किया जाता है।

यदि रोगी को बहुत अधिक पीड़ा है तो मर्म चिकित्सा या ऑस्टियोपैथी, शिरावेध, अग्निकर्म, आदि चिकित्सा के द्वारा सधः लाभदिया जा सकता है।

कटि प्रदेश अपानवायु का स्थान है अतः आमदोष का पाचन करना व कोष्ठ की शुद्धि करना आवश्यक है।

बचाव व सावधानियाँ - जो व्यक्ति लगातार कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं, उन्हें निश्चित् अंतराल पर खड़े होकर कमर का हल्का व्यायाम करना चाहिए। फोम या मुलायम गद्दों का उपयोग न करें इससे स्पाइन का प्राकृतिक पोश्चर बदल जाता है जो कि कटिशूल का कारण बनता है। रूई का पतला गद्दा इस्तेमाल करें, आगे की ओर झुककर वजन न उठायें। बैठते समय, कम्प्यूटर पर कार्य करते समय, पोछा लगाते समय पोश्चर का ध्यान रखें। गृहणियाँ रसोई में खड़े होकर बर्तन साफ न करें।

यौगिक सूक्ष्म व्यायाम द्वारा शरीर की सभी संधियों का व्यायाम तथा स्पाइन की कुछ स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज द्वारा लम्बे समय तक राहत प्राप्त की जा सकती है।

निरंजन फल (Niranjan Phal), जिसे मालवा नट (Malva Nut) या चाइना फ्रूट भी कहा जाता है, का वानस्पतिक नाम Sterculia lychnopho...
17/04/2026

निरंजन फल (Niranjan Phal), जिसे मालवा नट (Malva Nut) या चाइना फ्रूट भी कहा जाता है, का वानस्पतिक नाम Sterculia lychnophora है। यह आयुर्वेद और पारंपरिक चीनी/वियतनामी चिकित्सा में एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी/फल के रूप में इस्तेमाल होता है। यह प्राकृतिक रूप से शीतलक (cooling), सूजन कम करने वाला, कसैला (astringent), एंटी-इंफ्लेमेटरी और डिटॉक्सिफाइंग गुणों से भरपूर होता है। फल पानी में भिगोने पर फूल जाता है और जेल जैसा गूदा बन जाता है, जो पेट और गले को आराम देता है।

निरंजन फल के मुख्य औषधीय उपयोग
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यह मुख्य रूप से पित्त दोष को संतुलित करने और शरीर की आंतरिक गर्मी कम करने के लिए जाना जाता है। इसके प्रमुख फायदे निम्न हैं:

♦️बवासीर (Piles/Hemorrhoids): खून आने, सूजन और दर्द में रामबाण। यह आंतों की सूजन कम करता है और मल को नरम बनाता है।

♦️अत्यधिक रक्तस्राव (Excessive Bleeding): गर्भाशय से होने वाले भारी मासिक धर्म (heavy periods), अल्सर या अन्य रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है।

♦️पाचन संबंधी समस्याएं: कब्ज, अपच, गैस, एसिडिटी, अल्सर, कोलाइटिस (ulcerative colitis) और IBS में राहत। यह आंतों को आराम देता है और detox करता है।

♦️गले की समस्याएं: गले में खराश, सूजन, टॉन्सिलाइटिस, खांसी, कफ और गले के संक्रमण में सुखदायक। जेल जैसा पानी धीरे-धीरे पीने से राहत मिलती है।

♦️त्वचा संबंधी फायदे: शरीर से विषाक्त पदार्थ निकालकर मुंहासे, फोड़े-फुंसी, एक्जिमा, चकत्ते और सोरायसिस जैसी समस्याओं में सुधार।

♦️अन्य फायदे: बुखार, साइनस, दमा, वजन नियंत्रण, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर में सहायक। यह इम्यूनिटी बढ़ाता है, नींद सुधारता है और शरीर को ठंडक प्रदान करता है।

