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मूलाधार चक्र में नकारात्मकता क्यों आती है मूलाधार को सनातन योग परम्परा में पहला चक्र कहा गया है। मूल माने जड़, आधार माने...
13/05/2026

मूलाधार चक्र में नकारात्मकता क्यों आती है

मूलाधार को सनातन योग परम्परा में पहला चक्र कहा गया है। मूल माने जड़, आधार माने नींव। जैसे किसी मकान की नींव कमजोर हो तो पूरी इमारत हिलती है, वैसे ही मूलाधार कमजोर हो तो जीवन में डर, असुरक्षा और ठहराव महसूस होता है। यह चक्र रीढ़ के सबसे निचले सिरे पर, गुदा और जननेंद्रिय के बीच स्थित माना गया है। इसका तत्व पृथ्वी है, रंग लाल, बीज मंत्र लं, और देवता गणेश।

नकारात्मकता यहाँ इसलिए सबसे पहले आती है क्योंकि यह हमारे survival brain से जुड़ा है। जब जीवन में आधार हिलता है, तो ऊर्जा ऊपर के चक्रों तक ठीक से नहीं जाती।

1. नकारात्मकता के मुख्य कारण

1. भय और असुरक्षा का संस्कार
मूलाधार का सीधा संबंध भय से है। बचपन में अगर घर में आर्थिक तंगी, माता-पिता के झगड़े, बार-बार घर बदलना, या शारीरिक दंड रहा हो, तो मन में संदेश बैठ जाता है, दुनिया सुरक्षित नहीं है। यह संस्कार वयस्क होने पर भी ट्रिगर होता रहता है। नौकरी जाने का डर, बीमारी का डर, अकेले रह जाने का डर, सब मूलाधार की अति-सक्रियता है।

2. पृथ्वी तत्व से कट जाना
हमारा शरीर मिट्टी से बना है। आज हम दिन भर जूते पहनते हैं, एसी में रहते हैं, जमीन पर नंगे पैर नहीं चलते। प्राकृतिक grounding न होने से शरीर में स्थिरता की कमी आती है। आयुर्वेद इसे वात वृद्धि कहता है, योग इसे अपान वायु का असंतुलन।

3. आर्थिक और भौतिक अस्थिरता
मूलाधार अन्न, आवास और धन का चक्र है। लगातार कर्ज, किराये का घर बदलना, नौकरी की अनिश्चितता, या बचत न होना, मन को rootless बनाता है। शास्त्रों में इसे अन्नमय कोश का क्षोभ कहा गया है।

4. बचपन का आघात या उपेक्षा
0 से 7 साल की उम्र में मूलाधार बनता है। इस समय में शारीरिक या भावनात्मक हिंसा, माँ से अलगाव, या लगातार डाँट, चक्र में गहरी छाप छोड़ते हैं। वयस्क होने पर व्यक्ति को बिना कारण अपराधबोध, शर्म या लोगों पर भरोसा न होना महसूस होता है।

5. अनियमित दिनचर्या और तामसिक आहार
देर रात जागना, सुबह देर से उठना, अत्यधिक जंक फूड, मांस-मदिरा, और मल का रुकना, ये सब अपान वायु को रोकते हैं। हठयोग प्रदीपिका में कहा है, मल-मूत्र का अवरोध प्राण को अधोगामी करता है। इससे आलस्य, भारीपन और नकारात्मक सोच बढ़ती है।

6. अत्यधिक डिजिटल जीवन और मूल्यों का टकराव
सनातन दृष्टि में मूलाधार धर्म का भी स्थान है, यानी सही-गलत की नींव। जब व्यक्ति लगातार ऐसे काम करता है जो उसके अंतरात्मा के विरुद्ध हों, झूठ, चोरी, शोषण, तो भीतर अपराधबोध जमा होता है। यह अपराधबोध चक्र को बंद करता है।

7. पीढ़ीगत भय
परिवार में अगर विभाजन, पलायन, अकाल या युद्ध की स्मृति रही हो, तो वह भय DNA की तरह आगे जाता है। इसे पितृ ऋण का मनोवैज्ञानिक रूप भी कह सकते हैं।

