29/10/2026
🌺 श्रीविद्या साधना — Day 19 🌺
श्रीचक्र का चतुर्थ आवरण — सर्वसौभाग्यदायक चक्र और चौदह शक्तियों का रहस्य
क्या सौभाग्य का अर्थ केवल धन, विवाह, प्रतिष्ठा और सांसारिक सफलता है? श्रीचक्र के चौथे आवरण को सर्वसौभाग्यदायक क्यों कहा गया है? और इसमें प्रतिष्ठित चौदह देवियों के नामों में आकर्षण, आनन्द, सम्मोहन, स्तम्भन और सम्पत्ति जैसी अवधारणाएँ क्यों आती हैं?
🌺 जय माँ ललिता महात्रिपुरसुन्दरी। 🌺
श्रीचक्र का चतुर्थ आवरण सर्वसौभाग्यदायक चक्र कहलाता है।
इसकी ज्यामितीय संरचना में चौदह त्रिकोणीय क्षेत्र होते हैं। इन्हें चतुर्दशार कहा जाता है।
इन चौदह त्रिकोणों में चौदह विशिष्ट देवियों का स्थान माना जाता है।
इनके नामों में एक विशेष समानता है—अधिकांश नामों के आरम्भ में 'सर्व' शब्द आता है।
यह नामावली श्रीविद्या की तांत्रिक शब्दावली का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, क्योंकि इसमें आकर्षण और संक्षोभण के साथ-साथ आनन्द, सम्पत्ति, मन्त्र और द्वन्द्व जैसे विषय भी सम्मिलित हैं।
आज हम इसी चतुर्थ आवरण की संरचना, चौदह देवियों, चक्रेश्वरी, योगिनी तथा सौभाग्य के व्यापक आध्यात्मिक अर्थ का अध्ययन करेंगे।
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🌸 1. सर्वसौभाग्यदायक शब्द का वास्तविक अर्थ
इस नाम में तीन प्रमुख शब्द हैं।
सर्व — समस्त अथवा सभी।
सौभाग्य — शुभ भाग्य, मंगल, कल्याण अथवा अनुकूल स्थिति।
दायक — प्रदान करने वाला।
इस प्रकार सर्वसौभाग्यदायक का सामान्य अर्थ हुआ—समस्त सौभाग्य प्रदान करने वाला।
लेकिन संस्कृत में सौभाग्य की अवधारणा केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं है।
सौभाग्य शब्द का प्रयोग शुभता, कल्याण, समृद्धि और जीवन की अनुकूल परिस्थितियों के लिए विभिन्न सन्दर्भों में मिलता है।
श्रीविद्या के चतुर्थ आवरण का नाम इसी व्यापक मंगलमय शब्दावली से सम्बन्धित है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी यन्त्र को घर में रखने मात्र से विवाह, धन अथवा व्यापार में सफलता निश्चित हो जाएगी।
यह एक विशिष्ट तांत्रिक आवरण का नाम है, जिसका पूर्ण महत्त्व उसकी देवता-व्यवस्था में समझा जाता है।
🌸 2. चतुर्दशार — चौदह त्रिकोणों की संरचना
सर्वसौभाग्यदायक चक्र श्रीचक्र के चौदह त्रिकोणीय क्षेत्रों से निर्मित आवरण के रूप में पहचाना जाता है।
यहाँ अर शब्द का प्रयोग त्रिकोणीय विभाग के अर्थ में किया जाता है।
इसीलिए इसे चतुर्दशार कहा जाता है।
इन चौदह क्षेत्रों में चौदह देवियाँ प्रतिष्ठित मानी जाती हैं।
श्रीचक्र की इस संरचना में एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
चौदह त्रिकोण कोई चौदह अलग-अलग स्वतंत्र यन्त्र नहीं हैं।
वे श्रीचक्र के नौ मुख्य त्रिकोणों के परस्पर प्रतिच्छेदन से निर्मित ज्यामितीय व्यवस्था के भाग हैं।
प्रत्येक क्षेत्र का आवरण-पूजा में विशिष्ट स्थान है।
चौदह की संख्या को देखकर इसे स्वतः चौदह लोकों या चौदह विद्याओं के समान नहीं मान लेना चाहिए। ऐसे सम्बन्धों के लिए सम्बन्धित ग्रन्थ अथवा टीका का स्पष्ट आधार आवश्यक है।
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🌺 3. सर्वसौभाग्यदायक चक्र की चौदह देवियाँ
