हमारा Dr sunil Tetarwal bishnoi

हमारा Dr sunil Tetarwal bishnoi Founder Desert80 foundation &team aagaz foundation &lakshya institute Bikaner
सेवा ही परम धर्म हैं
(1)

19/08/2026

पैदा गरीब परिवार में हुआ तो क्या हुआ , AIIMS में डॉक्टर किताबें पढ़कर ही बनते हैं ,कोलायत को मिला अपना पहला AIIMS डॉक्टर 🫡

““समय कभी वापस नहीं आता”… लेकिन अगर हिम्मत बाकी हो, तो इंसान खुद वापस आ सकता है — अभिषेक की कहानीमैं किसी बच्चे से यह नह...
16/08/2026

““समय कभी वापस नहीं आता”… लेकिन अगर हिम्मत बाकी हो, तो इंसान खुद वापस आ सकता है — अभिषेक की कहानी

मैं किसी बच्चे से यह नहीं कहूँगा कि वह अभिषेक जैसा बने।
क्योंकि अभिषेक की कहानी में उसका भटकाव किसी के लिए आदर्श नहीं है।
लेकिन मैं हर उस बच्चे से जरूर कहूँगा, जिसने कभी पढ़ाई छोड़ी, समय बर्बाद किया, अपने लक्ष्य से दूर चला गया और अब बैठकर सोचता है—
“अब बहुत देर हो चुकी है… जो समय निकल गया, वो वापस थोड़ी आएगा… अब मुझसे पढ़ाई नहीं होगी…”
एक बार अभिषेक की कहानी जरूर पढ़ लेना।
क्योंकि कभी-कभी जिंदगी में देर हो जाती है,लेकिन वापसी के लिए हमेशा देर नहीं होती !
मानकासर गाँव का वह लड़का, जिसके अंदर प्रतिभा बहुत थी… बस दिशा नहीं थी
मानकासर गाँव के किसान परिवार में जन्मा अभिषेक डेलू पढ़ाई में शुरू से ही बहुत तेज था।
दिमाग इतना तेज कि उसे हमेशा लगता रहा—
“अभी नहीं पढ़ता तो क्या हुआ, आखिर में पढ़ लूँगा… मैं कर लूँगा।”
और सच कहूँ तो वह कई बार कर भी लेता था।कभी टेस्ट में बहुत अच्छे नंबर,
तो कभी ऐसे नंबर कि देखकर लगे—
“इस लड़के का चयन होगा भी या नहीं?”
कभी क्लास में,तो कभी गायब कभी टेस्ट में शानदार प्रदर्शन,तो कभी टेस्ट देने तक नहीं पहुँचना ,पढ़ाई के साथ-साथ उसने अपनी एक दूसरी दुनिया भी बना ली थी।
और यहीं से उसकी सबसे बड़ी समस्या शुरू हुई।

प्रतिभा थी, लेकिन अनुशासन नहीं था

अभिषेक Desert-80 परीक्षा में 2022 में चयनित हुआ था।Desert 80 फाउंडेशन ने 4 साल तक अभिषेक को पढ़ाया ,वह लगातार अच्छे अंक लाने की क्षमता रखता था।लेकिन नियमित पढ़ाई नहीं।न क्लास की नियमितता,न टेस्ट की नियमितता,न समय का हिसाब।
उसे लगता था—
“अंत में मेहनत करूँगा और सब कवर कर लूँगा।”

लेकिन जिंदगी में सबसे खतरनाक भ्रम यही होता है—“अभी समय बहुत है।”
समय निकलता रहता है।और एक दिन पता चलता है कि जिस “आखिरी समय” का इंतजार कर रहे थे,वह समय आ चुका है।

NEET 2025 — सिर्फ 15 नंबर की दूरी… लेकिन उसके पीछे पूरी कहानी थी

अभिषेक में काबिलियत की कोई कमी नहीं थी।वह पहला प्रयास ही निकाल सकता था।लेकिन पढ़ाई में अनुशासन की कमी, दोस्तों के साथ इधर-उधर का समय, क्लास से दूरी और अपनी दूसरी दुनिया में उलझे रहने के कारण NEET 2025 में वह चयन से सिर्फ 15 नंबर दूर रह गया।

