Advance Ayurveda and Piles Clinic

Advance Ayurveda and Piles Clinic AN TRUSTWORTHY CENTRE FOR COMPLETE CURE OF PILES,FISTULA,FISSURE AND PILONIDAL SINUS. KSHAR SUTRA IS AN ANCIENT TECHNIQUE TO GET COMPLETE RID OFF.

बीमारियों का जड़ से खात्मा करता है 'पंचकर्म', शरीर की गंदगी को निकालता बाहर!https://hindi.news18.com/news/lifestyle/heal...
18/02/2026

बीमारियों का जड़ से खात्मा करता है 'पंचकर्म', शरीर की गंदगी को निकालता बाहर!
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Gonda News: शरीर में तीन दोष वात, पित्त और कफ होते हैं. जब इनका संतुलन बिगड़ जाता है, तब बीमारियां पैदा होती हैं. पंचकर्म इन द...

12/10/2025

🇮🇳 नीलगिरी या सफेदा या लिप्टिस (Eucalyptus) – श्वसन रोगों का प्राकृतिक रक्षक 🙏

आयुर्वेद में नीलगिरी के पत्ते और तेल को विशेष औषधीय गुणों वाला माना गया है। इसका स्वाद तिक्त (कड़वा) और गुण उष्ण (गर्म) होते हैं। यह मुख्य रूप से कफ-नाशक, श्वसन रोग हर, जीवाणुनाशक और वेदनाहर (दर्द निवारक) है।

✅ नीलगिरी के प्रमुख लाभ

1. श्वसन तंत्र के लिए अमृत – दमा, खांसी, सर्दी-जुकाम और सांस की तकलीफ में लाभकारी।

2. कफ नाशक – बलगम को पतला कर बाहर निकालता है।

3. दर्द निवारक – जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों के दर्द और गठिया में उपयोगी।

4. जीवाणु व विषाणु नाशक – संक्रमण, फंगल और बैक्टीरिया रोगों में असरदार।

5. मस्तिष्क शुद्धि व ताजगी – इसकी सुगंध मानसिक तनाव और सिरदर्द को कम करती है।

6. त्वचा रोग नाशक – घाव, फोड़े-फुंसी, खुजली और संक्रमण में लाभकारी।

7. कीट निवारक – मच्छर और कीड़े भगाने में प्रभावी।

🩺 नीलगिरी से आयुर्वेदिक उपचार (Treatment Uses)

सर्दी-जुकाम: नीलगिरी तेल की भाप लेने से बंद नाक खुलती है और कफ बाहर आता है।

दमा व खांसी: नीलगिरी पत्तों का काढ़ा पीने से श्वसन मार्ग साफ होता है।

जोड़ों का दर्द: नीलगिरी तेल की मालिश करने से सूजन और दर्द कम होता है।

त्वचा रोग: नीलगिरी तेल को नारियल तेल में मिलाकर लगाने से घाव और फंगल संक्रमण ठीक होते हैं।

सिरदर्द: इसकी भाप या तेल की सुगंध सूंघने से राहत मिलती है।

मच्छर भगाने में: कमरे में नीलगिरी तेल मिलाकर जलाने से मच्छर दूर रहते हैं।

🍃 सेवन और उपयोग की सात विधियाँ (Seven Vidhi)

1. भाप चिकित्सा (Steam Inhalation) – नीलगिरी तेल की कुछ बूंदें गर्म पानी में डालकर भाप लेना।

2. काढ़ा (Decoction) – पत्तों का काढ़ा बनाकर पीना, खासकर खांसी-दमा में।

3. तेल मालिश (Massage Oil) – नीलगिरी तेल को तिल या नारियल तेल में मिलाकर दर्द वाले स्थान पर लगाना।

4. अरोमा थेरेपी – कमरे में नीलगिरी तेल की सुगंध फैलाकर मानसिक ताजगी पाना।

5. लेप (Paste) – पत्तों को पीसकर फोड़े-फुंसी पर लगाना।

6. सिरदर्द निवारण – माथे पर नीलगिरी तेल की हल्की मालिश।

7. कीट प्रतिरोधक – पानी या कपूर में नीलगिरी तेल डालकर कमरे में छिड़काव करना।

⚠️ सावधानी:

