31/10/2024
एक त्वरित सृजित व्यंग्य रचना..
प्रेरणा मिली आज जब अखवार हमारे द्वार आया
**दिवाली का सांता क्लॉज**
क्रिसमस पर जैसे लोग सांता क्लॉज का इंतजार करते हैं, वैसे ही दीवाली पर हम अखबार का इंतजार करते हैं। हमारे लिए तो चलता-फिरता सांता क्लॉज ही है अखबार... सिर्फ दिवाली ही क्यों, हर रोज! अब देखो न, क्रिसमस का सांता क्लॉज तो साल में एक बार आता है, वो भी सिर्फ बच्चों के लिए। बड़ों के लिए कुछ नहीं! अब भई, अगर बड़े लोग बड़े काम न करें तो बच्चे कहाँ से आएंगे... खैर छोड़ो जी, बड़ों के लिए तो अखबार ही सांता क्लॉज है, जो रोज-रोज उपहार लेकर आता है। ढेरों उपहार, इश्तिहारों से भरा अखवार ,उपहारों से भरा अखबार - ऑफर, डिस्काउंट, सेल, एक के साथ एक फ्री का उपहार... उपहारों से लदे-फदे विज्ञापन, जैसे चुनाव के मौसम में नेता के चारों ओर छुटभैयों की भीड़ होती है, वैसे ही त्योहारों के मौसम में अखबार के पन्नों पर विज्ञापन और गोद में इश्तिहार चिपके होते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे मोहल्ले की कुतिया फिर ब्याही हो और अपने पिल्लों को लेकर आ धमकी हो आपके दरवाजे पर।
आजकल तो उपहारों के कारण अखबार इतना भारी हो चुका होता है कि मेरा स्टाफ त्योहारों के समय उसे उठाने से कतराता है। मेरे दो स्टाफ के कर्मचारियों की कमर में चक चल गई...कमर बोल गई इस चक्कर में! अब ये मेडिकल भाषा है जी, आप नहीं समझेंगे... आप इसे देसी भाषा में 'स्लिप डिस्क' कह सकते हैं या 'कमर दर्द', आपकी मर्जी। मैंने अपने परिसर में लिफ्ट का प्रोविजन भी इस समस्या से निपटने के लिए किया है ।
अखबार, विज्ञापन और उपहार... तीन तिगाड़ा, जैसे इन्हीं में जिंदगी उलझ गई हो। वैसे भी गिफ्ट चीज ही ऐसी है, यह भी एक प्रकार का निवेश है, खरीदारी की राह को चिकना करने के लिए ताकि ग्राहक आसानी से फिसल सके। कंपनियां भी अब समझदार हो गई हैं, जैसे पति का मन जीतने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है, वैसे ही कंपनियों की बिक्री की भी कमान श्रीमती जी के हाथों में होती है। स्टाफ को निर्देश दे दिए गए हैं कि जो भी गिफ्ट कंपनी से आए, सीधे ऊपर पहुँचना चाहिए।गिफ्ट की नाप ,तोल,कीमत के हिसाब से गिफ्ट प्रदाता कंपनी की मार्केटिंग समझ का विश्लेषण होता है ।
दीवाली और नववर्ष, दो ऐसे मौके हैं, जहाँ श्रीमती जी की सख्त हिदायत है कि अखबार अपने मूल रूप में ही ऊपर आना चाहिए। दीवाली पर लक्ष्मी जी का पन्ना और नए साल पर कैलेंडर आएगा, इसी उम्मीद में अखबार बेडरूम तक आता है... वरना बाकी दिन तो स्टाफ ऐसे उठाता है कि दस बारह पम्पलेट उसमें से बेतरतीब गिर पड़ते हैं, जैसे धूल भरे कंबल में लट्ठ मारने पर धूल उड़ती है। पीछे से स्वीपर झाड़ू लिए तैयार रहता है धूल साफ करने के लिए... अखबार की तीन बार डिलीवरी होती है, एक बार हॉकर से, दूसरी बार हमारे पड़ोसी शर्मा जी से और तीसरी बार स्टाफ से। हॉकर से सामान्य डिलीवरी होती है, लेकिन हमारे पड़ोसी शर्मा जी और उनका कुत्ता टोमी तो पूरी सिजेरियन जैसी काट-छांट वाली डिलीवरी करते हैं अखबार की।
“सुनो, शर्मा जी को कह देना कि कम से कम दीवाली पर अखबार का बोझ हमें ही उठा लेने दें। पिछली बार लक्ष्मी जी का पन्ना निकाल लिया था। “ बताओ, अखबार लगाया ही इसीलिए कि दीवाली पर लक्ष्मी का पन्ना मिल जाए और नए साल का कैलेंडर। बाकी थोड़ी बहुत कीमत रद्दी वाले से मिल जाती है। श्रीमती जी का आमद-खर्च का लेखा-जोखा... कमाल है!
