02/04/2026
राधे राधे 🙏🏻 जय मां ललितांबिका 🙏🏻 👉🏻जब भीतर का शिव, भीतर की शक्ति से एकाकार होता है… तब साधक अर्धनारीश्वर के दिव्य स्वरूप को धारण कर लेता है
यह केवल ज्ञान नहीं… यह अनुभूति का वह परम रहस्य है जो तंत्र और कुंडलिनी योग के गूढ़तम आयामों में प्रकट होता है। इसे शब्दों में समझना सीमित है, पर अनुभव करना अनंत है।
जब साधक बाह्य संसार के मोह-माया से ऊपर उठकर अपने अंतर के सूक्ष्म लोक में प्रवेश करता है, तब उसे ज्ञात होता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना का एक विराट केंद्र है। उसके भीतर दो मूल तत्त्व सदा से विद्यमान हैं—
शिव: निश्चल, निराकार, साक्षी, शून्य का परम बिंदु।
शक्ति: स्पंदन, ऊर्जा, सृजन, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड की गति।
जब साधक अपनी प्राणशक्ति को विषयों में व्यर्थ बहने से रोकता है, इंद्रियों को संयमित करता है और चित्त को एकाग्र करता है, तब उसकी सुप्त ऊर्जा कुंडलिनी मूलाधार से जागृत होती है।
यह ऊर्जा धीरे-धीरे प्रत्येक चक्र को भेदती हुई ऊपर उठती है, हर केंद्र को शुद्ध करती है, और अंततः सहस्रार कमल में प्रवेश करती है।
सहस्रार में पहुँचते ही चेतना का विस्फोट होता हैयह कोई भौतिक घटना नहीं, बल्कि आत्मा का ब्रह्म से मिलन है। इसी क्षण शक्ति, शिव में विलीन होती है… और द्वैत समाप्त हो जाता है।
तब साधक न पुरुष रहता है, न स्त्री… वह अर्धनारीश्वर की अवस्था में स्थित हो जाता है
जहाँ संतुलन पूर्ण है,
जहाँ चेतना जागृत है,
जहाँ केवल शांति, आनंद और साक्षित्व शेष है।
यह अवस्था हमें यह बोध कराती है कि जो हम बाहर खोज रहे हैं, वह सब हमारे भीतर ही सन्निहित है। परम सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे ही अंतर्मन में विराजमान है।
🙏 प्रार्थना
हे शिव, हे आदिशक्ति…
मेरे अंतर्मन के अज्ञान को दूर करो।
मेरी सुप्त कुंडलिनी को जागृत कर मुझे उस परम अवस्था तक ले चलो
जहाँ मैं संतुलन, जागरूकता और पूर्णता को प्राप्त कर सकूँ।
👉🏻साधना का मार्ग
प्रतिदिन कुछ समय श्वास पर ध्यान केंद्रित करें।
अपनी चेतना को मूलाधार से सहस्रार तक प्रवाहित होते अनुभव करें।
अपने भीतर उठती ऊर्जा को प्रकाश के रूप में देखें…
और स्वयं को उसी दिव्य प्रकाश में विलीन होने दें।
👉🏻यह मार्ग कठिन अवश्य है, पर जो इस पर स्थिर रहता है, वह साधारण सीमाओं से परे जाकर दिव्यता को स्पर्श कर लेता है। शिव संकल्प मस्तु 🙏🏻 सांब सदाशिव 🙏🏻