1. सर्वसंक्षोभिणी
प्रथम देवी हैं—सर्वसंक्षोभिणी।
संक्षोभ शब्द का सम्बन्ध उद्वेलन, क्षोभ अथवा किसी स्थिति में हलचल उत्पन्न होने से है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अन्तर समझना आवश्यक है।
श्रीचक्र के तृतीय आवरण का नाम सर्वसंक्षोभण चक्र है, जबकि चतुर्थ आवरण की प्रथम देवी सर्वसंक्षोभिणी हैं।
दोनों नामों में समान शब्द अवश्य है, लेकिन उनका आवरण-सम्बन्धी स्थान अलग है।
इसलिए समान शब्दों के आधार पर दोनों को एक ही देवी या एक ही उपासना-विधान नहीं मानना चाहिए।
2. सर्वविद्राविणी
दूसरी देवी हैं—सर्वविद्राविणी।
विद्रावण का सामान्य अर्थ दूर हटाना, विचलित करना अथवा तितर-बितर करना हो सकता है।
तांत्रिक साहित्य में विद्रावण शब्द विशिष्ट क्रियाओं की शब्दावली में भी मिलता है।
लेकिन इस देवी के नाम को केवल किसी व्यक्ति को भगाने अथवा परेशान करने की क्रिया के रूप में समझना उचित नहीं है।
उनका स्थान चतुर्दशार के देवतामण्डल में है।
3. सर्वाकर्षिणी
तीसरी देवी हैं—सर्वाकर्षिणी।
आकर्षण का अर्थ है—अपनी ओर खींचना।
यहाँ एक रोचक अन्तर दिखाई देता है।
द्वितीय आवरण में हमने सोलह आकर्षिणी देवियों का अध्ययन किया था, जिनके नाम विशिष्ट अवधारणाओं के साथ जुड़े थे।
लेकिन चतुर्थ आवरण में सर्वाकर्षिणी एक स्वतंत्र देवीसंज्ञा है।
अतः द्वितीय आवरण की सोलह आकर्षिणी शक्तियों और चतुर्थ आवरण की सर्वाकर्षिणी को एक ही देवता-समूह नहीं समझना चाहिए।
4. सर्वाह्लादिनी
चौथी देवी हैं—सर्वाह्लादिनी।
आह्लाद शब्द का सम्बन्ध प्रसन्नता, आनन्द और हर्ष से है।
आह्लादिनी का सामान्य अर्थ प्रसन्नता प्रदान करने वाली समझा जा सकता है।
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र और आध्यात्मिक साहित्य में आनन्द की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
लेकिन यहाँ सर्वाह्लादिनी का नाम एक विशिष्ट तांत्रिक देवी का नाम है।
इसे केवल प्रसन्न रहने की मनोवैज्ञानिक तकनीक के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
5. सर्वसम्मोहिनी
पाँचवीं देवी हैं—सर्वसम्मोहिनी।
सम्मोहन शब्द का सामान्य सम्बन्ध मोहित करने अथवा मोह उत्पन्न करने से है।
लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तांत्रिक साहित्य में प्रयुक्त सम्मोहन और आधुनिक Clinical Hypnosis एक ही विषय नहीं हैं।
दोनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अवधारणाएँ और प्रयोग अलग हैं।
इसलिए सर्वसम्मोहिनी को आधुनिक सम्मोहन चिकित्सा की देवी कहना उचित नहीं होगा।
वे श्रीचक्र की चतुर्थ आवरण-व्यवस्था की एक विशिष्ट देवी हैं।
6. सर्वस्तम्भिनी
छठी देवी हैं—सर्वस्तम्भिनी।
स्तम्भन का सामान्य अर्थ रोकना, स्थिर करना अथवा गति में अवरोध उत्पन्न करना हो सकता है।
तांत्रिक साहित्य में स्तम्भन एक विशिष्ट तकनीकी शब्द के रूप में भी मिलता है।
लेकिन यहाँ देवी के नाम को किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर नियन्त्रण करने की प्रमाणित विधि नहीं समझना चाहिए।
सर्वस्तम्भिनी का स्थान चतुर्थ आवरण की चौदह देवियों में है।
7. सर्वजृम्भिणी
सातवीं देवी हैं—सर्वजृम्भिणी।