✍️सावधानी: यह शीतलक है, इसलिए ठंडे प्रकृति वाले लोग कम मात्रा में लें। अधिक मात्रा से दस्त या पेट दर्द हो सकता है। गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं या कोई गंभीर बीमारी वाले डॉक्टर/आयुर्वेदिक वैद्य से सलाह लेकर ही इस्तेमाल करें।

निरंजन फल के सरल घरेलू नुस्खे
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🕳️बवासीर और कब्ज के लिए:
रात को 1 निरंजन फल को आधे गिलास पानी में भिगोकर रखें।
सुबह खाली पेट उसी पानी में फल को अच्छे से मसलें (यह फूलकर जेल जैसा हो जाता है), बीज निकालकर पानी पी लें।
2-3 सप्ताह तक रोज करें। खून आना और सूजन कम होती है।

🕳️अत्यधिक मासिक रक्तस्राव या गर्भाशय ब्लीडिंग के लिए:
रात को 1 फल 1 कप पानी में भिगोएं।
सुबह खाली पेट मसलकर पानी पीएं। यह रक्तस्राव को नियंत्रित करता है।

🕳️गले की खराश, खांसी या टॉन्सिल के लिए:
1 फल पानी में भिगोकर उसका जेल जैसा पानी धीरे-धीरे चुस्कियों में पिएं।
दिन में 1-2 बार। यह गले को ठंडक और नमी देता है।
एसिडिटी, अल्सर या पेट की गर्मी के लिए:
1 फल भिगोकर सुबह का पानी पिएं। या फल को उबालकर काढ़ा बनाकर पिएं।

🕳️त्वचा के लिए (बाहरी उपयोग):
भिगोए हुए फल के गूदे को मुल्तानी मिट्टी या गुलाबजल के साथ मिलाकर फेस पैक बनाएं। 10 मिनट लगाकर धो लें। मुंहासे और चकत्तों में फायदा।

अन्य जड़ी-बूटियों के साथ संयुक्त नुस्खे
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निरंजन फल को अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर प्रभाव बढ़ाया जा सकता है। ये पारंपरिक आयुर्वेदिक संयोजन हैं

🌹बवासीर और पाचन के लिए हल्दी के साथ:
1 निरंजन फल भिगोएं। सुबह मसलकर पानी में आधा चम्मच हल्दी मिलाकर पिएं।
हल्दी की एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीसेप्टिक गुण सूजन और संक्रमण कम करते हैं। रोज 7-10 दिन।

🌹गले की समस्या और खांसी के लिए अदरक या मुलेठी के साथ:
निरंजन फल का भिगोया पानी + थोड़ा अदरक का रस या मुलेठी का काढ़ा मिलाकर पिएं।
यह कफ निकालने और गले को शांत करने में बेहतर काम करता है। दिन में 2 बार।

🌹मासिक धर्म अनियमितता या भारी ब्लीडिंग के लिए अशोका या शतावरी के साथ:
निरंजन फल का पानी + अशोका छाल या शतावरी पाउडर (1/4 चम्मच) मिलाकर पिएं।
यह महिलाओं की समस्याओं में हार्मोनल बैलेंस और रक्तस्राव नियंत्रण में मदद करता है।

🌹अल्सर और कोलाइटिस के लिए एलोवेरा या आमला के साथ:
भिगोए फल का जेल + एलोवेरा जेल (1 चम्मच) या आमला पाउडर मिलाकर लें।
यह पेट की आंतरिक सूजन और अल्सर को ठीक करने में सहायक है।

🌹डिटॉक्स और त्वचा के लिए नीम या त्रिफला के साथ:
निरंजन फल का पानी + थोड़ा नीम पत्ती का काढ़ा या त्रिफला चूर्ण मिलाकर पिएं।
शरीर से गर्मी और विष निकालकर त्वचा साफ करता है।

