Satyamev Mansik Vikas Kendra

Satyamev Mansik Vikas Kendra Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Satyamev Mansik Vikas Kendra, Mental Health Service, Awadhpuri, Bhopal.

शारीरिक स्वास्थ्य की तरह ही मानसिक स्वास्थ के पहलुओं के प्रति सजग रहना और खुद को मानसिक रूप से स्वस्थ रखना बेहतरीन जिन्दगी जीने के लिए बहुत जरुरी है. विश्व को मानसिक स्वास्थ के विभिन्न पहलुओं से परिचय कराने के साथ –साथ, विभिन्न मानसिक समस्या से उबारने में मदद करने के उद्देश्य से ”सत्यमेव मानसिक विकास केन्द्र “ का संचालन किया जा रहा है .
“सत्यमेव मानसिक विकास केन्द्र” का उद्देश्य केवल व्यक्तिओं के

व्यवहारों से जुड़ी समस्याओं का वैज्ञानिक रूप से समाधान करने से है. इसका जुड़ाव किसी जाति, धर्म, लिंग और उम्र के व्यक्तियों से नहीं बल्कि वैज्ञानिक और संवैधानिक विचारों पर केन्द्रित मानसिक स्वास्थ्य के उपचारों से है .
अगर आप अपने या अपने परिवार या साथियों के व्यवहार में किसी भी प्रकार का व्यवहार संबंधित बदलाव महसूस कर रहे हैं तो “सत्यमेव मानसिक विकास केन्द्र “ के संपर्क नंबर -09329243202 पर और [email protected] पर शाम 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक संपर्क कर सकते हैं.
इसके अलावा निम्न सुविधाओं के लिए भी संपर्क कर सकते हैं -
- मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और परीक्षण
- संज्ञानात्मक मूल्यांकन और पुनःनिर्माण
- लैंगिक समानता के लिए प्रशिक्षण
- हेल्थ केयर काउन्सलिंग
- केरियर सम्बंधित परामर्श
-विशेष क्षमताओं वाले बच्चों के मनोवैज्ञानिक थेरेपी और विशेष शिक्षा के लिए
- मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे से जुड़े पहलुओं पर व्याख्यान,जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन में भागीदारी


स्मिता कुमारी
निदेशक एवं पुनर्वास मनोवैज्ञानिक
सत्यमेव मानसिक विकास केन्द्र , भोपाल

कल News18 MP/CG पर News18 Madhya Pradesh
22/05/2026

कल News18 MP/CG पर
News18 Madhya Pradesh

https://kharinews.com/a-seminar-on-womens-identity-crisis-and-mental-health-was-organised-at-anganwadi/महिलाओं की पहचान ...
07/05/2026

https://kharinews.com/a-seminar-on-womens-identity-crisis-and-mental-health-was-organised-at-anganwadi/

महिलाओं की पहचान का संकट और मानसिक स्वास्थ्य पर विचार गोष्ठी आंगनबाड़ी में आयोजित
सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका एवं मनोवैज्ञानिक स्मिता कुमारी ने आंगनबाड़ी क्रमांक 710, गोविंदपुरा में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। इसका विषय था – “महिलाओं की पहचान: एक संकट और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव”।







Smita Satyamev

https://kharinews.com/hum-sunenge-saathi/“हम सुनेंगे साथी”: बाल, महिला और LGBTQ समुदाय की मानसिक समस्याओं पर आंगनबाड़ी म...
07/05/2026

https://kharinews.com/hum-sunenge-saathi/

“हम सुनेंगे साथी”: बाल, महिला और LGBTQ समुदाय की मानसिक समस्याओं पर आंगनबाड़ी में जागरूकता कार्यक्रम
सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका स्मिता कुमारी ने गुरुवार को आंगनबाड़ी क्रमांक 1146, गोविंदपुरा में एक विशेष कार्यक्रम “हम सुनेंगे साथी” का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों, महिलाओं और एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों की मानसिक समस्याओं को समझना और उनका समाधान ढूंढना था।







Smita Satyamev

4 मई को मेरे द्वारा आयोजित कार्यक्रम की खबर "जय स्वतंत्र भारत" अखबार में
06/05/2026

