Yog Sadhan Ashram Bani

Yog Sadhan Ashram Bani ॐ नमः श्री राम लाल प्रभु जी परब्रह्मणे नमः !!

05/07/2026

" मोह व शोक से मुक्ति "

इस जीवन रुपी सफर में मोह व शोक से मुक्ति पाना परम आवश्यक है,क्यूंकि मोह व शोक से मुक्त हुए बिना हमारी जीवन रुपी यात्रा का सफर कभी भी सुगम व सन्तोषजनक नहीं हो सकता है। इस सन्दर्भ में मोह व शोक से त्राण केवल आत्मा का ज्ञान होने पर ही हो सकता है। आत्मा का ज्ञान तभी हो सकता है जब हम आत्मा को.............अव्यक्त जानें।
आत्मा को अचिन्त्य माने।
आत्मा को अविकारी जाने।
आत्मा को नित्य व सरवगत जाने।
ऐसा सव कुछ जानने व मानने पर जब साधक मनन कर्ता है,तव उसे आत्म बोध होता है। केवल मात्र ऐसा होने पर ही साधक मोह व शोक से मुक्ति पा सकता है।यह सव सदगुरुदेव के आशीर्वाद से ही मुमंकिन है।
"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

03/07/2026

"आत्म बोध अवस्था"
आत्म बोध से तात्पर्य है आत्मा के वारे जानकारी अर्जित करना।यह तभी सम्भव है जव हमारी बुद्धि स्थिर हो जाए। बुद्धि के स्थिर होने से साधक के सारे संशय नष्ट हो जाते हैं तथा हमें क्या करना चाहिये आऔर क्या नहीं करना चाहिए, क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है। इसे भगवान श्री कृष्ण ने श्री मदभगवत गीता में लिखा है
प्रवरितिचयः ,निरवरितिचयः कार्यकाये,भयाभये।
बनधनचय,मोक्षचय या वेति बुद्धि,स पार्थ सात्विकी ।

ऐसी अवस्था वाला साधक मुझ से अलग नहीं हो सकता वह मुझ में ही समा जाता है।
यो मां पशयति।सर्वत्र ,सर्व च मेयी पशयति।
तसयाहम न प्रणशयामि स च म न परणशयंति।
यही निर्वाण का रहस्य है तथा जीवन रुपी सफर का रहस्य है।
"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"।

"  योग सन्देश "अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस  के पावन अवसर की सभी प्रभु भक्तों /सर्व साधारण  को कोटि कोटि शुभ कामनाओं के साथ अ...
21/06/2026

" योग सन्देश "
अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर की सभी प्रभु भक्तों /सर्व साधारण को कोटि कोटि शुभ कामनाओं के साथ अनन्त वधाइयां जी। आज वो समय है जिसको हम गुलामी की वजह से भूल चुके थे। श्री प्रभु राम लाल जी ने योग सन 1888 में पंजाब प्रांत के अमृतसर में अवतार लिया तथा योग का उद्धार किया।श्री प्रभु जी ने अपने जीवन काल में तीन योग साधन आश्रमों की स्थापना की तथा त्रेता युग में महा ऋषी काक भुषुङी की भविष्य वाणी अनुसार देह त्याग कर 51 वर्ष की आयु में
महा प्रस्थान किया।
योग समस्त मानवता के लिए अनमोल धरोहर है। योग ही एक ऐसी जीवन पदति है जो हमारे समग्र व्यक्तित्व का विकास कर्ता है।जिसमें शरीरक,मानसिक, अध्यात्मिक और समाजिक मूल्यों का प्रक्षेपण है।यही हम सव के जीवन का आधार है।यह हमारी जीवन रुपी यात्रा को सन्तोषजनक वनाकर इस यात्रा के लक्ष्य की ओर ले जाने में सक्षम है।इसके लिए हमें योग को वस अपनी मुनियादी आवश्यकता के आधार पर लेने की आवश्यकता है। भाव यह है कि योग को अपने 2 जीवन भोजन व पानी की तरह आवश्यक जान कर निरन्तर योग युक्त जीवन शैली को अपनाना है। आज इस अवसर पर इस संकल्प के साथ किसी निपुण योगाचार्य की निगरानी में योग अभ्यास हर दिन करने के लिए स्वयं को शपथवद करना है ।इस जीवन रुपी सफर को खुशहाल वनाने के लिए यही केवल मात्र यही स्वयंम भगवान भोले नाथ का दिया हुआ मानवता को उपहार है।

जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणी पश्यंतु मा कशिचददुख भाग भवेत"।

With  जय श्री सदगुरुदेव जी की जी कोटि कोटि  प्रणाम, वन्दन, नमन  जी Shrimadbhagwadgeeta Prachar and Janjagran Sabha - Reg...
05/06/2026