मैंने कहा, "भाग्यवान, एक लक्ष्मी के पन्ने के लिए इतनी मारामारी... बाज़ार से खरीद लेंगे, ज्यादा से ज्यादा एक रुपए का आएगा।"
श्रीमती जी, "नहीं... लक्ष्मी अगर घर में आएगी तो अखबार वाले लक्ष्मी के पन्ने से ही।"
अखबार साक्षात सांता क्लॉज सा लग रहा था मुझे, ऐसा लगा लक्ष्मी जी ने अपना वाहन बदल लिया है। उल्लू की जगह अब अखबार में सवार होकर आ रही हैं। पूरा अखबार रंगीन विज्ञापनों, सेल, डिस्काउंट, ऑफर्स और शुभकामनाओं से अटा पड़ा था। हर कंपनी ने अपने विज्ञापन में लक्ष्मी माता को भी बिठा रखा था, ऐसा लग रहा था जैसे लक्ष्मी माता ही ब्रांड एम्बेसडर बनकर बाजार को घर-घर पहुंचा रही हैं।
अभी विज्ञापनों के अम्बार में हाथ डालकर लक्ष्मी जी के पन्ने को टटोल ही रहा था कि वह कहीं नजर नहीं आया... लक्ष्मी का पन्ना गायब...
अखबार के पन्ने पलटते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हर विज्ञापन गलत इशारा कर के हमें बुला रहा हो, "कहाँ जाते हो? छलिये, इधर तो आइए... कभी तो आइए हमारी हवेली पर।" मैं सबसे नजरें बचाता हुआ, खासकर श्रीमती जी की नजर से भी, किसी प्रकार आखिरी पन्ने तक पहुंचा... लेकिन लक्ष्मी का पन्ना नदारद...
श्रीमती जी गश खाकर गिरने ही वाली थीं कि मैंने उन्हें संभाला। इस बेवफाई पर श्रीमती जी अखबार वाले को कोसने लगीं, "अच्छा सिला दिया तूने...!"
इतने में ही अखबार वाला हॉकर हाथ में लक्ष्मी जी का पन्ना लिए आता दिखाई दिया। "नमस्ते साहब, नमस्ते भाभी जी, दीवाली की शुभकामनाएं!" वो खीसें निपोरता हुआ बोला, "वो साहब, मैंने सोचा अपने हाथों से लक्ष्मी का पन्ना दं आपको... वो क्या है, आप तो जानते ही हैं, आपके पड़ोसी शर्मा जी खुद तो अखबार लगवाते नहीं, आपके अखबार से काम चला रहे हैं। उनका भरोसा नहीं, कहीं आपका लक्ष्मी का पन्ना न निकाल लें।"
वो लक्ष्मी का पन्ना देकर वहीं खड़ा रहा, इशारा साफ था... लक्ष्मी जी को हमारे घर तक लाया, बदले में उसे बख्शीश चाहिए थी।
श्रीमती जी, "रुको भाई, वो आपकी मिठाई लाती हूँ।"
आधा किलो मिठाई के बदले लक्ष्मी मइया आपके द्वार आ रही हैं... कोई बुरी डील तो नहीं। फिर अंत में एक रुपया भी बच गया और बाजार की दौड़ भी!
रचनाकार -डॉ मुकेश असीमित
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