27/04/2026
तंत्र साधना के रूप :
तांत्रिक साधनाओं के मुख्यतः तीन रूप रहे हैं। इन्हीं के माध्यम से तांत्रिकों के विभिन्न सम्प्रदाय अपने अन्तिम लक्ष्य 'परमतत्व' की प्राप्ति तक पहुंचते रहे हैं। यद्यपि इन रूपों में समयान्तराल, स्थान विशेष आदि के कारण कई प्रकार के बदलाव और नवीनताएं भी आती रही हैं। इसलिये बंगाल, कामाख्या, बिहार, गोरखपुर, नेपाल आदि के तंत्र साधकों के क्रियाकर्म और उपासना पद्धतियां हिमालय में साधानारत तांत्रिकों से काफी भिन्न प्रतीत होती हैं।
तांत्रिक साधना के जो तीन रूप रहे हैं, उनमें से तंत्र साधना का प्रथम रूप आद्यशक्ति को स्वयं में पूरी तरह से आत्मसात करने की प्रक्रिया पर आधारित रहा है। साधना के इस रूप में तंत्र साधक क्षणिक भौतिक इच्छाओं के पीछे नहीं भागता, बल्कि सम्पूर्णता के साथ परमात्मा के शाश्वत सत्य को पाना चाहता है। उसका मुख्य ध्येय शाश्वत आनन्द की अनुभूति को प्राप्त करना होता है। तंत्र साधना का यही रूप सांसारिक बंधनों से मुक्त करते हुये साधक की आत्मा को दिव्य साक्षात्कार करवा देता है। तंत्र साधना में मोक्ष, मुक्ति अथवा निर्वाण प्राप्ति का यही मार्ग है। इस मार्ग पर अग्रसर होते ही साधक की भौतिक आकांक्षाएं धीरे-धीरे समाप्त होती चली जाती हैं और उसका प्रवेश अभौतिक संसार में होने लगता है। तंत्र साधना के इस पथ से अन्ततः साधक परमात्मा के दिव्य रूप में समाहित होता चला जाता है। तंत्र साधना का वास्तविक और श्रेष्ठ रूप यही है।
तंत्र साधना के इस मार्ग पर जब कोई तांत्रिक अग्रसर होता है तो उसकी भौतिक इच्छाएं तो अवश्य लोप होती चली जाती हैं, पर उसे अनंत, असीम क्षमताओं से युक्त अलौकिक शक्तियां स्वतः ही प्राप्त होने लगती हैं, जिनके माध्यम से वह प्रकृति के स्वाभाविक कार्यों में हस्तक्षेप करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। यद्यपि ऐसे तंत्र साधक धीरे-धीरे इस नश्वर जगत के लिये विरक्त होने लगते हैं। उसकी समस्त भौतिक इच्छाएं, आकांक्षाएं, मान-सम्मान की भूख, सब धीरे-धीरे क्षीण और समाप्त होती चली जाती हैं। वह संसार के लिये एक अनुपयोगी प्राणी बनकर रह जाता है। इसलिये ऐसे सिद्ध तांत्रिक सांसारिक लोगों से दूर चले जाते हैं और घने जंगलों, पहाड़ों की गुप्त गुफाओं, शमशान आदि में रहने लगते हैं।
तंत्र साधना की इस उच्च अवस्था में वह सदैव समाधि की गहनावस्था और शाश्वत दिव्य आनन्द में डूबे रहना चाहते हैं। वह नश्वर जगत के वास्तविक सत्य को जान चुके होते हैं।
यद्यपि वह अभौतिक जगत के साथ पूर्ण रूप से तारतम्य स्थापित कर चुके होते हैं, इसलिये उनकी इच्छाएं परमात्मा की इच्छाएं बन जाती हैं, इसलिये प्रकृति तत्क्षण उनकी इच्छामात्र से सृष्टि के किसी भी पदार्थ, किसी भी वस्तु को उत्पन्न कर देने के लिये तत्पर रहती है। वह इच्छामात्र से शून्य से किसी भी पदार्थ का निर्माण करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके लिये फिर समय की धारा कोई