22/04/2026
मैं हूं न :
गंभीर मरीज के परिजनों को सांत्वना देते हुए चिकित्सक ने कहा — 'आप चिंता न करें, मैं हूँ न।'
लेकिन उपरोक्त वाक्य आज से पचास वर्ष पूर्व आख़िरी बार किसी भारतीय चिकित्सक के मुँह से निकला था।
भारत में डॉक्टर-मरीज का रिश्ता हमेशा से विश्वास और आपसी सहयोग पर टिका था। पश्चिमी देशों की तरह यहाँ 'कंसेंट', आरोप-बाजी — ये सब कभी नहीं रहा। गंभीर से गंभीर मरीज का इलाज करते हुए भी कुछ दशकों पूर्व तक डॉक्टर को यह डर नहीं होता था कि मरीज मर गया तो मुझ पर हमला होगा, आरोप लगेंगे।
अब हर मरीज डॉक्टर को संभावित मुकदमेबाज लगता है और हर डॉक्टर मरीज को संभावित लुटेरा। इस वजह से डॉक्टर सुरक्षित रहने के लिए ढेरों जाँचें करवाता है — उनकी भी जिनकी संभावना बेहद कम हो। दुनिया भर की कागजी कार्यवाही, नोट्स, फाइलें मेडिकल कॉलेजों में सिखाई जाती हैं। मरीज के इलाज में गड़बड़ी से कहीं अधिक डांट इन फाइल वर्क के अधूरेपन पर पड़ती है मेडिकल कॉलेजों में।
परेशान और डरा हुआ चिकित्सक उस बस-चालक की तरह है जिसके सर पर बंदूक रखकर कहा हो — 'एक भी गड्ढे पर टायर नहीं जाना चाहिए।'
पश्चिमी देशों के कानूनों की अंधी नकल, बिना यहाँ की न्याय-व्यवस्था, जीवन, और धारणाओं के अंतर को समझे, की जा रही है।
सुषेण वैद्य सो रहे थे — उन्हें सोने दिया गया और खटिया सहित लाया गया, एक आपात स्थिति में, जब लक्ष्मण जी मूर्छित थे। कितनी अजीब सलाह थी उनकी — उस सुदूर पर्वत से चार संजीवनी बूटियाँ लाने की। हनुमान जी को पहचान नहीं आईं तो लड़े नहीं, लौटकर नहीं आए कि 'ढंग से क्यों नहीं बताया' — पर्वत ही उठा लाए। उन ताकतवर योद्धाओं के बीच इस वैद्य की सलाह मानी गई, सम्मान के साथ — क्योंकि वहाँ इंटेंट भलाई था, मरीज की... प्राथमिक प्रेरणा पैसा नहीं था। कोई कंसेंट नहीं, कोई 'poor prognosis explanation' नहीं — मात्र एक-दूजे पर विश्वास।
रिश्तों में कड़वाहट के कारण तलाश रहा था तो पाया — कारण एक नहीं, बहुत से हैं, जिन पर पूरी एक किताब बन सकती है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और निजी चैनलों का भारत में उद्भव एक अहम बिंदु था, जिसमें संपादक के दबाव में खबरें ढूँढता पत्रकार 'सॉफ्ट टारगेट' ढूँढता था।
किंतु आज बाहर उँगली दिखाना नहीं, बल्कि स्वयं में झाँकना
उद्देश्य है — इस क्षेत्र में क्या गड़बड़ है, यह आत्मावलोकन करना भी आवश्यक है।
मुझे स्वयं हाल ही में कॉर्पोरेट अस्पताल और बीमा कंपनी का अनुभव हुआ और समझ आया कि सब कुछ कितना व्यावसायिक, सामान की खरीद-फरोख्त जैसा बना दिया गया है। कोई व्यक्तिगत, भावनात्मक स्पर्श नहीं — मात्र पैसों से सेवाएँ खरीदने जैसा। उसमें भी एक ऐसा गठजोड़ जहाँ खरीदार स्वयं को असहाय महसूस करे।
मैं एक चिकित्सक हूँ — मुझे इस क्षेत्र में हर जगह से मदद मिल सकती है, फिर भी मुझे ऐसा लगा। तो सोचिए, वह आम व्यक्ति जिसने कभी अस्पताल में कदम नहीं रखा, उसे कैसा लगता होगा? स्वास्थ्य बीमा कंपनियाँ जरूरत पर मदद करने के जज्बे से नहीं, बल्कि कोई न कोई गलती निकालने की मंशा से बैठी हैं। धीमी न्याय-प्रक्रिया उन्हें अलग ही आत्मविश्वास से भर देती है। उनके कॉल सेंटर और ऐप्स — प्रीमियम भरते समय मक्खन जैसे चिकने, और क्लेम के समय बार-बार 'technical error'।
लेकिन आप अपने जीवन में ही देखें — आपको अपने मोहल्ले के, परिवार के डॉक्टर से शायद ही कभी कड़वाहट महसूस हुई हो। आप में से अधिकांश तो कृतज्ञ होंगे उन चिकित्सकों के, उन छोटे-छोटे अस्पतालों के, जो रात-बिरात, बिना भारी-भरकम बिल और तामझाम के, अपनत्व के साथ इलाज करते रहे। फोन पर बिना नियमों की परवाह किए इलाज बता दिए... किसी कॉरपोरेट से बिना अपॉइंटमेंट बिना फीस ये संभव है ?
