16/07/2026
यह पौराणिक कथा **समुद्र मंथन** की है, जिसमें भगवान विष्णु और सभी देवताओं (सुरों) की महिमा, उनके संकट और धैर्य की सुंदर झलक मिलती है।
# # समुद्र मंथन और अमृत की कथा
एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र और सभी देवता अपनी शक्ति, वैभव और ऐश्वर्य खो बैठे। स्वर्ग की आभा फीकी पड़ गई और असुरों ने इसका फायदा उठाकर देवताओं को पराजित कर दिया। निराश और लाचार होकर सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें साथ लिया और वे सब भगवान विष्णु की शरण में क्षीर सागर पहुंचे।
भगवान विष्णु ने देवताओं की व्यथा सुनी और मुस्कुराते हुए कहा, *"हे देवगण! संकट के इस समय में तुम्हें धैर्य और कूटनीति से काम लेना होगा। इस समय असुर तुमसे अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उनसे मित्रता कर लो और मिलकर **समुद्र मंथन** करो। समुद्र से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम अमर और शक्तिशाली हो जाओगे।"*
# # # मंथन की तैयारी
भगवान विष्णु के कहे अनुसार, देवता और असुर दोनों समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए।
* **मंदराचल पर्वत** को मथानी (churning rod) बनाया गया।
* **नागराज वासुकी** को रस्सी के रूप में लपेटा गया।
मंथन शुरू हुआ, लेकिन तभी एक भारी संकट आ गया। बिना किसी आधार के मंदराचल पर्वत धीरे-धीरे समुद्र के भीतर धंसने लगा। यह देखकर देवता और असुर दोनों निराश हो गए।
# # # भगवान विष्णु का कूर्म अवतार
अपने भक्तों को संकट में देख भगवान विष्णु ने तुरंत **कूर्म (विशाल कछुए)** का अवतार लिया। वे समुद्र के तल में चले गए और मंदराचल पर्वत को अपनी विशाल पीठ पर संभाल लिया। इसके बाद समुद्र मंथन सुचारू रूप से आगे बढ़ा।
> **मंथन के रत्न:** मंथन के दौरान समुद्र से एक-एक करके 14 रत्न निकले। सबसे पहले भयंकर 'हलाहल' विष निकला, जिसे सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया। इसके बाद कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और स्वयं देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्होंने भगवान विष्णु को अपने वर के रूप में चुना।
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# # # अमृत की प्राप्ति
अंत में, धन्वंतरि वैद्य अपने हाथों में **अमृत कलश** लेकर प्रकट हुए। अमृत देखते ही असुर उसे छीनकर भागने लगे। एक बार फिर देवता चिंतित हो गए कि यदि असुरों ने अमृत पी लिया तो सृष्टि का विनाश निश्चित है।
तब भगवान विष्णु ने **मोहिनी** रूप धारण किया। अपने अद्वितीय सौंदर्य और चतुराई से उन्होंने असुरों को मोहित कर लिया और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। अमृत पीकर सभी देवता पुनः अमर, शक्तिशाली और ओजस्वी हो गए। उन्होंने असुरों को परास्त किया और अपना खोया हुआ स्वर्ग का राज्य वापस पा लिया।
**सीख:** यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न आए, यदि हम सब मिलकर, धैर्यपूर्वक और ईश्वर पर विश्वास रखकर प्रयास करें, तो अंत में विजय सत्य और धर्म की ही होती है।