Agrawal Blood Bank

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06/12/2025

❓ *प्रश्न 1:* WBC डोनेशन क्या होता है?
*उत्तर:*
WBC यानी *White Blood Cells* हमारे शरीर को इंफेक्शन से बचाते हैं।
जब किसी मरीज में ये कोशिकाएँ बहुत कम हो जाती हैं, तब *सामान्य रक्त काफी नहीं रहता*।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर *WBC डोनेशन (Granulocyte डोनेशन)* करवाते हैं, जिसमें दाता के खून से केवल WBC लेकर मरीज को दिए जाते हैं।

❓ *प्रश्न 2:* WBC डोनेशन की जरूरत किन मरीजों को पड़ती है?
*उत्तर:*
WBC डोनेशन सामान्य मरीजों को नहीं, बल्कि *खास परिस्थितियों* में दिया जाता है, जैसे
* कैंसर के इलाज (कीमोथेरेपी) के बाद
* बोन मैरो की गंभीर समस्या
* बहुत ज्यादा और जानलेवा इंफेक्शन
* जब दवाइयों से इंफेक्शन कंट्रोल नहीं होता

ऐसे समय यह *जीवन रक्षक* साबित हो सकता है।

❓ *प्रश्न 3:* क्या WBC डोनेशन सामान्य ब्लड डोनेशन जैसा ही है?
*उत्तर:*
नहीं।
सामान्य रक्तदान में *पूरा खून* लिया जाता है,
जबकि WBC डोनेशन में मशीन के जरिए खून बाहर लिया जाता है, उसमें से *केवल WBC अलग* किए जाते हैं और बाकी खून *वापस दाता के शरीर* में लौटा दिया जाता है।

❓ *प्रश्न 4:* WBC डोनेशन की प्रक्रिया कैसे होती है?
*उत्तर:*
दाता ब्लड बैंक या *बड़े अस्पताल* में जाता है।
हाथ की नस से खून मशीन में जाता है।
मशीन WBC अलग कर लेती है और बाकी खून वापस शरीर में चला जाता है।
पूरी प्रक्रिया *डॉक्टर और प्रशिक्षित स्टाफ* की निगरानी में होती है।

❓ *प्रश्न 5:* क्या WBC डोनेशन से दाता को कमजोरी आती है?
*उत्तर:*
आमतौर पर नहीं।
क्योंकि
* खून का तरल भाग वापस शरीर में चला जाता है
* शरीर जल्दी से *नए WBC* बना लेता है
* सामान्य आराम, पानी और भोजन से दाता *ठीक महसूस* करता है

हल्की थकान हो सकती है, जो *थोड़े आराम* से ठीक हो जाती है।

❓ *प्रश्न 6:* WBC डोनेशन कौन कर सकता है?
*उत्तर:*
आमतौर पर
* उम्र 18 से 50 वर्ष
* शरीर पूरी तरह *स्वस्थ*
* हीमोग्लोबिन, BP और वजन *सामान्य सीमा* में
* HIV, Hepatitis B/C, मलेरिया जैसी *कोई संक्रामक बीमारी नहीं*

हर व्यक्ति की पहले *चिकित्सकीय जांच* की जाती है।

❓ *प्रश्न 7:* क्या डोनेशन से पहले कोई इंजेक्शन या दवा दी जाती है?
*उत्तर:*
कई मामलों में डॉक्टर
डोनेशन से *1–2 दिन पहले* दाता को *विशेष इंजेक्शन* देते हैं,
जिससे शरीर में WBC की संख्या बढ़ जाती है
और मरीज को *अधिक लाभ* मिल पाता है।
यह सब *डॉक्टर की निगरानी* में ही होता है।

❓ *प्रश्न 8:* WBC डोनेशन कितनी बार किया जा सकता है?
*उत्तर:*
WBC डोनेशन *सामान्य रक्तदान* की तरह बार-बार नहीं किया जाता।
यह केवल
* जरूरत पड़ने पर
* डॉक्टर की सलाह से
* सीमित अंतराल पर
किया जाता है।

❓ *प्रश्न 9:* आम लोगों को WBC डोनेशन के बारे में जानकारी क्यों होनी चाहिए?
*उत्तर:*
क्योंकि
* कई मरीज अचानक *गंभीर स्थिति* में पहुंच जाते हैं
* सही समय पर दाता न मिले तो *जान का खतरा* हो सकता है
* जागरूक रक्तदाता किसी परिवार की *आखिरी उम्मीद* बन सकते हैं

अक्सर सिर्फ *जानकारी के अभाव* में मदद समय पर नहीं मिल पाती।

❓ *प्रश्न 10:* मेरी छोटी सी पहल क्या बदलाव ला सकती है?
*उत्तर:*
आपका *जागरूक होना*,
जरूरत पड़ने पर *आगे आना*,
और दूसरों तक *सही जानकारी पहुंचाना*
किसी *मां, पिता या बच्चे* को नया जीवन दे सकता है।