सोचिए—

सिर्फ 15 नंबर।मतलब लगभग 3 सवाल।
एक ऐसा बच्चा जिसकी क्षमता 720/720 तक जाने की थी,वह सिर्फ तीन सवालों की दूरी पर रह गया।
यह कहानी उसकी काबिलियत की कमी की नहीं थी ,यह कहानी उसकी आदतों की थी।

और फिर बुरे दोस्तों ने उसे उस जगह पहुँचा दिया, जहाँ से निकलना आसान नहीं था

बाद में बीकानेर में अभिषेक कुछ ऐसे लड़कों के संपर्क में आया, जिन्होंने उसे जुए की आदत लगा दी।धीरे-धीरे वह इस जाल में फँसता चला गया।
सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि वह किसी को बता भी नहीं पा रहा था।
डरता था।उसे डर था कि अगर सबको पता चल गया तो क्या होगा?
और यही डर उसे और अंदर ले जा रहा था।जुआ, गेमिंग और गलत संगत केवल पैसा नहीं बिगाड़ते।वे दिमाग पर कब्जा कर लेते हैं।पढ़ने बैठो तो ध्यान वहाँ नहीं रहता।लाइब्रेरी जाओ तो मन पढ़ाई में नहीं लगता।और धीरे-धीरे इंसान अपनी ही जिंदगी से झूठ बोलने लगता है।
अभिषेक भी झूठ बोलने लगा।
लेकिन एक बात ध्यान देने वाली थी—
वह सिर्फ इस एक चीज को छिपाने के लिए झूठ बोल रहा था।

हम सबको लग रहा था कि यह लड़का पढ़ाई को लेकर गंभीर नहीं है…

मैनेजमेंट और शिक्षकों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अभिषेक पढ़ाई में इतना अनियमित क्यों है।उसकी क्षमता देखकर लगता था कि यह लड़का बहुत आगे जा सकता है।लेकिन उसका व्यवहार कुछ और कहानी बता रहा था।
एक समय ऐसा आया जब उसके पिता ओम जी को बुलाया गया।
किसान आदमी है,कुछ समय तक बेटे के साथ रहे।सुबह जगाना,क्लास भेजना,टेस्ट के लिए भेजना,समय का ध्यान रखना—
और अभिषेक ठीक चलने लगा।
लेकिन पिता कितने दिन बेटे के साथ रह सकते थे?घर था।खेती थी।सामाजिक जिम्मेदारियाँ थीं।काम था।
उन्हें वापस जाना ही था।
और जैसे ही पिता वापस गए—
अभिषेक फिर उसी रास्ते पर लौटने लगा।

असल समस्या अब भी हमारी नजरों से छिपी हुई थी ,उधर जुए में उसका कर्ज भी हो चुका था।जिन लोगों से वह जुड़ गया था, उनसे पूरी तरह पीछा छुड़ाना उसके लिए आसान नहीं था।वे उसे पढ़ने बैठने के बाद भी बुलाने आ जाते।वह मना नहीं कर पाता।एक तरफ पढ़ाई छूट रही थी।
दूसरी तरफ कर्ज था अधिक नहीं था पर बच्चे के लिए वो खूब होता है ,और तीसरी तरफ डर।वह किसी को बता नहीं पा रहा था कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है।यही वजह थी कि ऊपर से हमें एक लापरवाह बच्चा दिखाई दे रहा था, जबकि अंदर से वह एक ऐसे जाल में फँसा हुआ था जिसके बारे में किसी को पता ही नहीं था।

NEET 2026 से सिर्फ दो महीने पहले… एक बातचीत ने पूरी कहानी बदल दी

एक दिन मैंने उसे बुलाया।

डाँटने के लिए नहीं।

प्यार से।

कंधे पर हाथ रखा और पूछा— अभिषेक, आखिर बात क्या है?”
पहले वह चुप रहा।डरा हुआ था।
फिर धीरे-धीरे उसने अपनी पूरी बात बता दी।ये बात मैंने किसी को नहीं बतायी
जब मुझे पूरी बात पता चली तो मैं उसके कमरे तक गया।वह वहाँ नहीं था।
फिर मैनेजमेंट स्टाफ से कहा कि अब इसकी दिनचर्या को बारीकी से देखा जाए।तब असली तस्वीर सामने आई।