कॉर्पोरेट व्यवस्था में वहाँ के डॉक्टर भी एक व्यावसायिक मानसिकता के साथ काम करते हैं क्योंकि यह स्ट्रक्चर ही एक कंपनी है .. जिसका मुख्य उद्देश्य प्रॉफिट है ।
उनकी बातचीत में अपनेपन का अभाव दिखता है — मरीज के लिए 'out of the way' जाना नहीं दिखता, बल्कि पूर्व-निर्धारित नियम, विनियम और फॉर्म दिखाई देते हैं।
यहाँ मरीज ठीक होकर भी कृतज्ञ नहीं होता — 'मैंने कुछ खरीदा है' ऐसा महसूस करता है। और ठीक न हो तो एक कड़वाहट से भर जाता है।
उस सिस्टम का जो पहला और आखिरी चेहरा होता है मरीज के सामने— वह डॉक्टर होता है। पृष्ठभूमि का तंत्र मरीज कैसे देख सकेगा? वह तो बस उस टाई वाले चेहरे को याद रखता है जिसने स्वास्थ्य बेचा था, हीलिंग बेची थी — लेकिन वह अगर खराब निकली तो वह सिस्टम नहीं वरन उस चेहरे और उसके नाम के आगे लगे प्रीफेक्स के प्रति कड़वाहट से भर जाता है। जैसे एक मोबाइल खरीदा हो और वो न चले।
इन पाँच सितारा अस्पतालों में डॉक्टर एक सेल्समैन है ।
अब कड़वाहट से भरा यह मरीज, वहाँ कॉर्पोरेट में बाउंसर और वकीलों की फौज के बीच कुछ नहीं कर पाता, तो धारणा बनाता है — 'सब डॉक्टर चोर होते हैं।' उसका गुस्सा वहाँ निकलता है जहाँ निकाला जा सकता है।
बड़े लोग चाहे जितने कॉर्पोरेट खोलें — उनकी अपनी आवश्यक जगह होगी निःसंदेह , जटिल और महंगी सर्जरी में, शायद शोध में, शायद अमीरों, ताकतवरों के लिए ५ स्टार से कंफर्ट में।
किंतु व्यक्तिगत स्पर्श वाले, अपने-से लगते छोटे-छोटे क्लिनिक और अस्पतालों को तंग मत कीजिए। इनका बंद होना, इन्हें तंग करना सीधे-सीधे आम, मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय जनसंख्या का एक सहारा छीन लेने जैसा होगा। और यह अनुरोध मेरा सरकारों, पत्रकारों, नौकरशाही और जनता — सभी से है।
भारत का स्वास्थ्य-ढाँचा पश्चिमी देशों से बेहद अलग है और बेहद सुविधाजनक — इन्हीं छोटे-छोटे असंगठित क्षेत्र के चिकित्सकों की वजह से। इतनी बड़ी जनसंख्या बिना दिनों की वेटिंग के इस असंगठित क्षेत्र की वजह से स्वास्थ्य लाभ,
सलाह, वैक्सीनेशन, जांचें, सर्जरी , एक्सीडेंट को झेल पाती है ।
एक प्रयोग करके देखिए —
किसी गरीब को इन मोहल्ले के क्लिनिकों में भेजिए। बिना किसी कागज-पत्र के उसे मुफ्त परामर्श और सैंपल की दवाइयाँ न मिलें तो कहना ।
अब उसी मरीज को किसी कॉर्पोरेट अस्पताल के रिसेप्शन तक बिना किसी मदद के पहुँचाकर देखिए।
मैने एम बी बी एस छात्रों की एक कक्षा में हाथ उठवाकर पूछा था एक दिन,आगे क्या करना चाहते हो ? और पाया — डॉक्टरों की आने वाली पीढ़ी किसी व्यवसायी या बड़े राजनीतिज्ञ के पैसों से बने इन कॉर्पोरेट्स में 'सेल्समेन' बनने को अपना सर्वश्रेष्ठ 'placement' मानने लगी है।
ये आपको तय करना है कि सेल्समेन के साथ साथ आपको कुछ लोग चिंता न करो ' मैं हूं न ' कहने वाले भी चाहिए या नहीं ।
आपका
डॉ. अव्यक्त