पाखंड पर चोट

पाखंड पर चोट लोगो में साइंटिफिक टेंपरामेंट को इनकरेज करना

17/08/2025

मनुस्मृति के सपोर्टर आ जाओ दम हो तो
काटो मेरी पोस्ट को..
===========
मनुस्मृति का श्लोक है:
“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:.
यत्रैतास्तु न पूज्यंते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:.”
-मनु 3/56
अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है और
जहां इन की पूजा नहीं होती, वहां सब क्रियाएं निष्फल होती हैं.
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बस इस श्लोक पर हाय तोब करने वाले====
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ऋग्वेद में लिखा है:
इंद्र ने स्वयं कहा, “स्त्री के मन को शिक्षित नहीं किया
जा सकता. उस की बुद्धि तुच्छ होती है.” ( ऋ. 8/33/17 ).
इसी पुस्तक में अन्यत्र लिखा है:
“स्त्रियों के साथ मैत्री नहीं हो सकती. इन के दिल लक्कड़बम्घों के दिलों
से क्रूर होते हैं.” ( ऋ. 10/95/15 )
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अब हम 'मनुस्मृति ' के कुछ एलोक प्रस्तुत करते हैं जिन से मनु के नारी विषयक
विचार पूर्णतः स्पष्ट हो जाएंगे और सामान्य व्यक्ति को ज्ञात हो जाएगा कि जहां
नारियों की पूजा होती है....कह कर उस की प्रशंसा करने वाले मनु की, नारियों के
प्रति कैसी राय थी.
=
1=पुरुषों को खराब करना स्त्रियों का स्वभाव ही है, अतः बुद्धिमानों को इन
से बचना चाहिए. ( 2/213 )
2=पुरुष विद्वान हो, चाहे अविद्वान, स्त्रियां उसे बुरे रास्ते पर डाल देती हैं.
( 2/214 )
3=चाहे माता हो, चाहे बहन हो, चाहे अपनी लड़की हो, इन के पास एकांत
में नहीं बैठना चाहिए. इंद्रियां कई बार विद्वानों को भी खींच कर बुरे रास्ते
पर ले जाती हैं. ( 2/215 )
4=ललाई लिए भूरे रंग वाली, छः उंगलियों वाली, ज्यादा बालों वाली, बिना
बालों वाली, ज्यादा बोलने वाली स्त्री के साथ विवाह न करे. ( 3/8 )
( वे क्‍या करें? क्‍या मातापिता उन्हें सारी उमर घर में रख सकेंगे ? क्‍या वे आत्महत्या कर लें ? क्‍या वे पेशा करने वाली वेश्याएं बन जाएं? )
5=जिन का कोई भाई न हो, उस के साथ विवाह न करे. ( 3,11 )
( इस में उस बेचारी लड़की का क्‍या कसूर है कि उस का कोई भाई नहीं है?)
6=पुरुषों को दिनदात स्त्रियों की देखभाल करनी चाहिए. ( 9/2 )
7=कुमारावस्था में पिता उस की देखभाल करता है, युवावस्था में पति और
बुढ़ापे में पुत्र. नारी स्वतंत्र नहीं की जानी चाहिए. स्त्रियों को जराजरा सी
बातों से बचाना चाहिए, नहीं तो दोनों कुलों की बदनामी होती है.
( 9/3,5 )
8= स्त्रियों को घर के कामों और धर्म के कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि
वे खाली समय प्राप्त न कर सकें. ( 9/11 )
9=स्त्रियों को बचा कर रखना चाहिए. वे सुंदर या कुरूप का भी ध्यान नहीं
करतीं. वे किसी भी पुरुष की हो जाती हैं. ( 9/14 )
10= स्त्रियों में क्रोध, कुटिलता, द्वेष और बुरे कामों में रुचि स्वभाव से ही होती
है. (9/17)
11= स्त्रियों के संस्कार वेदमंत्रों से नहीं करने चाहिए. वे मूर्ख होती हैं. वे अशुभ
होती हैं. (9/18 )
12= विधवा स्त्री का दोबारा विवाह नहीं करना चाहिए. यदि किया जाए तो धर्म
का नाश होगा. ( 9/64 )