नीलगिरी तेल को कभी भी सीधा और अधिक मात्रा में न पिएँ।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं में केवल डॉक्टर की सलाह से प्रयोग करें।

अत्यधिक सेवन से उल्टी, चक्कर या सिरभारी हो सकती है।

👉 नीलगिरी को आयुर्वेद में “कफघ्न व श्वसन हितकर” औषधि माना गया है। यह प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और एंटीवायरल गुणों से भरपूर है।
साभार: PT

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11/10/2025

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🌿 भूम्यामलकी (Bhumi Amla)

जिसे संस्कृत में भूम्यावला, तामालकी या भूद्राक्षा भी कहा जाता है — यह आयुर्वेद की अत्यंत प्रसिद्ध औषधि है।
इसका वैज्ञानिक नाम 👉 Phyllanthus niruri Linn.
यह पौधा भूमि पर फैलने वाला छोटा सा शाक होता है, इसलिए इसे "भूम्यामलकी" (भूमि पर उगने वाली आंवला) कहा गया है।

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🌿 परिचय

कुल (Family): Euphorbiaceae

रूप: छोटा, कोमल, शाखाओं वाला पौधा — आंवले जैसा फल पत्तियों के नीचे उलटे लटकते हैं।

स्वाद (Rasa): तिक्त, कषाय

गुण (Guna): लघु, रुक्ष

वीर्य (Virya): शीत

विपाक (Vipaka): कटु

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⚕️ मुख्य उपयोग (Medicinal Uses)

रोग / समस्या उपयोगिता

यकृत विकार (Liver diseases) अत्यंत प्रभावी – विशेषकर हेपेटाइटिस-B, पीलिया, लिवर की सूजन में।
मूत्र रोग (Urinary disorders) मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन), मूत्राश्मरी (किडनी स्टोन) में उपयोगी।
कफ-पित्त विकार पित्तज ज्वर, कफ-पित्तज विकार में शमन करती है।
त्वचा रोग रक्तशोधक होने से त्वचा के दाग, फोड़े, खुजली में लाभकारी।
मधुमेह (Diabetes) रक्तशर्करा को संतुलित करती है।
अग्निमांद्य / अपच यकृत को सक्रिय करके पाचन सुधारे।

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🧪 प्रयुक्त भाग (Part Used):

पूरा पौधा (Whole plant)

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💊 मात्रा एवं उपयोग विधि

रूप मात्रा सेवन विधि

चूर्ण 3–5 ग्राम दिन में 2 बार, गुनगुने पानी से
स्वरस 10–20 मि.ली. दिन में 2 बार, भोजन से पहले
काढ़ा 30–50 मि.ली. दिन में 2 बार
घनसार / टैबलेट चिकित्सक की सलाह अनुसार —

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⚠️ सावधानी

अत्यधिक मात्रा में सेवन करने पर शरीर में ठंडक बढ़ा सकता है।

गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक।

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📜 आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख

> "भूम्यामलकी तिक्तका लघुशीता पित्तकफजित्।
रक्तपित्तकृमिज्वरघ्नी यकृत्प्लीहविनाशिनी॥"
(भावप्रकाश निघण्टु)

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🏥 उपलब्ध स्थान

Advance Ayurveda and Piles Clinic
📍 महादेवा कलां, जय प्रभा ग्राम, गोंडा – 271209
🕑 समय: दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक
📞 मोबाइल: 9919941200

Dr. Abhishek's Wellness Centre
📍 रानीजोत, बड़गांव, गोंडा – 271002
🕗 समय: सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक
📞 मोबाइल: 9919941200

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🌕 करवा चौथ का आयुर्वेदिक महत्त्व — जब स्त्री का संयम बनता है परिवार की सुरक्षा

(लेखक – वैद्य अभिषेक कुमार मिश्र, Advance Ayurveda & Piles Clinic / Dr. Abhishek’s Wellness Centre)