2. नकारात्मक मूलाधार के लक्षण

शरीर में: कमर दर्द, पैरों में ठंडापन, कब्ज, बवासीर, थकान, इम्यूनिटी कम होना, बार-बार सर्दी लगना।
मन में: हर समय चिंता, पैसे को लेकर घबराहट, निर्णय न ले पाना, जमा करने की आदत, या बिल्कुल भी बचत न कर पाना।
व्यवहार में: जगह बदलने से डर, रिश्तों में चिपकना, या बिल्कुल अलग-थलग रहना, नशे की ओर झुकाव।

यदि ये लक्षण लगातार महीनों तक रहें और दैनिक जीवन प्रभावित हो, तो केवल चक्र साधना पर्याप्त नहीं। उस स्थिति में मनोवैज्ञानिक या चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।

3. शास्त्रीय दृष्टि से समाधान का सिद्धांत

योग कहता है, जो कारण है उसी को उल्टा करो। भय का उल्टा है स्थिरता। अस्थिरता का उल्टा है पृथ्वी से जुड़ना।

अभ्यास
ताड़ासन, मलासन, जानुशीर्षासन, पादहस्तासन। ये आसन पैरों और पेल्विक फ्लोर को मजबूत करते हैं।
अश्विनी मुद्रा और मूलबंध। अपान वायु को ऊपर खींचते हैं।
नाड़ी शोधन प्राणायाम 5 मिनट सुबह शाम।

आहार
पृथ्वी तत्व बढ़ाने वाले भोजन, मौसमी जड़ वाली सब्जियाँ, चुकंदर, गाजर, शकरकंद, साबुत अनाज, घी। अत्यधिक ठंडा और बासी भोजन घटाएँ।

दिनचर्या
ब्रह्ममुहूर्त में उठना, सूर्य को जल देना, नंगे पैर घास पर चलना। हफ्ते में एक बार मिट्टी में हाथ डालना, बागवानी करना।
हर शाम 5 मिनट जमीन पर बैठकर लं बीज मंत्र का जप, रीढ़ सीधी, ध्यान मूलाधार पर।

भावनात्मक कार्य
भय को लिखना। रोज रात 3 चीजें लिखें जिनके लिए आप सुरक्षित महसूस करते हैं, घर, भोजन, एक व्यक्ति। यह मस्तिष्क को safety signal देता है।
क्षमा साधना। जिन लोगों ने बचपन में असुरक्षा दी, उन्हें मन में क्षमा करना। यह बदला नहीं, अपनी जड़ें साफ करना है।

सेवा
मूलाधार का देवता गणेश हैं, जो विघ्नहर्ता हैं। सनातन में कहा गया है, जो अन्न दान करता है उसका मूलाधार स्थिर होता है। हफ्ते में एक बार किसी जरूरतमंद को भोजन कराना, चक्र को प्राकृतिक रूप से खोलता है।

4. सबसे जरूरी बात

मूलाधार में नकारात्मकता पाप नहीं है, यह संकेत है। जैसे घर की नींव में सीलन दिखे तो हम पूरे घर को दोष नहीं देते, नींव सुखाते हैं। उसी तरह जब डर, पैसे की चिंता या अकेलापन बढ़े, तो समझें कि जड़ को पानी चाहिए।

सनातन दृष्टि कहती है, आप शरीर नहीं, आप आधार हैं। जब आधार स्थिर होता है, तो कुंडलिनी अपने आप ऊपर उठती है। इसलिए मूलाधार को साफ करना आध्यात्मिक विलास नहीं, जीवन की प्राथमिक मरम्मत है।

कैसे पहचानें कि दैवीय शक्ति आपकी मदद कर रही है......इन 11 संकेतों से कर सकते हैं आभास दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन...
12/05/2026

कैसे पहचानें कि दैवीय शक्ति आपकी मदद कर रही है......

इन 11 संकेतों से कर सकते हैं आभास दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके जीवन में दैवीय सहायता मिलती है। किसी को ज्यादा तो किसी को कम। कुछ तो ऐसे हैं जिनके माध्यम से दैवीय शक्तियां अच्छा काम करवाती हैं। सवाल यह उठता है कि आम व्यक्ति कैसे पहचानें कि उसकी दैवीय शक्तियां मदद कर रही है या उसकी पूजा-पाठ-प्रार्थना का असर हो रहा है? इन 11 संकेतों से हम इसको महसूस कर सकते हैं-