अवरोध खड़ा नहीं कर पाती। वह अतीत अथवा भविष्य में समान रूप से परिभ्रमण कर सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। उनके सामने किसी भी प्राणी का अतीत, वर्तमान अथवा भविष्य काल से संबंधित कोई भी घटना अदृश्य नहीं रह पाती। वह जीवन की समस्त घटनाओं को पकड़ सकने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं। उनके सामने फिर पूर्वजन्मों अथवा भविष्य में होने वाले जन्मों से संबंधित घटनाएं भी किसी चलचित्र की तरह साक्षात होने लग जाती हैं।
साधना की इस श्रेष्ठ अवस्था में उनकी क्षमताएं असीम रूप धारण कर लेती हैं। वह दूसरे के मन में उठने वाले विचारों को पढ़ने, पकड़ने में भी सक्षम हो जाते हैं। मनुष्यों की बात तो अलग, वह पशु-पक्षियों के साथ बात करने की सामर्थ्य भी प्राप्त कर लेते हैं। उनके लिये अन्य ग्रहों का अवलोकन करना, अन्तरिक्षीय प्राणियों के साथ संबंध स्थापित करना और उनसे उपयोगी कार्यों में मदद लेना भी संभव हो जाता है। इस सिद्धावस्था में पहुंचते ही साधकों की इन्द्रियां विराट का अंग बनती चली जाती हैं। वह परमात्मा की लीलाओं का अंग बनने लगती हैं। ऐसे साधकों के लिये इच्छामात्र से ही किसी भी प्राणी के भाग्य में बदलाव कर देना, किसी को भी अभयदान दे देना, किसी भी प्राणी को राजा से रंक अथवा रंक से राजा बना देना, केवल इच्छामात्र का खेल बन जाता है। यद्यपि नंश्वर संसार की वास्तविकता से गुजर चुके ऐसे संत अनावश्यक रूप में प्रकृति या परमात्मा के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते और प्रकृति के कार्यों, प्राणियों के जीवन को उनके सहज रूप में आगे बढ़ने देते हैं।
तंत्र का यह श्रेष्ठ मार्ग है। इस सिद्धावस्था तक पहुंच पाना हर किसी के लिये सहज रूप में संभव नहीं हो पाता। यहां तक पहुंचने के लिये तंत्र के मार्ग का अनुसरण जन्मों-जन्मों तक करना पड़ता है। यही कारण है कि बहुत दुर्लभ महापुरुष ही यहां तक, इस सिद्धावस्था तक पहुंचने में सफल हो पाते हैं। वशिष्ठ, विश्वामित्र, कणाद, अगस्त जैसे आद्य ऋषि, गोरखनाथ, आदिशंकराचार्य, मृत्युंजय बाबा, स्वामी महातपा, स्वामी सर्वानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे कुछ साधक ही यहां तक पहुंचने में सफल हो पाये हैं।
इस तंत्र साधना का एक रूप 'अघोर पद्धति' पर आधारित रहा है। तांत्रिकों का औघड़ सम्प्रदाय इसी तंत्र मार्ग का अनुसरण करता आ रहा है। भूतभावन भगवान भोले शंकर स्वयं इसी मत के साधक रहे हैं। औघड़ों की यह पद्धति अब भी निरन्तर जारी है। इस अघोर पद्धति पर कभी विस्तारपूर्वक लिखूंगा।