🌹सामान्य शीतलक पेय (गर्मी में):
निरंजन फल का जेल + गुलाबजल या सौंफ मिलाकर ठंडा करके पिएं। यह शरीर को ठंडक देता है और पाचन सुधारता है।

🌹उपयोग की विधि सामान्य:
फल को अच्छे से धोकर एयरटाइट डिब्बे में रखें।
हमेशा साफ पानी में भिगोएं। पाउडर या काढ़ा रूप में भी उपलब्ध होता है।
सामान्य डोज: 1 फल रोज (भिगोकर) या वैद्य के अनुसार 1-2 ग्राम पाउडर।

स्वस्थ रहने की कामना 🙏
Share जरूर करें।
धन्यवाद!

➡️गठिया रोग(Rheumatoid Arthritis) 👉आजकल बहुत लोग इस रोग से परेशान रहते हैं लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह रोग एक दि...
13/04/2026

➡️गठिया रोग(Rheumatoid Arthritis) 👉आजकल बहुत लोग इस रोग से परेशान रहते हैं लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह रोग एक दिन में नहीं होता बल्कि बहुत से गलत आदतों का परिणाम होता है।

➡️ बहुत से लोग सोचते हैं कि “सब कुछ खाओ, कुछ नहीं होता”, लेकिन सच यह है कि शरीर हर चीज़ का हिसाब रखता है👉 खासकर 40 के बाद, जो आदतें हम सालों से करते आ रहे हैं, उनका असर धीरे-धीरे सामने आता है।
गठिया (जॉइंट पेन, यूरिक एसिड, stiffness, RA) कोई छोटी समस्या नहीं है। एक बार शुरू हो जाए तो जोड़ टेढ़े होना, दर्द, सूजन और चलने-फिरने में दिक्कत जैसी समस्याएं बढ़ती जाती हैं।
गठिया में शरीर के जोड़ों में यूरिक एसिड या दूसरे क्रिस्टल जमा होने लगते हैं। इससे जोड़ों में सूजन, दर्द और जकड़न बढ़ती है। यह अचानक नहीं होता, बल्कि सालों की गलत आदतों का परिणाम होता है।

➡️“गठिया” शब्द सुनते ही लोग घबरा जाते हैं और मान लेते हैं कि यह एक ही तरह की बीमारी है, जबकि असल में इसकी पहचान लक्षणों से होती है।

➡️अगर सुबह उठते ही हाथ-पैर के छोटे-छोटे जोड़ जकड़े हुए हों और दोनों तरफ एक जैसे दर्द हो, तो यह Rheumatoid Arthritis की तरफ इशारा करता है।

➡️वहीं अगर दर्द धीरे-धीरे उम्र के साथ बढ़े और खासकर घुटनों या कमर में हो, तो यह Osteoarthritis हो सकता है।

➡️ अगर अचानक तेज दर्द, सूजन और जलन के साथ एक ही जोड़ (जैसे पैर का अंगूठा) प्रभावित हो, तो यह Gout का संकेत होता है।

➡️इसलिए बिना समझे हर दर्द को “गठिया” बोलना सही नहीं है—सही पहचान ही सही इलाज की पहली सीढ़ी है।

➡️ऐसे में कुछ बातों पर प्रारंभ से ही ध्यान देना चाहिए।⬇️
👉शरीर के प्राकृतिक रिएक्शन को दबाना
जब शरीर में बुखार, उल्टी या दस्त होते हैं, तो वह शरीर की सफाई की प्रक्रिया होती है।
अक्सर लोग तुरंत दवा लेकर बुखार दबा देते हैं
दस्त या उल्टी रोक देते हैं
ऐसे में जो टॉक्सिन बाहर निकलने चाहिए थे, वो शरीर के अंदर ही रह जाते हैं
धीरे-धीरे ये टॉक्सिन जोड़ों में जमा होकर गठिया का कारण बन सकते हैं
समझने वाली बात
हर बार दवा लेना जरूरी नहीं, शरीर को भी काम करने दें।

