13/12/2025
पुराण सम्मत है #गङ्गा_स्नान!
सन्दर्भ— #प्रयाग_माघमेला
कहा गया है कि —
"गङ्गायास्तु एकबिन्दुः पवित्रः स्यात् समन्ततः।
सम्पूर्णा गङ्गा यथा तथा बिन्दुः सदैव पावनः॥"
#अर्थात्— गङ्गा की एक बूँद भी चारों ओर से पवित्र है, जैसे समूची गङ्गा है, वैसे ही वह बूँद सदैव पावन है।
यहाँ उल्लेख्य है कि "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहे और माने गये 'भगवान' राम पिता की आज्ञा से वनवास के लिए जाते हैं। वे गङ्गा पार करते हैं। यद्यपि वन के लिए जाते या, वनवास से लौटते समय उनके द्वारा कहीं पर #गङ्गा_स्नान का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
वाल्मीकिकृत ' #रामायण' या, तुलसीदासकृत ' #श्रीरामचरितमानस' में श्री राम के #गङ्गा_स्नान करने का कोई उल्लेख नहीं है। यही दोनों ग्रन्थ ' #राम_कथा' के सर्वाधिक प्रमाणित माने गये हैं। इसके आधार पर अनेक लोग, विशेषकर कई आधुनिक 'बाबा गण' अपने प्रवचनों, कथाओं में तथा गाहे बगाहे अवसर मिलने पर #गङ्गा_स्नान और इसकी महिमा को अतिरञ्जित मानते/बताते हैं। कुछ 'ज्ञानी' तो गङ्गा स्नान की परम्परा को और भी बहुत कुछ कह जाते हैं। हालाँकि #गङ्गा_स्नान का पुराणों में विशद महत्व बताया गया है। दुर्भाग्य से संस्कृत और पुराणों से अपरिचित तथा इनसे दूर रहने वाले इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं।
पुराणों में #गङ्गा_स्नान की महिमा और इससे मनुष्य जाति के पाप-नाश होने का व्यापक उल्लेख है।
प्रमुख पौराणिक सन्दर्भ :
#विष्णुपुराण, #भविष्यपुराण, #मत्स्यपुराण, #गरुड़पुराण और #पद्मपुराण में गङ्गा के दर्शन, स्पर्श, जल-पान एवं स्नान से तीन जन्मों के पाप नष्ट होने का वर्णन है।
#स्कन्दपुराण के अध्याय 27 में गङ्गा की विशेष महत्ता बतायी गयी है, जहाँ स्नान से स्वर्ग या, निर्वाण की प्राप्ति होती है। इसी से सनातन हिन्दू परम्परा में मृत्यु के उपरान्त अन्तिम क्रिया-कर्म गङ्गा के तट पर या, कम से कम चिता की भस्म (राख) अथवा, अस्थियाँ गङ्गा में प्रवाहित किये जाने की प्रथा और इसका महत्व है।
लाभ और कथाएँ :
#देवीभागवत_पुराण में उल्लेख है कि, श्रीकृष्ण द्वारा गङ्गा को वरदान दिया गया कि उसके स्पर्श से करोड़ों जन्मों के पाप धुल जाते हैं, स्नान से दस गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है।
#ब्रह्मपुराण में कुम्भ जैसे पर्वों पर गङ्गा स्नान को लाख गुना फलदायी कहा गया है।
रामायण सन्दर्भ से भिन्नता :
ये उल्लेख गङ्गा की सामान्य पुण्यप्रदत्ता पर हैं, न कि राम के वनवास प्रस्थान अथवा वापसी के समय विशिष्ट स्नान पर।
#श्रीरामचरितमानस में सरयू की भाँति गङ्गा को भी पावन बताया गया, किन्तु वनवास के आरम्भिक चरण में उनके #गङ्गा_स्नान का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं।
#श्रीरामचरितमानस म में राम के वनवास प्रस्थान के समय जाते हुए निषादराज 'गुह' की नौका से गङ्गा पार करने का तो वर्णन है परन्तु गङ्गा स्नान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
वनवास यात्रा का संक्षिप्त वर्णन :