लाइब्रेरी जाता था… लेकिन पढ़ने नहीं पहुँच पाता थाअभिषेक जब लाइब्रेरी के लिए निकलता, तो वही लड़के लाइब्रेरी के बाहर उसे पकड़ लेते।उसे अपने साथ ले जाते।वह मजबूरी में उनके साथ चला जाता।अब बात केवल आदत की नहीं थी।
वह उस चक्र से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन अकेले निकल नहीं पा रहा था।फिर उसे बुलाया गया।प्यार से समझाया गया।मैंने उससे सिर्फ एक बात कही—“तू ईमानदारी से पढ़ाई करेगा तो उन लड़कों से तेरा पीछा छुड़ाने की जिम्मेदारी मेरी।”उसने कहा—
“सर, मैं डर की वजह से किसी को बता नहीं पाया। अगर आप ये कर दें तो मेरी बहुत बड़ी मदद हो जाएगी।”
उसकी जो रकम उन लोगों पर बाकी थी, वह चुकाई गई ,और अभिषेक को उस जाल से बाहर निकाला गया।
अब पहली बार उसके सामने सिर्फ एक रास्ता था—पढ़ाई।
और फिर शुरू हुआ असली अभिषेक…
अब वह रोज लाइब्रेरी आने लगा।
रोज एंट्री करता रोज पढ़ाई।
रोज टेस्ट।नियमित दिनचर्या।
कोई बहाना नहीं।कोई छिपाव नहीं।
कोई दूसरी दुनिया नहीं।बस पढ़ाई।
और फिर वही बच्चा, जिसे कुछ समय पहले तक हम अनियमित और लापरवाह समझ रहे थे—
दो महीने में बदल गया।
NEET जैसी परीक्षा, जिसकी तैयारी में बच्चे सालों लगा देते हैं, उसमें उसने सिर्फ दो महीने की ईमानदार और नियमित मेहनत से ऐसी वापसी की, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

NEET 2026 —परिणाम आया अभिषेक डेलू — 660 अंक।और फिर रीनिट में भी—610 अंक।
चयन हुआ।वह भी अच्छी रैंक के साथ।
जिस बच्चे को लेकर कुछ समय पहले तक सवाल था कि—“इसका होगा भी या नहीं?”वही बच्चा अब अपनी मंजिल के सामने खड़ा था।
कहानी का सबसे बड़ा सबक 660 नंबर नहीं हैंअभिषेक की कहानी को सिर्फ इसलिए मत पढ़िए कि उसने NEET में 660 नंबर हासिल किए।
इस कहानी की असली ताकत 660 नंबरों से कहीं ज्यादा बड़ी है।क्योंकि अभिषेक ने सिर्फ एक परीक्षा नहीं निकाली।उसने अपने भटकाव से वापसी की।उसने अपनी गलती स्वीकार की।मदद माँगी।
गलत संगत से बाहर निकला।और फिर अपने अंदर की उस प्रतिभा को, जिसे वह वर्षों से बर्बाद कर रहा था, सही दिशा में लगाया,कभी-कभी कारण बहुत छोटा होता है… लेकिन उसे ढूँढना बहुत मुश्किल,किसी बच्चे के नंबर गिर रहे हों तो हम तुरंत कह देते हैं—“पढ़ता नहीं है।”क्लास में नहीं आता तो—“सीरियस नहीं है।”टेस्ट खराब हो तो—“इससे नहीं होगा।”लेकिन हर बार समस्या इतनी सीधी नहीं होती।कभी कारण दोस्त होते हैं।कभी मोबाइल।कभी गेमिंग।कभी जुआ।कभी डर।
कभी कोई ऐसा कर्ज या परेशानी जिसे बच्चा किसी को बता नहीं पा रहा।और कभी-कभी बच्चा खुद अपनी परेशानी से बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ पाता।
इसलिए किसी बच्चे को सुधारने से पहले उसकी समस्या को समझना जरूरी है
और अब यह कहानी उन बच्चों के लिए है जो सोचते हैं— “अब बहुत देर हो गई।”
जिस बच्चे ने पढ़ाई छोड़ दी है…
जिसने कुछ साल बर्बाद कर दिए हैं…
जिसके नंबर कभी अच्छे आए, कभी बहुत खराब…जिसे अब लगता है कि दूसरे बच्चे उससे बहुत आगे निकल चुके हैं…
जो रात में बैठकर सोचता है—“काश मैंने पहले पढ़ लिया होता…”“काश मैंने समय बर्बाद नहीं किया होता…”
“काश मैं नियमित रहता…”
और फिर खुद से कहता है—
“अब क्या फायदा? अब तो बहुत देर हो चुकी है।”उन बच्चों से मैं सिर्फ इतना कहूँगा—अभिषेक की कहानी याद रखना।
उसने अपना खोया हुआ समय वापस नहीं पाया ,उसने बस बचे हुए समय को ईमानदारी से इस्तेमाल किया।और वही उसके लिए काफी था।
**समय वापस नहीं आता।

