12/06/2026
मैं एक डॉक्टर हूँ और हाल ही में एक वायरल क्लिप में एक मेडिकल स्टूडेंट के द्वारा कैडेवर पर असम्माननीय शब्द सुनकर, आँखों के सामने सालों पहले के मेडिकल कॉलेज के अपने फर्स्ट ईयर के दृश्य तैर गए!
एनाटॉमी की तीन-चार घण्टे की क्लास जब डिसेक्शन हॉल में शुरू हुई थी, तब हर किसी का अनुभव अलग रहा होगा; जैसे मेरी एक बैचमेट कैडेवर देखते ही बेहोश हो कर गिर गई (आज वो बढ़िया सर्जन है)।
मेरा अनुभव पहली बार यहाँ लिख रही हूँ। जब मैंने पहली बार कैडेवर देखा तो मुझे बहुत अनकम्फर्टेबल लगा। सिर तो बहुत चकराया, लेकिन उल्टी नहीं आई और उसके बाद मेरे मन में जीवन और मृत्यु को लेकर अनेक विचार उठने लगे। मैं यह सोच रही थी कि यह व्यक्ति कौन रहा होगा, इसका जीवन कैसा रहा होगा, इसके अपने कौन रहे होंगे, क्या इसने भी अपने भविष्य के सपने देखे होंगे, क्या इसे पता रहा होगा कि एक दिन इसकी बॉडी मेडिकल छात्रों को पढ़ाएगी!
फर्स्ट ईयर में तो सेकंड ईयर के सामने सहमे रहते थे, जब सेकंड ईयर में आए तो इसे अपने प्रशिक्षण का हिस्सा मान ही चुके थे क्योंकि कोई ऑप्शन था ही नहीं!
मेरे ग्रुप में ऐसा मज़ाक़ कभी नहीं हुआ। कुछ लोग हँसते थे लेकिन क्यों हँसते थे, मुझे नहीं पता था। मैं जीवन की नश्वरता के बारे में अक़्सर ही सोचती थी और रात को कविताएँ भी लिखती थी। होस्टल में घर की याद आती रहती थी।
आज भी प्रकृति जो देती है, उसके प्रति कृतज्ञ रहती हूँ! जीवन के प्रति हर किसी का अलग दृष्टिकोण होता है l आज भी सोचती हूँ कि एक दिन हम सबको इसी सत्य का सामना करना है।
तो विषय था; कैडेवर!
मेरे विचारों में जो व्यक्ति मृत्यु के बाद भी मेरे सीखने का माध्यम बन रहा है, उसके प्रति कृतज्ञता होनी चाहिए।
ज़रा सोच कर देखें कि मृत्यु के बाद हम अपने प्रियजनों के शरीर का कितना सम्मान करते हैं। कोई दफनाता है तो कोई अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार दाह संस्कार करता है। ऐसा तो नहीं है कि मृत्यु के बाद शरीर को महत्त्वहीन मानकर कहीं फेंक दिया जाता है क्योंकि मृत्यु के बाद भी हम उस शरीर के साथ एक मनुष्य का सम्मान जोड़कर देखते हैं। कोई लावारिस बॉडी भी असम्मान का पात्र नहीं हो सकती।
फिर उस व्यक्ति के बारे में सोचिए, जो अपनी पूरी देह भविष्य के डॉक्टरों को सीखने के लिए दे देता है। वह व्यक्ति मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा कर रहा होता है। उसकी वजह से मेडिकल छात्र सीखते हैं, बेहतर डॉक्टर बनते हैं और भविष्य में अनगिनत मरीजों को बेहतर उपचार मिल पाता है। हो सकता है आपका कोई क़रीबी अपनी बॉडी डोनेट करने का फॉर्म भर चुका हो !
डॉक्टर होने का अर्थ क्या है? क्या केवल शरीर को समझ लेना पर्याप्त है? नहीं न! यदि हम शरीर को समझ लें लेकिन मनुष्य को न समझें, यदि हम रोग को समझ लें लेकिन रोगी को न समझें, यदि हम विज्ञान सीख लें लेकिन संवेदनशीलता न सीखें, तो हमारी शिक्षा अधूरी रह जाएगी!
एमबीबीएस इत्यादि करने के बाद जब हम प्रैक्टिस करते हैं तो मरीज हमारे सामान्य परिस्थिति में नहीं आता; वह दर्द और डर में होता है, कई बार असहाय महसूस कर रहा होता है। ऐसे में डॉक्टर द्वारा कही गई एक साधारण-सी बात भी उसके मन पर बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ सकती है। इसलिए प्रैक्टिस के दौरान भी हर डॉक्टर को समझना चाहिए कि सामने केवल एक शरीर नहीं बैठा है, एक इन्सान बैठा है।
आज के मेडिकल स्टूडेंट्स ही भविष्य के डॉक्टर बनेंगे न?