With जय श्री सदगुरुदेव जी की जी कोटि कोटि प्रणाम, वन्दन, नमन जी Shrimadbhagwadgeeta Prachar and Janjagran Sabha - Regd. – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

"शिष्य  को गुरु से क्या  मिलता  है"यह विषय हर किसी की सन्तोषजनक जीवन रुपी यात्रा में अतुलनीय, अवर्णनीय स्थान रखता है। इस...
02/06/2026

"शिष्य को गुरु से क्या मिलता है"

यह विषय हर किसी की सन्तोषजनक जीवन रुपी यात्रा में अतुलनीय, अवर्णनीय स्थान रखता है। इस सन्दर्भ में विस्तार से अवलोकन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि हर जीव को इस सफर में जो कुछ भी चाहिए वो सव श्री सदगुरुदेव के मार्ग दर्शन से ही मिलता है।अर्थात यहां यह कहना अत्याधिक उचित होगा कि गुरु जी के सानिध्य में दो ऐसी चीजें मिलती हैं जिनमें जीवन के लिए जो आवश्यक है सव कुछ समाया है।
1) धृति
2) मति
1)यहां धृति से तात्पर्य है साहस,हौसला / हिम्मत यह सव कुछ मिलता है।फलस्वरूप हम हर कार्य को हाथ में लेने से संकोच नहीं करते यहां चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां क्युं न हो।यहां गुरु जी का सानिध्य होने से सफलता शिष्य के लिए स्वागत करती है।
2)
मति से तात्पर्य है कि ऐसी विलक्षण बुद्ध मिलती है कि जीवन के हर लम्हे में सही निर्णय लेने में कोई विलम्ब नहीं होता,परिणाम स्वरूप जीवन में सारे निर्णय सन्तोषजनक और हर मापदंड, पैमाने की कसोटि पर एक समुचित एहसास प्रदान करते हैं। यह सव एक सफल सन्तोषजनक सफर के लिए अत्याधिक आवश्यक है और यही श्री सदगुरुदेव जी के सानिध्य से प्राप्त होता है। इस सव का अगर हम वचपन से ही अवलोकन करें तो यह विषय और अधिक सरल हो जाता है।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी"

"सर्वे भवन्तु सर्वे सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय।
सर्वे भद्राणी पशुयनतु,मा कशिचददुख भाग भवेत"।

भुक्ति ओर मुक्ति इससे तात्पर्य  है कि संसार में जीवन रुपी यात्रा को भोगने/जीने के लिए वो सभी आवश्यक पदार्थो, वस्तुओं की ...
23/05/2026

भुक्ति ओर मुक्ति
इससे तात्पर्य है कि संसार में जीवन रुपी यात्रा को भोगने/जीने के लिए वो सभी आवश्यक पदार्थो, वस्तुओं की उपलब्धि होना ही भुक्ति है।जो कि हर जीव की आवश्यकता है तथा यह योगयुक्त जीवन होने पर ही संम्भव है।इस सब के लिए योगी योगी सदगुरु का सानिध्य परम आवश्यक है।

मुक्ति से तात्पर्य कि अपने मूल में विलय होना/मिलना है। यहां इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे एक लोहे का टुकडा चुंम्बक के सानिध्य अपना अस्तित्व खो कर चुंम्बक वन जाता है ठीक इसी प्रकार जव कोई जीव जो कि सभी उस परम शक्तिमान परमातमा के अंश मात्र है तथा
प्रभु के पास पहुंच कर अपना अस्तित्व खो कर प्रभु स्वरूप हो कर इस संसार रुपी यात्रा से मुक्त हो जाता है अर्थात आवागमन समाप्त हो जाता है। यही इस जीवन की वास्तविकता है।यह सारा जीवन इसी भुक्ति और मुक्ति का ही ताना वाना है।
योग निष्ठ जीवन ही उचित मार्ग है जो इस चक्र से मुक्त कर सकता हैं।

इसको भगवान श्री कृष्ण ने श्री मदभगवत गीता में ऐसे चरितार्थ किया है।

योगी बनो कुन्ती के जाए,योगी के सव कारज पूरे योग विना सव काज अधूरे।

"जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।"

15/05/2026

"कण कण में वह वैठा स्वामी, करे करावे अन्तर्यामी। चित मेरे मैं उसकी थाप,सोचे सोच करावे आप।ऐसा ज्ञान प्रभु वतलावें,मूढ मती हम क्या कथ पावें।वचन प्रभु के सुन मम मीत,होती जन मन दृढ प्रतीत ।प्रभु के मुख से श्रवण कर उपजे तत्क्षण ज्ञान, मनन करे जो प्रेम से होय एकाग्र ध्यान"।