30/04/2025

पार्ट 4=
नंदिग्राम, जहां राम की पादुकाओं (खड़ाऊं) को सिंहासन पर बैठा कर भरत अयोध्या का राजप्रबंध देखता था;

चित्रकूट, जहां राम आदि ने वनवास का बहुत सा समय बिताया था.
ये पांचों स्थल आज विद्यमान हैं. इन स्थानों की पुरातत्त्व विभाग ने काफी खुदाई भी की है. डाक्टर बी. बी. लाल 'रामायण से संबद्ध स्थलों का पुरातत्त्व' योजना के अधीन रामायण से संबद्ध स्थलों की खुदाई करवा चुके हैं. इस काम में 'इंडियन इंस्टिट्यूट आफ एडवांस स्टडीज, शिमला' (जिस के वे निदेशक रहे) और आरकिओलाजिकल सर्वे आफ इंडिया' दोनों ने सहयोग किया.

इस की व्याख्या में शीलस्कंध ने लिखा है-
आयतने बुद्धादिवन्दनस्थाने बुद्धबिम्बं
बुद्धप्रतिमा, बुद्धविशेषो वा. ( सटीक त्रिकांडशेष, 1919 ई., पृ. 200 )

अर्थात चैत्य; बौद्धों का वंदना करने का स्थान, अथवा बुद्ध की प्रतिमा अथवा
बुद्ध है.

4. चैत्य-चैत्यमायतने बुद्धबिम्बे (मेदिनीकोषः ).
अर्थात चैत्य, बुद्ध मंदिर या बुद्ध की मूर्ति को कहते हैं.
न केवल ‘चैत्य' बल्कि स्वयं बुद्ध का भी रामायण में नामोल्लेख किया गया है,

यद्यपि गाली देते हुए.

यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धः तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि, तस्माद् हि सः शंक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात्.
-अयोध्याकांड 109/34
अर्थात जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्ध मतावलंबी) भी दंडनीय है. तथागत (नास्तिक विशेष) और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहां इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दंड दिलाया जा सके, उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाए, परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्मण कभी उन्मुख न हों, उस से वार्तालाप तक न करे. (देखें, श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण, हिंदी अनुवाद, पृ. 303, गीताप्रेस, गोरखपुर, सं. 2033 )

बुद्ध का उल्लेख
,,,,,,
प्राचीन टीकाकारों ने भी इस श्लोक में बुद्ध का ही उल्लेख माना है.
18वीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुए व्याकरण के प्रकांड पंडित नागेश भट्ट 'रामायणतिलक' नामक संस्कृत टीका में लिखा है:

बौद्धादयो राज्ञश्चोरवद् दण्ड्या इत्याह यथा हीति,
बुद्धो बुद्धमतानुसारी तथा चोरवद् दण्ड्य इति हि प्रसिद्धम्.

अर्थात बुद्ध के अनुयायी आदि को राजा उसी तरह दंडित करे जैसे चोरों को दंडित किया जाता है.

30/04/2025

पार्ट 3=
एक बंदर 1280 कि. मी. चौड़े समुद्र को एक छलांग में फांद जाता है (सुंदरकांड),

10 सिरों वाला व्यक्ति राज करता है.

रामरावण युद्ध में मरने वाले वानर और रीछ शाम को फिर जीवित हो जाते हैं (युद्धकांड).

कुंभकर्ण पैदा होते ही कई हजार लोगों को खा जाता है (युद्धकांड, सर्ग 61/13).

ऋषि अगस्त्य के आगे निर्जीव विंध्याचल पर्वत सिर झुका देता है (अरण्यकांड, सर्ग 11/86).

राम अकेले ही 72 मिनटों से भी कम समय में युद्धभूमि में 14 हजार शूरवीर राक्षसों को धनुषबाण से मार गिराते हैं (अरण्यकांड, सर्ग 30/31).

केसरी की पत्नी अंजना हवा के चलने मात्र से गर्भवती हो जाती है (उत्तरकांड, सर्ग 35/20).