तंत्र साधना का दूसरा रूप 'हठ योग' की पद्धति पर आधारित रहा है। इसमें तंत्र साधक हठयोग की पद्धति का अनुसरण करते हुये आत्मरूपान्तरण की प्रक्रिया से गुजरते हुये अन्ततः परमात्मा का दिव्य साक्षात्कार प्राप्त कर लेता है। हठयोग तंत्र, तंत्र साधना से ही संबंधित आत्मरूपान्तरण की एक विशिष्ट और वैज्ञानिक प्रक्रिया रही है, जिसे तंत्र साधकों में 'क्रियायोग' की पद्धति के नाम से जाना जाता है। इस क्रियायोग के थोड़े से अभ्यास से ही साधकों को अनेक प्रकार के दिव्य अनुभव होने लग जाते हैं। वास्तव में हठयोग पद्धति पर आधारित 'क्रियायोग' अपनी अन्तः अतिचेतना में गहराई तक प्रवेश की एक अद्भुत प्रक्रिया है। यह आत्मसाक्षात्कार और समाधि जैसी सिद्धावस्था तक पहुंचने की सबसे सरल, सहज, वैज्ञानिक और अद्भुत प्रक्रिया है। इसके गहन अभ्यास से कुछ दिनों के भीतर ही साधकों को अनेक प्रकार की दिव्य अनुभूतियां प्राप्त होने लग जाती हैं। इसके नियमित अभ्यास से शीघ्र ही साधकों की चेतना स्थूल शरीर से लेकर सूक्ष्म जगत में परिभ्रमण करने लग जाती है।
क्रियायोग तंत्र आधारित एक ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसका सर्वप्रथम प्रकटीकरण भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में गीता ज्ञान देते हुये अर्जुन के सामने किया था। यद्यपि बाद में आत्मसाक्षात्कार की इस जटिल प्रक्रिया को पतंजलि ने और अधिक परिष्कृत करके सरल रूप प्रदान किया। क्रियायोग संबंधी इस पद्धति पर हिमालय में तिब्बत की सीमा में स्थित ज्ञानगंज जैसे सिद्धक्षेत्र में भी निरन्तर गहन स्वाध्याय के कार्य होते रहे हैं। इस ज्ञानगंज का संबंध आदिशंकराचार्य, गोरखनाथ, ईसा और महर्षि पुलत्स्य एवं कणाद जैसे ऋषियों से लेकर आचार्य द्रोण, माँ कृपाल भैरवी, किंकट स्वामी, स्वामी विशुद्धानन्द, योगी चैतन्यप्रज्ञ, अक्षरानन्द स्वामी, महातांत्रिक मणिसंभव आदि अनेक सिद्ध साधकों के साथ रहा है।
ज्ञानगंज नामक इस स्थान को बहुत से लोग सिद्धाश्रम या सिद्ध साधकों की स्थली आदि नामों से भी जानते हैं। यह उच्च साधना का एक ऐसा स्थल है, जहां साधना के विभिन्न रूपों पर निरन्तर अध्ययन, मनन, स्वाध्याय आदि का कार्य चलता रहता है। यह एक ऐसा सिद्ध स्थल है, जिसकी खोज अनेक पश्चिमी साधकों ने भी की है और उनमें से बहुत से लोग यहां तक पहुंचने में भी सफल रहे हैं। फ्रांस की एक लेखिका, जो बाद में लामा बन गयी थी, एक तिब्बतीय तंत्र साधक की मदद से सिद्धाश्रम में प्रवेश पाने में सफल रही थी। इसी प्रकार थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका और 'सेवन रेज' एवं 'सीक्रेट डॉक्ट्राइन' जैसी प्रसिद्ध कृतियों की लेखिका मेडम ब्लावट्रस्वी भी एक तिब्बतीय लामा की मदद से ज्ञानगंज तक पहुंचने में सफल रही थी। तिब्बतीय लामा की यह एक अशरीरी आत्मा है, जो अनेक शताब्दियों से लोगों की मार्गदर्शक बनी हुई है।
आधुनिक समय में क्रियायोग नामक इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रकटीकरण काशी के महान सिद्धयोगी श्यामाचरण लाहड़ी महाशय के द्वारा किया गया था। बाद में उन्हीं की परम्परा को उनके शिष्यों ने आगे बढ़ाया। यद्यपि समय के साथ-साथ और जिज्ञासु साधकों के अभाव में सिद्ध साधकों की संख्या निरन्तर घटती चली गयी। असली क्रियावान योगी गुप्त स्थानों पर चले गये और उनकी जगह पर प्रचार-प्रसार के भूखे योगी रह गये।
