09/09/2025
श्री हरि
संत चरित्र
अद्वितीय गऊसंतसेवी परमपूज्य श्री सुदामदास जी महाराज
परमपूज्य श्रीसुदामादास जी महाराज जी का जन्म बिहार के गोपालगंज ज़िले के छिपाया फ़ार्म नामक गाँव में हुआ था ।इनका यज्ञोपवीत पाँच वर्ष की आयु में ही हो गया था । यद्यपि ये मेधावी बालक थे किंतु कक्षा पाँच तक ही पढ़े । अपने अधिकतर समय में मटिहानी के सीताराम मंदिर में हनुमानचालीसा एवं श्रीरामचरितमानस जी का पाठ करते। आसपास सत्संग कीर्तन होता तो मंजीरा ले कर बड़े उत्साह से आनन्दमग्न होते । चौदह वर्ष की आयु में मंदिर के महंत श्री रामसेवकदास जी से राम मंत्र मिला और सात आठ वर्ष के बाद वैराग्य के मार्ग पर निकल पड़े ।
यात्रायें आरंभ की और प्रथम यात्रा में माता जानकी के जनमस्थान जनकपुर पहुँचे । वहाँ 6 माह रहे और चौरासी कोस परिक्रमा की । फिर भगवान श्रीराम के जन्मस्थान अयोध्या पहुँचे । वहाँ मणिराम दास जी की छावनी में रहे और अन्य स्थानों पर भी श्री अयोध्या जी के । श्री अयोध्या जी रहकर नित्य एक लाख सीताराम नाम जप और रामायण का नित्य पाठ करते । वही रहकर साधु संतों की सेवा में सलंग्न हुए और तन मन प्राण से दिन रात सेवा करते ।
एक दिन मणिरामदास जी की छावनी में स्वामी दामोदर जी मंडली द्वारा प्रस्तुत राधाकृष्ण लीला देखी और अनायास ही रासबिहारी जी को और खिंच गये । श्रीकृष्ण को ये श्रीराम जी से अलग नहीं देखते थे । किंतु राधाकृष्ण लीला देख सन् 1926 में सदैव के लिए वृंदावन आ गये । वृंदावन आ कर अनेकों स्थानों पर रहे किंतु मुख्यतः राम मंदिर ज्ञान गुदड़ी में निवास करते हुए प्रसिद्ध सिद्धप्रेमी संत श्रीजगन्नाथदास भक्तमाली जी से भक्तमाल श्रवण की और सीखी । कुछ वर्ष पश्चात् जहां अब वर्तमान की सुदामा कुटी है , वहाँ पर श्रीराम कुमार दास जी महाराज जी के साथ निवास किया जहां तब केवल फूस की कुटिया थी । यह स्थान परिक्रमा मार्ग पर यमुना किनारे होने से वहाँ इन्हें अनेकों साधु संतों के दर्शनों का लाभ मिलता । नित्य प्रातः यमुना स्नान करके भजन के बाद यमुना के पार जा कर आसपास के गाँवों से मधुकरी माँग कर लाते और साधु संतों को पवाते । गाय के गोबर और लकड़ी एकत्र कर स्वयं प्रसाद भी बनाते और निष्काम भाव से साधु संतों की सेवा करते । निरंतर नाम जप करते हुए सेवा करते और अजपा जप होने लगा ।
कुछ समय पश्चात संत श्री रामकुमारदास जी ने सुदामा कुटीर पूज्य महाराज जी को सौंप दी । इनकी साधु सेवा सब सराहते और दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई । यह हमेशा कहते कि सब श्रीकृष्ण करते हैं और अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् इस सूत्र को जीवन में उतारे हुए सेवा करते ।
एक बार 125 साधु संत के लिए प्रसाद बना और जैसे ही उनको पवाने के बाद स्वयं परिकर सहित प्रसाद को बैठे तो 50 साधु और आ गये ।रसोईघर में ज़्यादा प्रसाद नहीं था 5-10 मूर्तियों से अधिक । सभी सेवक चिंतित हुए । आश्रम में सेवकों को चिंताग्रस्त देख सुदामादास जी स्वयं रसोईघर गये और सभी भोजन पत्र भर भर कर देने लगे और सबको तृप्त किया गया । बाद में सेवकों ने अस्चार्यपूर्वक ये चमत्कार पूछा तो उन्होंने बताया कि सब राम जी की कृपा है ।