हज़ारों वर्षों से भारतीय स्त्रियाँ करवा चौथ का व्रत रखती आई हैं —
सिर्फ़ पति की लंबी आयु के लिए नहीं, बल्कि उसके अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की पवित्रता की रक्षा के लिए भी।
आयुर्वेद की दृष्टि से यह व्रत एक शारीरिक, मानसिक और यौनिक (sexual) शुद्धि साधना है।

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🌿 १. उपवास – शरीर की गहराई तक शुद्धि

आयुर्वेद कहता है —

> “लघ्वन्नं बलवर्धनम्” — चरक संहिता

दिनभर का उपवास आमशय को विश्राम देता है, जिससे रक्त, रस और शुक्र धातु की गुणवत्ता सुधरती है।
यह टॉक्सिन्स (विष) को हटाकर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है, जिससे संक्रमणों से बचाव होता है।

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🌸 २. हार्मोनल संतुलन — यौन स्वास्थ्य की जड़

करवा चौथ जैसे उपवास, ध्यान और संयम से एंडोक्राइन सिस्टम (हार्मोनल तंत्र) संतुलित होता है।
यह सीधे तौर पर प्रजनन स्वास्थ्य को सुधारता है।

जब महिला का हार्मोन संतुलन सही रहता है, तो गर्भाशय, योनि और मूत्रमार्ग की रोगप्रतिरोधक क्षमता (local immunity) बढ़ती है।

इससे बैक्टीरियल, फंगल या वायरल संक्रमण (जैसे Trichomoniasis, HPV, Herpes, Candida infection) की संभावना घटती है।

यह STDs/STIs (Sexually Transmitted Diseases/Infections) जैसे रोगों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरक्षा बनाता है।

👉 इस तरह, स्त्री का हॉर्मोनल और मानसिक संतुलन पति के यौन स्वास्थ्य और जीवनकाल दोनों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
यही कारण है कि करवा चौथ को पति-पत्नी दोनों के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाला पर्व माना गया है।

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🌼 ३. चन्द्रमा का मानसिक व शारीरिक प्रभाव

> “चन्द्रमाः मनसो जातः” — उपनिषद्

चन्द्रमा “मन” का अधिपति है।
रात्रि में चन्द्रमा का दर्शन पित्त दोष को शांत करता है और Serotonin-Melatonin जैसे हार्मोन के स्तर को संतुलित रखता है।
यह तनावजनित यौन रोगों (psychosexual disorders) जैसे low libido, premature issues, irritability आदि में लाभकारी होता है।

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🌺 ४. सोमजल सेवन — शीतलता और शुद्धि का प्रतीक

चन्द्रकिरणों में रखा हुआ जल (सोमजल) पित्त और रक्त दोषों को शांत करता है, जिससे त्वचा, गर्भाशय और शुक्र धातु शुद्ध रहते हैं।
आयुर्वेद कहता है कि शुद्ध शुक्र और शुद्ध रज ही स्वस्थ संतान और दीर्घायु दांपत्य जीवन की नींव हैं।

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🌹 ५. मानसिक प्रसन्नता – सर्वश्रेष्ठ औषधि

> “मनः प्रसादः सर्वारोगपरिहारकः”

जब मन संयमित और प्रसन्न होता है, तब शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति चरम पर होती है।
करवा चौथ का व्रत प्रेम, संयम और आत्मसंयोजन की साधना है — यही कारण है कि यह शारीरिक और यौन दोनों प्रकार के रोगों से सुरक्षा का एक सांस्कृतिक कवच भी बन गया है।

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🔔 निष्कर्ष

करवा चौथ केवल धार्मिक कर्म नहीं,
बल्कि एक गहन आयुर्वेदिक और जैविक साधना है —
जो स्त्री के शरीर, मन और रज-शुक्र धातु को शुद्ध करती है।
इससे न केवल हार्मोनल असंतुलन और संक्रमणजन्य रोगों का जोखिम घटता है,
बल्कि पति की दीर्घायु और यौन स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है।

