गुप्त रोग solution

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एक मित्र मेरे पास आए। आते ही से मुझसे बोले कि मैं अरविंद आश्रम हो आया, रमण आश्रम हो आया, शिवानंद के आश्रम हो आया, सब आश्...
02/01/2026

एक मित्र मेरे पास आए। आते ही से मुझसे बोले कि मैं अरविंद आश्रम हो आया, रमण आश्रम हो आया, शिवानंद के आश्रम हो आया, सब आश्रम छान डाले, कहीं शांति नहीं मिलती है। अभी मैं पांडिचेरी से सीधा चला आ रहा हूं। किसी ने आपका नाम ले दिया, तो मैंने कहा आपके पास भी जाकर शांति--तो मुझे शांति दें। तो मैंने कहा कि इसके पहले कि तुम मुझसे भी निराश होओ,एकदम उलटे लौटो और वापस हो जाओ। मैं तुम्हें शांति नहीं दूंगा। और तुम कुछ इस तरह कह रहे हो कि जैसे अरविंद आश्रम ने तुम्हें शांति देने का कोई ठेका ले रखा है। सब जगह हो आया, कहीं नहीं मिली! जैसे कि मिलना कोई आपका अधिकार था। बाहर हो जाओ दरवाजे के! उन्होंने कहा, आप कैसे आदमी हैं! मैं शांति खोजने आया हूं। मैंने कहा, अशांति खोजने कहां गए थे? अशांति खोजने किस आश्रम में गए थे, यह मुझे पहले बता दो। कहा, कहीं नहीं गया था। तो मैंने कहा, जब तुम अशांति तक पैदा करने में कुशल हो, तो शांति भी पैदा कर सकते हो। मेरी क्या जरूरत है? जिस रास्ते से अशांत हुए हो, उसी रास्ते से वापस लौट पड़ो तो शांत हो जाओगे। मैं कहां आता हूं बीच में? अशांति के वक्त मुझसे तुमने कोई सलाह न ली थी, शांति के वक्त तुम मुझसे सलाह लेने चले आए हो! मैंने पूछा कि शांति की बात बंद। अगर मेरे पास रुकना है, तो अशांति की चर्चा करो कि अशांत कैसे हुए हो? क्या है अशांति, उसकी मुझसे बात करो। अशांति तुम्हारी स्पष्ट हो जाए, तो शांति पाना जरा भी कठिन नहीं है। वे दो दिन मेरे पास थे। उनकी अशांति फिर धीरे-धीरे उन्होंने खोलनी शुरू की। वही थी, जो हम सब की है। एक ही लड़का है उनका। बहुत पैसा कमाया। ठेकेदारी थी। एक ही लड़का है। उस लड़के ने एक लड़की से शादी कर ली, जिससे वे नहीं चाहते थे कि शादी करे। तलवार लेकर खड़े हो गए दरवाजे पर--लाश बिछा दूंगा; बाहर निकल जाओ! लड़का बाहर निकल गया। अब मुसीबत है। अब मौत करीब आ रही है। अब किस मुंह से लड़के को वापस बुलाएं, तलवार दिखाकर निकाला था। और मौत पास आ रही है। और जिंदगीभर जिस पैसे को हजार तरह की चोरी और बेईमानी से कमाया, उसका कोई मालिक भी नहीं रह जाता और हाथ से सब छूटा जा रहा है! तो मैंने उनसे पूछा, वह लड़की खराब थी, जिसने तुम्हारे लड़के से शादी की है? उन्होंने कहा, नहीं, लड़की तो बिलकुल अच्छी है, लेकिन मेरी इच्छा के खिलाफ...। तुम्हारी इच्छा से तुम शादी करो, तुम्हारा लड़का क्यों करने लगा? अशांत होने के रास्ते खड़े कर रहे हो। फिर जब उसने शादी अपनी इच्छा से की और तुमने उसे घर से बाहर निकाल दिया, तो अब परेशान क्यों हो रहे हो? बात समाप्त हो गई। उसने तो आकर नहीं कहा कि घर में वापस लो। कहने लगे, यही तो अशांति है। वह एक दफा आकर माफी मांग ले, अंदर आ जाए। नहीं मानी, ठीक है। जब उसने आपकी बात नहीं मानी, तो ठीक है। बात खतम हो गई। अब आप क्यों परेशान हैं? तो इस धन का क्या होगा? मैंने कहा, धन का सबके मर जाने के बाद क्या होता है? और तुम्हें क्या फिक्र है? तुम मर जाओगे, धन का जो होगा, वह होगा। कहा कि नहीं, मेरे ही लड़के के पास मेरा धन होना चाहिए। तो मैंने कहा, फिर मेरे लड़के के पास मेरी ही पसंद की औरत होनी चाहिए, यह खयाल छोड़ो। तुम्हारा लड़का धन छोड़ने को राजी है अपने प्रेम के लिए, तुम भी कुछ छोड़ने को राजी होओ। दो दिन मेरे पास थे, सारी बात हुई। देखा कि सब हजार तरह की उलटी-सीधी इच्छाएं मन को पकड़े हुए हैं, तो चित्त अशांत हो गया है। हम सब का मन ऐसा ही अशांत है। कृष्ण कह रहे हैं कि विषय-आसक्त चित्त--चूंकि विषय बहुत विपरीत हैं--एक ही साथ विपरीत विषयों की आकांक्षा करके विक्षिप्त होता रहता है और खंड-खंड में टूट जाता है। जो व्यक्ति निष्काम कर्म की तरफ यात्रा करता है, अनिवार्यरूपेण--क्योंकि कामना गिरती है, तो कामना से बने हुए खंड गिरते हैं। जो व्यक्ति अपेक्षारहित जीवन में प्रवेश करता है, चूंकि अपेक्षा गिरती है, इसलिए अपेक्षाओं से निर्मित खंड गिरते हैं। उसके भीतर एकचित्तता, यूनिसाइकिकनेस, उसके भीतर एक मन पैदा होना शुरू होता है। और जहां एक मन है, वहां जीवन का सब कुछ है--शांति भी,सुख भी, आनंद भी। जहां एक मन है, वहां सब कुछ है--शक्ति भी, संगीत भी, सौंदर्य भी। जहां एक मन है, उस एक मन के पीछे जीवन में जो भी है, वह सब चला आता है। और जहां अनेक मन हैं, तो पास में भी जो है, वह भी सब बिखर जाता है और खो जाता है। लेकिन हम सब पारे की तरह हैं--खंड-खंड,टूटे हुए, बिखरे हुए। खुद ही इतने खंडों में टूटे हैं, कि कैसे शांति हो सकती है!

ओशो

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