Vihangam Yog Gautam Budh Nagar

Vihangam Yog Gautam Budh Nagar Vihangam Yoga is a "scientific" meditation system founded by Sadguru Sadafaldeo Ji Maharaj.

14/05/2026

अक्षरों से परे: आत्म-साक्षात्कार का मार्ग

​मानव जीवन की सबसे बड़ी जिज्ञासा परमात्मा और आत्म-तत्व को जानने की रही है। किंतु हमें यह समझना होगा कि परमात्मा मन, बुद्धि, इंद्रियों और वाणी की सीमा से परे है। इन सीमित भौतिक माध्यमों से न तो आत्मा के सूक्ष्म अस्तित्व को पूर्णतः समझा जा सकता है और न ही उस अनंत परम सत्ता को। आध्यात्मिक मार्ग पर केवल शब्दों के बौद्धिक विलास में उलझने के बजाय, व्यावहारिक साधना के माध्यम से इन सत्यों को अनुभव करना ही श्रेयस्कर है।

​संसार के शास्त्रों और किताबों में ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है, लेकिन मात्र पठन-पाठन से कोई मुक्त नहीं हो सकता। यदि केवल अध्ययन से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव होती, तो आज हर विद्वान जीवन्मुक्त हो चुका होता। इतिहास साक्षी है—चाहे गौतम बुद्ध हों, महावीर हों या गुरु नानक देव, इन्होंने परमात्मा को शब्दों के जाल में उलझकर नहीं, बल्कि गहन तप और आत्म-साक्षात्कार के बल पर प्राप्त किया। पुस्तकें हमें 'ज्ञानी' (विद्वान) बना सकती हैं, 'आत्मज्ञानी' नहीं।

​आत्मा और परमात्मा का वास्तविक बोध केवल एक तत्वदर्शी गुरु के सान्निध्य में ही संभव है। उनके पास वह प्रयोगात्मक विधि होती है, जिससे वे साधक को स्वयं के भीतर उस परम ज्योति का दर्शन करा देते हैं। यह एक सूक्ष्म और गुप्त विद्या है, जो किसी कागज़ या पुस्तक में पूर्णतः अंकित नहीं की जा सकती।

​श्रीमद्भगवद्गीता इसका जीवंत प्रमाण है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ब्रह्मविद्या का प्रत्यक्ष अनुभव कराया था। उन्होंने अर्जुन को शास्त्र पढ़ने का परामर्श देने के बजाय स्वयं उसे दिव्य दृष्टि प्रदान की, ताकि वह सत्य को देख सके। वर्तमान में हम अक्सर उन ग्रंथों में उस ब्रह्मज्ञान को खोजने का प्रयास करते हैं, जो वास्तव में केवल गुरु-परंपरा और जीवंत अनुभव से ही प्राप्त हो सकता है।

​सांसारिक लिपियों और ग्रंथों में समाहित ज्ञान ५२ अक्षरों की सीमा में बंधा है। जब ये अक्षर स्वयं काल के प्रवाह में विलीन हो जाने वाले हैं, तो इनके माध्यम से उस 'अविनाशी' परमात्मा को पूर्णतः कैसे ग्रहण किया जा सकता है? ५२ अक्षरों से परे का जो दिव्य ज्ञान है, वह केवल निजी अनुभव और अनुभूति का विषय है।

​यदि कोई भी जिज्ञासु अपने प्रश्नों को शांत करना चाहता है और उस चेतन जगत का आनंद लेना चाहता है, तो उसे 'जड़' (पदार्थ) से 'चेतन' की ओर मुड़ना होगा। सेवा, सत्संग और साधना के माध्यम से जब सद्गुरु की कृपा प्राप्त होती है, तो वे अंतर्मन के द्वार खोल देते हैं। जब सहज समाधि घटित होती है, तब सारे तर्क मौन हो जाते हैं और कोई प्रश्न शेष नहीं रहता। वहां केवल असीम आनंद और साक्षात्कार शेष रह जाता है।

जय सदगुरुदेव

07/05/2026

स्वर्वेद: परमात्मा का स्वरूप (दोहा 1/1/1)