जब एक समय श्री यमुना जी का जलस्तर बहुत बाढ़ गया था और बाढ़ की स्थिति बन गई थी जिससे आश्रम भी प्रभावित होता तो इन्होंने यमुना जी की पूजा अर्चना की और उसी दिन यमुना जी 12 मीटर पीछे चली गई थी और अगले दिवस कई सौ मीटर तक ।
एक समय ये बिहारी जी के दर्शन को गये तो उस समय तक बिहारी जी की शयन आरती हो विश्राम करा दिया गया था । पूज्य महाराज जी वहाँ कुछ समय तक बैठे दण्डवत कर और निराश हो वापिस आश्रम लौट आये । जब अगली सुबह भगवान के जप और ध्यान को बैठे तो इन्होंने अति मधुर प्रिय वाणी सुनी _ “ बाबा , बाबा ! मैं आया हूँ । कल आप दर्शन नहीं पा सके । अब आँखें खोलो और दर्शन करो ।” जैसे ही पूज्य महाराज जी ने आँखें खोली तो त्रिभंगी ललित मुद्रा में बांसुरी और ग्वालछड़ी लिए हुए मयूरमुकुट धारण किए हुए श्री कृष्ण के साक्षात दर्शन किए । इनका हृदय प्रेम से भर गया । दल वृंदावन में रहना सफल हो गया था । साधु संतों की सेवा के आशीर्वाद से मानव शरीर धारण करने का सर्वोत्तम लक्ष्य पा लिया था । अब कुछ बाक़ी नहीं रह गया था ।
इनके जीवन के अनेकों अनुभव है । इनके श्री विग्रह श्री कौशलकिशोर जी इनके साथ लीला करते थे । उनमें से एक लीला है कि एक रात्रि को ये काँपते हुए जागे । अपने ऊपर मोटे गरम कंबल वस्त्र होते हुए इतना ठंड से काँपना इनको आश्चर्यचकित कर रहा था । इनको तभी अनुभव हुआ कि इनके श्रींविग्रह ठंड में ठिठुर रहे हैं । ये तभी उठे और जब मंदिर में पहुँचे तो देखा कि आज पुजारी जी कंबल उढ़ाना भूल गए थे । इन्होंने क्षमा याचना करते हुए भूमि पर पड़े हुए गरम वस्त्र से श्री विग्रह को ढका और फिर आ कर वापिस लत गये ।
रामानन्द जयंती जो इतने उत्साह से मनायी जाती है , इस उत्सव का इतने बड़े स्तर पर मनाने का श्रेय इन्हें ही जाता है । श्री अग्रदास जी का उत्सव , भक्तमाल जी प्राकट्य उत्सव , हनुमान जयंती और तुलसीदास जी उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । सन् 1972 में सीताराम जी के बड़े विग्रह स्थापित किए गए । जब आयु बढ़ने लगी तो इन्होंने सेवा अपने शिष्यों को सौंप दी और स्वयं यमुना के किनारे एकांत स्थान पर भजन करने चले गये । वहाँ भी भक्त पहुँच गये इनके लिय एक मंदिर , 50 साधुओं के रहने का स्थान और गौशाला निर्मित कर दी । सुदामादास जी वहाँ से भी एकांत में भजन के लिए निकल गये और प्रेम सरोवर पर नितांत एकांत में भजन करने लगे और वहाँ भी प्रेमी भक्तों ने इन को ढूँढ लिया । एकांत भजन की प्रीति से ये ऋषिकेश चले गये और वहाँ गंगा किनारे भजन किया । वहाँ भी इनके लिए लक्ष्मण झूला पर आश्रम निर्माण कर दिया । किंतु सभी स्थानों पर साधु सेवा , गौ सेवा और भजन कीर्तन और सत्संग ही निरंतर चलता ।
साधु संतों की सेवा , गौ सेवा जैसी इन्होंने की , वैसा और उदाहरण दुर्लभ है । सन् 2006 में श्रावण कृष्ण द्वादशी पर 106 वर्ष की आयु में भगवान के धाम को प्रस्थान किया ।
परमपूज्य सुदामादास जी के चरणों में बारम्बार दण्डवत प्रणाम ।। जय जय राधेश्याम सीताराम । जय जय संत भगवान ।।