18/02/2026
घर-बार,जमीन-जायदाद बच्चों के नाम लिखकर मत दीजिए..???
अपने घर में आप स्वयं रहिए।
ज़रूरत पड़े तो बेटे-बेटियाँ घर बनाकर ‘यौवनाश्रम’ में रहें।
परिपक्व उम्र में आकर हममें से कई लोगों के लिए यह कहानी शायद काम आ सकती है…
दीनानाथ शर्मा साहब पिछले कुछ महीनों से कुछ-कुछ भाँप रहे थे।
उन्हें रिटायर हुए तीन साल हो चुके थे। वे सरकारी उच्च पद पर कार्यरत थे। अच्छी-खासी पेंशन पाते हैं। पत्नी का देहांत बहुत पहले हो चुका था।
दोनों बेटों को उन्होंने बड़े जतन से पाला-पोसा। पिता और माता—दोनों का स्नेह देकर अच्छी तरह पढ़ाया-लिखाया और वे दोनों स्थापित हो गए। फिर बड़े बेटे की शादी कर दी। एक पोता हुआ। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा।
इसके बाद छोटे बेटे ने अपनी पसंद की लड़की खोजकर पिता को बताया, तो उन्होंने सहर्ष उस लड़की को घर में बहू बनाकर ले आए। रिटायर होने से पहले ही बड़े बेटे की शादी हो चुकी थी, अब छोटी बहू भी आ गई।
दीनानाथ जी अब पोते के साथ काफी समय बिताते हैं। घर-खर्च का बड़ा हिस्सा भी वे ही उठाते हैं।
एक दिन सुबह ईज़ी चेयर पर बैठकर अख़बार पढ़ रहे थे। तभी बड़ी बहू की आवाज़ सुनाई दी—
“आज सामान कम है, रात में खाना नहीं बनेगा।
वह नौकरी करती है और जेठानी से कह रही थी।
इस घर में बेटों के जन्म से पहले से ही काम करने वाली सरिता जी है। वह उनके बेटों से उम्र में काफ़ी बड़ी है। सरिता जी ने मातृहीन दोनों बेटों को माँ की तरह स्नेह देकर पाला था।
सरिता जी बोली—“ सामान कोई ओर ले आएगा।
बड़ी बहू ने कहा—“क्यों? पापा तो बैठे ही रहते हैं, रोज़ बाज़ार कर ही सकते हैं।
दीनानाथ जी के कानों में यह बात गूँज गई। समझ गए—घर में उनकी ज़रूरत अब खत्म हो गई है।
अपने मन से बोले—“मन, तू तैयार रह।
इसके बाद बहुओं के व्यवहार में उनके प्रति धीरे-धीरे विरोध झलकने लगा।
एक दिन सुबह बड़े बेटे को गुस्से में बहू से कहते सुना—
“मेरी शर्ट लॉन्ड्री से लाई नहीं?
बड़ी बहू बोली—“नहीं, जाने का समय नहीं मिला।
बड़ा बेटा बोला—“पापा थोड़ा ला नहीं सकते थे? दिन भर तो बैठे ही रहते हैं।
यह बात जब दीनानाथ जी के कानों तक पहुँची, तो उन्होंने सोचा—
“युगधर्म!”
फिर एक दिन छुट्टी के दिन सुबह नाश्ते की मेज़ पर आए, देखा—सब पहले से ही मौजूद हैं।
सरिता जी प्लेट में गरम-गरम लुचियाँ, आलू भाजी और संदेश परोस रही है।
बड़ा बेटा बोला—“बाबा, एक बात थी।
दीनानाथ जी समझ गए कि सबने मिलकर कुछ योजना बनाई है। बोले—“कहो।
बड़ा बेटा बोला—
“बाबा, कल ऑफिस के काम से गाज़ीपुर गया था। काम के बीच समय निकालकर वहाँ की दर्शनीय जगहें देखने गया। नदी के किनारे, स्वास्थ्यकर माहौल में एक बहुत अच्छा वृद्धाश्रम देखा। देखकर सोचा—आप वहाँ सुंदर वातावरण में अपना अंतिम जीवन बिता सकते हैं। हम आते-जाते रहेंगे। क्यों रे भाई, क्या कहता है?”
छोटा बेटा बोला—“हाँ, बहुत अच्छा होगा।
दीनानाथ जी मुस्कुराकर बोले...
“सब सुन लिया। लेकिन बेटा, जैसे तुम मेरे बारे में सोचते हो, वैसे ही मैं भी तुम्हारे बारे में सोचता हूँ। इसलिए तुम्हारे लिए भी मेरा एक प्रस्ताव है। तुम लोग ही क्यों न किसी उपयुक्त और मनोहर वातावरण वाले ‘यौवनाश्रम’ की तलाश करके वहाँ जाकर रहो? घर तो मेरा ही है, पेंशन भी अच्छी मिलती है। सरिता माँ को साथ लेकर हम बाप-बेटी अच्छे से रह लेंगे। तुम लोग आते-जाते रहना।”
इस तरह उन्होंने एक ही चाल में बाज़ी पलट दी।
सरिता मां से बोले...
“सरिता माँ, पुड़िया ठंडी हो रही हैं। ज़रा गरम-गरम ले आओ।
बेटे और बहुएँ सबके सब स्तब्ध रह गए, अवाक होकर बैठे रह गए…
समय बदल रहा है।
इसलिए उचित जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए…
नहीं तो भविष्य में बड़े संकट में पड़ना पड़ सकता है।
आपकी क्या प्रतिक्रिया है..???
अपने अनमोल विचार कमेंट्स में जरूर दीजियेगा।