लेकिन इंसान वापस आ सकता है।**
बीते हुए दो साल वापस नहीं आएँगे।
बर्बाद हुई कक्षाएँ वापस नहीं आएँगी।
छूटे हुए टेस्ट वापस नहीं आएँगे।
NEET का पहला प्रयास वापस नहीं आएगा।लेकिन अगर आज भी मन में एक आवाज है—“मुझे वापस पढ़ना है।”तो उस आवाज को दबाना मत।हो सकता है तुम देर से शुरू करो।हो सकता है तुम्हें दूसरों से ज्यादा मेहनत करनी पड़े।
हो सकता है तुम्हें अपनी कई पुरानी आदतें छोड़नी पड़ें।
लेकिन यह मत मान लेना कि—
“अब कुछ नहीं हो सकता।”
क्योंकि अभिषेक की कहानी यही बताती है—काबिलियत अगर बची हुई है और इरादा ईमानदार है, तो वापसी की कोई तय उम्र नहीं होती।और शायद सबसे जरूरी बात—बच्चे को उसकी गलती से पहचान मत दो।क्योंकि कभी-कभी एक बच्चा गलत रास्ते पर इसलिए नहीं होता कि उसमें क्षमता नहीं है…
बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसे सही समय पर उसकी असली समस्या समझने वाला कोई नहीं मिला।अभिषेक को भी सिर्फ डाँट की जरूरत नहीं थी।
उसे समझे जाने की जरूरत थी।
उसे रास्ता दिखाने की जरूरत थी।
और जब रास्ता मिला—
उसने चलना शुरू किया।
फिर परिणाम ने खुद बता दिया कि उस बच्चे के अंदर कितना दम था।
**यह अभिषेक की NEET की कहानी नहीं है।यह एक भटके हुए बच्चे की वापसी की कहानी है।**
और हर उस बच्चे के नाम है जो आज भी मन ही मन कहता है—
काश मैं फिर से शुरू कर पाता…”
हाँ, कर सकते हो।
आज से रिस्टार्ट !

16/08/2026
उदट गांव का पहला डॉक्टर: किसान पुत्र रामचंद्र की कहानीफलोदी के ओम बन्ना की धरती, उदट गांव से पहली बार एक बेटा डॉक्टर बनन...
28/07/2026

उदट गांव का पहला डॉक्टर: किसान पुत्र रामचंद्र की कहानी
फलोदी के ओम बन्ना की धरती, उदट गांव से पहली बार एक बेटा डॉक्टर बनने जा रहा है। यह केवल रामचंद्र बिश्नोई की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों ग्रामीण परिवारों के सपनों की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों के लिए बड़े सपने देखते हैं।डॉ सुनील टेटरवाल बज्जू आपका धन्यवाद,डॉ साहब के ऑफिसियल आईडी से कॉपी पेस्ट

रामचंद्र के पिता श्री मंगलाराम जी जालुवाला पाकिस्तान बॉर्डर के पास लगभग 25 बीघा भूमि पर कास्तकारी हिस्से से खेती-किसानी का कार्य करते हैं। ग्रामीण परिवेश में अधिकांश किसानों का सपना यही होता है कि उनका बेटा सरकारी विद्यालय में पढ़-लिख जाए, फिर किसी अध्यापक की नौकरी लग जाए, या फिर खेती-बाड़ी संभाल ले। क्योंकि मेडिकल जैसी पढ़ाई का खर्च उठाना साधारण किसान परिवार के लिए लगभग असंभव होता है। जिस परिवार की छह महीने की फसल की आय से घर-परिवार, सामाजिक दायित्व, शादी-विवाह और रिश्तेदारी के खर्च पूरे होते हों, उसके लिए हर वर्ष लाखों रुपये की कोचिंग और मेडिकल तैयारी का खर्च वहन करना आसान नहीं होता।