4 मई को मेरे द्वारा आयोजित कार्यक्रम की खबर "जय स्वतंत्र भारत" अखबार में


17/04/2026

साथियों,

बोर्ड रिजल्ट आ गया और कई अनहोनी की खबरें भी।
आपके इस कदम से आपके रिजल्ट में कोई परिवर्तन नहीं होगा। यह रिजल्ट भविष्य तय करता तो 12th फेल व्यक्ति अधिकारी नहीं बनते, थॉमस एडिसन बल्ब का अविष्कार नहीं करते। और ऐसे हजारों लोग अपने जीवन में उड़ान भर रहें हैं जिन्होंने जिंदगी में असफलता देखी है।

आपको तो पता है हमारे देश में क्रिकेट का कितना क्रेज है और उसमें भी हर बार हर टीम नहीं जीतता, लेकिन इससे वह जिंदगी में असफल नहीं होते। हर रिसर्च में कई बार असफलता मिलती है, मगर वैज्ञानिक हर बार उन कमियों को दूर कर नई उम्मीद के साथ उड़ान भरते हैं। हमारे घरों में हर दिन बेस्ट भोजन नहीं बनता मगर जो सामान्य दाल-चावल भी कई बार लोग बड़े चाव से खाते हैं। दुनियाँ का कोई बेहतर कार्य एक प्रयास में बेहतर नहीं होता, अगली प्रयास उससे और बेहतर करता है। आप जिंदगी का साथ मत छोड़िए, उदासी होना, घबराहट होना, दूसरों से तुलना होना, कई बार कुछ शिक्षकों का केवल टॉपर्स के लिए पोस्ट लिखा देख खुद को कमतर महसूस करना, रिश्तेदारों का अपने बच्चों से तुलना करना, ऐसी कई घटनाओं से कई लोग गुजरे हैं इसलिए समझ सकती हूँ दर्द बहुत होता है मगर यह दावे से कह रही हूँ सब से जीत सकते हैं बस हमको खुद से नहीं हारना चाहिए।

मैं अक्सर कहती हूँ कई कोचिंग संस्थान या स्कूल टॉपर्स का फोटो लगा गर्व से बताते हैं कि ये उनके पढ़ाये बच्चे हैं इसमें कुछ गलत नहीं, गलत तब है जब फेल या सामान्य नंबर के बच्चों को कमतर महसूस कराते हैं या उनके लिए नहीं कह पाते कि "इस बार हम मिलकर कोशिश करेंगे कि तुम बेहतर करो, शायद हमदोनों ने मिलकर तुम्हारी समस्या पर बेहतर एनालिसिस नहीं किया।" इसलिए बुरा लगना स्वभाविक है, मगर मेरे प्यारे साथियों आप इससे लड़ों, डर लगे तो काउंसलर या मनोवैज्ञानिक से मदद लीजिए। और खुद के क्षमताओं का आंकलन कर उसके अनुसार पढ़ाई कीजिए, याद रखिए वास्तव में सफलता की कोई परिभाषा नहीं, जो फेल है उसके लिए पास होना भर सफलता है, जो पास है उसके लिए प्रथम श्रेणी आना सफलता है जो प्रथम श्रेणी में है उसको टॉपर्स में आना सफलता है और जो टॉपर है उसके लिए हर विषय में सौ प्रतिशत अंक आना ही सफलता है।

जिन बच्चों के बेहतर नंबर आये हैं उन सबको बधाई मगर उनके परिजनों से आग्रह है बच्चों का मार्क्स वाला पोस्ट डालकर दूसरों को कमतर का एहसास मत कराईये। जो बच्चे असफल महसूस कर रहे हैं उनको आगे की रणनीति के लिए शुभकामनाएं, आप भरोसा रखिए इस पल को जीत लिए तो सफलता की कहानी बताने के लिए बेहतरीन अनुभव आपके पास होगा और आप भविष्य में खुद के जैसे कई बच्चों के प्रेरणा होंगे। इनके परिजनों से आग्रह है अपने बच्चों के साथ खड़े होइए और व्यवहार में जरा भी बदलाव दिखे तो मनोवैज्ञानिको से मदद लीजिए इस पल को संभालने में।-🙏स्मिता कुमारी, निदेशक एवं मनोवैज्ञानिक