नित्य युक्त
ऐसा जीव जो हर पल प्रभु गुण गावे ,हर पल प्रभु जी को नमन करे,हर पल प्रभु को धयावे।ऐसा जीव नित्य युक्त कहलाता है।अर्थात नित्य युक्त ही ऐसी विधि है जो कि जीव को इस जीवन रुपी यात्रा का लक्ष्य पाने का पात्र वनाती है।ऐसे जीव का कुशल क्षेम प्रभु स्वयंम देखते हैं।नित्य युक्त हो कर जीव हर रहस्य को जानने का सामर्थवाहन हो जाता है। अर्थात जीव के हर संशय का निर्वाण हो जाता है।यही योगयुक्त जीवन का मूल आधार है।नित्य युक्त हमारे जीवन की अमृत धारा है,जो हमें इस जीवन की यात्रा का भरपूर आनंदमय,खुशहाल वनाती है। यही इस संसारिक यात्रा की वास्तविकता है।यहां पहुंच कर जीव सन्तोष धन की प्राप्ति होती है।

"जय श्री प्रभु जी की जी"।

"सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्रराणि पशुयनतु मा कशिचंददुख भाग भवेत"।

जिंदे चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।गुरु चमन जगत नूं तारदे,तपे ह्रदय अनेकों ठारदे।होर झल न खलार झलिए।जिंदा ...
06/05/2026

जिंदे चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।
गुरु चमन जगत नूं तारदे,तपे ह्रदय अनेकों ठारदे।
होर झल न खलार झलिए।
जिंदा चल योगाश्रम चलिए, द्वार योगी गुरां दा मलिए।

यहां से एहसास होता है कि योगाश्रम क्यूं जाना चाहिए, वहां क्या मिलता है। योगाश्रम जाने से योगाअनुकूल जीवन का रास्ता मिलता है।परिणाम स्वरुप ऋतमभरा प्रज्ञा/ ईश्वरीय ज्ञान से वुद्धि भर जाती है। इसी क्रम में स्थित प्रज्ञा होती है/ दूसरे शब्दों में हमारी वुद्धि उस परम शक्ति में स्थित हो जाती है। यही वो अवस्था है जहां इस सृष्टि का ज्ञान होता है तथा इस जीवन रुपी सफर का लक्ष्य प्राप्त होता है। यही तो सारा रहस्य है।अर्थात यह सव अविद्या व माया का खेल है जीस कारण जीव इस सारे रहस्य से अनभिज्ञ रहता है। इस अविद्या और माया से योगाअनुकूल जीवन ही नितांत दिला सकता है। इसीलिए योगाश्रम में ही हम स्थित प्रज्ञा हो सकते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय।सर्वे भद्राणी पशुयनतु मा कशिचंददुख भाग भवेत।

जय श्री प्रभु जी की जी।

"योग में निश्चय  जो धरे,और योग से प्रीत। सचमुच वह जन धन्य  है,सुन्दर  उसकी नीत"।।उपरोक्त  पंक्तियों  में छिपा है योग का ...
03/05/2026

"योग में निश्चय जो धरे,और योग से प्रीत।
सचमुच वह जन धन्य है,सुन्दर उसकी नीत"।।

उपरोक्त पंक्तियों में छिपा है योग का गूढ़ रहस्य, जो हमें इंगित करती हैं कि योग में जब निश्चय हो जाए तो इससे अच्छी जीवन रुपी सफर को आनंदमय वनाने की कोई भी रीत नहीं हैं।योग मानवता के लिए अदभुत उपहार है तथा इस सृष्टि में कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए कहना उचित होगा कि योग एक जीवन धारा है,अमृत है जो जीवन के हर पल एहसास दिलाता है कि सर्वोत्तम सेवा सम्पूर्ण मानव सेवा है और वो तभी मुमकिन है जब हम स्वयंम इसके काबिल हों। इसके लिए केवल योग से ही हम खुद को सक्षम वना सकते हैं। इस वास्तविकता को श्री प्रभु जी ने,स्वामी जी ने तथा श्री सदगुरुदेव जी ने अपने जीवन रुपी यात्रा में प्रत्यक्ष प्रमाण दे दे कर यथार्थ किया।आज आवश्यकता है अभ्यास, दरिढ संकल्प और अटूट विश्वास की,यही इस जीवन रुपी सफर की सचाई है जो लक्ष्य कि ओर अग्रसर करती है।

सर्वे भवन्तु सुखिना,सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणि पशुयनतु मा कशिचददुख भाग भवेत।

जय श्री सदगुरुदेव जी की जी।

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Khadwana, Bani
Dehra Gopipur
177108

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