07/03/2026
वक्त हो तो जरूर पढ़िएगा...
28 फरवरी को रायसेन के शासकीय कन्या महाविद्यालय में महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में, मैं 'मानसिक स्वास्थ्य' विषय पर वक्ता एवं मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई। मुझे दो सत्र लेने थे—पहला, मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्महत्या से बचाव पर और दूसरा, करियर काउंसलिंग पर।
विषय इतना गंभीर था और समय का अभाव इतना अधिक कि मुझे दोनों सत्र बिना किसी ब्रेक के एक साथ ही लेने पड़े। सत्र के दौरान छात्राओं और शिक्षकों के कई सवाल भी आए और सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था। सत्र समाप्त होने पर, यह सोचकर कि कुछ छूट न जाए, मैंने छात्राओं से सवाल पूछने को कहा। साथ ही, महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत मित्र दिनेश मालवीय जी से मैंने रिकॉर्डिंग करने के लिए कहा, ताकि यदि समय की कमी के कारण किसी के सवाल रह जाएं, तो मैं बाद में उन्हें फोन पर उत्तर दे सकूं (क्योंकि हमें तुरंत एक अन्य शासकीय कार्यक्रम में पहुँचना था)।
तभी एक लड़की सवाल पूछने के लिए खड़ी हुई। जैसे ही दिनेश जी ने रिकॉर्डिंग ऑन की, वह अभी एक ही लाईन बोल पाई थी कि फूट-फूटकर रोने लगी। हम कैमरा बंद कर उसे संभालने पहुँचे ही थे कि दूसरी ओर से एक और चीख सुनाई दी, और देखते ही देखते सभी लड़कियां रोने लगीं। वे सिर्फ सिसकियाँ नहीं थीं, बल्कि कई लड़कियों की चीखें थीं। हम सब स्तब्ध थे। अपने 14 वर्षों से अधिक के कार्य अनुभव में मैंने पहली बार ऐसा देखा था कि एक-दो नहीं, बल्कि सभी प्रतिभागी इतनी व्याकुलता से रो रही थीं। ऐसा लगा मानो उन सबके मन में बहुत कुछ दबा हो जिसे वे कहना चाहती थीं, लेकिन उन्हें सुनने और समझने वाला कोई नहीं था।
वहाँ एक छात्रा थी जो टॉपर थी, परिवार से उसे बढ़िया स्पोर्ट भी था। लोग उससे कह रहे थे, 'तुम तो हर चीज़ में इतनी बेहतर हो, तुम्हें घबराने की क्या ज़रूरत?' मैंने तुरंत टोकते हुए कहा—"टॉपर होना, हंसमुख होना, खुले विचारों का होना या दूसरों को संभालने वाला होना, ये सब भी एक इंसान ही हैं। ऐसे व्यक्ति को भी तनाव और डिप्रेशन हो सकता है। इसलिए उसे 'मजबूत' या 'महान' बताकर उसकी भावनाओं को दबाना बंद कीजिए। महानता और मजबूती के बोझ तले किसी को इतना मत दबाइये कि वह खुद को ही भूल जाए, या इतना घुट जाए कि बिना कुछ साझा किए हमेशा के लिए चला जाए।"
यह उस सत्र की उपलब्धि थी कि सभी छात्राएं बेझिझक अपनी भावनाएं व्यक्त कर रही थीं। मगर यह सोचने वाली बात है कि क्या आज के दौर में हम सच में अपनों के साथ सब कुछ साझा कर पा रहे हैं? क्या कोई वास्तव में किसी को समझ रहा है, या हम उतना ही देख रहे हैं जो जितना दिखाया जा रहा है?
किसी को जज करना बंद कीजिए कि 'आप उसे बेहतर जानते हैं'। जब कोई तनाव या नकारात्मकता की बात करे, तो उसे अनदेखा न करें। मोबाइल की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर असलियत में लोगों के करीब जाइए। साथ बैठिए, एक-दूसरे को जानिए और समझने की कोशिश कीजिए।