एक वानर का बच्चा कई लाख कि. मी. अंतरिक्ष में ऊपर जाता है और सूर्य को आराम से ऐसे पकड़ लेता है मानो गुलाब का फूल हो (उत्तरकांड, सर्ग 35/22-23).

राजा ययाति अपने पुत्र से उस का यौवन ले लेता है और कई वर्षों के बाद उसे लौटा देता है, मानो यह चोला हो (उत्तरकांड, सर्ग 59/8).

शंबूक नामक तपस्वी का कत्ल करने पर एक मृत ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाता है. (उत्तरकांड, सर्ग 76/15)

ये कुछ मुख्य स्थल गिनाए गए हैं. ऐसे सभी स्थलों को गिनाना सारी रामायण की विस्तृत विषयसूची बनाने के समान है,

क्योंकि ऐसे स्थल हर सर्ग में हैं और कई जगह तो हर श्लोक में हैं.
इतनी असंभाव्य और अयथार्थ बातों से लबालब भरे काव्यग्रंथ को ऐतिहासिक काव्य कैसे कहा जा सकता है?
क्या अयोध्या आदि कुछ स्थलों के उल्लेख मात्र से ये सारी बेसिरपैर की कल्पनाएं ऐतिहासिक बन जाएंगी?

रामायण की घटना का समय
रामायण की मूल घटना त्रेतायुग में घटित हुई बताई जाती है यानी आज से 12 लाख 96 हजार वर्ष पूर्व.

लेकिन रामायण में उल्लिखित अयोध्या आदि वे स्थान इन निराधार पुरातनपंथी बातें करने वालों के लिए गलफांस सिद्ध हो रहे हैं,

जिन से वे इसे इतिहास ग्रंथ सिद्ध करना चाहते हैं.

रामायण में अयोध्या के अतिरिक्त अन्य अनेक स्थानों का भी उल्लेख है,

जैसे शृंग्वेरपुर, जहां तक राम एवं लक्ष्मण आदि अयोध्या से रथ में बैठ कर गए थे और जहां से सुमंत्र रथ ले कर लौट आया था;

भारद्वाज आश्रम, जहां राम आदि पहुंचे थे और जहां राम को मना कर वापस लाने के लिए चला हुआ भरत भी सेना सहित रुका था;

30/04/2025

पार्ट 2=
हमारा निवेदन है कि रामायण मूल रूप में संभवतः बहुत छोटी सी ऐतिहासिक घटना थी-दशरथ के राजमहलों के अंदर एक षड्यंत्र हुआ. राम, सीता और लक्ष्मण कुछ समय तक वनों में रहे.
वहां उन्हें कई लड़ाइयां लड़नी पड़ीं. अंत में उन का पैतृक राजसिंहासन पर अधिकार हो गया.
पतिपत्नी में जुदाई हो गई. इतनी बात ऐतिहासिक हो सकती है.
इस बात का जो बतंगड़ बनाया गया, वह लगभग सारी की सारी कल्पना है.

रामायण ऐतिहासिक काव्य भी नहीं,
क्योंकि ऐतिहासिक तथ्य का बेसिरपैर का बतंगड़ ऐतिहासिक काव्य नहीं होता.

ऐतिहासिक काव्य में इतिहास के पिंजर पर वास्तविकता का या कम से कम संभवता का रक्तमांस चढ़ा कर उसे सजीव बनाया जाता है, न कि उस पर कपोलकल्पनाओं को लपेट कर उसे मनमरजी से ढाला जाता है.
रामायण में यही दूसरी स्थिति दिखाई पड़ती है.

इस में 60 हजार वर्ष की उम्र में दशरथ के पुत्र पैदा होते हैं. वे भी हवनकुंड से पैदा हुए एक व्यक्ति द्वारा दी गई खीर खाने से गर्भवती हुई रानियों से (बालकांड, सर्ग 16/30-31).

राम की पत्नी सीता खेतों में शाकसब्जी की तरह उगती है (सर्ग 66/13-14).

राजा सगर की एक रानी 60 हजार पुत्रों को जन्म देती है (सर्ग 38/17-18).