स्वयं लाहड़ी महाशय जी को इस क्रियायोग पद्धति की दीक्षा उनके पूर्वजन्मों के गुरु महावतार बाबा के द्वारा रानीखेत स्थित पाण्डुखोली नामक एक प्राचीन गुफा में प्रदान की थी। महावतार बाबा का संबंध भी पिछली अनेक शताब्दियों से हिमालय स्थित ज्ञानगंज आश्रम के साथ रहा है। ज्ञानगंज में महावतार बाबा को मृत्युञ्जय स्वामी की उपाधि प्रदान की गयी है, क्योंकि उन्होंने पिछली बीस-बाईस शताब्दियों से निरन्तर ज्ञानगंज और समाज के मध्य नारद की भांति संबंध स्थापित किया हुआ है। महावतार बाबा अपने कुछ सिद्ध साधकों के साथ ज्ञानगंज और हिमालय स्थित अनेक गुप्त स्थानों एवं तिब्बतीय लामाओं के गुप्त मठों में निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। बाबा जब भी किसी इच्छुक जिज्ञासु को क्रियायोग जैसी किसी पद्धति के लिये अत्यधिक लालायित अवस्था में पाते हैं, तुरन्त वायुमार्ग से उसके पास पहुंच जाते हैं और उसे क्रियायोग की दीक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि क्रियायोग की दीक्षा प्रदान करने का उत्तरदायित्व उन्होंने अपने सांसारिक एवं विरक्त सिद्ध साधकों को सौंप रखा है। महावतार बाबा का प्रत्यक्ष दर्शन लाभ लेने वाले अनेक साधक अब भी साधना में रत हैं।
ज्ञानगंज से ही संबंधित एक अन्य महापुरुष हैं, जिन्हें महर्षि महातपा के नाम से जाना जाता है। महर्षि महातपा भी अनेक शताब्दियों से क्रियायोग संबंधी अनेक प्रक्रियाओं के प्रचार-प्रसार में जुटे हुये हैं। महर्षि महातपा द्वारा भी समय-समय पर अलग-अलग साधकों को क्रियायोग की दीक्षा प्रदान करने के उल्लेख मिलते रहे हैं। कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ को उनकी तिब्बत यात्रा के दौरान इन्हीं द्वारा क्रियायोग अथवा उस जैसी ही किसी अन्य तंत्र संबंधी पद्धति की दीक्षा प्रदान की गई थी। गोरखनाथ प्रारम्भ में शाक्त उपासकों के सिद्धों के वर्ग से संबंधित रहे थे और तांत्रिकों की पंचमकार क्रियाओं का भरपूर आनन्द लूटते रहते थे। वह भी अपने गुरु मच्छन्दर नाथ की भांति मांस, मदिरा, मैथुन, मुद्रा और मत्स्य के भोग में निमग्न रहते थे। इन क्रियाओं का पूर्णतः भोग करने एवं इनसे विरक्त होकर ही वे कामाख्या त्यागकर हिमालय यात्रा पर निकले थे।
महर्षि महातपा के द्वारा ही काशी के प्रसिद्ध संत और लाहड़ी महाशय के समकालीन प्रसिद्ध योगी त्रैलंग स्वामी को तंत्र साधना की दीक्षा प्रदान की थी। इनके अलावा मेहर बाबा, गढ़वाल के प्रसिद्ध संत गूदड़ी बाबा, नैनीताल के हेडाखान बाबा, हरिहर बाबा, बंगाल के चैतन्यपुरी और हीरानन्द स्वामी आदि अनेक ऐसे सिद्ध महापुरुष हो चुके हैं, जिन्हें तंत्र साधना संबंधी दीक्षाएं महर्षि महातपा के द्वारा प्रदान की गई थी। ऐसा भी माना जाता है कि महाकाली के परम साधक रामकृष्ण परमहंस जिस तंत्र साधना का नियमित अभ्यास किया करते थे और जिसके प्रभाव से उनकी परम आराध्य माँ काली स्वयं अपने हाथों से रामकृष्ण को महाप्रसाद का भोग प्रदान करने लगी थी, वह पद्धति भी क्रियायोग पर ही आधारित थी। संभवतः वह पद्धति उन्हें ज्ञानगंज से संबंधित किसी सिद्ध साधक ने प्रदान की होगी।