लेकिन शायद नियति ने रामचंद्र के लिए कुछ और ही लिखा था।

वर्ष 2022 में बज्जू में Desert80 Foundation की स्थापना हुई। रामचंद्र ने प्रवेश परीक्षा दी और अपनी मेहनत के दम पर शीर्ष 80 विद्यार्थियों में स्थान बनाया। बोर्ड परीक्षा में उसके अंक लगभग 74 प्रतिशत थे, जो सामान्य माने जाते हैं। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाएं केवल प्रतिशत नहीं, बल्कि लगन, मेहनत और क्षमता देखती हैं।

टॉप-80 में चयन होने के बाद एक नई समस्या सामने आई। Desert80 Foundation में वही विद्यार्थी पढ़ सकते थे जो बज्जू तहसील के निवासी हों अथवा बज्जू क्षेत्र के विद्यालय में अध्ययनरत हों। रामचंद्र उदट गांव का रहने वाला था और उसकी पढ़ाई लूणा गांव के विद्यालय में हुई थी। नियमों के अनुसार उसका चयन संभव नहीं था।
रामचंद्र बेहद निराश हो गया। उसने परीक्षा पास कर ली थी, टॉप-80 में स्थान भी बना लिया था, लेकिन फिर भी उसका सपना अधूरा रह रहा था। उसे लगा कि अब वह वापस गांव जाकर 11वीं-12वीं की पढ़ाई करेगा और आर्थिक स्थिति के कारण NEET की तैयारी शायद कभी नहीं कर पाएगा।हालाकि उसको neet और डॉक्टर की पढ़ाई का कुछ पता भी नहीं था ,साइंस बायोलॉजी भी विषय होता है ये भी नहीं पता था ये डेजर्ट 80 के एग्जाम देता हैं और पता चलता है !
इसी परीक्षा में रामचंद्र के मामा के पुत्र, मांनकासर निवासी अभिषेक डेलू का चयन हो गया था। एक ओर भाई का चयन हो चुका था और दूसरी ओर रामचंद्र योग्य होने के बावजूद अवसर से वंचित रह रहा था।

तभी कहानी ने नया मोड़ लिया।
रामचंद्र के मामा स्वयं आए और उन्होंने कहा—

“मेरे बेटे को पढ़ाओ या मत पढ़ाओ, लेकिन मेरे भांजे रामचंद्र को जरूर पढ़ाइए। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है। अभिषेक कोई दूसरा रास्ता निकाल लेगा, लेकिन रामचंद्र को यह अवसर मिलना चाहिए।”
इस भावनात्मक आग्रह के बाद चर्चा हुई और अंततः निर्णय लिया गया कि दोनों बच्चों को पढ़ाया जाएगा। शायद ईश्वर ने दोनों भाइयों के लिए कुछ विशेष लिख रखा था।

वर्ष 2022 और 2023 में रामचंद्र की कोचिंग तथा छात्रावास की पूरी व्यवस्था निःशुल्क रही।
2024 जून महीने में एक दिन उसके पिता का फोन आया। उन्होंने कहा—

“डॉक्टर साहब, आपने दो साल तक कोचिंग और हॉस्टल की व्यवस्था अपने स्तर पर की है। आगे यदि कोचिंग की फीस भी माफ कर दें तो मैं बेटे के रहने-खाने का खर्च जैसे-तैसे उठा लूंगा।”इसके बाद अगले दो वर्षों तक उसकी कोचिंग फीस पूरी तरह माफ रखी गई। रहने और खाने के लिए रामचंद्र ने एक छोटा कमरा लिया, जिस पर लगभग ₹3500 प्रतिमाह का खर्च आता था।
यह एक किसान पिता का विश्वास था, जो अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं देना चाहता था।

वर्ष 2025 में रामचंद्र ने NEET परीक्षा दी। उसके 505 अंक आए, जबकि चयन के लिए कटऑफ 525 अंक तक पहुंच गई। वह मात्र 20 अंकों से पीछे रह गया।

परिवार निराश था। पिता ने फिर फोन किया और कहा—

“डॉक्टर साहब, यदि MBBS नहीं हो सकता तो इसे पशु चिकित्सा, आयुर्वेद या दंत चिकित्सा कॉलेज में प्रवेश दिला दीजिए। बच्चे ने बहुत मेहनत की है, शायद कहीं न कहीं थोड़ी कमी रह गई होगी।”

तब मैंने कहा
“मैंने आपके बेटे को तीन साल तक अपने पास रखा है। आप उसे एक साल और मेरे भरोसे छोड़ दीजिए। कोचिंग की फीस नहीं लूंगा। आप तो सिर्फ रहने-खाने का खर्च संभाल लो !