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📍लेखक:
वैद्य अभिषेक कुमार मिश्र
Advance Ayurveda and Piles Clinic – महादेवा कलां, जय प्रभा ग्राम, गोंडा – 271209
🕑 समय: दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक

Dr. Abhishek’s Wellness Centre – रानीजोत, बड़गांव, गोंडा – 271002
🕗 समय: सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक
📞 9919941200

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I gained 195 followers, created 2 posts and received 5 reactions in the past 90 days! Thank you all for your continued s...
07/10/2025

I gained 195 followers, created 2 posts and received 5 reactions in the past 90 days! Thank you all for your continued support. I could not have done it without you. 🙏🤗🎉

✨ विशेष घोषणा ✨🩺 डॉ. अभिषेक का नया प्रयास – आपके स्वास्थ्य की अनोखी समीक्षा 🩺हम आपके लिए लेकर आए हैं एक विशेष स्वास्थ्य ...
27/08/2025

✨ विशेष घोषणा ✨

🩺 डॉ. अभिषेक का नया प्रयास – आपके स्वास्थ्य की अनोखी समीक्षा 🩺

हम आपके लिए लेकर आए हैं एक विशेष स्वास्थ्य समीक्षा (Health Review) का अवसर।
इसमें एक विशेष फॉर्म भरकर आपसे कुछ सवाल पूछे जाएंगे तथा निम्न जाँच की जाएगी –

👉 परीक्षण में शामिल:
✔ दशविध परीक्षा
✔ नाड़ी परीक्षा
✔ BP (ब्लड प्रेशर)
✔ Pulse
✔ Body Composition Analysis (शरीर की संरचना – वसा, स्नायु, आदि का आकलन)
✔ Temperature (शरीर का तापमान)
✔ Respiratory Rate (श्वसन दर)
✔ Weight (वज़न)

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और आपको मिलेगा:
✅ आपकी अनुमानित औसत आयु का आकलन
✅ संभावित बीमारियों की जानकारी
✅ उनसे बचाव के आसान उपाय

⚡ सबसे खास बात – यह सेवा पूरी तरह निशुल्क (FREE) है।

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🏥 क्लिनिक पते:
1️⃣ Dr. ABHISHEK'S WELLNESS CENTRE
Ranijot, Gonda

2️⃣ ADVANCE AYURVEDA AND PILES CLINIC
Mahadeva Kalan

📞 संपर्क: 9919941200

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🌿 आयुर्वेद और आधुनिक जांचों का संगम – एक स्वस्थ व दीर्घ जीवन की ओर।

किडनी-स्वास्थ्य में गोखरू, पुनर्नवा व सौंफ की आयुर्वेदिक भूमिका — शोध-संदर्भों सहित1) परिचयकिडनी रोग (CKD) धीरे-धीरे बढ़...
26/08/2025

किडनी-स्वास्थ्य में गोखरू, पुनर्नवा व सौंफ की आयुर्वेदिक भूमिका — शोध-संदर्भों सहित

1) परिचय

किडनी रोग (CKD) धीरे-धीरे बढ़ने वाली समस्या है। आयुर्वेद में मूत्रवह स्रोतस की शुद्धि-संतुलन के लिए जड़ी-बूटियों व पंचकर्म (शोधन) का वर्णन है—परन्तु आधुनिक साक्ष्य के पैमानों पर जड़ी-बूटियों का बहुत-सा शोध अभी पशु-अध्ययन, छोटे क्लिनिकल अवलोकन या केस-रिपोर्ट तक सीमित है। इसलिए उपयोग हमेशा चिकित्सकीय निगरानी, जाँच-रिपोर्ट और आधुनिक उपचार के साथ समन्वय में ही करें।

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2) गोखरू (Tribulus terrestris – गोक्शुर)

परंपरागत वर्णन: मूत्रल (diuretic), शोथहर, वृष्य—मुख्य प्रयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी और सूजन में।
शोध क्या कहता है?

