जीवन आध्यात्म और ग्रहों की नजर में.

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जीवन आध्यात्म और ग्रहों की नजर में. जीवधारी विश्व प्रकृति और ग्रहों की दृ?

सहनशीलता हर व्यक्ति में नही होती वह तो सिर्फ देव महान आत्माओ में ही होती हैं,  जिस तरह भगवान शिव् ने अमृत त्याग कर विष ह...
24/08/2026

सहनशीलता हर व्यक्ति में नही होती वह तो सिर्फ देव महान आत्माओ में ही होती हैं, जिस तरह भगवान शिव् ने अमृत त्याग कर विष ही पिया यहाँ तक कि उनके चारो तरफ सर्प बिच्छू कई तरह के जहरीले जीव मौजूद रहें । उनके चारो तरफ भूत पिशाच उन्हे घेरे रहते पर शंकर भगवान तप कर के उनका ही कल्याण करते । यह एक नीलकंठ ही कर सकता हे जो दूसरो के हित के लिए विष पी जाये वह शिव् है।

23/08/2026
खुशी उड़ती हुई तितली के जैसी है, जिसे पकड़ने के लिए हम जितना दौड़ेंगे ये उतना ही हमसे दूर चली जायेगी। यदि हम एक जगह स्थिर ह...
22/08/2026

खुशी उड़ती हुई तितली के जैसी है, जिसे पकड़ने के लिए हम जितना दौड़ेंगे ये उतना ही हमसे दूर चली जायेगी। यदि हम एक जगह स्थिर हो जायेंगे तो ये खुद हमारे कंधे पे आके बैठ जायेगी । खुशी के पीछे भागना नहीं है, खुशी को महसुस करना है। बाकी तो जो प्राप्त है वही पर्याप्त है।

मैं शिव हूं मैं ही शव हूं, मैं तब हूं मैं ही अब हूं मैं ही राग हूं मैं मैं वैराग हूं, मैं पराग मैं ही निराराग हूंमैं अनं...
17/08/2026

मैं शिव हूं मैं ही शव हूं, मैं तब हूं मैं ही अब हूं
मैं ही राग हूं मैं मैं वैराग हूं, मैं पराग मैं ही निराराग हूं

मैं अनंत हूं मैं अखंड हूं, मैं दिशाव्योम मैं ही दिगंत हूं
मैं सत मैं रज मैं ही तम हूं, मैं कठोर हूं मैं ही नम हूं

मैं भूत, वर्तमान मैं ही भविष्य हूं, मै चित्त मैं ही अचिन्त्य हूं
मैं समय हूं मैं प्रणय हूं, मैं परिणाम मैं ही प्रलय हूं

मैं सृजन हूं मैं संचालक, मैं परितोष मैं ही संहारक
मैं अनुभूति मैं अभिव्यक्ति, मैं प्रज्ञा मैं ही परिपूर्ण हूं

मैं चित मैं ही चितवन, मैं चेतन मैं चेतना मैं ही चैतन्य हूं
मैं जल मैं अग्नि मैं ही थल हूं, मैं वायु मैं ही व्योम हूं

मैं मूल मैं ही उन्मूलन, मैं शूल हूं मैं ही सर्वेषण
मैं शांत मैं प्रवाह मैं ही गति हूं, मैं सहज़ मैं ही प्रचंड हूं

मैं दिशा मैं दशा मैं ही व्योम हूं, मैं प्रस्तुत मैं ही दिगंत हूं
मैं खंड मैं अखंड मैं ही खंडन हूं, मैं अमृत मैं विष मैं ही भंजन हूं

मै माया मैं मोह मैं ही बंधन हूं, मैं पंचभूत मैं प्रपंच मैं ही खंडन हूं
मैं चिता मैं भस्म मैं भभूत हूं, मैं सतत मैं अनवरत मैं अतीत हूं

मैं काल मैं ही विकराल, मैं महाकाल मैं ही कराल हूं
मैं जीव मैं ही जीवन हूं, मैं मृत मै सत्य मैं ही मृत्यु हूं

मैं रोग मैं ही औषधि, मैं भोग मैं योग मैं ही निरोग हूं
मैं शिव हूं मैं शव हूं, मैं सर्व मैं प्रज्ञ हूं मैं प्रज्ञान मैं ही सर्वज्ञ हूं

हां हां मैं ही शिव हूं....

सीमाएं हों सुरक्षित, राहें हों बाधा-रहित,बनें निर्भीक हम, हों सदा निर्विकार,प्रगति के पथ पर सबका हो अधिकार,मुक्त सांसों ...
15/08/2026

सीमाएं हों सुरक्षित, राहें हों बाधा-रहित,
बनें निर्भीक हम, हों सदा निर्विकार,
प्रगति के पथ पर सबका हो अधिकार,
मुक्त सांसों में स्वच्छंद हों विचार,
क्लेश मिटे सबके मन से,
ऐसा हो स्वतंत्र भावों का संचार.....
लहराकर ये तिरंगा, कर रहा है यही पुकार!

बौद्धिक विकास हो, सद्गुण का हो संचार,
सुरक्षित हो बेटियां, ना ही हो दुराचार,
मानवता विचरण करे, हो दुर्जन का संहार,
सुरक्षित हों जन-जन के अधिकार,
देश सँवरे, सभ्यता निखरे,
ऐसा ही हो स्वतंत्रता का एहसास...
लहराकर ये तिरंगा, कर रहा है यही पुकार!

तीन रंगों में घुलते हों, जन-जन के विचार,
रंग केसरिया, नस-नस में हम लें उतार,
हरे रंग में हो घुले, आचरण और व्यवहार,
हो उजला रंग सा, मन का ये संसार,
इन तीन रंगों से हो होली,
ऐसा ही हो स्वतंत्रता का त्योहार....
लहराकर ये तिरंगा, कर रहा है यही पुकार!

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