17/04/2026

साथियों,

बोर्ड रिजल्ट आ गया और कई अनहोनी की खबरें भी।
आपके इस कदम से आपके रिजल्ट में कोई परिवर्तन नहीं होगा। यह रिजल्ट भविष्य तय करता तो 12th फेल व्यक्ति अधिकारी नहीं बनते, थॉमस एडिसन बल्ब का अविष्कार नहीं करते। और ऐसे हजारों लोग अपने जीवन में उड़ान भर रहें हैं जिन्होंने जिंदगी में असफलता देखी है।

आपको तो पता है हमारे देश में क्रिकेट का कितना क्रेज है और उसमें भी हर बार हर टीम नहीं जितना लेकिन इससे वह जिंदगी में असफल नहीं होते। हर रिसर्च में कई बार असफलता मिलती है, मगर वैज्ञानिक हर बार उन कमियों को दूर कर नई उम्मीद के साथ उड़ान भरते हैं। हमारे घरों में हर दिन बेस्ट भोजन नहीं बनता मगर जो सामान्य दाल-चावल भी कई बार लोग बड़े चाव से खाते हैं। दुनियाँ का कोई बेहतर कार्य एक प्रयास में बेहतर नहीं होता, अगली प्रयास उससे और बेहतर करता है। आप जिंदगी का साथ मत छोड़िए, उदासी होना, घबराहट होना, दूसरों से तुलना होना, कई बार कुछ शिक्षकों का केवल टॉपर्स के लिए पोस्ट लिखा देख खुद को कमतर महसूस करना, रिश्तेदारों का अपने बच्चों से तुलना करना, ऐसी कई घटनाओं से कई लोग गुजरे हैं इसलिए समझ सकती हूँ दर्द बहुत होता है मगर यह दावे से कह रही हूँ सब से जीत सकते हैं बस हमको खुद से नहीं हारना चाहिए।

मैं अक्सर कहती हूँ कई कोचिंग संस्थान या स्कूल टॉपर्स का फोटो लगा गर्व से बताते हैं कि ये उनके पढ़ाये बच्चे हैं इसमें कुछ गलत नहीं, गलत तब है जब फेल या सामान्य नंबर के बच्चों को कमतर महसूस कराते हैं या उनके लिए नहीं कह पाते कि "इस बार हम मिलकर कोशिश करेंगे कि तुम बेहतर करो, शायद हमदोनों ने मिलकर तुम्हारी समस्या पर बेहतर एनालिसिस नहीं किया।" इसलिए बुरा लगना स्वभाविक है, मगर मेरे प्यारे साथियों आप इससे लड़ों, डर लगे तो काउंसलर या मनोवैज्ञानिक से मदद लीजिए। और खुद के क्षमताओं का आंकलन कर उसके अनुसार पढ़ाई कीजिए, याद रखिए वास्तव में सफलता की कोई परिभाषा नहीं, जो फेल है उसके लिए पास होना भर सफलता है, जो पास है उसके लिए प्रथम श्रेणी आना सफलता है जो प्रथम श्रेणी में है उसको टॉपर्स में आना सफलता है और जो टॉपर है उसके लिए हर विषय में सौ प्रतिशत अंक आना ही सफलता है।

जिन बच्चों के बेहतर नंबर आये हैं उन सबको बधाई मगर उनके परिजनों से आग्रह है बच्चों का मार्क्स वाला पोस्ट डालकर दूसरों को कमतर का एहसास मत कराईये। जो बच्चे असफल महसूस कर रहे हैं उनको आगे की रणनीति के लिए शुभकामनाएं, आप भरोसा रखिए इस पल को जीत लिए तो सफलता की कहानी बताने के लिए बेहतरीन अनुभव आपके पास होगा और आप भविष्य में खुद के जैसे कई बच्चों के प्रेरणा होंगे। इनके परिजनों से आग्रह है अपने बच्चों के साथ खड़े होइए और व्यवहार में जरा भी बदलाव दिखे तो मनोवैज्ञानिको से मदद लीजिए इस पल को संभालने में।-🙏स्मिता कुमारी, निदेशक एवं मनोवैज्ञानिक

https://kharinews.com/program-organized-on-mental-health-and-constitutional-rights-of-children/बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्...
17/04/2026

https://kharinews.com/program-organized-on-mental-health-and-constitutional-rights-of-children/
बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के मानसिक स्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकारों पर कार्यक्रम आयोजित

सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका स्मिता कुमारी द्वारा आंगनबाड़ी क्रमांक 1146, गोविंदपुरा में “बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के मानसिक समस्या और उनके संवैधानिक अधिकार” विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया





भोपाल : 15 अप्रैल/ सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका स्मिता कुमारी द्वारा आंगनबाड़ी क्रमांक 1146, गोविंदपुरा मे....

अम्बेडकर हम सबके, हम सब अम्बेडकर केबाबा साहेब अम्बेडकर कभी सोचे नहीं होंगे कि कुछ लोग उनके नाम पर एक अलग ब्राह्मणवाद फैल...
15/04/2026

अम्बेडकर हम सबके, हम सब अम्बेडकर के

बाबा साहेब अम्बेडकर कभी सोचे नहीं होंगे कि कुछ लोग उनके नाम पर एक अलग ब्राह्मणवाद फैला देंगे। ब्राह्मणवाद का सम्बन्ध किसी विशेष जाति से नहीं बल्कि एक खास विचारधारा से है जो निराधार श्रेष्टता के बदौलत वंचित समुदाय पर शासन करना सीखता है। अब ठीक वैसे ही कुछ लोग अम्बेडकरवाद के नाम पर यह जताना शुरू कर दिए हैं कि अम्बेडकरवाद से सम्बंधित व्यक्ति दलित समुदाय से होगा और अम्बेडकर के नाम पर वे पूजा-पाठ करने के साथ एक विशेष जाति के खिलाफ नफरत फैसला भी शुरू कर दिए हैं।

वास्तव में अम्बेडकर किसी जाति विशेष से खुद को मुक्त कर अपने आप को सबके लिए बना गए। अम्बेडकर से बेहतर भला इस बात को कौन समझेगा कि ब्राह्मणवाद का जहर किस तरह उनके जीवन के उत्थान में रोड़ा रहा और उसी के साथ कुछ सवर्ण समाज के लोगों ने ही उनकी योग्यता पर भरोसा जता उनको शिक्षा दिलाने से कानून मंत्री बनने तक में साथ खड़े रहे, सहयोग किए। बौद्ध धर्म को अम्बेडकर ने ब्राह्मणवाद और अंधविश्वास को तोड़ने तथा सभी को समान अधिकार दिलाने के लिए अपनाया. मगर इसके लिए वह जिस धर्म को ग्रहण किए उस धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध भी राजकुमार सिद्धार्थ थे। यह तथ्य इस बात का प्रणाम है कि अम्बेडकर ने आडम्बर का त्याग किया लेकिन जाति के आधार पर किसी मनुष्य का नहीं। वर्तमान में कई बार अम्बेडकर पर लिखते या बौद्ध धर्म पर बात करते यह महसूस हुआ कि लोगों ने अम्बेडकर की तरह पढ़ना तो दूर अम्बेडकर को भी नहीं पढ़ा और यह मान बैठे हैं कि जाति के आधार पर अम्बेडकर केवल दलित जाति के प्रतिनिधि थें या बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित ही होते हैं।