👉 बार-बार ठंडा-गर्म एक्सपोजर
आज की लाइफस्टाइल में यह बहुत कॉमन है।AC में बैठना और तुरंत तेज गर्मी में निकल जाना।बहुत ठंडी चीज खाने के बाद गर्म चीज लेना।
शुरुआत में कुछ नहीं लगता,लेकिन सालों तक ऐसा करने से शरीर की सहनशक्ति टूटने लगती है

➡️नतीजा👉जोड़ों में दर्द और गठिया की शुरुआत।

👉रात में ठंडी चीजें खाना
रात में शरीर की पाचन शक्ति कम होती है ऐसे में दही, लस्सी, कोल्ड ड्रिंक बर्फ वाली चीजें लेना हानिकारक है।

ये आदत धीरे-धीरे शरीर में कफ और टॉक्सिन बढ़ाती है
लॉन्ग टर्म असर👉जोड़ों में ब्लॉकेज और क्रिस्टल जमना।

➡️ गलत नहाने की आदतें👉कुछ लोग दिन में कई बार नहाते हैं और कुछ लोग बहुत देर तक नहाते रहते हैं
कुछ कि तो आदत होती है ठंडे पानी से बार-बार नहाने की।
महिलाओं में पीरियड्स के दौरान ठंडे पानी से नहाना...

इन सबसे शरीर की गर्मी और संतुलन बिगड़ता है,टॉक्सिन बाहर निकलने के बजाय अंदर रुक जाते हैं।

➡️ भारी और कफ बढ़ाने वाला खाना ज्यादा लेना
कुछ चीजें अगर ज्यादा खाई जाएं तो नुकसान करती हैं

जैसे👉राजमा,पनीर,सोया,आलू,गोभी,दाल मखनी,
या ज्यादा दही-लस्सी
ये सब लिमिट में ठीक हैं लेकिन रोज और ज्यादा मात्रा में लेने से...
शरीर में कफ और वायु बढ़ती है और फिर जोड़ों में जाम होने की समस्या....

➡️ ध्यान रखें संतुलन ही असली समाधान है।
👉भारी खाने के बाद हल्का खाएं
👉डिटॉक्स करने वाली चीजें शामिल करें

जिनके परिवार में पहले से गठिया है या जिनके माता-पिता को यह समस्या रही है,उनके लिए रिस्क ज्यादा होता है
उन्हें अपनी लाइफस्टाइल और ज्यादा सुधारनी चाहिए।

➡️जरूरी आदतें जो अपनानी चाहिए⬇️
👉समय पर खाना
👉धीरे-धीरे चबा कर खाना
👉शरीर को एक्टिव रखना
👉प्राणायाम और योग करना
👉पर्याप्त पानी पीना

➡️सच तो यह है कि गठिया अचानक नहीं होता,यह सालों की गलत आदतों का रिजल्ट होता है।
और एक बार बढ़ जाए तो पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो जाता है
इसलिए बचाव ही सबसे बड़ी दवा है।

➡️आज के समय में बहुत लोग ये भी पूछते हैं👉गठिया जल्दी ठीक कैसे होगा? दवा ले रहे हैं, आयुर्वेद भी ट्राय किया, लेकिन पूरा फायदा नहीं मिल रहा।
खासकर Rheumatoid Arthritis (RA) जैसे केस में तो लोग जल्दी रिजल्ट चाहते हैं, लेकिन सच यह है कि यह समस्या धीरे-धीरे बनी है, तो ठीक भी धीरे-धीरे ही होगी।
अगर आप केवल दवा पर निर्भर रहेंगे और भोजन तथा दिनचर्या नहीं बदलेंगे, तो पूरा फायदा नहीं मिलेगा।