1. अच्छा चरित्र -
शास्त्र कहते हैं कि दैवीय शक्तियां सिर्फ उसकी ही मदद करती है, जो दूसरों के दुख को समझता है, जो बुराइयों से दूर रहता है, जो नकारात्मक विचारों से दूर रहता है, जो नियमित अपने इष्ट की आराधना करता है या जो पुण्य के काम में लगा हुआ है। यदि आप समझते हैं कि मैं ऐसा ही हूं तो निश्चित ही दैवीय शक्तियां आपकी मदद कर रही हैं। आपको बस थोड़ा सा इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि आप अच्छे मार्ग पर हैं और आपको ऊपरी शक्तियां देख रही हैं।

2. ब्रह्म मुहूर्त -
विद्वान लोग कहते हैं कि यदि आपकी आंखें प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में अर्थात् रात्रि 3 से 5 के बीच अचानक ही खुल जाती हैं तो आप समझ जाएं कि दैवीय शक्तियां आपके साथ हैं, क्योंकि यही वह समय होता है जबकि देवता लोग जाग्रत रहते हैं। यदि आप अपने बचपन से लेकर जवानी तक इस समय के बीच उठते रहे हैं तो समझ जाएं कि दैवीय शक्तियां आपके माध्यम से कुछ करवाना चाहती हैं या कि वे आपको एक अच्छी आत्मा समझकर यह संकेत दे रही हैं कि अब उठ जाओ। यह जीवन सोने के लिए नहीं है। आपको दुनिया में बहुत कुछ करना है। यह भी कहा जाता है कि सत्व गुण प्रधान लोग इस काल में स्वत: ही उठ जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। यह अमृत वेला होती है। कहते हैं कि इस काल में दुनिया के मात्र 13 प्रतिशत लोगों की ही नींद खुलती है।

3. सपने में देव दर्शन -
यदि आपको बारंबार मंदिर या किसी देव स्थान के ही सपने आते रहते हैं। सपने में आप आसमान में ही उड़ते रहते हैं या सपने में आप देवी-देवताओं से वार्तालाप करते रहते हैं तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आप पर मेहरबान हैं।

4. पूर्वाभास -
यदि आपको आने वाली घटनाओं का पहले से ही ज्ञान हो जाता है या आपको पूर्वाभास हो जाता है तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियों की आप पर कृपा है।

5. पारिवारिक प्रेम -
आपकी पत्नी, बेटा, बेटी और आपके सभी परिजन आपकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं, वे सभी आपसे प्यार करते हैं एवं आप भी उनसे प्यार कर रहे हैं तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आप से प्रसन्न हैं।

6. भाग्य से भी तेज -
जीवन में आपको अचानक से लाभ प्राप्त हो जाता है। आपके किसी भी कार्य में किसी भी प्रकार की आपको बाधा उत्पन्न नहीं होती है और सभी कुछ आपको बहुत आसानी से मिल जाता है, तो आप समझ जाइए कि दैवीय शक्तियां आपकी मदद कर रही हैं।

7. सुगंधित वातावरण का अहसास -
यदि कभी-कभी आपको यह महसूस होता है कि मेरे आसपास कोई है या आपको बिना किसी कारण ही अपने आसपास सुगंध का अहसास हो तो समझ जाइए कि अलौकिक शक्तियां आपके आसपास आपकी मदद के लिए हैं।

8. सुहानी हवा -
आप पूजा कर रहे हैं और यदि आपको लगे कि अचानक सुहानी हवा का झोंका या प्रकाश पुंज आ गया और शरीर में सिहरन दौडऩे लगे। ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं तो समझिए कि देवी या देवता आप पर प्रसन्न हैं।

9. ठंडी हवा का घेरा -
भूमि पर रहते हुए भी कभी-कभी आपको यह अहसास हो कि मेरे आसपास बादल या ठंडी हवा का एक पुंज है जिसने मुझे घेरा हुआ है तो आप समझ जाइए कि अलौकिक या दैवीय शक्ति ने आपको घेर रखा है। ऐसा अक्सर बहुत ज्यादा पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति के साथ होता है।

10. रोशनी का पुंज -
अचानक ही आपको तेज रोशनी का पुंज दिखाई दे जिसकी कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते या आपको अचानक ही कानों में मधुर संगीत सुनाई दे और आप आश्चर्य करें कि यहां आसपास तो कोई संगीत बज ही नहीं रहा फिर भी वह कानों में सीटी बजने की तरह सुनाई दे, तो आप समझ जाइए कि आप दैवीय शक्ति के सान्निध्य में हैं। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है, जो निरंतर ही अपने इष्टदेव का मंत्र जप कर रहे होते हैं।