कई प्रायोगिक अध्ययनों में गोखरू अर्क ने विषाक्तता-उत्पन्न किडनी क्षति में ऑक्सीडेटिव-स्ट्रेस कम करके नेफ्रोप्रोटेक्टिव प्रभाव दिखाया। उदाहरण: पारे/इस्केमिया-रीपरफ्यूज़न से हुई क्षति में क्रिएटिनिन-यूरिया में सुधार व ऊतक-सुरक्षा देखी गई।

साथ ही, अलग-अलग सप्लीमेंट्स/डोज़ में यकृत-किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव की केस-रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है—इसलिए स्व-औषध सेवन से बचें, डॉक्टर की देखरेख में सही दवा-रूप व मात्रा लें।

आयुर्वेदिक उपयोग-भाव: गोक्शुरादि गण के औषधों के साथ मूत्रल व शोथहर योगों में। मधुमेह/रक्तचाप नियंत्रित कर रही एलोपैथिक दवाओं के साथ इंटरैक्शन सम्भव—इसलिए संयोजन चिकित्सक ही तय करें।

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3) पुनर्नवा (Boerhavia diffusa)

परंपरागत वर्णन: नाम-ही बताता है—“फिर से नया करने वाली”, शक्तिशाली मूत्रल-शोथहर, किडनी-एडीमा में उपयोगी।
शोध क्या कहता है?

जेंटामाइसिन जैसी दवाओं से प्रेरित किडनी-क्षति के पशु-अध्ययनों में पुनर्नवा ने एंटीऑक्सिडेंट/एंटी-इन्फ्लेमेटरी क्रिया से संरक्षण दिखाया।

फार्माकोलॉजी/एथ्नोमेडिसिन समीक्षाएँ इसके बहु-आयामी प्रभाव (सूजनरोधी, मूत्रल, एंटी-फाइब्रोटिक संकेत) का उल्लेख करती हैं, पर मानव-आधारित बड़े नियंत्रित परीक्षण अभी सीमित हैं।

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4) सौंफ (Foeniculum vulgare)

परंपरागत वर्णन: पाचन-दीपनीय, वात-शामक, हल्की मूत्रल प्रवृत्ति—अपच-गैस में प्रसिद्ध।
शोध क्या कहता है?

कुछ प्रायोगिक अध्ययनों में सौंफ-बीज/स्प्राउट्स के अर्क ने ऑक्सीडेटिव-स्ट्रेस घटाकर तीव्र किडनी-क्षति मॉडलों में लाभ दिखाया, पर ये पशु-आधारित हैं; मनुष्यों में ठोस CKD-ट्रायल नहीं हैं।

> निष्कर्ष (जड़ी-बूटियाँ): गोखरू-पुनर्नवा-सौंफ जैसे औषधों में नेफ्रोप्रोटेक्टिव क्षमता के संकेत मिलते हैं, पर CKD में “मानक-उपचार के विकल्प” के रूप में इनका स्वतंत्र प्रयोग साक्ष्य-अपर्याप्त है। इन्हें पूरक (adjunct) रूप में, योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की निगरानी में ही लेना चाहिए।

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5) शोधन-थेरेपी (Panchakarma) व किडनी

आयुर्वेद में दोष-दुष्टि शांत करने हेतु शोधन (मुख्यतः विरेचन व बस्ति) का उपयोग वर्णित है। कुछ आयुर्वेदिक अध्ययनों/समीक्षाओं में उच्च रक्तचाप/सूजन पर इनके सहायक प्रभाव के संकेत मिलते हैं, पर CKD-विशिष्ट बड़े नियंत्रित क्लिनिकल ट्रायल अभी कम हैं।

अवगाह स्वेदन (Avagaha Swedana)

यह एक तापन/स्वेदन विधि है जिसमें अभ्यंग के बाद गर्दन तक औषध-कषाय/गर्म जल से भरे टब में बैठाकर पसीना लाया जाता है; इससे मांसपेशीय शिथिलता, दर्द-सूजन, वातिक लक्षणों में राहत बताई गई है। किडनी के लिए यह प्रत्यक्ष नेफ्रोप्रोटेक्टिव इलाज नहीं, बल्कि दर्द-सूजन/तनाव घटाने, पेशाब में रुकावट-जकड़न जैसी सह-समस्याओं में सहायक हो सकती है—और यह भी तभी जब रोगी की स्थिति (BP, हृदय, त्वचा, घाव) इसकी अनुमति दे।