➡️हमारा भोजन👉गठिया हो या RA👉हमारा भोजन सबसे बड़ा रोल निभाती है।
अगर भोजन ही सही नहीं है, तो कोई भी दवा पूरी तरह काम नहीं करेगी।

➡️शरीर को ऐसा भोजन देना चाहिए जो
👉आसानी से पचे
👉सूजन कम करे
👉शरीर को अंदर से ताकत दे
👉बहुत लोग रोज ज्यादा चावल खाते हैं, जिससे शरीर में heaviness और सूजन बढ़ सकती है।
👉चावल कम करें या कुछ दिन बंद करें।
👉मूंग दाल के साथ हल्की खिचड़ी लें।
👉गेहूं या मल्टीग्रेन रोटी ले सकते हैं
👉 ध्यान रखें—हल्का और सुपाच्य भोजन

➡️सब्जियों का सही उपयोग⬇️
👉सब्जियां बहुत जरूरी हैं, लेकिन उन्हें सही तरीके से लेना है।लौकी, तोरई, गाजर, शिमला मिर्च जैसी सब्जियां लें
हल्का तड़का (सरसों तेल या तिल तेल) डाल सकते हैं।
ज्यादा सूखी या बहुत ठंडी प्रकृति की सब्जियां avoid करें।थोड़ा oil इस्तेमाल करने से joints में lubrication भी मिलता है

➡️तेल और फैट्स का सही उपयोग
गठिया या RA में शरीर सूखने लगता है, joints stiff हो जाते हैं,इसलिए healthy fats जरूरी हैं
👉सरसों का तेल
👉तिल का तेल
👉नारियल तेल (हल्का)
इनसे body में lubrication और flexibility आती है

👉दूध, मक्खन और हल्दी का रोल
अगर शरीर में ज्यादा सूजन नहीं है, तो दूध लिया जा सकता है।मक्खन में हल्दी मिलाकर लिया जा सकता है
क्योंकि हल्दी natural anti-inflammatory है,
यह joints के दर्द और swelling में मदद करती है।

➡️गठिया में फल⬇️
👉पपीता
👉अमरूद
👉मीठे फल

➡️ध्यान रखें👉बहुत ज्यादा खट्टे फल avoid करें।

गठिया और RA दोनों में imbalance होता है
👉कहीं सूजन
👉कहीं dryness
👉कहीं stiffness

➡️इसलिए इलाज सिर्फ दवा नहीं, बल्कि balance बनाना है। भोजन और दिनचर्या दोनों का संतुलन जरूरी है।

➡️आयुर्वेदिक औषधियां ⬇️
👉गठिया या Rheumatoid Arthritis (RA) में आयुर्वेदिक औषधियां काफी मदद कर सकती है,लेकिन सही मात्रा,सही समय और सही व्यक्ति के हिसाब से लेना बहुत जरूरी है।

➡️अजमोदादि चूर्ण चूर्ण👉यह शरीर में सूजन कम करने, पाचन क्रिया ठीक रखने और इम्युनिटी को बैलेंस करने में मदद करता है।

➡️सेवन विधि 👉लगभग 2–3 ग्राम गुनगुने पानी से भोजन के बाद दोनों समय लेना चाहिए।

➡️महारास्नादि क्वाथ👉यह joints pain, stiffness और सूजन में शास्त्रोक्त आयुर्वेदिक काढ़ा माना जाता है।

➡️सेवन विधि 👉15–20 ml क्वाथ बराबर मात्रा में गुनगुना पानी मिला कर भोजन के बाद लेना चाहिए।

➡️लाभ👉joint stiffness कम करता है, शरीर में जमा “आम” (toxins) को निकालने में मदद करता है।

➡️अश्वगंधा चूर्ण 👉RA और chronic गठिया में कमजोरी और joint degeneration को सपोर्ट करता है।