अहल्या नामक एक नारी हजारों वर्षों तक केवल हवा खा कर जीवित रहती है (सर्ग 48/30).

एक गाय पल भर में हर इच्छित वस्तु उपस्थित कर देती है. रंभाने मात्र से पहवों, शकों, कांबोजों तथा यवनों की सेनाएँ पैदा कर देती है (सर्ग 54/18),

राम 10 हजार वर्ष राज्य करते हैं (उत्तरकांड, सर्ग 102/16 ).

5 हजार वर्ष का
व्यक्ति वहां अभी लड़कपन में है (उत्तरकांड, सर्ग 73/5).

जटायु नामक गीध संस्कृत में प्रश्नोत्तर करता है (अरण्यकांड).

30/04/2025

पार्ट 1=
जब कभी हमारे पूर्वजों के इतिहास बोध की बात चलती है तो प्रायः वाल्मीकीयरामायण को इतिहास ग्रंथ के तौर पर पेश किया जाता है और यह स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि प्राचीन भारतीयों का इतिहास बोध बहुत स्पष्ट था.
लेकिन जब हम रामायण को उठाते हैं तो वहां कुछ और ही दिखाई पड़ता है. रामायण के लेखक ने रामायण की प्रकृति का कई स्थलों पर उल्लेख किया है. उस ने इसे कहीं भी 'इतिहास' नहीं कहा.

इस प्रसंग में रामायण के शुरू और अंत के कुछ स्थल यहां प्रस्तुत हैं:

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति. (बालकांड 2/35 ) अर्थात ब्रह्मा ने वाल्मीकि से कहा, तुम्हारे काव्य में कुछ भी झूठा नहीं होगा.

कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम्.
–बालकांड 2/41
वाल्मीकि ने कहा, मैं संपूर्ण रामायण काव्य की रचना करूंगा.

आदिकाव्यमिदं त्वार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम्.
-उत्तरकांड 111/15
अर्थात यह वही आदिकाव्य है, जिसे पहले वाल्मीकि ने रचा.

नित्यं शृण्वन्ति संहृष्टाः काव्यं रामायणं दिवि.
- उत्तरकांड 111/3
अर्थात वे प्रसन्न हो कर स्वर्ग में नित्य रामायण काव्य को सुनते हैं.

स्कंदपुराण में रामायण का पांच अध्यायों में माहात्म्य गाया गया है.
उस में भी पदपद पर इसे 'काव्य' अथवा 'महाकाव्य' ही कहा गया है:
रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम्. (उत्तरखंड, रामायण माहात्म्य 1/19)
अर्थात रामायण महाकाव्य सब वेदों के अनुकूल है.

श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं हि काव्यं शुद्धिमवाप्नुयात्.
- उत्तरखंड, रामायण माहात्म्य 1/22
अर्थात इस ऋषि प्रणीत काव्य को सुन कर व्यक्ति शुद्ध हो जाता है.

रामायणं नाम परं तु काव्यम्.
-उत्तरखंड, रामायण माहात्म्य 1/27
अर्थात रामायण नामक परम काव्य है.

श्रुत्वा चैतन् महाकाव्यम्.
अर्थात इस रामायण महाकाव्य को सुन कर.
-उत्तरखंड, रामायण माहात्म्य 5 / 54

रामायणमादिकाव्यम्.
–उत्तरखंड, रामायण माहात्म्य 5/61
अर्थात रामायण आदि काव्य है.

इन अंतःप्रमाणों और बहिर्साक्ष्यों से स्पष्ट है कि रामायण को न उस के रचयिता ने इतिहास माना और न रामायणभक्तों ने.
सब ने एक स्वर से इसे काव्य कहा है.

क्या रामायण कल्पना है?...,.........
प्रश्न उठता है कि क्या रामायण शतप्रतिशत कल्पना है?
क्या यह ऐतिहासिक काव्य नहीं है?
जब अयोध्या आदि स्थान आज तक मिलते हैं, तब यह कल्पना कैसे हो सकती है?