जृम्भण शब्द का सम्बन्ध विस्तार, फैलाव अथवा उन्मेष जैसे अर्थों से हो सकता है।
संस्कृत में जृम्भा शब्द का प्रयोग जम्हाई और प्रसरण से सम्बन्धित सन्दर्भों में भी मिलता है।
लेकिन तांत्रिक प्रयोग में जृम्भण का अपना विशिष्ट अर्थ हो सकता है।
इसलिए सर्वजृम्भिणी को केवल किसी सामान्य शारीरिक क्रिया से जोड़ना उचित नहीं है।
8. सर्ववशंकरी
आठवीं देवी हैं—सर्ववशंकरी।
वशंकरी का सम्बन्ध वश में करने अथवा अधीन करने की सामान्य शब्दावली से है।
यह नाम तांत्रिक साहित्य में मिलने वाले वशीकरण-सम्बन्धी शब्दों की याद दिलाता है।
लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।
किसी देवी के नाम में वश शब्द आने का अर्थ यह नहीं है कि उनकी उपासना से किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा समाप्त हो जाती है।
ऐसे दावों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
सर्ववशंकरी चतुर्थ आवरण की एक विशिष्ट देवता-संज्ञा है।
9. सर्वरञ्जनी
नौवीं देवी हैं—सर्वरञ्जनी।
रञ्जन शब्द का सम्बन्ध प्रसन्न करना, अनुरक्त करना अथवा रंगना जैसे अर्थों से है।
संस्कृत साहित्य में रञ्जन का प्रयोग भावात्मक और सौन्दर्यात्मक सन्दर्भों में मिलता है।
सर्वरञ्जनी का नाम इसी शब्दावली से सम्बन्धित है।
लेकिन इसे केवल दूसरों को प्रसन्न करने की सामाजिक कला के रूप में सीमित नहीं करना चाहिए।
10. सर्वोन्मादिनी
दसवीं देवी हैं—सर्वोन्मादिनी।
उन्माद शब्द का सामान्य सम्बन्ध तीव्र आवेश अथवा उन्मत्त अवस्था से है।
यह नाम तांत्रिक शब्दावली का अंग है।
लेकिन यहाँ उन्माद को आधुनिक मानसिक रोगों के समान समझना उचित नहीं होगा।
सर्वोन्मादिनी को किसी मनोवैज्ञानिक विकार अथवा चिकित्सकीय स्थिति का प्रतिनिधित्व करने वाली देवी कहना भी बिना प्रमाण उचित नहीं है।
उनका स्थान चतुर्दशार की विशिष्ट देवी-व्यवस्था में है।
11. सर्वार्थसाधिनी
ग्यारहवीं देवी हैं—सर्वार्थसाधिनी।
अर्थ शब्द के अनेक अर्थ हैं।
इसका सम्बन्ध प्रयोजन, उद्देश्य, अर्थवत्ता और धन से भी हो सकता है।
साधिनी का सम्बन्ध सिद्ध करने अथवा सम्पन्न करने से है।
इस प्रकार सर्वार्थसाधिनी का सामान्य अर्थ समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली समझा जा सकता है।
लेकिन यहाँ अर्थ शब्द को केवल धन के अर्थ में सीमित नहीं करना चाहिए।
यह नाम प्रयोजन और सिद्धि की व्यापक धार्मिक शब्दावली से सम्बन्धित है।
12. सर्वसम्पत्तिपूरिणी
बारहवीं देवी हैं—सर्वसम्पत्तिपूरिणी।
सम्पत्ति शब्द का सम्बन्ध समृद्धि और उपलब्ध साधनों से है।
लेकिन संस्कृत में सम्पत्ति का अर्थ केवल मुद्रा अथवा बैंक-बैलेंस नहीं है।
यह विभिन्न प्रकार की सम्पन्नता और उपलब्धि के सन्दर्भ में प्रयुक्त हो सकता है।
सर्वसम्पत्तिपूरिणी नाम इसी व्यापक समृद्धि की अवधारणा से सम्बन्धित है।
फिर भी इसे निश्चित आर्थिक लाभ प्रदान करने का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित साधन नहीं माना जा सकता।
13. सर्वमन्त्रमयी
तेरहवीं देवी हैं—सर्वमन्त्रमयी।
यह नाम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
मन्त्रमयी का अर्थ है—मन्त्रस्वरूप अथवा मन्त्रों से सम्बद्ध स्वरूप वाली।