हाल ही में किसी ने मुझसे पूछा क्या आप अम्बेडकर को मानती है? क्या अम्बेडकरवादी हैं, यानि दलित हैं? मैंने कहा अंबेडकर को मानने वाले सभी अम्बेडकरवादी नहीं होते हैं। मैं बाबा साहेब अंबेडकर को उनके कार्य के लिए दिल से सम्मान करती हूँ। रही बात शूद्र या दलित या वंचित समुदाय से होने की, तो महिला होने से बड़ा वंचित समुदाय का कोई और नहीं होता, फिर चाहे वह महिला किसी भी जाति की हो। हाँ यह सच है कि जाति के आधार पर शोषण और बढ़ जाती है। आगे बात होते हुए बौद्ध धर्म पर चर्चा हुई तब उन्होंने फिर से पूछा बौद्ध धर्म तो दलित जाति अपनाते हैं। मैंने कहा मैं जहाँ तक पढ़ी हूँ महात्मा बुद्ध "बुद्ध" बनने से पहले राजकुमार सिद्धार्थ थे यानि सवर्ण जाति के। उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना जातिगत भेद यानि ब्राह्मणवाद को खत्म करने के लिए किया था ना कि किसी विशेष जाति के लिए। तो इस अर्थ में बौद्ध धर्म के समर्थक अम्बेडकर भी हो सकते हैं और सम्राट अशोक भी या किसी भी जाति, लिंग के लोग हो सकते हैं। बुद्ध को मानने या अंबेडकर को मानने के लिए एक विशेष जाति में होना जरूरी नहीं है।

अम्बेडकर ने कभी भी एक विशेष जाति के लिए कोई उत्थान का कार्य नहीं किया बल्कि एक विशेष विचारधारा के लोगों के शोषण से सबको मुक्त करने का काम किया। 1920 में मूकनायक का प्रकाशन दलितों के आवाज के रूप में भले ही किया गया हो मगर उसका उद्देश्य यह भेदभाव बरकरार रखने के लिए नहीं बल्कि भेदभाव मिटाकर समानता स्थापित करने के लिए था। 1927 में महाड़ सत्याग्रह इसलिए नहीं किया गया कि तालाब के पानी पर अधिकार किसी एक जाति के लोग से छीनकर दूसरे को दे दिया जाए बल्कि यह सत्याग्रह इसलिए किया गया था ताकि पानी पर सबका समान अधिकार हो। 1930 में कालाराम मंदिर में प्रवेश को लेकर सत्याग्रह करने वाले अंबेडकर 1935 में बौद्ध धर्म इसलिए अपना लेते हैं ताकि बौद्ध धर्म में कोई ब्राह्मणवाद जैसा आडंबर नहीं था और यह सभी मनुष्य को बराबरी का अधिकार देता है, बौद्ध धर्म में किसी भी मनुष्य से जाति और लिंग के आधार पर भेद नहीं किया जाता है, यह हिंसा, अंधविश्वास और अवतार जैसे अवधारणाओं के खिलाफ है। 1932 में पुन एक्ट या 1936 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना इसलिए किया गया ताकि दलित, श्रमिक और गरीब समुदाय को बराबरी तक पहुंचा जा सके। इसका अर्थ है कि वह किसी एक समुदाय की हित के लिए काम नहीं कर रहे थे बल्कि वह सभी को बराबरी तक पहुंचाने के लिए काम कर रहे थे। 1947 से 1951 तक कानून मंत्री के रूप में उन्होंने महिलाओं के हित के लिए हिंदू कोड बिल पेश किया जिसमें महिलाओं को संपत्ति का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, विवाह और तलाक के अधिकार के बारे में जिक्र किया गया। मगर यह केवल दलित महिलाओं के लिए नहीं किया गया था बल्कि यह सभी समुदाय की महिलाओं को बराबरी तक पहुंचाने के लिए किया गया कार्य था। अक्टूबर 1956 में अंबेडकर ने नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म को मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, आडंबर और छुआछूत के खिलाफ अपनाया था। लेकिन उन्हें मानने वाले आज उनको एक जाति विशेष के रूप में देखना शुरू कर रहे हैं। अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद द्वारा खींची गई शोषण की सीमा रेखा को तोड़कर एक लंबी लकीर खींचकर वंचित समुदाय को दिया और अपनी शिक्षा के आधार पर यह स्थापित किया कि शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल किसी विशेष जाति को नहीं है बल्कि शिक्षा प्राप्ति योग्यता के अनुसार हर इंसान का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने शिक्षा प्राप्त करके समाज में समानता स्थापित करने के लिए कार्य किया और देश को एक ऐसा संविधान दिया जिसमें देश के सभी नागरिकों को सामान के अधिकार देने की जिक्र की गई। आज उनके जितना शिक्षित व्यक्ति देश-विदेश में मिलना मुश्किल है। उनके पथ पर चलने की बजाय कुछ लोग उनकी मूर्ति को पूजा पाठ करके उनके द्वारा विरोध की गई विचारधारा को ही दूसरे रूप में स्थापित कर रहे हैं। अंबेडकर को मानने का अर्थ यह नहीं कि उनकी पूजा की जाए, यह भी नहीं कि अंबेडकर को एक विशेष जाति में बांधकर देखा जाए, बल्कि अंबेडकर ने जिस जाति बंधन से खुद को मुक्त किया उन्हें उसी तरह देखा जाए। उनके तरह शिक्षित होने का कार्य और पूरे समाज के उत्थान करने के लिए कार्य किया जाना चाहिए तब ही यह कहा जा सकता है कि हम अंबेडकर के वंशज है। अंबेडकर ने सबको अपनाया और सबके लिए काम किया। ब्राह्मणवाद जब किसी मंदिर और देवता पर अपना एकल अधिकार बताता है तो एक दूसरे समुदाय को उससे अपना कहने से वंचित करता है, अम्बेडकर इसके ही तो खिलाफ गए फिर अम्बेडकर को किसी एक के विशेषधिकार से देखना भी तो ब्राह्मणवाद है। जब अम्बेडकर ने खुद इस विचार को बहिष्कार करके खुद को सबके लिए समर्पित किया तो अंबेडकर को किसी एक जाति के नजर से देखना वैसा ही होगा जैसे ब्राह्मणवाद का विचारधारा। अंबेडकर सभी के थे, अम्बेडकर सभी के हैं और हम सब अंबेडकर के हैं इस बात को आत्मसात करके ही सब अम्बेडकर को अपना कह सकते हैं।
Subah Savere - Bhopal - 15 Apr 2026 - Page 5 https://share.google/EKAC27UybvpdgGT7v






बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के मानसिक समस्या और उनके संवैधानिक अधिकार पर कार्यक्रम का आयोजन आज दिनांक 15 अप्रैल ...
15/04/2026

बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के मानसिक समस्या और उनके संवैधानिक अधिकार पर कार्यक्रम का आयोजन

आज दिनांक 15 अप्रैल को सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका स्मिता कुमारी द्वारा आंगनबाड़ी क्रमांक 1146, गोविंदपुरा में "बाल, महिला एवं एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के मानसिक समस्या और उनके संवैधानिक अधिकार " विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के उन कार्यों को याद करते हुए किया गया जिसके तहत उन्होंने संविधान को बनाया। आज इसी संविधान के कारण देश में बाल एवं महिलाओं के हित में कानून बन रहे हैं, जो उन्हें समाज में समानता का अधिकार दिला रहे हैं। व्याख्यान में स्मिता ने बताया कि मानसिक रूप से समस्या ग्रस्त महिला या दिव्यांग बच्चों या एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) के लिए समानता की लड़ाई बहुत कठिन है। ऐसे में शोषण से लड़ते हुए यह वर्ग हमेशा न्याय के लिए संविधान की तरफ ही देखता है, क्योंकि सदियों से हो रही मानसिक समस्याओं या दिव्यांगता या लिंग आधारित भेदभाव को चुनौती केवल संवैधानिक तौर पर ही दिया जा सकता है। समाज में समानता के साथ जीना हम सबका अधिकार है मगर इस तरह के लोगों का शोषण पहले अपने ही लोग जागरूकता के अभाव में करते हैं, इसलिए मैं इस तरह के अलग-अलग विषयों पर हर महीने एक निःशुल्क कार्यक्रम का आयोजन कर रही हूँ ताकि समुदाय में लोग समझ सकें कि उनका अधिकार क्या है और परिवार भी जागरूक होकर उनका साथ दे सकें। इस तरह के लोगों की लड़ाई सबसे ज्यादा तब कठिन होती है जब अपना परिवार ही उनको नहीं समझता। कई लोग मानसिक दिव्यांग बच्चे, बालिकाओं और LGBTQ को सबसे पहले जीने का ही अधिकार नहीं देना चाहते हैं, उसके बाद पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के आधार पर शोषण किया जाता है और उससे भी ज्यादा उनके सम्पति में कोई अधिकार देना नहीं समझता, रोजगार से वंचित रखा जाता है या कार्य स्थल पर भी कई बार भावनात्मक, मानसिक एवं शारीरिक रूप से शोषण किया जाता है। ऐसे में संविधान ही एक रास्ता है जो असमानता और शोषण से लड़ने में मदद करता है। इसलिए यह कार्यक्रम किया गया ताकि अभी तक जो कानून बाल एवं महिला हित में बने हैं उनके प्रति लोग जागरूक हो सके और मानसिक समस्या ग्रस्त या दिव्यांगजन या LGBTQ के लोगों के साथ समानता का व्यवहार अपनाएं।