11. किसी की आवाज सुनाई देना -
आप रात्रि में गहरी नींद में सो रहे हैं और आपको लगता है कि किसी ने मुझे आवाज दी और आप अचानक ही उठ जाते हैं, लेकिन फिर आपको आभास होता है कि यहां तो कोई नहीं है। लेकिन आवाज तो स्पष्ट थी। ऐसा आपके साथ कई बार हो जाता है तो आप समझ जाइए कि आप पर किसी अलौकिक शक्ति की मेहरबानी है। ऐसे में आप अपने ईष्ट का ध्यान करें और उन्हें धन्यवाद दें।

स्वाधिष्ठान चक्र में नकारात्मकता कैसे आती है स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र है। संस्कृत में स्व का अर्थ है अपना, अधिष्ठान का अर्...
10/05/2026

स्वाधिष्ठान चक्र में नकारात्मकता कैसे आती है

स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र है। संस्कृत में स्व का अर्थ है अपना, अधिष्ठान का अर्थ है निवास। यानी जहाँ आपका अपना भाव, आपकी इच्छा और आपका रस बसता है। स्थान नाभि से लगभग दो अंगुल नीचे, पेडू में। तत्व जल, रंग नारंगी, बीज मंत्र वं, देवता विष्णु और राकिनी शक्ति।

मूलाधार हमें स्थिरता देता है, स्वाधिष्ठान हमें गति देता है। जैसे पानी का काम बहना है, वैसे ही इस चक्र का काम है भावनाओं को बहने देना, इच्छा को रचना में बदलना, और संबंधों में रस बनाए रखना। जब पानी रुकता है तो सड़ता है। जब स्वाधिष्ठान रुकता है तो वही पानी डर, शर्म, अपराधबोध और व्यसन बन जाता है।

नकारात्मकता बाहर से नहीं आती, वह भीतर के बहाव को रोकने से पैदा होती है।

1. बचपन में शर्म का संस्कार

स्वाधिष्ठान 8 से 14 साल की उम्र में सबसे अधिक बनता है। इस समय शरीर बदलता है, पहली इच्छाएँ जागती हैं। भारतीय परिवारों में अक्सर इस उम्र में बच्चों को कहा जाता है, अच्छा बच्चा ऐसा नहीं सोचता, शर्म करो, लड़कियाँ ऐसे नहीं बैठतीं।

जब प्राकृतिक जिज्ञासा को बार-बार शर्म से जोड़ा जाता है, तो मस्तिष्क सीख लेता है, इच्छा बराबर खतरा। बड़ा होने पर व्यक्ति को अपनी ही भावनाओं से डर लगता है। यही स्वाधिष्ठान की पहली गाँठ है।

2. अपराधबोध और धार्मिक गलतफहमी

सनातन में काम को चार पुरुषार्थों में रखा गया है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। काम को मना नहीं किया गया, उसे दिशा देने को कहा गया। पर बाद में कई जगहों पर काम को पाप कह दिया गया।

जब कोई व्यक्ति आनंद लेता है, रचना करता है, या किसी को चाहता है, और भीतर से आवाज आती है, ये गलत है, तो वह आनंद पूरा नहीं बहता। अधूरा रस भीतर जमा होकर अपराधबोध बनता है। यही ऊर्जा फिर नकारात्मकता के रूप में लौटती है, या तो अति भोग में या पूरी तरह ठंडेपन में।

3. भावनाओं का दमन

जल का स्वभाव है बहना। रोना, हँसना, गुस्सा, ईर्ष्या, ये सब जल के रूप हैं। जब परिवार या समाज कहता है, रो मत, मजबूत बनो, लड़के रोते नहीं, लड़कियाँ गुस्सा नहीं करतीं, तब भावनाएँ दब जाती हैं।

दबी हुई भावना खत्म नहीं होती, वह शरीर में जमा होती है। स्वाधिष्ठान में यह जमा पानी भारीपन, पेट के नीचे दर्द, यौन ठंडापन, या बार-बार मूड स्विंग के रूप में दिखता है।