श्रीविद्या की परम्परा में मन्त्र और देवी के सम्बन्ध का अत्यन्त महत्त्व है।
इसलिए सर्वमन्त्रमयी का नाम चतुर्थ आवरण में मन्त्रात्मक देवीतत्त्व की अवधारणा की ओर संकेत करता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी मन्त्रों की परम्परागत भिन्नताएँ समाप्त हो जाती हैं।
विभिन्न मन्त्रों की अपनी देवता, विनियोग और परम्परा हो सकती है।
14. सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी
चौदहवीं और अन्तिम देवी हैं—सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी।
यह नाम दार्शनिक दृष्टि से अत्यन्त रोचक है।
द्वन्द्व शब्द का सम्बन्ध दो विपरीत अथवा परस्पर सम्बद्ध अवस्थाओं से हो सकता है।
जैसे—
सुख और दुःख।
लाभ और हानि।
मान और अपमान।
शीत और उष्ण।
भारतीय दार्शनिक साहित्य में द्वन्द्वों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है।
भगवद्गीता में भी द्वन्द्वों के प्रति समत्व का महत्त्व बताया गया है।
क्षयंकरी का सामान्य अर्थ क्षय करने वाली अथवा समाप्त करने वाली समझा जा सकता है।
इस प्रकार सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी का नाम द्वन्द्वों के क्षय की अवधारणा से सम्बन्धित दिखाई देता है।
लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।
भगवद्गीता में वर्णित समत्व और श्रीचक्र की सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी देवी का विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप अलग-अलग शास्त्रीय सन्दर्भ हैं।
उनके बीच दार्शनिक तुलना की जा सकती है, लेकिन दोनों को बिना आधार एक ही सिद्धान्त नहीं मानना चाहिए।
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🌸 4. चौदह देवियों का सम्पूर्ण क्रम
क्रम| देवी| नाम से सम्बन्धित अवधारणा
1| सर्वसंक्षोभिणी| उद्वेलन
2| सर्वविद्राविणी| विद्रावण
3| सर्वाकर्षिणी| आकर्षण
4| सर्वाह्लादिनी| आह्लाद
5| सर्वसम्मोहिनी| सम्मोहन
6| सर्वस्तम्भिनी| स्तम्भन
7| सर्वजृम्भिणी| प्रसरण अथवा जृम्भण
8| सर्ववशंकरी| वश अथवा अधीनता
9| सर्वरञ्जनी| रञ्जन
10| सर्वोन्मादिनी| उन्माद
11| सर्वार्थसाधिनी| प्रयोजन-सिद्धि
12| सर्वसम्पत्तिपूरिणी| सम्पन्नता
13| सर्वमन्त्रमयी| मन्त्रस्वरूप
14| सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी| द्वन्द्वों का क्षय
इस नामावली को देखने पर एक महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है।
चतुर्थ आवरण में केवल सौभाग्य अथवा समृद्धि से सम्बन्धित नाम नहीं हैं।
यहाँ ऐसी देवियाँ भी हैं जिनके नामों का सम्बन्ध उद्वेलन, आकर्षण, स्तम्भन, मन्त्र और द्वन्द्व जैसे विषयों से है।
इससे पता चलता है कि सर्वसौभाग्यदायक चक्र की देवता-व्यवस्था उसके सामान्य नाम से कहीं अधिक विस्तृत है।
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🌸 5. चतुर्थ आवरण की चक्रेश्वरी — त्रिपुरवासिनी
श्रीचक्र की प्रचलित नवावरण पूजा-पद्धतियों में सर्वसौभाग्यदायक चक्र की चक्रेश्वरी त्रिपुरवासिनी मानी जाती हैं।
त्रिपुरवासिनी नाम का सामान्य अर्थ त्रिपुरा में निवास करने वाली समझा जा सकता है।
लेकिन यहाँ त्रिपुरा शब्द को केवल किसी भौगोलिक स्थान के अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