08/02/2025

? उपनिषदों में अश्लील ?
======/========
उपनिषदों में 'ब्रहम और आत्मा ' की बातें मानी जाती हैं,
लेकिन इन में कुछ स्थल ऐसे हैं कि उन्हें देख कर ऐसा लगता है मानो कामसूत्र के कुछ पृष्ठ इन में घुसेड़ दिए गए हों.

छांदोग्य उपनिषद्‌ में लिखा है :

उपमंत्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्ताव: स्त्रिया सह शेते स उद्गीथ:
प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहार: काल॑ गच्छति सन्निधनं
पारं॑ गच्छति तन्निधनमेतद्‌ वामदेव्यं मिथुने. प्रोतम्‌.
-छां. उ. 2/13/1
अर्थात जब पुरुष किसी स्त्री के साथ समागम करना चाहता है तो पहले संकेत
करता है. यह 'हिंकार' है,
पहले इस की उपासना करे.
फिर स्त्री को वस्त्रादि दे कर प्रसन्‍न करता है,
अत: प्रसन्न दृष्टि से 'प्रस्ताव' की उपासना करे.
स्त्री के साथ जो सहवास किया जाता है. उस में 'उद्गीथ' की उपासना करे.
हर स्त्री के प्रसन्‍नतापूर्वक संमुख होना,
प्रत्येक के साथ शयन करना,
यह प्रतिहार है. इस दृष्टि से 'प्रतिहार' की उपासना करे.
मैथुन में समय बिताने और संभोग के समाप्त होने की 'निधन ' की दृष्टि
से उपासना करे.
यह 'वामदेव्य साम' संभोग में स्थित है.

स॒ य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति
मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्‌
प्रजया पशुभिर्भवति महान्‌ कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम्‌.
-2/13/2
अर्थात
जो साधक इस 'वामदेव्य साम' को इस प्रकार संभोग में सन्निविष्ट जान
कर इस की उपासना करता है, उस को कभी स्त्री का वियोग नहीं होता. जब भी वह संभोग करता है,
उस के बच्चा उत्पन्न होता है. वह पूरी आयु प्राप्त करना है. उस की संतति और कीर्ति की वृद्धि होती है. उसे किसी भी स्त्री को नहीं छोड़ना चाहिए अर्थात
सब से संभोग करना चाहिए. यह उस के लिए नियम है.

अंतिम वाक्य पर 8वीं शताब्दी में हुए आदि शंकराचार्य ने भाष्य करते हुए लिखा
है:

न कांचन कांचिदपि स्त्रियं स्वात्मतल्पप्राप्तां न परिहरेत्समागमार्थिनीम्‌.
अर्थात समागम चाहने वाली जो स्त्री शय्या पर आ जाए, ऐसी किसी भी स्त्री का
त्याग न करे. द
ध्यान रहे इस में 'शय्या पर आईं हुई' अपनी तरफ से जोड़ा गया है, मूल में कोई
शब्द इस का संकेत नहीं करता. 'समागम चाहने वाली' विशेषण भी अपनी ओर से
जोड़ा गया है.

❓धर्म क्या है❓  क्लास में आते ही नये टीचर ने बच्चों को अपना परिचय दिया. बातों ही बातों में उसने जान लिया कि; लड़कियों की ...
08/02/2025

❓धर्म क्या है❓

क्लास में आते ही नये टीचर ने बच्चों को अपना परिचय दिया. बातों ही बातों में उसने जान लिया कि; लड़कियों की इस क्लास में सबसे तेज और सबसे आगे कौन सी लड़की है? उसने खामोश सी बैठी उस लड़की से पूछा;

बेटा, आपका नाम क्या है?
लड़की खड़ी हुई और बोली;
जी सर; मेरा नाम है जूही.

टीचर ने फिर पूछा; पूरा नाम बताओ बेटा.
लड़की ने फिर कहा;
जी सर मेरा पूरा नाम जूही ही है.

टीचर ने सवाल बदल दिया. अच्छा; तुम्हारे पापा का नाम बताओ.
लड़की ने जवाब दिया;
जी सर; मेरे पापा का नाम है शमशेर.

टीचर ने फिर पूछा; अपने पापा का पूरा नाम बताओ.