4. रिश्तों में आघात

स्वाधिष्ठान संबंधों का चक्र है। पहली असफल प्रेम कहानी, धोखा, जबरदस्ती, या अपमानजनक विवाह, ये सब चक्र पर गहरी छाप छोड़ते हैं। व्यक्ति फिर से जुड़ने से डरता है। वह या तो हर रिश्ते में अत्यधिक चिपक जाता है, या पूरी तरह दूर हो जाता है। दोनों ही स्थितियों में जल का संतुलन बिगड़ता है।

विशेष रूप से यौन आघात स्वाधिष्ठान को सबसे तेजी से बंद करता है। शरीर याद रखता है, भले मन भूल जाए।

5. रचनात्मकता का दमन

बहुत लोग सोचते हैं स्वाधिष्ठान सिर्फ सेक्स का चक्र है, पर इसका असली काम सृजन है। चित्र बनाना, नाचना, लिखना, खाना बनाना, नया विचार लाना, ये सब स्वाधिष्ठान की ऊर्जा हैं।

जब बचपन में कहा जाता है, आर्ट से पेट नहीं भरता, नाचना छोड़ पढ़ाई कर, या नौकरी में सिर्फ टारगेट पूरा करो, तो रचनात्मक बहाव रुक जाता है। रुकी हुई रचनात्मकता धीरे-धीरे कुंठा, ईर्ष्या और व्यसन में बदल जाती है।

6. अति भोग या अति नियंत्रण

जल को दो तरीके से गंदा किया जा सकता है, उसे पूरी तरह रोक दो, या उसे बाढ़ की तरह बहने दो।

कुछ लोग हर इच्छा को तुरंत पूरा करते हैं, अत्यधिक मीठा, अत्यधिक पोर्न, अत्यधिक खरीदारी, अत्यधिक शराब। इससे चक्र अति सक्रिय हो जाता है, पर खाली हो जाता है। बाद में अपराधबोध और थकान आती है।

दूसरे लोग हर इच्छा को मारते हैं। उपवास के नाम पर भूखा रहना, भावना के नाम पर पत्थर बनना। इससे चक्र सूख जाता है। दोनों ही स्थितियों में नकारात्मकता आती है, एक में सड़न से, दूसरे में सूखे से।

7. पानी से कटाव

आधुनिक जीवन में हम पानी से दूर हो गए हैं। एसी कमरे, बोतल का पानी, नहाने में जल्दबाजी, तैरना बंद। आयुर्वेद कहता है, जब शरीर में स्निग्धता कम होती है तो वात और पित्त बढ़ते हैं। योग में इसे अपान और व्यान वायु का असंतुलन कहते हैं। परिणाम, रूखी त्वचा, कब्ज, अनियमित मासिक, लो लिबिडो, और भावनात्मक सूखापन।

8. पीढ़ीगत पैटर्न

यदि माँ ने अपनी इच्छाओं को दबाया हो, या पिता ने भावनाओं को कभी व्यक्त न किया हो, तो बच्चे अनजाने में वही पैटर्न दोहराते हैं। इसे कुल संस्कार कहा जाता है। लड़की देखती है माँ हमेशा समझौता करती है, तो वह भी अपनी चाह को गलत मान लेती है।

नकारात्मक स्वाधिष्ठान के सामान्य संकेत

शरीर में: पेट के नीचे भारीपन, लोअर बैक दर्द, यूरिन इन्फेक्शन दोहराना, हार्मोन असंतुलन, पानी कम पीना।
मन में: बिना कारण अपराधबोध, खुशी में भी डर लगना, रिश्तों में या तो चिपकना या पूरी तरह कट जाना, रचनात्मक काम शुरू करके छोड़ देना।
व्यवहार में: अत्यधिक मीठा या नमकीन खाने की craving, पोर्न या शॉपिंग की लत, या बिल्कुल इच्छा का न होना।

यदि ये लक्षण लगातार बने रहें, नींद और दैनिक जीवन पर असर डालें, तो केवल चक्र साधना पर निर्भर न रहें। किसी योग्य योग शिक्षक, काउंसलर या डॉक्टर से मिलना जरूरी है।

सार

स्वाधिष्ठान में नकारात्मकता इसलिए आती है क्योंकि हम पानी को या तो बाँध देते हैं या बहा देते हैं। शर्म, अपराधबोध, आघात, दमन, अति भोग, और रचनात्मकता का अपमान, ये सब बाँध हैं।

