Dr Neetesh Singh

Dr Neetesh Singh सर्वहित सर्वोपरि

09/07/2026

पाँच 'F'.....

तरल पदार्थ (Fluids):- जल स्रोत की रक्षा करें।

उंगलियाँ (Fingers):- भोजन तैयार करने से पहले हाथ धोएँ।

मक्खियाँ (Flies):- भोजन को ढक दो।

क्षेत्र (Fields):- उपयोग से पहले सब्जियों और फलों को साफ करें।

भोजन (Food) :- उचित जल निकासी व्यवस्था।

ये पाँच अच्छी आदतें हमारे शरीर को बीमारियो से बचा सकती हैं।

चर्म रोग(skin disease) वे बीमारियाँ हैं जो त्वचा को प्रभावित करती हैं। इनके सामान्य लक्षणों में खुजली, लालपन, दाने, सूजन...
08/07/2026

चर्म रोग(skin disease) वे बीमारियाँ हैं जो त्वचा को प्रभावित करती हैं। इनके सामान्य लक्षणों में खुजली, लालपन, दाने, सूजन, जलन, सूखी त्वचा, सफेद या काले धब्बे तथा फफोले शामिल हैं। इनके कारण एलर्जी, संक्रमण (बैक्टीरिया, वायरस या फंगस), आनुवंशिकता, हार्मोनल परिवर्तन, खराब स्वच्छता या प्रतिरक्षा संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। सामान्य चर्म रोगों में एक्जिमा, सोरायसिस, दाद, मुहाँसे और विटिलिगो शामिल हैं। समय पर सही निदान और उपचार से अधिकांश चर्म रोगों को नियंत्रित या ठीक किया जा सकता है। त्वचा की स्वच्छता बनाए रखना, संतुलित आहार लेना और चिकित्सक की सलाह का पालन करना आवश्यक है।

अस्थमा एवं एलर्जी में सावधानियाँ.धूल, धुआँ, परागकण, तेज़ गंध और ठंडी हवा से बचें। धूम्रपान एवं तंबाकू से दूर रहें। घर की...
06/07/2026

अस्थमा एवं एलर्जी में सावधानियाँ.
धूल, धुआँ, परागकण, तेज़ गंध और ठंडी हवा से बचें। धूम्रपान एवं तंबाकू से दूर रहें। घर की नियमित सफाई रखें और पर्याप्त पानी पिएँ। संतुलित आहार लें, नियमित व्यायाम करें तथा डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का समय पर सेवन करें। सांस लेने में अधिक तकलीफ़ होने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। अधिक जानकारी और बीमारी छुटकारा के लिए सम्पर्क करे.

PCOS युवतियों और प्रजनन आयु की महिलाओं में बहुत आम समस्या:-आइये सरल और समान्य रूप से समझते है पीसीओएस (PCOS) यानी पॉलीसि...
31/12/2025

PCOS युवतियों और प्रजनन आयु की महिलाओं में बहुत आम समस्या:-

आइये सरल और समान्य रूप से समझते है पीसीओएस (PCOS) यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम एक हार्मोनल समस्या है, जिसमें अंडाशय ज़्यादा पुरुष हार्मोन बनाते हैं और अंडे सही तरह परिपक्व व रिलीज़ नहीं हो पाते। यह आजकल युवतियों और प्रजनन आयु की महिलाओं में बहुत आम हो गया है।

पीसीओएस क्या होता है?
यह एक हार्मोनल विकार है जो अंडाशय (ovaries) और ओव्यूलेशन को प्रभावित करता है।अंडाशय में कई छोटी-छोटी पानी भरी सिस्ट (थैलियाँ) बन सकती हैं, जिनसे अंडा निकलने की प्रक्रिया बाधित होती है।शरीर में एण्ड्रोजन (पुरुष हार्मोन) और अक्सर इंसुलिन का स्तर बढ़ा रहता है, जिससे कई तरह के लक्षण दिखते हैं।