पिता ने दृढ़ स्वर में कहा—

“डॉक्टर साहब, रहने-खाने का खर्च मैं जैसे-तैसे संभाल लूंगा।”

इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष।

NEET 2026 में रामचंद्र ने 655 अंक प्राप्त किए। उसके मामा के पुत्र अभिषेक डेलू ने भी 655 अंक हासिल किए। दोनों परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन तभी पुनः परीक्षा (Re-NEET) की घोषणा हो गई। दोनों भाई वापस लौटे, फिर से पढ़ाई में जुट गए और पूरे एक महीने तक दोबारा तैयारी की।

Re-NEET 2026 के परिणाम आए।

रामचंद्र ने 570 अंक प्राप्त किए और कटऑफ से 12 अंक ऊपर रहकर सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS के लिए चयनित हो गया।

उधर अभिषेक डेलू ने 610 अंक प्राप्त किए और उसका भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS के लिए चयन हो गया।

आज उदट गांव ने अपना पहला डॉक्टर पाया है।

यह उपलब्धि केवल एक विद्यार्थी की नहीं, बल्कि एक किसान परिवार की तपस्या, संघर्ष और विश्वास की जीत है। रामचंद्र की सफलता उन तमाम गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों को यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास 100 प्रतिशत हो, तो कोई भी सपना असंभव नहीं रहता।

रामचंद्र और अभिषेक, दोनों भाइयों ने Desert80 Foundation से चयनित होकर यह सिद्ध कर दिया है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

अभिषेक की कहानी भी इस से अधिक रोचक और प्रेरणादायक है, जिसकी चर्चा फिर कभी की जाएगी।

सबसे भावुक बात यह है कि रामचंद्र ने एक संकल्प लिया है। उसने कहा है—

“जब मैं डॉक्टर बनकर नौकरी करूंगा और मेरी पहली तनख्वाह आएगी, तब मैं भी Desert80 Foundation के माध्यम से कम से कम दो गरीब बच्चों की NEET तैयारी में सहयोग करूंगा, ताकि जिन सपनों को किसी ने मेरे लिए जिंदा रखा, मैं भी किसी और के सपनों को उड़ान दे सकूं।”

यही सच्ची सफलता है।यही शिक्षा का उद्देश्य है।
और यही एक किसान पुत्र की सबसे बड़ी जीत है।

27/07/2026

डॉ सुनील तेतरवाल बज्जू देचू ब्लॉक की स्कूल में

“डॉ. साहब, नाई का लड़का इतना टैलेंटेड थोड़ी होता है…रिजल्ट के दिन 2021 को याद किया तो आँखे नम मेरी और अनिल दोनों की थी ,...
26/07/2026

“डॉ. साहब, नाई का लड़का इतना टैलेंटेड थोड़ी होता है…
रिजल्ट के दिन 2021 को याद किया तो आँखे नम मेरी और अनिल दोनों की थी ,गडियाला कोलायत गाँव के अनिल सेन की कहानी – जिसने साबित कर दिया कि सपनों की कोई जाति नहीं होती।ये कहानी डॉ सुनील टेटरवाल बज्जू और उनके शिष्य की

“डॉ. साहब, नाईयो का लड़का इतना टैलेंटेड थोड़ी होता है… इनका तो पुश्तैनी काम सैलून पर बाल काटना है। आखिर में वही करेंगे… डॉक्टर बनना सबके बस की बात नहीं।”

ऐसी बातें मैंने न जाने कितनी बार सुनी हैं।
हर बार जब कोई किसी बच्चे को उसकी जाति, उसके परिवार या उसकी आर्थिक स्थिति से तौलता है, तो अंदर कुछ टूटता नहीं… बल्कि एक आग जलती है।

