Poestess Prachi Mishra

19/08/2026

Beta.....
Poestess Prachi Mishra


मैं  प्रतीक्षा  के  कठिन संकल्प  लेकर  जा  रही  हूँतुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।साँझ   सिंदूरी  भी ...
17/08/2026

मैं प्रतीक्षा के कठिन संकल्प लेकर जा रही हूँ
तुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।

साँझ सिंदूरी भी होगी
भोर का यौवन भी होगा
प्यास धरती की बुझाता
नेह का सावन भी होगा
पर हमारी वेदना का
अब कोई भी हल न होगा
शब्द तो होंगे हज़ारों
पर स्वरों में बल न होगा
स्मृति का बाण भी अब इस हृदय के पार होगा
तुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।

तन नहीं बांधे हैं हमने
मन का गठबन्धन किया है
प्रेम को सौभाग्य कहकर
माथ का चंदन किया है
सप्तपदि और सात भाँवर
प्रगतिपथ की कामना है
हर वचन में एक दूजे के
सुखों की कामना है
ये समय इस प्रीत के परिणाम का आधार होगा
तुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।

लक्ष्य को साधे हुए मैं
शूल पथ पर चल रही हूँ
हर कदम अग्निपरीक्षा
मैं स्वयं में जल रही हूँ
प्रेरणा बनकर के प्रियतम
तुम सदा ही साथ होगे
मन सशंकित हो चला है
क्या पुनः विश्वास दोगे
हर पराजित स्वप्न मेरा एक दिन साकार होगा
तुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।

हाथ हाथों में समेटे
सुखद क्षण न जी सकेंगे
नैन से नैनों कि मय को
हम अभी न पी सकेंगे
द्वार ,आंगन और दीवारें
सब अभी रूठे रहेंगे
साथ तो हर पल रहेंगे
तार पर टूटे रहेंगे
स्वास की गति पर सदा ही प्रेम का अधिकार होगा
तुम कहो प्रिय क्या विरह बंधन तुम्हें स्वीकार होगा।

Prachi Mishra


लोगों ने बताया तुम आज़ाद हो बहुत खुशी हुईमिठाइयाँ बाँटी गईं गान गाये गए कुछ लोग भाषण देने लगे आज़ादी कैसे मिली किसने दिलाई...
15/08/2026

लोगों ने बताया तुम आज़ाद हो
बहुत खुशी हुई
मिठाइयाँ बाँटी गईं
गान गाये गए
कुछ लोग भाषण देने लगे
आज़ादी कैसे मिली
किसने दिलाई
फिर उजले कपड़े की क्रीज़ संभालते हम घर आये
हाथ में आधा लड्डू
जो हाथ में पकड़े पकड़े सिलसिला सा गया था
छोटे भाई के हाथ पर रख दिया
फिर वही दिन जो कल था
माँ रसोई से चिल्ला कर बोलीं
आकर खाना खा लो
फिर जाकर बाहर के काम देखूँ
मुझे तो एक दिन की छुट्टी नहीं
एक निवाला भीतर गया की पड़ोस में
किसी की चीख सीना चीर गई
पड़ोसी की बेटी
ससुराल में खाना बनाते जल मरी
बगल के छोटे से स्कूल के बिगुल में बजता
"ये देश है वीर जवानों का "
धीमा हो गया
भीड़ जमा हुई और खाली हो गई
कोई रोया, किसी ने कहा "चरित्रहीन थी "
सब घर लौटे
बाबा और दादी के कमरे में टीवी चलता रहा
लेकिन दोनों बातों में मशगूल थे
पड़ोसी की बेटी और पड़ोसी..
टीवी का स्वर बाहर तक आता रहा "महंगाई की मार, हाहाकार "
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई
रतिराम था बाबा के ऑफिस का चपरासी
"बाबूजी पेंशन के कागज़ नहीं बन पा रहे"
चप्पल घिस गई
बाबू बस हाथ रगड़ के कहता है "समझो"
दादी कमरे से चिल्लाईं
चाय चढ़ा दो
और एक सब्ज़ी और बना लेना
भाई हाथ में तिरंगा लिए यहाँ से वहाँ दौड़ता रहा...
पिताजी चिल्लाये "पढ़ लो वरना सारी ज़िन्दगी दौड़ते ही रहोगे "
रात हो गई थी
नई सुबह की तैयारी थी....
Prachi Mishra

शिकायत नहीं है किसी से मुझेजो है जैसा है जितना है काफी हैमेरे हिस्से का है जो मिला है मुझे मेरी किस्मत ने जोभी दिया है म...
12/08/2026

शिकायत नहीं है किसी से मुझे
जो है जैसा है जितना है काफी है
मेरे हिस्से का है
जो मिला है मुझे
मेरी किस्मत ने जो
भी दिया है मुझे
वो लोग जो करते
मोहब्बत मुझसे
और वो जो नफ़रत
ही करते रहे
वो सब भी
क़ुबूल हैं मुझे
शिकायत नहीं है
किसी से मुझे

वो छत जो मेरा
जहाँ बन गयी
वो माँ जो मेरा
आसमां बन गयी
वो गुल्लक के चंद
सिक्के अमानत मेरी
वो मैली सी चादर
सुकून बन गयी
वो धुधंला सा आईना
जो दीवार पर टँगा
बड़ी साफ सी
सूरत दिखाता मेरी
सब कुछ बहुत है
मिला किस्मत से मुझे
शिकायत नहीं है
किसी से मुझे

मेरी खुशियों का
वो मैला सा आँगन
मेरे ग़मों का
वो टूटा चबूतरा
वो साथी मेरे
कुछ पक्के से
वो मटके पानी
के कच्चे से
वो बारिश भी
कुछ मटमैली सी
और गर्मी की
रुत बड़ी रूखी सी
सब कुछ यहां
बस मेरे लिए
शिकायत नहीं है
किसी से मुझे ।
★★★
©प्राची मिश्रा
Poestess Prachi Mishra

कई बातें अधूरी हैं,और इक मन अधूरा है अधूरी हैं कई रातें,प्राण बिन तन अधूरा है न उर्मिल सी प्रतीक्षा है न राधा सा कोई प्र...
09/08/2026

कई बातें अधूरी हैं,और इक मन अधूरा है
अधूरी हैं कई रातें,प्राण बिन तन अधूरा है
न उर्मिल सी प्रतीक्षा है न राधा सा कोई प्रण है
रेत के गाँव में प्रियतम हर इक सावन अधूरा है।

07/08/2026

बहुत दिन बाद.... एक मुक्तक... ❤️

Good morning ❤️
07/08/2026

Good morning ❤️

05/08/2026

Maa❤️

तुम्हारे  दूर  जाने   का ,  तुम्हारे  लौट   आने  का,असर  कम हो गया  है अब  हमें  यूं ही सताने का,नहीं  सोती  हैं  ये आँख...
05/08/2026

तुम्हारे दूर जाने का , तुम्हारे लौट आने का,
असर कम हो गया है अब हमें यूं ही सताने का,
नहीं सोती हैं ये आँखें न कोई ख़्वाब बुनती हैं
नहीं अब शौक है हमको रेत के घर बनाने का।
Poestess Prachi Mishra



28/07/2026

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