श्रीविद्या की परम्परा में त्रिपुरा शब्द देवी के विशिष्ट आध्यात्मिक स्वरूप से सम्बन्धित है।
त्रिपुरवासिनी इस आवरण की अधिष्ठात्री देवी हैं।
चौदह त्रिकोणों में प्रतिष्ठित देवियाँ और चक्रेश्वरी त्रिपुरवासिनी—इन दोनों की उपासना-सम्बन्धी भूमिकाएँ अलग हैं।
🌸 6. चतुर्थ आवरण की योगिनी — सम्प्रदाययोगिनी
इस आवरण की योगिनी को सम्प्रदाययोगिनी कहा जाता है।
यह नाम विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
सम्प्रदाय शब्द का सामान्य अर्थ किसी परम्परा अथवा परम्परागत शिक्षण-क्रम से है।
भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं में ज्ञान का संरक्षण और संप्रेषण गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से होता रहा है।
श्रीविद्या में भी विभिन्न सम्प्रदायों की अपनी विशिष्ट मन्त्रात्मक और अनुष्ठानिक व्यवस्थाएँ हैं।
लेकिन सम्प्रदाययोगिनी के नाम को केवल गुरु-शिष्य परम्परा का सामान्य प्रतीक समझना पर्याप्त नहीं होगा।
यह चतुर्थ आवरण की विशिष्ट योगिनी-संज्ञा है।
इसका पूर्ण तांत्रिक महत्त्व सम्बन्धित नवावरण पूजा-पद्धति में समझा जाता है।
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🌸 7. सौभाग्य और सम्पत्ति में क्या अन्तर है?
आज के विषय में एक अत्यन्त उपयोगी दार्शनिक प्रश्न सामने आता है।
यदि इस आवरण का नाम सर्वसौभाग्यदायक है, तो इसमें सर्वसम्पत्तिपूरिणी जैसी देवी अलग से क्यों प्रतिष्ठित है?
क्या सौभाग्य और सम्पत्ति एक ही बात हैं?
सामान्य भाषा में इन शब्दों को कभी-कभी समान अर्थ में प्रयोग किया जाता है।
लेकिन इनके अर्थों में अन्तर सम्भव है।
सम्पत्ति का सम्बन्ध उपलब्ध संसाधनों और सम्पन्नता से हो सकता है।
जबकि सौभाग्य का सम्बन्ध व्यापक शुभता और अनुकूल स्थिति से भी हो सकता है।
उदाहरण के लिए—
किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त धन हो सकता है, लेकिन उसका पारिवारिक जीवन अशान्त हो।
किसी दूसरे व्यक्ति के पास सीमित आर्थिक साधन हों, लेकिन उसका जीवन सन्तोष और सहयोग से परिपूर्ण हो।
यह उदाहरण केवल दोनों शब्दों के व्यापक अर्थों को समझाने के लिए है।
इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सर्वसौभाग्यदायक चक्र की चौदह देवियाँ जीवन के चौदह निश्चित क्षेत्रों को नियंत्रित करती हैं।
ऐसा दावा करने के लिए स्पष्ट शास्त्रीय आधार आवश्यक होगा।
🌸 8. सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी का नाम सबसे अन्त में क्यों आता है?
चौदह देवियों की नामावली में अन्तिम नाम सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी है।
यह नाम विशेष रूप से विचारणीय है।
प्रारम्भिक देवियों के नामों में आकर्षण, उद्वेलन और रञ्जन जैसी अवधारणाएँ दिखाई देती हैं।
मध्य भाग में प्रयोजन और सम्पत्ति से सम्बन्धित नाम मिलते हैं।
और अन्त में द्वन्द्वों के क्षय का उल्लेख आता है।
इस क्रम को देखकर एक दार्शनिक प्रश्न उठता है—
क्या जीवन की पूर्णता केवल इच्छाओं की पूर्ति में है, या सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों के प्रति हमारी दृष्टि भी महत्त्वपूर्ण है?