क्योंकि मैं जानता हूँ…

गाँव की झोपड़ी में पैदा हुआ बच्चा भी डॉक्टर बन सकता है, अगर कोई उसका हाथ पकड़कर उसे सही दिशा में चलना सिखा दे।
यह कहानी है गडियाला गाँव के अनिल सेन की।
पिता श्री हड़मानराम सेन (नाई)।
एक साधारण परिवार…पर सपना असाधारण।
26 अगस्त 2021…
कोरोना का समय था।
लोग घरों से निकलने से डरते थे।
स्कूल महीनों बंद रहे।
दसवीं की पढ़ाई लगभग बिखर चुकी थी।
ऐसे समय मैंने बज्जू में पहला “डॉ. सुनील तेतरवाल स्कॉलरशिप टेस्ट” आयोजित किया।
सिर्फ 25 बच्चों ने हिम्मत करके परीक्षा दी।
मैंने खुद पेपर बनाया… खुद परीक्षा ली…
और तय किया कि केवल सबसे प्रतिभाशाली बच्चों को आगे बढ़ाया जाएगा।
उन 25 बच्चों में से केवल 3 बच्चे चयनित हुए !उनमें एक नाम था…
अनिल सेन।

सच कहूँ…
मैं अनिल को नहीं जानता था।
न उसके परिवार को…न उसके गाँव को…
बस उसकी उत्तर पुस्तिका ने बता दिया था कि इस बच्चे में कुछ अलग है।
बाद में पता चला कि अनिल खुद परीक्षा देने भी नहीं आना चाहता था।
उसे विश्वास ही नहीं था कि वह चयनित हो सकता है।लेकिन उसके स्कूल के संचालक विजय जी खिलेरी उसे लगभग ज़बरदस्ती लेकर आए।

उन्होंने सिर्फ एक बात कही…

“डॉक्टर साहब, इस बच्चे की पकड़ बहुत अच्छी है… एक मौका देकर देखिए।”

और वही मौका…

उसकी ज़िंदगी का पहला मोड़ बन गया।

सीकर की यात्रा
मैंने तीनों चयनित बच्चों का Sikar में 11वीं में प्रवेश करवाया।

कोचिंग…होस्टल…मेस…लाइब्रेरी…

दो साल का पूरा खर्च मैंने स्वयं वहन किया।दो साल तक अनिल मेहनत करता रहा।

टेस्टों में लगभग 350 अंक आते थे।

NEET 2023 में भी लगभग 300 अंक आए।
चयन नहीं हुआ।

एक और शुरुआत…
2023 में मैंने लक्ष्या कोचिंग बीकानेर के शिक्षकों से चर्चा करके अनिल को Lakshya Coaching Bikaner ले आया।
Desert80 Foundation के सहयोग से उसका तीसरे वर्ष का पूरा खर्च भी उठाया गया।
2024 में अंक बढ़कर 450 हो गए।
लेकिन उस वर्ष कटऑफ लगभग 660 तक चली गई।फिर भी चयन नहीं हुआ।

सबसे बड़ा दर्द…

फिर आया NEET 2025…
NEET इतिहास के सबसे कठिन पेपरों में से एक।अनिल ने इतना अच्छा पेपर किया कि चयन की सीमा तक पहुँच गया।

लेकिन…

जब OMR देखी…

तो पता चला…
OMR गलत भर दी गई थी।
जिस बच्चे का चयन होना था…
वह सिर्फ एक छोटी सी गलती से बाहर हो गया।
उस दिन…
अनिल बहुत रोया।
अपने आपको कोसता रहा।

मैंने उससे सिर्फ एक बात कही—

“अनिल… NEET ज़िंदगी नहीं है।

यह सिर्फ एक परीक्षा है।
मेहनत हमारे हाथ में है…
पर परिणाम हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।”

फिर मैंने मुस्कुराकर कहा—

“जरूरत पड़ी तो हम दोनों मिलकर एक सैलून खोल लेंगे… नाम रखेंगे ‘डॉक्टर वाला सैलून’।

लेकिन अगर तुम्हारे अंदर फिर से शून्य से शुरुआत करने की हिम्मत है…

तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ।”

उसने बिना एक पल सोचे जवाब दिया—

“सर… मुझे सिर्फ सफेद एप्रन पहनना है… गले में स्टेथोस्कोप डालना है… मुझे डॉक्टर ही बनना है।”

उसकी आँखों में उस दिन मैंने हार नहीं…
जिद देखी थी।

2026 की तैयारी शुरू हुई।
तभी पहली बार मेरी मुलाकात अनिल के पिताजी से हुई।

और उसकी माँ…
आज भी उनकी आवाज़ मेरे कानों में गूँजती है।

हर 10-15 दिन में फोन आता था।

फोन उठाते ही एक ही बात…

“डॉक्टर साहब राम-राम… अनिल के कूकर चाले? ई बार पार पड़ ही जावेगा ना ?बदमाशी तो कोनी करे ना?”

