Ayurvedic food supplements by Mehta

Ayurvedic food supplements by Mehta Hallo friends, healthy food supplement or powder means, which item, which is available in your kichen. But you do not know. What it benifit and how I used.

06/04/2026

चिंता आज के समय की सबसे आम लेकिन सबसे खतरनाक मानसिक समस्याओं में से एक बन चुकी है। यह धीरे-धीरे इंसान के मन, शरीर और जीवन की खुशियों को खत्म कर देती है। अक्सर लोग इसे एक सामान्य बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार चिंता केवल मन की स्थिति नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर के संतुलन को बिगाड़ने वाली अवस्था है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।

आयुर्वेद में चिंता को मुख्यतः “वात दोष” के असंतुलन से जोड़ा गया है। जब शरीर में वात बढ़ता है, तो मन अस्थिर हो जाता है, विचार तेजी से भागने लगते हैं और व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात को लेकर परेशान रहने लगता है। यही कारण है कि चिंता से ग्रस्त व्यक्ति को नींद नहीं आती, मन बेचैन रहता है और शरीर में भी थकान महसूस होती है।

चिंता से मुक्ति पाने के लिए सबसे पहला कदम है—अपने मन को समझना। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर चीज हमारे नियंत्रण में नहीं होती। जब हम उन बातों के बारे में सोचते रहते हैं, जिन पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता, तो चिंता अपने आप बढ़ने लगती है। इसलिए जरूरी है कि हम अपने ध्यान को वर्तमान में केंद्रित करें और भविष्य की अनावश्यक चिंताओं को छोड़ना सीखें।

आयुर्वेद में ध्यान (Meditation) को मन को शांत करने का सबसे प्रभावी उपाय माना गया है। प्रतिदिन कुछ समय ध्यान करने से विचारों की गति धीमी होती है और मन में स्थिरता आती है। जब मन शांत होता है, तो चिंता स्वतः ही कम होने लगती है। इसके साथ ही प्राणायाम, जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी, भी मानसिक तनाव को दूर करने में अत्यंत लाभकारी होते हैं।

दिनचर्या का सही होना भी चिंता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समय पर सोना और जागना, संतुलित आहार लेना और नियमित रूप से व्यायाम करना शरीर और मन दोनों को स्वस्थ बनाए रखता है। आयुर्वेद के अनुसार, असंतुलित जीवनशैली ही अधिकांश मानसिक समस्याओं की जड़ होती है। इसलिए अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना बहुत जरूरी है।

भोजन का भी हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक तला-भुना, मसालेदार और जंक फूड वात और पित्त को बढ़ाता है, जिससे चिंता और तनाव बढ़ सकता है। इसके बजाय हल्का, ताजा और पौष्टिक भोजन जैसे हरी सब्जियां, फल, दूध और घी का सेवन मन को शांत रखने में मदद करता है। साथ ही, अधिक मात्रा में कैफीन और चीनी से बचना भी जरूरी है।

प्रकृति के साथ समय बिताना भी चिंता को कम करने का एक सरल और प्रभावी तरीका है। जब हम खुले वातावरण में जाते हैं, पेड़-पौधों के बीच समय बिताते हैं, तो हमारा मन स्वतः ही शांत होने लगता है। यह हमें आंतरिक सुकून देता है और नकारात्मक विचारों को दूर करता है।

अच्छी नींद भी चिंता से मुक्ति के लिए बेहद आवश्यक है। यदि नींद पूरी नहीं होती, तो मन और अधिक अशांत हो जाता है। आयुर्वेद में सोने से पहले गुनगुने दूध का सेवन, पैरों में तेल की मालिश और हल्का संगीत सुनना नींद को बेहतर बनाने के लिए उपयोगी बताया गया है।

इसके अलावा, अपने विचारों को व्यक्त करना भी बहुत जरूरी है। जब हम अपनी परेशानियों को किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ साझा करते हैं, तो मन हल्का हो जाता है। अपने भीतर ही सब कुछ दबाकर रखना चिंता को और बढ़ा देता है। इसलिए खुलकर बात करना और मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।

यह समझना जरूरी है कि चिंता जीवन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसे अपने ऊपर हावी होने देना हमारी सबसे बड़ी गलती होती है। यदि हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख लें, तो कोई भी समस्या हमें ज्यादा देर तक परेशान नहीं कर सकती। आयुर्वेद हमें सिखाता है कि संतुलन ही जीवन का मूल मंत्र है—चाहे वह शरीर का हो या मन का।

इसलिए, आज से ही अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव लाएं, सकारात्मक सोच अपनाएं और अपने मन को शांति देने का प्रयास करें। याद रखें, शांत मन ही स्वस्थ जीवन की नींव है।