यह प्रश्न आत्मचिन्तन के लिए उपयोगी है।
लेकिन हमें सावधान रहना चाहिए कि केवल नामावली के क्रम से कोई निश्चित आध्यात्मिक विकासक्रम घोषित न कर दें।
किसी ऐसी व्याख्या को शास्त्रीय सिद्धान्त कहने के लिए सम्बन्धित तंत्रग्रन्थ अथवा प्रामाणिक टीका का आधार आवश्यक है।
इसलिए यहाँ हम इसे एक चिन्तन का विषय मान सकते हैं, न कि अनिवार्य शास्त्रीय निष्कर्ष।
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🌺 आज के अध्ययन का मूल निष्कर्ष
सर्वसौभाग्यदायक चक्र श्रीचक्र का चतुर्थ आवरण है।
इसमें चौदह त्रिकोणीय क्षेत्र होते हैं और प्रत्येक क्षेत्र से एक विशिष्ट देवी सम्बन्धित है।
इन चौदह देवियों की नामावली में संक्षोभण, विद्रावण, आकर्षण, आह्लाद, सम्मोहन, स्तम्भन, जृम्भण, वश, रञ्जन, उन्माद, अर्थसिद्धि, सम्पत्ति, मन्त्र और द्वन्द्वक्षय जैसी अवधारणाएँ आती हैं।
इस आवरण की चक्रेश्वरी त्रिपुरवासिनी तथा योगिनी सम्प्रदाययोगिनी मानी जाती हैं।
यहाँ सौभाग्य शब्द को केवल धन अथवा भौतिक उपलब्धियों तक सीमित करना उचित नहीं है।
चतुर्थ आवरण की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसकी चौदह देवियाँ श्रीविद्या की विविध तांत्रिक अवधारणाओं को एक व्यवस्थित देवतामण्डल के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
📖 शास्त्रीय अध्ययन के प्रमुख आधार
सर्वसौभाग्यदायक चक्र और उसकी चौदह देवियों का अध्ययन श्रीविद्या के नवावरण-पूजा साहित्य में मिलता है।
इस विषय के प्रमुख अध्ययन-स्रोतों में योगिनीहृदय, तन्त्रराजतन्त्र और नित्याषोडशिकार्णव की परम्पराएँ सम्मिलित हैं।
इसके अतिरिक्त ललिता सहस्रनाम की पारम्परिक टीकाएँ भी श्रीचक्र की आवरण-व्यवस्था को समझने में उपयोगी हैं।
आज प्रस्तुत नामावली प्रचलित नवावरण पूजा-पद्धतियों पर आधारित है। विभिन्न सम्प्रदायों में उच्चारण, विन्यास और अनुष्ठानिक व्यवस्था के कुछ भेद मिल सकते हैं।
🌸 आज का चिन्तन प्रश्न
आपके विचार में वास्तविक सौभाग्य क्या है—धन और उपलब्धियों की अधिकता, या ऐसा जीवन जिसमें समृद्धि के साथ विवेक, सन्तोष और मानसिक सन्तुलन भी उपस्थित हो?
अपने विचार Comments में अवश्य साझा करें।
🌺 जय माँ ललिता महात्रिपुरसुन्दरी। 🌺
— AstroVedanshu | Vashistha Gurukul
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“श्रीचक्र का पंचम आवरण — सर्वार्थसाधक चक्र और दस देवियों का रहस्य”
अगली पोस्ट में हम श्रीचक्र के पाँचवें आवरण का अध्ययन करेंगे।
इसमें स्थित दस त्रिकोणों, दस सर्वसिद्धिप्रदा आदि देवियों, चक्रेश्वरी त्रिपुराश्री और योगिनी कुलोत्तीर्णयोगिनी का क्रमबद्ध परिचय प्राप्त करेंगे।
विशेष रूप से समझेंगे कि सर्वसिद्धिप्रदा, सर्वसम्पत्प्रदा, सर्वप्रियंकरी, सर्वमंगलकारिणी और अन्य देवियों के नामों में सिद्धि, सम्पत्ति, प्रियता, मंगल तथा दुःख से मुक्ति जैसी अवधारणाएँ किस प्रकार आती हैं।
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