पीसीओएस क्यों होता है?
1-हार्मोनल असंतुलन:
एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और एण्ड्रोजन के स्तर में गड़बड़ी, जिससे मासिक धर्म और ओव्यूलेशन बिगड़ जाते हैं।
2-इंसुलिन रेज़िस्टेन्स: शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन पर सही तरह प्रतिक्रिया नहीं देतीं, इंसुलिन बढ़ने से अंडाशय ज़्यादा एण्ड्रोजन बनाने लगते हैं।
3-आनुवंशिक कारण: परिवार (माँ, बहन आदि) में पीसीओएस या टाइप–2 डायबिटीज़ का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ जाता है।
4-जीवनशैली: मोटापा, शारीरिक निष्क्रिया, जंक फूड, ज़्यादा शक्कर व रिफाइंड कार्ब्स लेने से स्थिति और खराब हो सकती है।

पीसीओएस के प्रमुख लक्षण पीरियड्स का अनियमित होना, बहुत देर से आना या कई‑कई महीने तक बिल्कुल न आना।चेहरा, ठोड़ी, छाती, पेट, पीठ आदि पर अनचाहे बालों का बढ़ जाना (हिरसुटिज़्म) और सिर के बालों का झड़ना या पतले होना। दाने/मुंहासे, तैलीय त्वचा और वजन बढ़ना, खासकर पेट के आसपास। गर्भधारण में कठिनाई, बार‑बार गर्भपात की प्रवृत्ति हो सकती है। मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, चिंता और अवसाद की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।

पीसीओएस के नुकसान /जटिलताएँबांझपन:- ओव्यूलेशन गड़बड़ होने से गर्भधारण में दिक्कत आती है।
टाइप–2 डायबिटीज़ और मेटाबॉलिक सिंड्रोम: इंसुलिन रेज़िस्टेन्स के कारण आगे चलकर डायबिटीज़, हाई BP और कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है।हृदय रोग और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ना।एंडोमेट्रियल (गर्भाशय की परत) कैंसर का खतरा, क्योंकि लंबे समय तक अनियमित या अनुपस्थित पीरियड्स से एंडोमेट्रियम मोटा होता रहता है।स्लीप एपनिया, मोटापा और लम्बे समय की त्वचा व मनोवैज्ञानिक समस्याएँ (चिंता, अवसाद)।

बचाव और ध्यान रखने योग्य बातें
वजन संतुलित रखना, नियमित व्यायाम (जैसे तेज़ चलना, योग, हल्का जॉगिंग) करना। आहार में सब्ज़ियाँ, फल, सलाद, फुल ग्रेन, प्रोटीन (दालें, पनीर, अंकुरित अनाज) अधिक पर्याप्त मात्रा मे लेना और शक्कर, मैदा, जंक फूड, मीठे पेय कम करना। तनाव घटाने के लिए प्राणायाम, ध्यान, पर्याप्त नींद और नियमित दिनचर्या अपनाना। पीरियड्स लंबे समय तक गड़बड़ रहने से चेहरे‑शरीर पर बाल असामान्य रूप से बढ़ें या प्रेग्नेंसी में समस्या हो तो स्त्रीरोग विशेषज्ञ से जाँच कराना ज़रूरी है।

यदि चाहें तो अगले कदम के रूप में होम्योपैथिक प्रबंधन या डाइट‑प्लान पर विशेष रूप से चर्चा की जा सकती है।


शीर्षक :- हिन्दी सिनेमा का व्यवसायिकरण भारतीय समाज में हिन्दी सिनेमा मनोरंजन का एक साधन ही नहीं बल्कि संचार का महत्वपूर्...
11/03/2025