'स्वर्वेद' अनंत श्री सद्गुरु सदाफलदेव जी महाराज की एक अमूल्य आध्यात्मिक कृति है। इसकी रचना किसी पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर नहीं, बल्कि हिमालय की कंदराओं में चेतन समाधि की अवस्था में प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभवों से हुई है। इसमें 'परमाणु से परमात्मा' तक का संपूर्ण बाह्य तत्वज्ञान और आंतरिक साधना का समावेश है। इसके पठन मात्र से आत्मा के शुभ संस्कार जागृत होते हैं और चेतना का उत्थान होता है।

आइए, 'स्वर्वेद' के प्रथम दोहे के गहरे अर्थों को समझें और जानें कि परमात्मा का वास्तविक अस्तित्व कैसा है।

​सत्य असत्य से अलग है, सो पर सत्य स्वरूप।
अकथ अलौकिक तत्त्व है, अज अनादि वर रूप।।

​परमात्मा नश्वर 'असत्य' और स्थिर 'सत्य'—दोनों परिभाषाओं से परे है। वह अकथ (अनकहा) और अलौकिक है, जिसे सांसारिक उदाहरणों से नहीं समझा जा सकता। वह 'अकथ' है, यानी उसके बारे में बोलकर सब कुछ नहीं बताया जा सकता। वह इस लोक (संसार) के नियमों से नहीं बंधा है, इसलिए 'अलौकिक' है। इसीलिए उसे 'अलौकिक' कहा गया है—क्योंकि हमारे संसार का कोई भी उदाहरण उसे पूरी तरह समझाने के लिए काफी नहीं है। 'अज' का अर्थ है जिसका जन्म न हुआ हो और 'अनादि' जिसका कोई प्रारंभ न हो। वह सबसे श्रेष्ठ ('वर') रूप है।

​ईश्वर के तीन मुख्य गुण हैं:
• ​सत्: जो समय की सीमाओं से परे अविनाशी है (त्रिकालावाद्य)।

• ​चित्त: जो स्वयं-प्रकाशमान परम चेतना (Pure Consciousness) है।

• ​आनंद: वह शाश्वत सुख जो बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है।

परमात्मा के जैसा दूसरा कोई नहीं एवं उससे बाहर कुछ भी नहीं। वह अखंड है, उसका कोई अंग या विभाजन नहीं है। जैसे सूर्य की किरणें गंदगी को छूकर भी मैली नहीं होतीं, वैसे ही परमात्मा संसार के कण-कण में रहकर भी इसके दोषों और त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) से पूरी तरह मुक्त और शुद्ध रहता है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक अनादि चेतन तत्व है। वह समस्त जगत का आधार (स्कम्भ) है, जिसे केवल शब्दों से नहीं बल्कि साधना और अनुभव से ही जाना जा सकता है।

30/04/2026
20/04/2026

कल ग्रेटर नोएडा में विहंगम योग संस्थान के तत्वाधान में एक विशेष योग साधना शिविर एवं सत्संग का सफलतापूर्वक आयोजन संपन्न हुआ। इस पावन अवसर पर संस्थान के वरिष्ठ प्रचारक एवं राष्ट्रीय संत श्री किशन लाल जी शर्मा के अमृतमयी प्रवचनों का लाभ उपस्थित जनसमूह को प्राप्त हुआ। उनके ओजस्वी विचारों से प्रेरित होकर अनेक नए जिज्ञासुओं ने विहंगम योग की प्रथम श्रेणी की साधना को विधिपूर्वक आत्मसात किया।

​इस सफल आयोजन की व्यवस्थाओं में श्री एस.एस. मलिक जी का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने अपने विद्यालय का प्रांगण एवं अन्य मूलभूत सुविधाएँ नि:स्वार्थ भाव से उपलब्ध कराईं। कार्यक्रम को भव्य स्वरूप देने में श्री मनीष जी, श्री रविंद्र सिंह जी, श्री रविंद्र कंबोज जी सहित ग्रेटर नोएडा के समस्त कर्मठ कार्यकर्ताओं की अटूट निष्ठा और अथक परिश्रम सराहनीय रहा।

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GautamBudh Nagar
Greater Noida
201306

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