क्रियायोग पद्धति की तरह ही हठयोग पर आधारित तंत्र साधना की एक और विशिष्ट प्रक्रिया है, जो कुण्डलिनी जागरण के निमित्त काम में लाई जाती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से भी तंत्र साधक आत्मरूपान्तरण की प्रक्रिया से गुजरते हुये और कुण्डलिनी के समस्त चक्रों को क्रमशः जाग्रत करते हुये साधना के अन्तिम लक्ष्य परमात्मा के दिव्य साक्षात्कार को प्राप्त कर लेता है।
तंत्र साधना का जो दूसरा रूप रहा है, वह उपासना एवं समर्पण की पद्धति पर आधारित है। इसमें मंत्र आदि विशिष्ट प्रक्रियाओं के माध्यम से स्वयं की अन्तःचेतना में जन्म-जन्मान्तर से सदैव सुषुप्तावथा में पड़ने रहने वाले चेतना केन्द्रों को जाग्रत करना होता है। इन प्रक्रियाओं के माध्यम से साधक की अन्तःचेतना अपनी इष्टदेवी के साथ जुड़ने लगती है। इनमें तंत्र साधक पूर्णतः समर्पित भाव से अपनी आराध्य शक्ति को समर्पित हो जाता है। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ जाती है, जहां साधक और साध्य में कोई भेद नहीं रह जाता। दोनों का परस्पर मेल हो जाता है तथा साधक के समस्त कर्म उसके आराध्य के बन जाते हैं।
तंत्र साधना की इस पद्धति के माध्यम से जैसे-जैसे साधक के चेतना केन्द्र सक्रिय और जाग्रत होते चले जाते हैं, वैसे-वैसे ही उसकी चेतना शक्ति का भी विस्तार होता चला जाता है। अन्ततः वह स्वयं विराट का अंश बनने लग जाता है। एक अवस्था के बाद अपनी साधना के माध्यम से अपनी इष्टदेवी का दिव्य साक्षात्कार पाने में भी वह सफल हो जाता है। इस साधना पद्धति की प्राचीन समय से ही दो प्रकार की प्रक्रियायें प्रचलित रही हैं। इनमें से एक प्रक्रिया विशुद्ध रूप में वैदिक पद्धति पर आधारित है, जबकि दूसरी प्रकार की प्रक्रियायें तंत्र की विविध रूपों से संबंधित रही है।
तंत्र साधना का वैदिक पद्धति पर आधारित जो रूप रहा है, उसमें अभीष्ट इष्ट से सम्बन्धित मंत्रजाप, उनके स्तोत्र, रक्षा कवच, रहस्य पाठ का अभ्यास करना, विशिष्ट प्रकार की सामग्रियों से यज्ञ, हवन करके अपने इष्ट को प्रसन्न करना मुख्य कर्म रहा है। साधना की इस प्रक्रिया में तंत्र साधक पूर्णतः समर्पित भाव से अपने इष्ट को समर्पित हो जाता है और उसके ध्यान, विभिन्न तरह के न्यास (ऋष्यादि न्यास, करन्यास, हृदयान्यास आदि) कर्मों का अभ्यास करते हुये उसे स्वयं में स्थापित कर लेता है। यह तंत्र साधना की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। दस महाविद्याओं की साधना का भी यह एक प्रमुख अंग रही है। यद्यपि इस पद्धति में पूर्ण सफलता पाने के लिये अभ्यास के साथ-साथ साधना में पूर्ण श्रद्धा, गहन आस्था, दीर्घ धैर्य और समर्पित भाव की आवश्यकता होती है। इसलिये जब तक तंत्र साधक मानसिक रूप से पूर्णतः साधना के लिये तैयार न हो जाये, तब तक उसे इस पद्धति में दीक्षित नहीं करना चाहिये अन्यथा साधना में निष्फल रहने की पूरी संभावना बनी रहती है।