शीर्षक :- हिन्दी सिनेमा का व्यवसायिकरण

भारतीय समाज में हिन्दी सिनेमा मनोरंजन का एक साधन ही नहीं बल्कि संचार का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। भूमण्डलीकरण के पश्चात संचार के क्षेत्र में आई क्रान्ति के प्रभाव से सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर नजर डाले तो हम पाते हैं कि मूक फिल्में परदे पर दिखाई जाती थी इसके बाद ‘आलमआरा’ से बोलने वाली फिल्मों का प्रचलन शुरू हुआ, ब्लैक एण्ड वाईट फिल्मों की जगह आज के समय में रंगीन फिल्में परदे पर दिखाई जाती थी। अब एक नए प्लेटफार्म के रूप में ओटीटी (ओवर-द-टॉप) आया है जिसने व्यावसायिकता का एक नया किर्तीमान हांसिल किया है। दृश्य व श्रृव्य का यह मिलाजुला स्वरूप आज सभी के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। खास कर युवाओं में इसके प्रति अधिक आकर्षण देखने को मिल रहा है। एक शोध 2022 के मुताबिक भारत में लगभग 36 करोड से अधिक लोग इनके उपयोगकर्त्ता हैं जिनमें सबसे अधिक 22 से 30 वर्ष के युवा हैं। एक वर्ग के लोग अपनी रूचि के अनुरूप अपनी मन पसंद फिल्में बडे़ चाव से देखते है। युवावर्ग हो चाहें बच्चें फिल्मों के प्रति उनका आकर्षण देखेते बनता है। फिल्में मात्र मनोरंजन ही नहीं वरन् शिक्षाप्रद व जानकारी से भरपूर भी होती हैं ये हमें देश काल व परिस्थितियों के विषय में ज्ञान भी देती हैं। इस के वर्षों में राष्ट्रीय विचार और सत्यनिष्ठ फिल्मों का खुब बोल बाला रहा। कश्मीर फाइल्स, केरला स्टोरी जैसी उन सच्चाईयों से जनमानस को रूबरू कराया जिन पर समाज ध्यान नहीं गया था। फिल्मों से हम बतियाते है संवाद करते है उसमें अपने तथा आने वाले समाज की बनती बिगडती छवि देखते है। आज फिल्में हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाईल व इंटरनेट के जरिए हम कहीं भी किसी भी समय अपनी पंसदीदा फिल्में देख सकते हैं।
आज के समय में व्यवसायीकरण के चलते जहां एक ओर शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है वहीं फिल्मों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा है। आज ज्यादातर फिल्में मात्र पैसा कमाने की दृष्टि से बनाई जाती हैं इसमें समाज के मुद्दों, सामाजिक सरोकारों व चेतना का अभाव ज्यादा देखने को मिलता है। इन दिनों कलात्मक फिल्मों का लगभग अभाव सा दिखाई देता है। यदि हम अपने इतिहास पर गौर करें तो 1930 व 1940 के दौरान ज्यादातर फिल्में जैसे ‘मदर इंडिया’, ‘पूरब और पश्चिम’, सतरंज के खिलाडी’, ‘झाँसी की रानी’ आदि स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित हैं। उनमें देशप्रेम व सर्मपण का भाव मुखर होने के साथ ही क्रान्तिकारी गतिविधियों तथा उस समकालीन परिस्थितियों का भी ज्ञान होता है। इसी प्रकार कारगिल युद्ध के समय ‘बार्डर’, ‘एल.ओ.सी’., ‘हिंदुस्तान की कसम’ आदि फिल्में खासी चर्चित व लोकप्रिय रही। आज कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार पर बनी फिल्म कश्मीर फाइल्स वहीं हिन्दूआें का जबरन धर्म परिवर्तन में विषय पर बनी फिल्म केरला स्टोरी हिन्दुओं को झाकझोरने वाल फिल्म भी बनी थी। जो हम सनातनी को सनातन होने का अहसास कराती है।