लड़की ने जवाब दिया;
मेरे पापा का पूरा नाम शमशेर ही है सर जी.

अब टीचर कुछ सोचकर बोले;
अच्छा अपनी माँ का पूरा नाम बताओ.

लड़की ने जवाब दिया;
सर जी; मेरी माँ का पूरा नाम निशा है.

टीचर के पसीने छूट चुके थे. क्यों कि; अब तक वो उस लड़की की फैमिली के पूरे बायो डाटा में जो एक चीज ढूंढने की कोशिश कर रहा था; वो उसे नहीं मिली थी.

उसने आखिरी पैंतरा आजमाया और पूछा; अच्छा तुम कितने भाई बहन हो?

टीचर ने सोचा कि; जो चीज वो ढूँढ रहा है; शायद इसके भाई बहनों के नाम में वो क्लू मिल जाये!

लड़की ने टीचर के इस सवाल का भी बड़ी मासूमियत से जवाब देते हुये बोली; सर जी मैं अकेली हूँ. मेरे कोई भाई बहन नहीं है.

अब टीचरने सीधा और निर्णायक सवाल पूछा; बेटे, तुम्हारा धर्म और जाति क्या है?

लड़की ने इस सीधे सवालका जवाब भी सीधा सीधा दिया.
बोली;
सर जी मैं एक विद्यार्थी हूँ. यही मेरी जाति है और ज्ञान प्राप्त करना मेरा धर्म है. मैं जानती हूँ; कि अब आप मेरे पेरेंट्स की जाति और धर्म पूछोगे तो मैं आपको बता दूँ कि; मेरे पापा का धर्म है मुझे पढ़ाना और मेरी मम्मी की जरूरतों को पूरा करना तथा मेरी मम्मी का धर्म है; मेरी देखभाल करना और मेरे पापा की जरूरतों को पूरा करना.

लड़की का जवाब सुनकर टीचर के होश उड़ गये. उसने टेबल पर रखे पानी के गिलास की ओर देखा; लेकिन उसे उठाकर पानी पीना भी भूल गया. तभी लड़की की आवाज आयी. इस बार फिर उसके कानों में किसी धमाके की तरह गूँजी.

सर, मैं विज्ञान पढती हूँ; और एक साइंटिस्ट बनना चाहती हूँ.
जब अपनी पढ़ाई पूरी कर लूँगी; और अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा कर लूँगी; तब मैं फुरसत से सभी धर्मोंका अध्ययन करूंगी; और जो धर्म विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरेगा; उसे मैं अपना लूँगी..

07/02/2025

====राजकुमार बनने का नुस्खा======
महाभारत का कहना है कि
नर्मदा में स्नान कर के 5 दिन निराहार व्रत रखने
वाला मनुष्य अगले जन्म में राजकुमार बनता हैः
----नर्मदायामुपस्पृश्य तथा शूर्पाकरकोदके,
एकपक्ष॑ निराहारो राजपुत्रो विधीयते.
-अनुशासनपर्व 25/50
त्रिकालदर्शियों को यह दिखाई ही न दिया कि भारत में एक समय ऐसा भी
आएगा
जब राजकुमार नामक प्राणी समूल नष्ट हो जाएंगे!
तब 5-दिन का ब्रत और नर्मदा स्नान क्‍या करेगा?

