12/01/2026
🌹🌹🌹🌹मनुष्य, देवता और प्रेत में क्या फ़र्क़ है?🌹🌹🌹🌹
💥शास्त्रों में कहा गया है कि देवताओं का स्थूल शरीर नहीं होता । उनका शरीर तीन तत्वों का होता है, आकाश, अग्नि और वायु। जबकि स्थूल शरीर के लिए पृथ्वी और जल तत्व की भी आवश्यकता होती है। इसीलिए मनुष्य का स्थूल शरीर पाँच तत्वों से बना होता है।
💥आकाश, अग्नि और वायु को वैसे स्थान की ज़रूरत नहीं होती , जैसे जल या
पृथ्वी को होती है। जबकि हर भौतिक चीज स्थान घेरती है, उसे जगह चाहिए होती
है। जैसे जिस जगह हम खड़े, लेटे या बैठे होते हैं, उसी समय उस जगह में कोई
दूसरा स्थान नहीं ले सकता । लेकिन आत्मा को इस प्रकार के स्थान को घेरने की
ज़रूरत नहीं होती । वह सूक्ष्म रूप से अलग आयाम में मौजूद रहती है। यह बात
अच्छी यानी दिव्यात्मा और बुरी यानी प्रेतात्माओं दोनों पर लागू होती है।
💥देवता वे आत्मा हैं, जिनमें जीव लिप्त नहीं है। वे मनुष्य के स्तर से बहुत ऊपर
जा चुकी हैं, लेकिन वे अनंत में लीन नहीं हुईं, यानी मोक्ष प्राप्त नहीं किया । हमारे
साथ ही उनका भी अस्तित्व है।
💥जैसा कि ऊपर बताया गया कि उनके पास मनुष्य जैसा स्थूल शरीर नहीं होता ,क्योंकि उनकी देह सिर्फ़ अग्नि , वायु और आकाश तत्व से बनी होती है। इसलिए वे हमें नहीं दिखते। चूँकि वे आत्माएँ हमें नहीं दिखतीं , तो हमें उनके होने का या तो यक़ीन नहीं होता या हमें लगता है कि वे किसी दूसरे ही लोक में होती होंगी । यह लोक अलग ज़रूर हैं, लेकिन इनका अर्थ पृथ्वी जैसे किसी अन्य ग्रह से नहीं ,
बल्कि चेतना के अलग आयाम से होता है।
💥वे श्रेष्ठ आत्मा जो स्वेच्छा से या अन्य किसी कारण से मोक्ष को धारण नहीं करती ,वे देवता हैं। ऐसी आत्माओं को अपने योग्य मनुष्य शरीर प्राप्त करना कठिन कार्य होता है। इसके लिए उन्हें सैकड़ों या हज़ारों साल प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। वे तभी जन्म ले सकती हैं, जब उनके योग्य कोई कोख मिले। और ऐसी कोख मिलना मुश्किल काम होता है।
💥इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि किसी सिद्ध पुरुष ने अपनी देह छोड़ने से पहले ही उस परम सत्य को जान लिया है, जिसे प्राप्त करना मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है। लेकिन इस प्राप्ति के बाद भी वे मोक्ष नहीं चाहते,बल्कि मोक्ष से पहले कल्याण का कुछ और कार्य भी करना चाहते हैं। तो ऐसी आत्मा स्थूल शरीर छोड़ने के बाद भी विलीन नहीं होंगी । वे आगे के कार्य के लिए उपयुक्त कोख की प्रतीक्षा करेंगी । जब तक उन्हें अपने योग्य कोख नहीं मिलती या जब तक वे जन्म लेना नहीं चाहते, तब तक वे देवलोक में सक्रिय रहकर अपनी इच्छानुसार कार्य करते रह सकते हैं।
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सोचिए कि जिसने परम सत्य को जानकर देह छोड़ी हो , तो दोबारा देह प्राप्ति के
लिए उसे कितनी उत्कृष्ट कोख की ज़रूरत होगी , ऐसी कोख की तलाश, जहाँ
जन्म लेकर वह आगे का कार्य कर सके, क्या आसान होगा ?
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💥इसलिए देवता तुल्य ऐसी आत्माएँ बग़ैर शरीर धारण किए भी हमारे आसपास
रहकर वही कार्य करती रहती हैं, जो उनका लक्ष्य होता है।
💥इसी तरह कुछ इतनी बुरी आत्मा भी होती हैं, जो पशु से भी बदतर होती हैं। वे
पशु योनि तो ले नहीं सकती और मनुष्य में इतनी निकृष्ट कोख ढूँढना मुश्किल
काम होता है, जहां जन्म लेकर वे उतने बुरे काम कर सकें। ऐसी आत्मा प्रेत
कहलाती हैं। उन्हें भी अपने योग्य गर्भ तलाशने में बहुत लम्बे समय इंतज़ार करना
पड़ता है। यह अवधि सैकड़ों या हज़ारों साल की भी हो सकती है।
💥यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि संसार में भौतिक इच्छाओं की पूर्ति भौतिक यानी स्थूल शरीर से ही सम्भव है। किसी भी भौतिक इच्छा की पूर्ति के लिए अच्छी या बुरी दोनों ही प्रकार की आत्माओं को मानव शरीर की ज़रूरत होती ही है।
इसलिए ऐसी आत्माएँ भी हमारे इर्द-गिर्द रहकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति होते हुए
देखना चाहती हैं। यह बात श्रेष्ठ आत्माओं पर भी लागू होती है और बुरी पर भी ।
🌹🌹🌹🌹🌹सबका मंगल हो🌹🌹🌹🌹🌹