#श्रीरामचरितमानस के #अयोध्याकाण्ड में राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान करते हैं। वे श्रृंगवेरपुर पहुँचते हैं, जहाँ निषादराज गुह (केवट) के सहयोग से गङ्गा पार करते हैं, लेकिन स्नान का वर्णन नहीं मिलता।
प्रयागराज और भारद्वाज आश्रम :
गङ्गा पार करने के बाद राम प्रयागराज के निकट भारद्वाज आश्रम पहुँचते हैं। (अब यह प्रयागराज में है।) कुछ स्थानीय परम्पराओं में वहाँ कूप स्नान की कथा जोड़ी जाती है, परन्तु #श्रीरामचरितमानस के #बालकाण्ड या #अयोध्याकाण्ड में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख अनुपस्थित है।
अन्य स्नान सन्दर्भ :
मानस में चित्रकूट या पञ्चवटी जैसे स्थानों पर नदी स्नान का सामान्य वर्णन है, किन्तु वनवास के प्रारम्भिक चरण में गङ्गा स्नान का वर्णन विशेष रूप से कहीं नहीं है।
#वाल्मीकि_रामायण में भी प्रस्थानकालीन समय में गङ्गा स्नान का अभाव है।
#श्रीरामचरितमानस के #बालकाण्ड (दोहा 34 के बाद) में चौपाई आती है— "दरस परस मज्जन अरु पाना।" यह सरयू नदी की महिमा का वर्णन करती है।
चौपाई का पूर्ण पाठ :
"दरस परस मज्जन अरु पाना।
हरइ पाप कह बेद पुराना॥"
"नदी पुनीत अमित महिमा अति।
कहि न सकइ सारदा बिमलमति॥
अर्थ और सन्दर्भ :
वेद-पुराणों के अनुसार सरयू नदी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जल-पान करने से पाप नष्ट हो जाते हैं। इसकी असीम पुण्यमयता का वर्णन देवी सरस्वती भी नहीं कर सकतीं। यह अयोध्या की पावनता और रामकथा आरम्भ के पूर्व नदी की महत्ता बताती है।
#श्रीरामचरितमानस में के #बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास सरयू की स्तुति कर रामचरित की शुरुआत करते हैं। यह वनवास प्रस्थान से पूर्व अयोध्या के वातावरण का चित्रण है, न कि वनवास के दौरान गङ्गा स्नान का।
बावजूद इसके, सहस्राब्दियों से यह मान्यता #वेदवाक्य सी प्रचलित है— "गङ्गे तव दर्शनात् मुक्ति:।"
पुराणों में यह एक स्वतंत्र आशीर्वाद वाक्य के रूप में प्रसिद्ध है, जो भगवान विष्णु के द्वारा गङ्गा अवतरण के समय दिया गया।
#नृसिंह_पुराण में इसके द्वारा गङ्गा के दर्शन मात्र से मोक्ष प्राप्ति का वरदान बताया गया है। यह नृसिंह पुराण के #गङ्गा_माहात्म्य में वर्णित है, जहाँ विष्णु गङ्गा को सम्बोधित कर कहते हैं कि उनके दर्शन से ही भक्तों को मुक्ति मिलेगी।
सन्दर्भ और लाभ :
पुराणों के अनुसार, गङ्गा सप्तमी या दशहरा पर इस वाक्य ("गङ्गे तव दर्शनात् मुक्ति:") के पाठ से पाप नष्ट होते हैं। अनेक सन्दर्भों में
गङ्गा को मोक्षदायिनी बताते हुए इनके दर्शन को स्नान से भी श्रेष्ठ माना गया है। यह हिन्दू परम्परा में गङ्गा भक्ति का मूल मंत्र है।
अनेक उद्भट विद्वानों के द्वारा संस्कृत में कहा गया है कि — "गङ्गाजलस्य केवलं कामना, गङ्गानामस्मरणं वा मोक्षदं भवति।
गङ्गाजलदर्शनमात्रेण तु परं मोक्षमवाप्यते।
लघु व्याख्या :
यहाँ ‘गङ्गाजलस्य केवलं कामना’ का अर्थ है— गङ्गाजल की केवल इच्छा करना भी मुक्तिदायक है।
‘नामस्मरणं वा’ यानी गङ्गा का नाम स्मरण करना भी मोक्ष देने वाला है। और ‘दर्शनमात्रेण’ से तात्पर्य है कि गङ्गा या उसके जल को देखने मात्र से परम मोक्ष प्राप्त होता है।
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