सनातन दृष्टि में जल को पवित्र माना गया है, पर पवित्र का अर्थ रुका हुआ नहीं, बहता हुआ है। गंगा तभी गंगा है जब बहती है। स्वाधिष्ठान तभी स्वस्थ है जब भावना बहती है, इच्छा दिशा पाती है, और रचना जन्म लेती है।

नकारात्मकता को दुश्मन मानने की जरूरत नहीं। वह केवल संकेत है कि आपके भीतर का पानी रास्ता माँग रहा है।

👁️ छठी इंद्री (Sixth Sense) को जागृत करने के 5 अचूक रहस्य! 🧘‍♂️✨क्या आपने कभी महसूस किया है कि कोई घटना होने वाली है और ...
03/05/2026

👁️ छठी इंद्री (Sixth Sense) को जागृत करने के 5 अचूक रहस्य! 🧘‍♂️✨
क्या आपने कभी महसूस किया है कि कोई घटना होने वाली है और वह सच हो गई? या किसी के बिना कहे ही आपने उसके मन की बात जान ली? यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आपकी 'छठी इंद्री' (Sixth Sense) का संकेत है!
वेदों, उपनिषदों और योग शास्त्रों में इस सोई हुई अद्भुत शक्ति को जगाने के सटीक उपाय बताए गए हैं:
📍 कहाँ होती है छठी इंद्री?
हमारे शरीर में इड़ा (बाईं) और पिंगला (दाईं) नाड़ी के बीच सुषुम्ना नाड़ी होती है। दोनों भौहों के बीच स्थित 'आज्ञा चक्र' (थर्ड आई) ही हमारी छठी इंद्री का केंद्र है, जो आमतौर पर हर इंसान में सुप्तावस्था में रहती है।
🌟 इसे जगाने के क्या फायदे हैं?
भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होना।
मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बात या दूसरों के मन के विचार (Telepathy) समझना।
अतीत और ब्रह्मांड की सूक्ष्म ऊर्जाओं का रहस्य जान लेना।
🕉️ छठी इंद्री को जागृत करने के 5 तरीके:
1. 🌬️ प्राणायाम का अभ्यास
नाड़ियों के शुद्धिकरण का सबसे उत्तम उपाय प्राणायाम है। इसके निरंतर अभ्यास से सुषुम्ना नाड़ी जाग्रत होती है, जिससे छठी इंद्री सक्रिय हो जाती है।
2. 🧘‍♀️ गहरे ध्यान (Meditation) का अभ्यास
हर दिन भृकुटी (दोनों भौहों के बीच) पर ध्यान केंद्रित करें। नियमित 40 मिनट का गहरा ध्यान आपके आज्ञा चक्र को जाग्रत कर आपके सिक्स्थ सेंस को कई गुना बढ़ा देता है।
3. 🌀 आत्म-सम्मोहन (Self-Hypnotism)
प्राचीन काल में इसे 'प्राण विद्या' या 'त्रिकाल विद्या' कहा जाता था। आत्म-सम्मोहन के माध्यम से अवचेतन मन की गहराइयों में जाकर इस शक्ति को पाया जा सकता है।
4. 🕯️ त्राटक क्रिया
बिना पलक झपकाए किसी एक बिंदु, वस्तु या दीपक की लौ को लगातार देखना 'त्राटक' कहलाता है। इससे एकाग्रता चरम पर पहुंच जाती है।
(सावधानी: इसके लगातार अभ्यास से आंखों में गर्मी बढ़ती है, इसलिए इसके बाद जल नेती क्रिया जरूर करें।)
5. 🧠 अपने बोध (Intuition) को बढ़ाएं
अपने अहसासों पर गहराई से ध्यान दें। जब आप अपनी 'गट फीलिंग' (Gut Feeling) पर विश्वास करने लगते हैं, तो मन की यही स्थिरता और शक्ति छठी इंद्री के विकास में सहायक होती है और यह पूर्वाभास में बदल जाती है।
⚠️ महत्वपूर्ण चेतावनी:
योग और तंत्र की इन सभी क्रियाओं (विशेषकर त्राटक और सम्मोहन) का अभ्यास हमेशा किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। गलत तरीके से अभ्यास करने पर लाभ की जगह हानि भी हो सकती है।
👇 क्या आपको भी कभी भविष्य का पूर्वाभास (Intuition) हुआ है? अपने अनुभव कमेंट्स में साझा करें!

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