➡️सेवन विधि 👉1 चम्मच (2–5 ग्राम)गुनगुने दूध के साथ रात को सोने से पहले लें।

➡️ गुग्गुल जैसे 👉 योगराज/कैशोर
ये खासतौर पर गठिया और RA में इस्तेमाल होते हैं

➡️सेवन विधि 👉2–2 टैबलेट,दिन में 2 बार, खाना खाने के बाद लें।

➡️लाभ👉सूजन कम,joint pain में राहत

➡️हल्दी वाला दूध👉सबसे simple और effective anti-inflammatory remedy

➡️सेवन विधि 👉1 गिलास दूध,1/2 चम्मच हल्दी रात को सोने से पहले लें।

➡️लाभ👉swelling कम करता है,joints को अंदर से heal करता है।

➡️ एरंड पाक 👉यह आमवात की सपेशल औषधि है जो जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में सहायक है।

➡️सेवन विधि 👉एक एक चम्मच सुबह-शाम ताजे जल से सेवन करें।

➡️जरूरी सावधानियां👉अगर RA severe है, तो doctor guidance लें
pregnancy, BP, sugar या दूसरी बीमारी में पहले सलाह लें।

➡️मालिश और सेक (Heat Therapy)
गठिया में सिर्फ खाना नहीं, वाह्य रूप से देखभाल भी जरूरी है
👉रोज आयुर्वेदिक तेल से (महानारायण/महाविषगर्भ) हल्की मालिश करें।
👉उसके बाद हल्का सेक (hot fomentation) करें।
लाभ
इससे जमे हुए toxins ढीले होते हैं,दर्द धीरे-धीरे कम होता है।

➡️योग और प्राणायाम👉अगर आप सच में जल्दी recovery चाहते हैं, तो जरूर करें
👉अनुलोम-विलोम
👉कपालभाति (5–7 मिनट)
👉हल्का योग
ये शरीर को अंदर से heal करते हैं।

➡️धैर्य रखना जरूरी है क्योंकि गठिया या Rheumatoid Arthritis कोई 10 दिन की बीमारी नहीं है,सालों में बनती है,महीनों में ठीक होती है।
अगर आप लगातार 2–3 महीने सही डाइट + दिनचर्या फॉलो करते हैं,
तो फर्क दिखना शुरू हो जाएगा।
याद रखें
➡️गठिया को सिर्फ दवा से नहीं, बल्कि⬇️
👉सही डाइट
👉संतुलित तेल
👉नियमित योग
👉और धैर्य
इन सबके combination से ही control किया जा सकता है
➡️अगर आप consistency रखेंगे, तो लाभ अवश्य मिलेगा।
➡️यदि कोई चमत्कारिक दावा करता है तो यकीनन वह फ्राड है।
विशेष परिस्थितियों में कुशल चिकित्सक से परामर्श लें।
➡️जानकारी अच्छी लगे तो शेयर जरूर करें 🙏
#गठिया_रोग
Saptrishi health care tharepy center 9565993931

आयुर्वेद का अनादित्व           आयुर्वेद अनादि काल से संसार में त्रस्त विभिन्न व्याधियों और तज्जनित कष्टों से पीड़ित प्राण...
12/01/2026

