28/06/2026
☞ Placenta Accreta : जब ईश्वर ने थाम लीं उँगलियाँ !!
हर चिकित्सक के जीवन में कुछ रातें ऐसी आती हैं, जो नींद छीन लेती हैं, लेकिन जब सुबह होती है, तो वो एक नया जीवन देकर जाती हैं।
ऑपरेशन थिएटर के बंद दरवाजों के पीछे की दुनिया बाहर के शोर से बिल्कुल अलग होती है।
वहाँ सिर्फ मॉनिटर की 'बीप-बीप' की आवाज़ और सामने लेटी एक ज़िंदगी होती है, जिसका पूरा दारोमदार आपके हाथों की उंगलियों और आपके फैसलों पर होता है।
हाल ही में मेरी सर्जिकल टेबल पर एक ऐसा ही पल था, जहाँ चुनौती सिर्फ एक सर्जरी की नहीं, बल्कि एक माँ के संपूर्ण मातृत्व को सुरक्षित रखने की थी।
मेरे सामने बेहद नाज़ुक अवस्था में एक युवा माँ थी। केस था 'प्लेसेंटा एक्रीटा' (Placenta Accreta) का।
यानी एक ऐसी भयानक स्थिति जहाँ बच्चे की नाल, माँ की बच्चेदानी की दीवार को चीरते हुए किसी पेड़ की जड़ों की तरह उसे जकड़ लेती है।
चिकित्सा जगत में इसे एक दुःस्वप्न की तरह देखा जाता है।
गर्भनाल माँ के गर्भाशय की दीवार में इतनी गहराई तक धंस जाती है कि बच्चा होने के बाद उसे अलग करना नामुमकिन हो जाता है।
डिलीवरी के बाद बच्चे की नाल को अलग करने की कोशिश का मतलब होता है— बेतहाशा, अनियंत्रित खून का बहना। डिलीवरी के चंद मिनटों में इतना खून बह जाता है कि माँ की जान बचाना नामुमकिन होने लगता है।
चिकित्सा विज्ञान से जुड़े लोग जानते हैं कि यह कितनी खौफनाक स्थिति है। ऐसी हालत में एक ही रास्ता अपनाया जाता है— गर्भाशय को काटकर शरीर से अलग कर देना।
लेकिन एक महिला के लिए उसका गर्भाशय सिर्फ एक अंग नहीं, उसकी सृजन शक्ति का प्रतीक, उसकी पूर्णता का अहसास होता है।
सर्जरी शुरू होने से ठीक पहले, उस युवा माँ ने अपनी काँपती हुई उंगलियों से मेरा हाथ पकड़ा था। उसने बेहद धीमी, टूटती आवाज़ में मुझसे कहा था— "दीदी, मेरी कोख मत उजड़ने देना, मुझे अधूरा मत करना।"
जब मैं उस युवा माँ की आँखों में देख रही थी, तो मुझे सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि उसके भीतर का वो मातृत्व दिखा जो अपनी पूर्णता के लिए मुझसे मूक प्रार्थना कर रहा था।
उस एक जुमले ने ऑपरेशन थिएटर के सन्नाटे को और भारी कर दिया था।
ऑपरेशन थिएटर की लाइटों के नीचे, धड़कनें तेज थीं और समय रेत की तरह फिसल रहा था, जोखिम बहुत बड़ा था व राह बेहद संकरी थी।
अपनी टीम की काबिलियत और परमपिता परमेश्वर पर भरोसा रख कर हमने एक बेहद चुनौतीपूर्ण रास्ता चुना — हमने सिर्फ जान बचाने की नहीं, बल्कि उस माँ के मातृत्व के उस आँचल को अक्षुण्ण रखने की ठानी।
घंटों तक सुई की नोंक जैसी बारीक सर्जिकल ब्लेड से मैं और मेरी टीम उस मौत के चक्रव्यूह से लड़ते रहे।
हर सेकंड ऐसा लग रहा था जैसे वक्त थम गया हो। मॉनिटर की 'बीप' जैसे हमारे दिलों की धड़कन बन चुकी थी।
काँप सकते थे जो हाथ, वो हुनर बन कर चले और जब आख़िरी टांका लगा, तो चमत्कार हो चुका था।
बिना गर्भाशय निकाले, वो कोख भी मुस्कुरा रही थी, माँ की साँसें भी सलामत थीं और कमरे में गूंजती नन्ही किलकारी उस जीत का जश्न मना रही थी।
हुनर को सौंप कर ईश्वर को,
मैंने हाथ बढ़ाया था,
लहू के समंदर में जैसे,
कोई तिनका तैर कर आया था,
बचा ली कोख भी उसकी,
बचा ली साँस भी उसकी,
लगा जैसे विधाता ने स्वयं,
मेरा हाथ चलाया था...
एक चिकित्सक के रूप में, जब मैं ऑपरेशन के बाद परिवारों के चेहरों पर सुकून देखती हूँ, तो लगता है सालों की तपस्या सफल हो गई।
हर माँ, हर बहन को मेरा वचन है — जब तक मेरी साँसें और मेरा हुनर सलामत है, आपके विश्वास और आपके मातृत्व पर कभी आँच नहीं आने दूँगी।
आपकी दुआओं की कर्जदार,
✨ डॉ. प्रीति राजपुरोहित