01/02/2025

=====तलाक़=====
========2. अल-बक़रा=====
|228|2
और तलाक़ पाई हुई स्त्रियाँ तीन हैज़ (मासिक-धर्म) गुज़रने तक अपने-आप को रोके रखें, और यदि वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखती हैं तो उनके लिए यह वैध न होगा कि अल्लाह ने उनके गर्भाशयों में जो कुछ पैदा किया हो उसे छिपाएँ। इस बीच उनके पति, यदि सम्बन्धों को ठीक कर लेने का इरादा रखते हों, तो वे उन्हें लौटा लेने के ज़्यादा हक़दार हैं। और उन पत्नियों के भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं, जैसी उन पर ज़िम्मेदारियाँ डाली गई हैं। और पतियों को उनपर एक दर्जा प्राप्त है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
==============
|229|2
तलाक़ दो बार है। फिर सामान्य नियम के अनुसार (स्त्री को) रोक लिया जाए या भले तरीक़े से विदा कर दिया जाए। और तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो, उसमें से कुछ ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को डर हो कि वे अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे तो यदि तुमको यह डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम न रहेंगे तो स्त्री जो कुछ देकर छुटकारा प्राप्त करना चाहे उसमें उन दोनो के लिए कोई गुनाह नहीं। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो ऐसे लोग अत्याचारी हैं।
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|230|2
فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
(दो तलाक़ों के पश्चात) फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो इसके पश्चात वह उसके लिए वैध न होगी, जब तक कि वह उसके अतिरिक्त किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। अतः यदि वह उसे तलाक़ दे दे तो फिर उन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलट आने में कोई गुनाह न होगा, यदि वे समझते हों कि अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम रह सकते हैं। ये अल्लाह कि निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हों।
-==============
|231|2
और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निश्चित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार उन्हें रोक लो या सामान्य नियम के अनुसार उन्हें विदा कर दो। और तुम उन्हें नुक़सान पहुँचाने के ध्येय से न रोको कि ज़्यादती करो। और जो ऐसा करेगा, तो उसने स्वयं अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया। और अल्लाह की आयतों को परिहास का विषय न बनाओ, और अल्लाह की कृपा जो तुम पर हुई है उसे याद रखो और उस किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसके द्वारा वह तुम्हें नसीहत करता है। और अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को जाननेवाला है।
=================
|232|2
और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ तो उन्हें अपने होनेवाले दूसरे पतियों से विवाह करने से न रोको, जबकि वे सामान्य नियम के अनुसार परस्पर रज़ामन्दी से मामला तय करें। यह नसीहत तुममें से उसको की जा रही है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखता है। यही तुम्हारे लिए ज़्यादा बरकतवाला और सुथरा तरीक़ा है। और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।
=================
|234|2
और तुममें से जो लोग मर जाएँ और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जाएँ, तो वे पत्नियाँ अपने-आपको चार महीने और दस दिन तक रोके रखें। फिर जब वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार वे अपने लिए जो कुछ करें, उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
=================
|235|2
और इसमें भी तुम पर कोई गुनाह नहीं कि तुम उन औरतों को विवाह के सन्देश सांकेतिक रूप से दो या अपने मन में छिपाए रखो। अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें याद करोगे, परन्तु छिपकर उन्हें वचन न देना, सिवाय इसके कि सामान्य नियम के अनुसार कोई बात कह दो। और जब तक निर्धारित अवधि (इद्दत) पूरी न हो जाए, विवाह का नाता जोड़ने का निश्चय न करो। जान रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता है। अतः उससे सावधान रहो और यह भी जान लो कि अल्लाह अत्यन्त क्षमा करनेवाला, सहनशील है।
=================
|236|2
यदि तुम स्त्रियों को इस स्थिति मे तलाक़ दे दो कि यह नौबत पेश न आई हो कि तुमने उन्हें हाथ लगाया हो और उनका कुछ हक़ (मह्र) निश्चित किया हो, तो तुमपर कोई भार नहीं। हाँ, सामान्य नियम के अनुसार उन्हें कुछ ख़र्च दो - समाई रखनेवाले पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार और तंगदस्त पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार अनिवार्य है - यह अच्छे लोगों पर एक हक़ है।
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|237|2
और यदि तुम उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, किन्तु उसका मह्र निश्चित कर चुके हो, तो जो मह्र तुमने निश्चित किया है उसका आधा अदा करना होगा, यह और बात है कि वे स्वयं छोड़ दें या पुरुष जिसके हाथ में विवाह का सूत्र है, वह नर्मी से काम ले (और मह्र पूरा अदा कर दे)। और यह कि तुम नर्मी से काम लो तो यह परहेज़गारी से ज़्यादा क़रीब है और तुम एक-दूसरे को हक़ से बढ़कर देना न भूलो। निश्चय ही अल्लाह उसे देख रहा है, जो कुछ तुम करते हो।
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