सिनेमा अपने विशिष्ट गुणों के कारण एक लोकप्रिय माध्यम हैं यह प्रेरणा का स्रोत होने के साथ ही नये विचारों को जन्म देने वाला है। इसके अच्छे व बुरे पहलू से हम सब वाकिफ हैं। शिक्षा का सही प्रारूप व ढ़ांचा न होने के कारण समाज में आज भी कई प्रकार की विसंगतिया बनी हुई है। धार्मिक तुष्टीकरण, यूसीसी, हलाला, तीन तलाक, क्षेत्रवाद, दहेज प्रथा, बाल विवाह, महिला उत्पीड़न, यौन शोषण, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, अकाल, जैसी तमाम समस्याएं आज भी मौजूद हैं। एक विकासशील देश के लिए यह चिंताजनक स्थिति है। इन सभी स्थितियों को समझने व समाज के बीच ले जाने का सबसे सहज व सरल माध्यम फिल्में ही है। यह सामाजिक चेतना, सामाजिक जागृति, समाज कल्याण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। फिल्मों के जरिये हम अपनी बात आसानी से समाज तक पहुंचा सकते है। शिक्षित व अशिक्षित दोनों लोगों को अपनी बात समझाई जा सकती है। यह शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों तक आसानी से अपनी पैठ बना चुका है। इसका सबसे बड़ा करण यह पढे़ लिखे लोगों का माध्यम नहीं हैं यह समाज के आखिरी व्यक्ति का माध्यम है जिन्हें हम अत्योदय कहते है। साहित्य की ही तरह सिनेमा भी समाज का दर्पण है। फिल्में अक्सर हमारे परिवेश पर आधारित होती है। यह सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिदृश्य को रेखांकित करती है। सिनेमा का मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है इसलिए फिल्मों के जरिये स्वस्थ मनोंरजन होना चाहिए। मगर आज फिल्मों के जरिये अश्लीलता परोसी व हिन्दू समाज को निचा दिखाया जा रहा है। उदाहण के लिए शारूख खांन व दिपिका पादुकोण ने एक फिल्म में हमारे भगवा झांडे का अपमान किया। यह सब सोचि समझा एक नीति है। जिसका युवावर्ग पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। फैशन व ग्लैमर के नाम पर नग्नता बढ़ी हैं यह एक तरह से भारतीय सांस्कृति को निम्न बताने और दिखाने का काच चल रहा है। अनैतिक गतिविधियाँ बढ़ रहीं हैं। आधुनिकता के नाम पर पश्चिम का अंधानुकरण बढ़ा है, सैक्स, रोमांस व अश्लिलता से भरपूर दृश्य अब आम बात हो चुकी है। उम्र के इस मोड़ पर जहां युवाओं को सही मागदर्शन की आवश्यकता होती है वहीं इस तरह के भड़काऊ सीन देखकर कर उनके युवा मन पर क्या प्रभाव पडेगा इस बारे में कोई नहीं सोचता। यह तो मनुष्य का स्वभाव है कि अच्छाई की जगह वह बुराई की ओर आकर्षित होता है। यही कारण है कि आजकल के युवा बिना सोचे समझे जोश में आकर अपना होश खो बैठते हैं। फिल्मों में जिस तरह से स्मोंकिंग व शराब पीने के दृश्य फिल्माये जा रहें हैं उसी प्रकार आजकल के युवा स्मोकिंग व शराब को अपनी लाइफ स्टाईल का हिस्सा बना चुके हैं। वे इसे एक स्टेटस सिंबल मानते है। नशे की लत भी युवावर्ग को पड़ चुकी है। फिल्मों में इस तरह के दृश्यों पर रोक लगनी चाहिए। भारतीय संस्कृति व परंपरा फिल्मों से नदारद है।
शहरी जीवन की भागदौड़ में व्यस्त मां बाप बच्चों को अक्सर समय नहीं दे पाते हैं ऐसे में उनके अकलेपन का साथी बन जाती है फिल्में। अमूमन वे टी.