कार्यक्रम के अंत मे डिप्रेशन और आत्महत्या की रोकथाम पर भी जानकारी दी गई। इस कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य पर कई सवाल-जवाब हुए, इस कार्यक्रम में आंगनवाड़ी की सहायिका निशा और लगभग 30 महिलाएँ एवं बच्चे शामिल हुए।



" महिलाओं की पहचान एक संकट और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव" विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आज दिनांक 30 मार्च को सत्यमेव ...
30/03/2026

" महिलाओं की पहचान एक संकट और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव" विषय पर जागरूकता कार्यक्रम

आज दिनांक 30 मार्च को सत्यमेव मानसिक विकास केंद्र की निदेशिका स्मिता कुमारी द्वारा आंगनबाड़ी क्रमांक 710, गोविंदपुरा में "महिलाओं की पहचान एक संकट और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव" विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। साथ ही इसलिए बार बोर्ड की परीक्षा में शामिल होने वाले बच्चे किस प्रकार अपना कैरियर सही दिशा में ले जाए इसके लिए भी मार्गदर्शन दिया गया। लड़कियों में आर्थिक संबलता की जरूरत, घरेलू हिंसा की रोकथाम, महिलाओं एवं बच्चों के संवैधानिक अधिकार पर विस्तार से चर्चा किया गया। स्मिता पेशे से मनोवैज्ञानिक होने के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों के अधिकार पर लगातार जागरूकता कार्यक्रम करती हैं। उन्होंने बताया कि कैसे आर्थिक रूप से कमजोर या निर्भर लड़की किसी ना किसी रूप में मानसिक या शारीरिक शोषण की शिकार होती रहती है और इसे उसकी परवरिश में ऐसे गढ़ा गया है कि उस शोषण को अपनी नियति समझ कभी उसके निराकरण होने की आस भी नहीं कर पाती। अगर लड़कियां आर्थिक रूप से संबल हो जाए तो वह अपने ऊपर हो रही हर हिंसा का विरोध और निराकरण कर सकती हैं। लड़कियों को पैदा होने से अधिकार से लेकर जीने का अधिकार भी पितृसत्तात्मक समाज के हाथ में है, ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर होता है। इससे आने वाली पीढ़ियों के मानसिकता पर भी गहरा असर हो रहा है। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने बताया कि वह कभी किसी ऐसे कार्यक्रम में शामिल नहीं हुई हैं जहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा होती है यह उनके लिए पहली कार्यक्रम है। कार्यक्रम के अंत में स्क्रीनिंग में एक महिला डिप्रेशन और आत्महत्या की विचार की समस्या से गुजर रही थी, उसे अलग से काउंसलिंग दिया गया और चिकित्सा से जोड़ा गया। इस कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य पर कई सवाल-जवाब हुए, इस कार्यक्रम में आंगनवाड़ी की कार्यकर्त्ता मधु सोनी,सहायिका मंजू और लगभग 20 महिलाएँ शामिल हुई।

सादर आभार
स्मिता कुमारी




वक्त हो तो जरूर पढ़िएगा...​28 फरवरी को रायसेन के शासकीय कन्या महाविद्यालय में महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से आयोजित क...
07/03/2026

वक्त हो तो जरूर पढ़िएगा...