*WBC डोनेशन आम नहीं है, लेकिन बहुत अनमोल है।*
जरूरत के समय आपकी पहल किसी की *जीवन डोर* बन सकती है।

22/11/2025
08/05/2024

हर साल 8 मई को पूरी दुनियाभर में विश्व थैलीसीमिया दिवस (World Thalassemia Day) मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को रक्त संबंधी इस गंभीर बीमारी यानि थैलीसीमिया के प्रति जागरुक करना है। आकड़ों के मुताबिक, देश के 5 करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं लेकिन बावजूद इसके लोगों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह एक जेनेटिक रोग है जो बच्चों को माता-पिता से मिलता है। इस बीमारी के कारण शरीर में खून की कमी होने लगती है। इससे पीड़ित बच्चे को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है और ऐसा नहीं करने से उसकी मौत हो सकती है।

क्या है थैलासीमिया?
थैलासीमिया खून से संबंधित जेनेटिक बीमारी है। आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में रेड ब्लड सेल्स की संख्या 45 से 50 लाख प्रति घन मिली मीटर होती है। जबकि थैलीसिमिया से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है। दरअसल, इसमें रेड ब्लड सेल्स तेजी से नष्ट होने लगते हैं और नए बनते नहीं। इसके चलते शरीर में खून की कमी होने लगती है और धीरे-धीरे आप अन्य बीमारियों का शिकार होने लगता है। थैलेसीमिया के पीड़ित व्यक्ति को महीने में 1 बार रक्त चढ़वाना बेहद जरूरी हो जाता है।

थैलेसीमिया होने का कारण?
यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर है और यह माता-पिता में से एक के या दोनों के जींस में गड़बड़ी होने के कारण होता है। खून में हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है। यह दो प्रोटीन अल्फा और बीटा हैं। इन दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर इस रोग का खतरा होता है।

थैलेसीमिया के प्रकार
माइनर थैलेसीमिया
यह रोग उन बच्चों को होता है जिनके माता या पिता में से किसी एक के जीन में गड़बड़ी होती है। इससे पीड़ित बच्चों में लक्षण कम नजर आते हैं। कुछ रोगियों में खून की कमी या एनीमिया इसके लक्षण हो सकते हैं।

मेजर थैलेसीमिया
यह रोग उन बच्चों को होता है जिनके माता-पिता दोनों के जीन में गड़बड़ी होती है। इसके लक्षणों में नाखून और जीभ पीले पड़ जाना, बच्चे के गाल और जबड़े में असमानता, बच्चों की ग्रोथ रुकना, चेहरा सूखना, वजन ना बढ़ना, कमजोरी और हमेशा बीमार रहना शामिल हैं।

थैलीसीमिया के लक्षण
यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर है इसलिए जन्म के छह महीने बाद ही बच्चों में ये लक्षण तेजी से दिखने लगते हैं।

नाखून और जीभ में पीलापन
बच्चे की ग्रोथ रुक जाना
वजन ना बढ़ना
कमजोरी और कुपोषण
सांस लेने में तकलीफ
थकान रहना
चेहरे की हड्डी की विकृति
धीमी गति से विकास
पेट की सूजन
गहरा व गाढ़ा मूत्र
जबड़े या गाल असामान्य नजर आना

थैलीसीमिया का उपचार
इसका इलाज थैलेसीमिया की स्टेज पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर इससे पीड़ित व्यक्ति को विटामिन, आयरन, सप्लीमेंट्स और संतुलित आहार लेने की सलाह दी जाती है। जबकि गंभीर स्थिति में रक्त बदलने, अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (बोनमैरो ट्रांसप्लांट) और पित्ताशय की थैली को हटाने के लिए सर्जरी का सहारा लिया जाता है। इसके साथ ही थालीसीमिया में व्यक्ति को अपनी डाइट का भी ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

-कम वसा, हरी पत्तेदार सब्जियां
-अधिक से अधिक आयरन युक्त फूड्स का सेवन
-मछली और नॉनवेज चीजों का सेवन
-नियमित योग और ​व्यायाम करना
-नियमित अपने खून की जांच कराना
-जेनेटिक टेस्ट कराना
-शिशु के जन्म से पहले ही रक्त जांच कराना

कैसे करें बचाव?
बच्चा थैलेसीमिया रोग के साथ पैदा ही न हो, इसके लिए शादी से पूर्व ही लड़के और लड़की की खून की जांच जरूरी है। अगर शादी हो भी गई है तो गर्भावस्था के 8 से 11 हफ्ते में DNA जांच करवाएं। ऐसा करके काफी हद तक बच्चों को इस रोग से बचाया जा सकता है।

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