आयुर्वेद का अनादित्व

आयुर्वेद अनादि काल से संसार में त्रस्त विभिन्न व्याधियों और तज्जनित कष्टों से पीड़ित प्राणियों को रोगमुक्त करता आ रहा है। आयुर्वेद की उत्पत्ति कब हुयी? इस विषय में कुछ भी कहना सम्भव नहीं है। संसार, जीवन, मरण, आत्मा आदि की भाँति आयुर्वेद भी अनादि है। यह समुद्र के समान गंभीर, प्रकृति और पुरुष की भाँति अनाद्यनन्त और तद्वत् शाश्वत है। अत: जो विज्ञान अनादि, अनन्त और शाश्वत होता है उसकी नवीन उत्पत्ति नहीं हो सकती। शास्त्र में जहाँ कहाँ भी आयुर्वेदोत्पत्ति शब्द का प्रयोग का व्यावहार हुआ है वहाँ उत्पत्ति शब्द से उत्पन्न होना अर्थ ग्रहण न कर अभिव्यक्ति मात्र समझना चाहिए। अत: आयुर्वेदोत्पत्ति के प्रसंग में सर्वत्र उत्पत्ति शब्द का रूढ अर्थ न लेकर अभिप्रेतार्थ ही ग्रहण करना चाहिये। क्योंकि अनादि, शाश्वत और नित्यशास्त्र की नवीन उत्पत्ति नहीं हो सकती। प्रसंगानुसार उसकी अभिव्यक्ति ही की जाती है। आयुर्वेद का शाश्वतत्व, अनिादित्व एवं नित्यत्व महर्षि चरक के निम्न वचनों से स्पष्ट है-
‘‘सोऽयमायुर्वेद: शाश्वतो निर्दिश्यते अनादित्वात् स्वभावसंद्विलणात्वत् भावस्वभावनित्यत्वाच्च। न ह्ययुर्वेदस्याभूत्वोपत्ति रूपलभ्यते, अन्यत्रावबोधोपदेशभ्याम्। एतद्वै द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशान्त्येके।’’
चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय-३०

अर्थात् यह आयुर्वेद अनादि होने से अपने लक्षणों के स्वभावत: सिद्ध होने से और भावों के स्वभाव के नित्य होने से शाश्वत (नित्य) है। सृष्टि के पहले आयुर्वेद शास्त्र की उत्पत्ति नहीं है और बाद में इसकी उत्पत्ति है ऐसी बात नहीं है। ज्ञान और उपदेश इन दोनों को लेकर कुछ आचार्य आयुर्वेद की उत्पत्ति स्वीकार करते हैं।

अत: ऐसे अनादि और शाश्वत आयुर्वेद की अभिव्यक्ति ब्रह्मा जी सृष्टि के प्रारम्भ में किया करते हैं। महर्षि सुश्रुत के निम्न वचन से स्पष्ट है कि वर्तमान सृष्टि के प्रारम्भ में मनुष्यों की उत्पत्ति के पूर्व ही आयुर्वेद की अभिव्यक्ति ब्रह्माजी ने की थी।
आयुर्वेदाभिव्यक्ति का यह सबल प्रमाण है-
‘‘अनुत्पाथेव प्रजा: श्लोकज्ञतसहस्त्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयम्भु:।’’ स.सू. १/६।।

अर्थात् ब्रह्मा जी ने प्राणियों की सृष्टि के पूर्व ही एक लाख श्लोकों एवं एक हजार अध्यायों में आयुर्वेद को निर्मित किया।

इसी आशय का एक वचन काश्यप संहिता में भी उपलब्ध होता है। यथा-
‘‘अथर्ववेदोपनिषत्सु प्रागुत्पन्न: स्वयम्भूर्ब्रह्मा प्रजा: सिसृक्षु: प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत् सर्ववित्।’’
काश्यप संहिता, विमानस्थान, अध्या-१

अर्थात् अथर्ववेद एवं उपनिषदों में पूर्व ही समुत्पन्न हुआ, सृष्टि की उत्पत्ति की इच्छा रखने वाले सर्वज्ञ ब्रह्मा ने प्रजा के परिपालन के लिए आयुर्वेद को ही पहले रचा।

उपर्युक्त कथन से एक यह तथ्य भी सामने आता है कि मनुष्योत्पत्ति होने के पूर्व ही आयुर्वेदाभिव्यक्ति होने के कारण यह अयुर्वेद वेदों के समान अपौरुषेय एवं नित्य है। आयुर्वेद का यह अपौरुषेयत्व उसे रचना की दृष्टि से वेदों की श्रेणी में रख देता है, जिनमें आयुर्वेदाध्येता को न केवल इहलौकिक अपितु पारलौकिक सुख की उपलब्धि होती है। इसके लिए महर्षि चरक ने स्वयं लिखा है-
तस्यायुषो पुव्यतमो वेदो वेदविदां मतम्।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरूभयोर्हित:।।