06/04/2026

*पित्त दोष क्या है?* What is Pitta Dosha?
मोटे तौर पर कहा जाए तो पित्त आग है। हालाँकि, इस शब्द का शाब्दिक अर्थ आग नहीं है, जिस तरह से आप इसे मोमबत्ती की रोशनी या खुली आग के रूप में अनुभव या महसूस कर सकते हैं। पित्त दोष और कुछ नहीं बल्कि शरीर में ऊष्मा ऊर्जा है जो कि अदृश्य है। पित्त हमारे चयापचय में हमेशा रहती है। जब हमारा भोजन पेट और आंत में टूट जाता है, जब एंजाइम बनते हैं या अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) से हार्मोन रक्तप्रवाह में निकलते हैं जहाँ पित्त हमेशा शामिल होता है। यह हमारे शरीर में बनने वाले हार्मोन और एंजाइम को नियंत्रित करता है। इसका अर्थ यह भी है कि सभी के पास पित्त जैव-ऊर्जा है, जो मुख्य रूप से अग्नि तत्व से बनी है। पित्त दोष भी दो तत्वों के मेल से बनता है, इसमें “अग्नि और जल” तत्व शामिल हैं। शरीर की गर्मी जैसे कि शरीर का तापमान, पाचक अग्नि जैसी चीजें पित्त द्वारा ही नियंत्रित होती हैं। पित्त का संतुलित अवस्था में होना अच्छी सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है। शरीर में *पेट* और *छोटी आंत* में पित्त प्रमुखता से पाया जाता है *पित्त दोष शरीर में निम्नलिखित* स्थान पर होता है
पेट व छोटी अंत – यह पित्त का मुख्य स्थान है।
छाती व नाभि – यह पित्त का मध्य स्थान है।
पसीना,लिम्फ,खून,पाचन तनत,मूत्र स्थान,जननांग – Ge***al
*पित्त दोष वाले व्यक्ति कैसे होते हैं?*
जिन लोगों में पित्त दोष ज्यादा प्रभावी होता है वह बाकी लोगों के मुकाबले काफी ज्यादा शक्तिशाली बुद्धि और महत्वाकांक्षी होते हैं। ऐसे लोग जन्म से ही प्रभावी पथ प्रदर्शक होते हैं जिन्हें आम भाषा में नेता या लीडर भी कहा जा सकता है। यह लोग ऊर्जा और ताकत से भरपूर और पूर्णतावादी होते हैं/ ऐसे लोग काफी जुनूनी होते हैं, यह अपने लक्ष्य को जितने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। पित्त वाले लोग चुनितियों से बहुत प्यार करते हैं और अपने साथी से भी अटूट प्यार करते हैं या कहा जाए कि यह इमानदार प्रवृति वाले होते हैं। इनका शरीर एथलेटिक होता है और यह सामान्य तौर पर उग्र होते हैं और इन्हें बहुत जल्दी गुस्सा भी आ जाता है। इनके पैर और हाथ कभी तनदे नहीं होते। ऐसे लोगों को मीठी चीज़े खाना बहुत पसंद होता है और यह लोग कड़वी चीजों से परहेज करना पसंद करते हैं।
*क्या पित्त दोष कई प्रकार का होता* *है?* हाँ, पित्त दोष भिन्न प्रकार का होता है। शरीर में इनके निवास स्थानों और अलग कामों के आधार पर पित्त को पांच भांगों में बांटा गया है जो कि निम्नलिखित है
साधक पित्त,आलोचक पित्त,भ्राजक पित्त,पाचक पित्त,रज्जक पित्त
*पित्त दोष के क्या लक्षण है?*
अगर किसी के शरीर में पित्त दोष असंतुलित हो जाए तो निम्नलिखित प्रकार के लक्षण दिखाई दे सकते हैं *शारीरिक लक्षण* अधिक भूख-प्यास लगना, सीने में जलन बनना – एसिडिटी ,आँखे, हाथों व तलवों में जलन बने रहना,सामान्य से बहुत गर्मी लगाना,हर समय पसीने आना – ऐसा सर्दी के मौसम में भी हो सकता है *त्वचा से जुड़ी समस्याएँ होना जैसे* – चेहरे पर दाने, मुहाँसे, फुंसी और अन्य समस्याएँ,पित्त की उल्टी होना,प्रकाश के प्रति अति संवेदनशीलता,शरीर से और मुह से तीक्ष्ण गंध ,बहुत ज्यादा सिर दर्द होना,जी मचलाना या उलटी जैसा मन होना,दस्त होने की समस्या,मुख में कड़वा स्वाद बने रहना, ज़्यादा गर्मी लगना और ठंडे वातावरण की चाह, *व्यवहारिक लक्षण* बोल चाल उग्र होना,काम करने में