> सुरक्षा-बिंदु: स्वेदन से निर्जलीकरण/लो-BP का खतरा हो सकता है; CKD में द्रव-संतुलन नाज़ुक होता है—इसलिए केवल चिकित्सकीय सेट-अप में, छोटी अवधि, तापमान-निगरानी व प्री-हाइड्रेशन के साथ करें।

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6) आधुनिक (एलोपैथिक) उपचार — “केवल डायलिसिस ही विकल्प” कहना क्यों सही नहीं

आधुनिक गाइडलाइंस बताती हैं कि CKD में डायलिसिस/ट्रांसप्लांट केवल अंतिम चरण (किडनी विफलता) के विकल्प हैं। शुरुआती-मध्यम चरणों में रोग-प्रगति धीमी करने के लिए कई दवाएँ व उपाय प्रभावी सिद्ध हुए हैं, जैसे:

RAAS अवरोधक (ACE-I/ARB), रक्तचाप व शुगर-नियंत्रण, नमक-प्रबंधन।

SGLT2 inhibitors (जैसे डैपाग्लिफ्लोज़िन): DAPA-CKD ट्रायल में किडनी-विफलता/मृत्यु-जोखिम में अर्थपूर्ण कमी दिखी—टाइप-2 डायबिटीज़ हो या न हो।

फिनेरिनोन (non-steroidal MRA): डायबिटिक CKD में किडनी/हृदय-घटनाएँ घटीं; हालिया संयोजन-डेटा में एम्पाग्लिफ्लोज़िन के साथ एल्ब्यूमिनुरिया में अधिक कमी दिखी।

अर्थात: समय रहते निदान-उपचार से बहुत-से मरीज वर्षों तक बिना डायलिसिस के अच्छा जीवन जी सकते हैं। इसलिए आयुर्वेद-आधुनिक चिकित्सा का इंटीग्रेटेड दृष्टिकोण सर्वोत्तम है—जड़ी-बूटियाँ/शोधन को “पूरक” और नेफ्रोलॉजिस्ट-निर्देशित दवाओं को “आधार” मानें।

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7) व्यावहारिक एकीकृत योजना (क्लिनिक सेट-अप में)

1. आकलन: eGFR, सीरम क्रिएटिनिन/यूरिया, एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन रेश्यो, BP, शुगर, इलेक्ट्रोलाइट्स, USG; चरण निर्धारण (KDIGO)।

2. जीवन-शैली: नमक सीमित, धूम्रपान-निवारण, पर्याप्त नींद, उचित प्रोटीन (गाइडलाइन-आधारित), नियमित फॉलो-अप।

3. आधुनिक दवाएँ: BP/शुगर नियंत्रण + SGLT2i ± RAAS ब्लॉकर ± चयनित मरीजों में फिनेरिनोन (डॉक्टर निर्णय)।

4. आयुर्वेदिक सहायक उपचार:

पुनर्नवा-मंडूर/गोक्षुरादि योग जैसे मानक योग—रक्त-अल्पता/सूजन/मूत्रकृच्छ्र में संकेतानुकूल। (रक्तक्षय, गर्भावस्था, दवा-इंटरैक्शन में सावधानी)

अवगाह स्वेदन (यदि उपयुक्त) + सौम्य अभ्यंग; निर्जलीकरण/लो-BP में निषेध।

हर 4–8 सप्ताह में लैब-मॉनिटरिंग; किसी भी खराबी पर तुरंत बदलाव।

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8) नैतिक-कानूनी सूचना

जड़ी-बूटियों/पंचकर्म को “किडनी पूरी तरह ठीक कर देता है” कहना वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्य के अनुरूप नहीं है; कई मामलों में ये लक्षण-नियंत्रण/प्रगति-धीमी करने में सहायक दिखते हैं।