मैं कहता—
“काकी, बिल्कुल चिंता मत करो।”
फिर वे कहतीं—
“डॉक्टर साहब… सोता तो नहीं रह जाता? संगत खराब तो नहीं है? बदमाशी करे तो थप्पड़ मार देना… पर इस बार इसे पार लगा देना। अब इसके माँ-बाप आप ही हो।”

एक माँ…

जिसने अपने बेटे को मुझ पर भरोसा करके छोड़ दिया था।
उनकी यह बात हर बार मेरे दिल को छू जाती थी

आखिरी लड़ाई…

अनिल चौथे प्रयास में था।
कई बार टेस्ट खराब हो जाते।
वह टूट जाता।

कहता—
“सर… मैं सबसे ज्यादा पढ़ता हूँ… फिर भी मेरे नंबर कम क्यों आते हैं?”

मैं सिर्फ एक बात कहता—

“तू मेहनत करता रह… एक भी प्रश्न बिना समझे मत छोड़… परिणाम एक दिन जरूर बदलेगा।”
रात के एक-दो बजे तक…
कोचिंग के किसी न किसी कमरे में…
सिर पर तौलिया बाँधकर…
मैं अक्सर अनिल को पढ़ते देखता था।

फिर आया NEET 2026…
अनिल के 648 अंक आए।
पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
सबको लगा…
अब सपना पूरा हो गया।

लेकिन…पेपर लीक की वजह से परीक्षा रद्द हो गई।

फिर से सब कुछ शून्य।
फिर से वही आँसू।फिर से वही डर।

उसका मन टूट गया।
हम कभी उसे जूस पिलाने ले जाते…
कभी शिव भाई, कभी वीपी सर, कभी विकास सर, कभी दिलीप जी उसे समझाते।
और शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो…
जब उसने डॉ. रवि बेनीवाल से बात न की हो।उन्होंने बड़े भाई की तरह हर दिन उसका हौसला बढ़ाया।

RE NEET टेस्ट सीरीज़…

पहले टेस्ट में फिर सिर्फ 350 अंक।
वह फिर टूट गया।
लेकिन इस बार उसने हार नहीं मानी।
हर दिन लाइब्रेरी…हर दिन अभ्यास…हर दिन सुधार…

धीरे-धीरे…

आत्मविश्वास वापस लौटा।

और फिर…

R-NEET का पेपर हुआ।

इतने कठिन पेपर में…

अनिल ने 563 अंक प्राप्त किए।

रिजल्ट आया…

AIR 27766

चयन लगभग सुनिश्चित।

फोन पर वह मुझसे बात कर रहा था।

आवाज़ में खुशी थी…

लेकिन आँखों में आँसू।

वे आँसू सिर्फ सफलता के नहीं थे…

वे चार साल की तपस्या के थे।



आज जब कोई कहता है—

“नाई का लड़का डॉक्टर कैसे बनेगा?”

तो मैं मुस्कुराता हूँ।

क्योंकि…

डॉक्टर जाति से नहीं बनते।डॉक्टर परिवार से नहीं बनते। डॉक्टर पैसे से नहीं बनते। डॉक्टर बनते हैं सपनों, मेहनत, संघर्ष और कभी हार न मानने वाली जिद से।

अनिल सेन की सफलता सिर्फ उसकी नहीं है.एमएम
यह हर उस गाँव के बच्चे की जीत है…
जिसे समाज ने कभी कम आँका।
हर उस माँ की जीत है…
जिसने बेटे को भरोसे के साथ विदा किया।
हर उस पिता की जीत है…
जिसने पुश्तैनी काम से बड़े सपने देखने की हिम्मत की।
और हर उस शिक्षक की जीत है…
जो किसी बच्चे का हाथ पकड़कर उसे वहाँ तक ले जाता है…
जहाँ तक वह अकेला कभी नहीं पहुँच पाता।

याद रखिए—

जब इंसान किसी मंज़िल को पूरी शिद्दत से चाहता है, तो मंज़िल मिलने में समय लग सकता है… प्रयास ज़्यादा लग सकते हैं… लेकिन अगर वह हार नहीं मानता, तो मंज़िल एक दिन उसके कदम जरूर चूमती है।

बधाई हो डॉ. अनिल सेन।

तुमने सिर्फ अपना सपना नहीं पूरा किया… हजारों गाँव के बच्चों को सपना देखने की हिम्मत भी दे दी।

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