उपर्युक्त वचन से स्पष्ट है कि पुण्यतम आयुर्वेद इस लोक में हितकारी एवं यश प्रदान करने वाला तो है ही, परलोक के लिए भी श्रेयस्कारी मार्ग प्रशस्त करता है। सुश्रुत संहिता के प्रसिद्ध टीकाकार आचार्य डल्हण के शब्दों में तो यह मोक्ष प्रदाता है। उन्होंने शाश्वत शब्द की व्याख्या में लिखा है-
‘‘शाश्वतशब्देन मोक्षोऽभिधीयते। तत्सम्पादनात् शाश्वतम्’’।

अत: इसमें अब कोई सन्देह ही नहीं है कि आयुर्वेद अपने अष्टांग स्वरूप में अनादि, अनन्त एवं शाश्वत होने से पारलौकिक सुख प्रदान करने वाला अर्थात् मोक्ष प्रदान करने वाला है।
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यकृत (लिवर) की आंत में दिक्कत क्या है:लिवर और आंतें आपस में जुड़ी होती हैं। लिवर ठीक से काम न करे तो पाचन, गैस, कब्ज, सू...
10/01/2026

यकृत (लिवर) की आंत में दिक्कत क्या है:
लिवर और आंतें आपस में जुड़ी होती हैं। लिवर ठीक से काम न करे तो पाचन, गैस, कब्ज, सूजन और पेट की अन्य समस्याएं होने लगती हैं।

यकृत की आंत में दिक्कत होने के कारण:

1. फैटी लिवर
2. कब्ज और गैस की समस्या
3. अधिक तला-भुना और बाहर का खाना
4. शराब का सेवन
5. दवाइयों का ज्यादा उपयोग
6. हेपेटाइटिस
7. संक्रमण (इन्फेक्शन)
8. कम पानी पीना
9. ज्यादा तनाव

यकृत की आंत में दिक्कत के लक्षण:

1. पेट फूलना और गैस
2. कब्ज या दस्त
3. भूख कम लगना
4. पेट के दाहिने हिस्से में दर्द
5. मुंह का स्वाद खराब
6. जी मिचलाना
7. कमजोरी
8. त्वचा या आंखों में पीलापन (गंभीर स्थिति)

यकृत की आंत की दिक्कत का घरेलू इलाज:

1. सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पिएं
2. गिलोय का काढ़ा दिन में 1 बार लें
3. त्रिफला चूर्ण 1 चम्मच रात को गुनगुने पानी के साथ लें
4. एलोवेरा जूस 20–30 ml रोज लें
5. चुकंदर, गाजर और मूली का सलाद खाएं
6. हल्दी वाला गुनगुना दूध रात को लें
7. छाछ में भुना जीरा डालकर पिएं
8. अधिक पानी पिएं (8–10 गिलास)
9. शराब और धूम्रपान पूरी तरह बंद करें

योग और प्राणायाम:

1. पवनमुक्तासन
2. भुजंगासन
3. धनुरासन
4. कपालभाति (हल्का)
5. अनुलोम-विलोम

खान-पान में सावधानी:

1. तला-भुना और जंक फूड न खाएं
2. अधिक तेल और मसाले से बचें
3. हरी सब्जियां और फल अधिक खाएं
4. बाहर का खाना कम करें
5. समय पर भोजन करें

कब डॉक्टर को दिखाएं:

1. पेट दर्द ज्यादा बढ़ जाए
2. उल्टी या तेज बुखार हो
3. आंख या त्वचा पीली होने लगे
4. लगातार कमजोरी रहे
5. लिवर रिपोर्ट खराब आए

लिवर या आंत की गंभीर समस्या में डॉक्टर की जांच और सलाह जरूरी है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें
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