अष्टांग योग

अष्टांग योग ऑनलाइन वैदिक गुरुकुल.

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"अष्टांग योग"* (संक्षिप्त परिचय)

*1- यम* = सामाजिक व्यवहार ठीक रखें। अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह का पालन करें।

*2- नियम* = व्यक्तिगत व्यवहार ठीक रखें। शौच संतोष तप स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान करें।

*3- आसन* = ईश्वर का ध्यान करने के लिए स्थिर हो कर बैठें।

*4- प्राणायाम* = कुछ देर के लिए श्वास को रोकें।

*5- प्रत्या

हार* = आँख आदि पांचों इंद्रियों के कार्य बंद कर दें।

*6- धारणा* = मन को शरीर में मस्तक नासिका कण्ठ हृदय आदि किसी एक स्थान पर स्थिर करें।

*7- ध्यान* = ईश्वर का चिंतन करें। उसकी स्तुति प्रार्थना करें।

*8- समाधि* = ईश्वर की अनुभूति करें। उससे ज्ञान आनन्द न्याय सेवा परोपकार आदि गुणों की प्राप्ति करें।

10/08/2026
07/08/2026

_🕉️ अष्टांग योग LIVE क्लास_ 🕉️
*📖 तर्क व प्रमाण आधारित - सनातन की असली पूजा पद्धति 📖*
📅 *शुक्रवार 7 अगस्त* | ⏰ *शाम 8:00 से 8:45 बजे*
📲 *Google Meet:* https://meet.google.com/cuc-rivb-jbh
*⚠️ योग के नाम पर चल रहे घोटालों का काला चिट्ठा खुलेगा ⚠️*
*योग के नाम पर हमें क्या सिखा दिया गया?*
1. अहिंसा के नाम पर *नपुंसकता* - "एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो"
2. ब्रह्मचर्य के नाम पर *नारी नरक का द्वार* बता दिया
3. तपस्या के नाम पर *शरीर से हिंसा* करना सिखा दिया
4. प्राणायाम के नाम पर *कपालभाति-अनुलोमविलोम*
5. आसन के नाम पर *व्यायाम/Aerobics*
6. प्रत्याहार के नाम पर *रेकी-विपश्यना* जैसी वामपंथी क्रियाएं
*इस क्लास में सीखेंगे: 👇*
1. 🧠 *बुद्धि व तर्क से वास्तविक अष्टांग योग*
2. 📿 *यम, नियम, आसन, प्राणायाम... समाधि* के गहरे रहस्य
3. 🌌 *परमपिता परमात्मा की चेतना से जुड़ने* का मार्ग
अगर आप _असली योग_ सीखकर ईश्वरीय चेतना से जुड़ना चाहते हैं तो ये 45 मिनट आपका जीवन बदल सकते हैं 🌟
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प्रश्न - ज्ञानी व्यक्ति को अपना ज्ञान किसे देना चाहिए ? आप बताएं कि वेद जैसे उत्तम ज्ञान पाने के सच्चे अधिकारी कौन हैं ?...
05/08/2026

प्रश्न - ज्ञानी व्यक्ति को अपना ज्ञान किसे देना चाहिए ? आप बताएं कि वेद जैसे उत्तम ज्ञान पाने के सच्चे अधिकारी कौन हैं ?
उत्तर - शास्त्र के अनुसार ज्ञानी व्यक्ति को अपना ज्ञान दो ही प्रकार के लोगों को देना चाहिए -
उत्तर - पहला - कोई श्रद्धालु होकर ज्ञान श्रवण करने वाला हो या ज्ञिज्ञासु होकर शंका निवारणार्थ प्रश्न पूछने वाला ज्ञान लेने का अधिकारी होता है।
दूसरा - ऐसा कोई व्यक्ति जो वास्तव में ज्ञान को ग्रहण करने की पात्रता रखता हो तो ज्ञानवान् को चाहिए कि उसे बिना पूछे भी ज्ञान देवे ।
इस विषय में महर्षि यास्क रचित निरुक्त 2.4 में लिखी इन पंक्तियों को हमें अवश्य स्मरण रखना चाहिए -
_विद्या वै ब्राह्मणमाजगाम ।
गोपाय मां शेवधिस्तेऽहमस्मि ।।
असूयकायानृजवेऽयताय ।
न मां ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ।।
अर्थात्
विद्या एक दिन ब्राह्मण/ज्ञानी व्यक्ति के पास आकर बोली -
"हे ब्राह्मण! मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हारे लिए एक अनमोल खजाने के समान हूँ।
परंतु मुझे ईर्ष्या करने वाले, कुटिल बुद्धि वाले और परिश्रम न करने वाले व्यक्ति को मत देना।
यदि तुम ऐसा करोगे तभी मैं तेजस्वी और प्रभावशाली बनी रहूंगी।"
इसलिए इस संसार में ये उपरोक्त दो प्रकार के व्यक्ति ही ज्ञान पाने के सव्चे अधिकारी होते हैं । ज्ञानवान् व्यक्ति को चाहिए कि वह इनके समक्ष ही अपनी उत्तम ज्ञानयुक्त वाणी को प्रकट करे ।
इनके अतिरिक्त व्यक्तियों को ज्ञान देना ज्ञान का अनादर व अपमान कराने वाला ही होता है।

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