वी. चैनलों में दिखाए जाने वाले कार्टून नेटवर्क या फिल्में देखते हैं। इन में अक्सर हिंसक दृश्य दिखाए जाते हैं जिसके कारण बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है वे जिद्दी, गुस्सैल, विद्रोही व हिंसक प्रवृति के बन जाते है। इन्ही कारणों के चलते बच्चों द्वारा हिंसा की खबरें अक्सर अखबारों व चैनलों पर देखने व सुनने को मिलती हैं। भारत में बच्चों के लिए कार्टून फिल्मों का निर्माण न के बराबर है। अगर कार्टून फिल्में बनती भी है तो वो उनका विषय भी भारतीयता के अनुसार नहीं होता है। कूछ वर्ष पहले रिलीज हुई फिल्म हनुमान और कृष्णा बच्चों में अपने हिन्दू धर्म के प्रति आकर्षण का विषय था पर पैचासिक विचार के वांमपंथीयों ने इसे अंधविश्वास कह कर बंद कराने का प्रयास किया। पूरी दूनियां जहां अपने ज्ञान-परंपरा को बढावा दिया जा रहा है वहीं भारत में उसके तरफ कोई घ्यान नहीं दिया जा रहा है। आप सोच सकते है कि भारतीय फिल्में किस प्रकार की छवि निमार्ण कर रही है अमूमन भारत में एैसा होता रहा है। यह वास्तव में सिनेमा जगत् के लिए शर्मनाक बात तो है हि सबसे शर्मनाक हिन्दू समाज के लिए भी है।
कुछ फिल्में में यथार्थता के नाम पर अशोभनीय व अभद्र भाषा, गाली-गलौच आदि सुनने को मिलता है। वल्गर लैग्वेंज (अश्लील शबदावली) का उपयोग होता है ऐसी फिल्मों को परिवार के साथ बैठकर देखना मुश्किल हो जाता है। हाल ही में आयी फिल्म ‘गैंग्स आफ वासेपुर’, ‘देल्ली बैली’ इसका जीता जागता उदाहरण है।
भारत के फिल्मनिर्माताओं को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि समाज के प्रति उनका कुछ दायित्व भी बनता है उनकी कुछ नैतिक जिम्मेदारी भी हैं सिर्फ आर्थिक पहलू ही नहीं वे सामाजिक पक्ष का भी विशेष ध्यान रखें। फिल्में मनोरंजन के अलावा ज्ञान व भारती ज्ञानपरंपरा पर केन्द्रीत होनी चाहिए।
कुछ समय पहले आई फिल्म आई एम कलामं बच्चों को केन्द्र में रख कर बनाई गई बेहतरीन फिल्म है। यह मनोरंजन से भरपूर होने के साथ ही शिक्षाप्रद व सामाजिक परिवेश को रेखांकित करती है। ‘तारे जमीन पर’ शारीरीक रूप से असक्षम और मंदबुद्धि के बच्चों को केंद्र में रख कर बनाई गई एक मनोवैज्ञानिक फिल्म है। जो समाज में एक बेहतर संदेश देने का काम करती है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि परिवार में बच्चें किस प्रकार उपेक्षा के शिकार हो जाते है और उनकी मानसिकता पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है। हर बच्चें की अपनी विशिष्टता होती है उसे दूसरों की तुलना में कम नहीं आंकना चाहिए।
आज सवाल यह है कि व्यवसायिक्ता के दौर में सामाजिक महत्व व भारतीयता को फिल्मों के माध्यम से कैसे दिखया जाए इस विषय पर चिंतन करने की जरूरत है। हिन्दी सिनेमा व्यवसायिक हों पर सामाजिक समरसता और सरोकार की फिल्मे आज भी निर्मीत हो। आने वाले समय में फिल्मों के दर्शक कम होने वाले नहीं है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे फिल्म निर्माता कैसी फिल्मों का निर्माण करते है? जाहिर सी बात है जैसी फिल्में आप दर्शक को परोसेंगे वही दर्शक देखेंगे और उसका प्रभाव भी दिखाई देगा।
इधर के कुछ वर्षों में हिन्दी सिनेमा में समाज में सही विषयों को उठाया और उन पर तीखा प्रहार करने के साथ ही आम जनता की चेतना को झकझोरने का काम किया है। कुछ अच्छी फिल्मों के अलावा ज्यादातर फिल्में मात्र मनोरंजन पर आधारित होती है, जिनमें प्रायः प्रेरणा का अभाव नजर आता है। स्वस्थ मनोरंजन से एक स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। देश की संस्कृति व सभ्यता के चहुमुखी विकास में सिनेमा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

डॉ नीतेश सिंह

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