तंत्र साधना का जो दूसरा तांत्रिक विधान है, उसमें भी मंत्रजाप, स्तोत्र पाठ, हवन आदि के उपक्रमों को जारी रखना पड़ता है, लेकिन इस पद्धति में साधक को मानसिक रूप से शीघ्र तैयार करने के लिये विभिन्न तरह की तांत्रिक वस्तुओं, पूजा सामग्रियों, यंत्र आदि की आवश्यकता पड़ती है। तंत्र साधना का यह एक विस्तृत विधान है और इसकी विस्तारपूर्वक यहां व्याख्या करना संभव नहीं है, क्योंकि बहुत से तंत्र साधक तांत्रिक वस्तुओं और तांत्रिक क्रियाओं के रूप में ऐसी चीजों का प्रयोग भी करने लग जाते हैं, जो सामान्य साधकों के लिये घृणास्पद होती हैं।
तंत्र साधना का जो तीसरा मार्ग अथवा तीसरा रूप रहा है, वह मुख्यतः क्षणिक इच्छाओं की पूर्ति एवं जीवन में नित नवीन उत्पन्न होने वाली विविध तरह की परेशानियों से मुक्ति पाने पर आधारित है। तंत्र साधना का यही रूप अब सर्वत्र दिखई पड़ता है। तंत्र साधना के इस रूप को ही तांत्रिक अनुष्ठान कहा जाता है। तंत्र के इस प्रचलित रूप में स्वयं साधक को आत्म रूपान्तरण की प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक नहीं होता। वह जिस रूप अथवा जिस अवस्था में होता है, वहीं ऐसे तांत्रिक अनुष्ठानों को सम्पन्न कर सकता है अथवा किसी अन्य तांत्रिक के द्वारा अपने अभीष्ट कार्य के निमित्त सम्पन्न करवा सकता है।
तांत्रिक अनुष्ठानों का यह रूप है तो बहुत प्रभावशाली और इन अनुष्ठानों के चमत्कार भी शीघ्र देखने को मिलते हैं, किन्तु इनका प्रभाव सीमित समय तक ही रहता है। इन अनुष्ठानों के माध्यम से साधकों के विविध तरह के दुःख, दर्द, क्लेश, पीड़ाएं आदि शीघ्र समाप्त तो हो जाती हैं, पर न तो उन पर उनके इष्ट की कृपा सदैव बनी रह पाती है और न ही वह साधक दिव्य अनुभूति के स्तर तक पहुंच पाते हैं। इष्ट से साक्षात्कार, शाश्वत सत्य की उपलब्धि और आत्म साक्षात्कार जैसी कोई उपलब्धि उन्हें नहीं होती।
ऐसे सभी तांत्रिक अनुष्ठान तीन पद्धतियों से सम्पन्न किये जाते हैं। इनमें एक पद्धति अघोर क्रियाओं पर आधारित है, जिसमें तांत्रिक शमशान भूमि में रहकर ऐसे समस्त अनुष्ठानों को सम्पन्न करने का प्रयास करता है। दूसरी पद्धति वामाचार्य क्रियाओं पर आधारित रहती है, जिसमें अनुष्ठान को पूर्ण रूप से सम्पन्न करने के लिये पंचमकारों पर जोर दिया जाता है, जबकि तीसरी पद्धति शुद्ध आचरण से संबंधित वैदिक पद्धतियों पर आधारित रहती है। तांत्रिक अनुष्ठान की इन्हीं क्रियाओं के साथ तंत्र की मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, विद्वेषण जैसी क्रियाओं का गहरा सम्बन्ध रहता है। इन मारण, मोहन, उच्चाटन क्रियाओं के माध्यम से एक भ्रष्ट तांत्रिक किसी भी व्यक्ति को मृत्यु के समकक्ष पीड़ाएं दे सकता है।
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