13/03/2025
कलयुग पुराण – संपादकीय
स्वयं के मुख से
मेरा नाम कृष्णा कांत मिश्रा है, लेकिन आध्यात्मिक जगत में लोग मुझे कृष्णा गुरुजी के नाम से जानते हैं।
रामायण की एक चौपाई है:
"संत, बिटप, सरिता, गिरी, धरनी।
पर हित हेतु इनकी करनी।।"
अर्थात् संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और धरती अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए होते हैं। यह एक कटु सत्य है, लेकिन न जाने क्यों आज अधिकांश संत परहित के स्थान पर संस्थागत स्वार्थ में उलझ गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, हमारे वैदिक रीति-रिवाजों ने अपना मूल अस्तित्व खो दिया और वे भय व लालच के माध्यम बन गए। इस स्थिति के लिए केवल संत ही नहीं, बल्कि हम सभी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने बिना कारण जाने इन परंपराओं को स्वीकार कर लिया और उन्हें उसी रूप में ढोते चले गए।
समय के साथ सब कुछ बदल गया—युग बदले, सोच बदली, परंतु हमारी परंपराओं को समझने का तरीका नहीं बदला। मैं एक साधारण गृहस्थ व्यक्ति हूँ, दिव्यांग भी हूँ, लेकिन अपनी दिव्यांगता को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
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कलयुग पुराण क्यों?
इस पुस्तक का उद्देश्य यह है कि आज के युवाओं तक आध्यात्मिक परंपराओं और उत्सवों को तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाए। आज का युवा हर बात को तर्क और लॉजिक के आधार पर परखता है। बिना ठोस कारण के वह किसी भी परंपरा को स्वीकार नहीं करता। इसी कारण कलयुग पुराण में सभी त्योहारों, योग, प्रथाओं और धार्मिक अनुष्ठानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया गया है।
इस पुस्तक में आपको हर प्रश्न का उत्तर मिलेगा—क्यों त्योहार मनाए जाते हैं, उनका तात्त्विक और व्यावहारिक महत्व क्या है, और वे समाज सेवा से कैसे जुड़े हो सकते हैं।
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परंपराएँ और उनकी बदलती प्रासंगिकता
एक पुरानी कथा है:
प्राचीन काल में एक आश्रम में एक गुरुजी रहते थे। उनके आश्रम में एक बिल्ली थी जो गुरुजी के निकट रहती थी। जब भी वे साधना करते, बिल्ली उनके पास आकर बाधा उत्पन्न कर देती। इसलिए, उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि जब तक साधना चले, बिल्ली को पेड़ से बाँध दिया जाए। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा।
कुछ समय बाद गुरुजी का निधन हो गया, और आश्रम में नए गुरुजी आए। उन्होंने शिष्यों से पूछा कि साधना की क्या विधि है? शिष्यों ने कहा कि हमारे पूर्व गुरुजी पहले बिल्ली को बाँधकर ही साधना करते थे, इसलिए यह परंपरा बनी रही।
समय बीतता गया, एक दिन वह बिल्ली मर गई। आश्रम में हड़कंप मच गया—अब साधना कैसे होगी? तत्काल एक नई बिल्ली लाकर उसे पेड़ से बाँध दिया गया, ताकि गुरुजी की साधना बिना बाधा जारी रह सके।
इस कथा का मूल संदेश यह है कि हमने भी अपने समाज में अनेक ऐसी परंपराएँ स्वीकार कर ली हैं, जिनकी आज कोई प्रासंगिकता नहीं है। समय के साथ रीति-रिवाजों का रूप बदला जाना चाहिए, लेकिन हम आज भी पुरानी परंपराओं को कारण जाने बिना निभाते चले आ रहे हैं।
कलयुग का अर्थ
अगर हम अतीत की ओर देखें तो—
सतयुग में देवताओं और असुरों के लोक अलग-अलग थे।
त्रेतायुग में दोनों के देश अलग हुए—श्रीराम भारत में और रावण श्रीलंका में।
द्वापरयुग में देवता और असुर एक ही परिवार में आ गए—अर्जुन और दुर्योधन।
अब कलयुग में क्या हुआ?
भागवत गीता के अनुसार, कलयुग में एक ही व्यक्ति के भीतर देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियाँ दोनों होती हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि कल कौन देवता बन जाएगा और कौन असुर।
आज के समय में बाहरी दिखावे, बनावट और सजावट पर अधिक ध्यान दिया जाता है, लेकिन व्यक्ति के आंतरिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है।
कलयुग पुराण का उद्देश्य
परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
इस पुस्तक का लक्ष्य है—हर आध्यात्मिक उत्सव और त्योहार को समाज सेवा से जोड़ना। जब तक हमारी धार्मिक परंपराएँ समाज के कल्याण से नहीं जुड़ेंगी, वे केवल एक दिखावा बनकर रह जाएँगी।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी परंपराओं को केवल निभाएँ नहीं, बल्कि उन्हें समझें और तर्कसंगत रूप से आत्मसात करें। यही कलयुग पुराण का उद्देश्य है—धर्म और तर्क का संतुलन बनाना।
हर पुरानी मान्यता को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए आपका स्वागत है।.