सप्लीमेंट रूप में बिकने वाले अर्कों की गुणवत्ता-शुद्धता भिन्न हो सकती है; विश्वसनीय स्रोत व चिकित्सकीय देखरेख आवश्यक है।

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9) क्लिनिक विवरण (आपके निर्देशानुसार)

Dr. Abhishek’s Wellness Centre, रणीजोत, गोंडा
संपर्क: 9919941200

> आपके क्लिनिक के आंतरिक रिकॉर्ड के अनुसार, डॉ. अभिषेक कुमार मिश्र ने अब तक लगभग 1000 मरीजों में किडनी-स्वास्थ्य में सुधार देखा है (उपचार-प्रतिक्रिया/फॉलो-अप के आधार पर)। ऐसी उपलब्धियों के लिए मरीज-सहमति के साथ डॉक्युमेंटेशन/ऑडिट-फ्रेंडली डेटा रखना उपयोगी होगा—ताकि भविष्य में केस-सीरीज़/पेपर के रूप में प्रकाशित किया जा सके।

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10) सार

गोखरू-पुनर्नवा-सौंफ: परंपरागत रूप से किडनी-समर्थक; पशु-अध्ययनों व कुछ समीक्षाओं में नेफ्रोप्रोटेक्टिव/मूत्रल/एंटी-इन्फ्लेमेटरी संकेत—पर मानव-स्तर पर बड़े परीक्षण सीमित।

शोधन व अवगाह स्वेदन: उपयुक्त चयन के साथ सहायक—पर CKD में प्रत्यक्ष इलाज नहीं; सुरक्षा-प्रोटोकॉल आवश्यक।

आधुनिक चिकित्सा: केवल डायलिसिस नहीं—RAAS ब्लॉकर्स, SGLT2i, फिनेरिनोन, जीवन-शैली व नियमित मॉनिटरिंग से रोग-प्रगति धीमी की जा सकती है; डायलिसिस/ट्रांसप्लांट अंतिम-चरण विकल्प हैं।

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22/04/2025

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अभिषेक वैलनेस सेंटर गोंडा और एडवांस आयुर्वेद पाइल्स क्लिनिक महादेवा कलां में एक सप्ताह तक नि:शुल्क जांच की जाएगी। इसमें निम्नलिखित जांचें शामिल हैं ¹:
- *शारीरिक जांचें:*
- बीपी (ब्लड प्रेशर)
- ऑक्सीजन स्तर
- पल्स रेट (नाड़ी दर)
- तापमान
- *शरीर संरचना विश्लेषण:*
- बॉडी वेट (शरीर का वजन)
- बॉडी फैट (शरीर की चर्बी)
- बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स)
- मसल रेट (मांसपेशियों की दर)
- बॉडी वॉटर (शरीर में पानी की मात्रा)
- बोन मास (हड्डियों का द्रव्यमान)
- बीएमआर (बेसल मेटाबोलिक रेट)
- मेटाबोलिक ऐज (चयापचय आयु)
- विसरल फैट (आंतरिक चर्बी)
- सब क्यूटनेस फैट (त्वचा के नीचे की चर्बी)
- प्रोटीन मास (प्रोटीन द्रव्यमान)
- मसल मास (मांसपेशियों का द्रव्यमान)
- वेट विदाउट फैट (चर्बी के बिना वजन)
- मोटापा स्तर (मोटापे का स्तर)
- स्केलेटल मसल मास (कंकाल की मांसपेशियों का द्रव्यमान)

अधिक जानकारी या अपॉइंटमेंट के लिए आप 9919941200 पर संपर्क कर सकते हैं। यह आयुर्वेदिक केंद्र बवासीर (पाइल्स) के इलाज में विशेषज्ञता रखता है, जिसमें आंतरिक और बाहरी बवासीर दोनों के लिए उपचार प्रदान किया जाता है। आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से शरीर को शुद्ध करने और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

If you are visiting hospitals. Once u can choose ayurved.
15/04/2025

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Once u can choose ayurved.

01/07/2024

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Gonda
271209

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Tuesday 9am - 5pm
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