​28 फरवरी को रायसेन के शासकीय कन्या महाविद्यालय में महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में, मैं 'मानसिक स्वास्थ्य' विषय पर वक्ता एवं मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई। मुझे दो सत्र लेने थे—पहला, मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्महत्या से बचाव पर और दूसरा, करियर काउंसलिंग पर।

​विषय इतना गंभीर था और समय का अभाव इतना अधिक कि मुझे दोनों सत्र बिना किसी ब्रेक के एक साथ ही लेने पड़े। सत्र के दौरान छात्राओं और शिक्षकों के कई सवाल भी आए और सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था। सत्र समाप्त होने पर, यह सोचकर कि कुछ छूट न जाए, मैंने छात्राओं से सवाल पूछने को कहा। साथ ही, महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत मित्र दिनेश मालवीय जी से मैंने रिकॉर्डिंग करने के लिए कहा, ताकि यदि समय की कमी के कारण किसी के सवाल रह जाएं, तो मैं बाद में उन्हें फोन पर उत्तर दे सकूं (क्योंकि हमें तुरंत एक अन्य शासकीय कार्यक्रम में पहुँचना था)।
​तभी एक लड़की सवाल पूछने के लिए खड़ी हुई। जैसे ही दिनेश जी ने रिकॉर्डिंग ऑन की, वह अभी एक ही लाईन बोल पाई थी कि फूट-फूटकर रोने लगी। हम कैमरा बंद कर उसे संभालने पहुँचे ही थे कि दूसरी ओर से एक और चीख सुनाई दी, और देखते ही देखते सभी लड़कियां रोने लगीं। वे सिर्फ सिसकियाँ नहीं थीं, बल्कि कई लड़कियों की चीखें थीं। हम सब स्तब्ध थे। अपने 14 वर्षों से अधिक के कार्य अनुभव में मैंने पहली बार ऐसा देखा था कि एक-दो नहीं, बल्कि सभी प्रतिभागी इतनी व्याकुलता से रो रही थीं। ऐसा लगा मानो उन सबके मन में बहुत कुछ दबा हो जिसे वे कहना चाहती थीं, लेकिन उन्हें सुनने और समझने वाला कोई नहीं था।

​वहाँ एक छात्रा थी जो टॉपर थी, परिवार से उसे बढ़िया स्पोर्ट भी था। लोग उससे कह रहे थे, 'तुम तो हर चीज़ में इतनी बेहतर हो, तुम्हें घबराने की क्या ज़रूरत?' मैंने तुरंत टोकते हुए कहा—"टॉपर होना, हंसमुख होना, खुले विचारों का होना या दूसरों को संभालने वाला होना, ये सब भी एक इंसान ही हैं। ऐसे व्यक्ति को भी तनाव और डिप्रेशन हो सकता है। इसलिए उसे 'मजबूत' या 'महान' बताकर उसकी भावनाओं को दबाना बंद कीजिए। महानता और मजबूती के बोझ तले किसी को इतना मत दबाइये कि वह खुद को ही भूल जाए, या इतना घुट जाए कि बिना कुछ साझा किए हमेशा के लिए चला जाए।"

​यह उस सत्र की उपलब्धि थी कि सभी छात्राएं बेझिझक अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही थीं। मगर यह सोचने वाली बात है कि क्या आज के दौर में हम सच में अपनों के साथ सब कुछ साझा कर पा रहे हैं? क्या कोई वास्तव में किसी को समझ रहा है, या हम उतना ही देख रहे हैं जो जितना दिखाया जा रहा है?

​किसी को जज करना बंद कीजिए कि 'आप उसे बेहतर जानते हैं'। जब कोई तनाव या नकारात्मकता की बात करे, तो उसे अनदेखा न करें। मोबाइल की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर असलियत में लोगों के करीब जाइए। साथ बैठिए, एक-दूसरे को जानिए और समझने की कोशिश कीजिए।




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