चिड़चिड़ाहट होना,हमेशा गुस्सा आना,हर किसी के साथ आक्रामक होना,विवाद करने के लिए हर समय तैयार रहना,अधीरता और हड़बड़ाहट रहना,हर समय निराशा का भाव रहना, *इनका मूड बहुत* जल्दी बदलता है, *पित्त दोष के क्या कारण है* जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ने लगती है वैसे-वैसे उनके शरीर में पित्त दोष सामान्यतः बढ़ने लग जाता है। पित्त दोष की समस्या सामान्य रूप से किशोरों में ज्यादा पाई जाती है। इसके अलावा जैसे-जैसे जाड़ों का मौसम आने लगता है प्राकृतिक रूप से ही शरीर में पित्त दोष बढ़ना शुरू कर देता है। इनके अलावा पित्त दोष बढ़ने के पीछे *निम्नलिखित कारण होते हैं* चटपटे, नमकीन, मसालेदार और तीखी खाने की चीजों का ज्यादा सेवन करने की वजह से।
सामान्य से *जायदा मेहनत करने की आदत* हमेशा मानसिक तनाव और गुस्से में रहने की आदत।
ज्यादा शराब या अन्य नशीली चीजों का सेवन करना।
उचित समय पर खाना न लेना।
बिना भूख के ही खाना ले लेना या ज्यादा खाना लेने के कारण।
हर थोड़े दिनों में सेक्स करना।
तेल और घी का ज्यादा सेवन करना। मुख्य रूप से तिल और सरसों के तेल का ज्यादा सेवन।
दही, खट्टी छाछ, सिरका और अन्य खट्टी चीजों का ज्यादा सेवन करना।
मांस का अधिक सेवन करना।
*पित्त दोष के कारण क्या शारीरिक* *समस्याएँ हो सकती है?*
अगर आप पित्त दोष से जूझ रहे हैं तो आपको निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह समस्याएँ सामान्य से लेकर अति गंभीर तक हो सकती है।
शरीर में कई जगह पर सूजन आना
अत्यधिक एसिडिटी की समस्या
रक्त स्राव की समस्या होना
हाई ब्लड प्रेशर की समस्या – इसकी वजह से किडनी पर नकरात्मक प्रभाव पड़ता है।
शरीर में जलन बने रहना जो कि मुख्य रूप से – सीने में, पेट में, हाथ-पैरों में और मूत्र मार्ग में भी हो सकती है। *सामान्य से अधिक मल त्याग करना – इसमें पेट खराब* भी हो सकता है
त्वचा में चकत्ते, फुंसी, मुसंहों के अलावा अन्य त्वचा संबंधित समस्याएँ होना।किसी भी चीज़ की अचानक से तेज इच्छा होना।
गर्दन से जुड़ी बीमारी
पीलिया की बीमारी भी है पित्त दोष का कारण,मधुमेह और पैनक्रियाज से जुड़ी बीमारी,नाभि के आसपास मरोड़े आना,पुरुषों में स्वप्न दोष की समस्या,महिलाओं की बीमारी – जैसे मूत्र पथ संक्रमण, *पित्त दोष को संतुलित रखने के लिए इस तरह* खाएं *इन्हें खाएं* घी का सेवन जरूर करें। सबसे बेहतर गाय का घी हैं।,गोभी, खीरा, गाजर, आलू, शिमला मिर्च और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें,सभी तरह की दालों का सेवन करें।,एलोवेरा जूस, अंकुरित अनाज, सलाद और दलिया का सेवन करें। ठंडी चीजों का सेवन करें।पानी खूब मात्रा में पीना चाहिए। *इनसे दूर रहें –* मूली, काली मिर्च और कच्चे टमाटर खाने से परहेज करना चाहिए करें।,तिल के तेल, सरसों के तेल से परहेज करें।,काजू, मूंगफली, पिस्ता, अखरोट और बिना छिले हुए बादाम से परहेज करें। सामान्य रूप से सूखे मेवों से दूरी बना कर रखे। संतरे के जूस, टमाटर के जूस, कॉफ़ी और शराब से परहेज करें।
खट्टे फलों और अन्य खट्टी चीजों से दूर रहें। ज्यादा मीठी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*तेज मसालेदार खाना नहीं लेना चाहिए* खाने पीने के इन उपायों के अलावा ऐसे लोगों को ठन्डे पानी से नहाना चाहिए, अपने गुस्से को काबू में रखने की कोशिश करनी चाहिए और शांत संगीत सुनने की आदत डालनी चाहिए। ऐसे लोगों को सेक्स करना काफी पसंद होता है, सरल शब्दों में कहा जाए तो इनकी वासना हमेशा बढ़ी हुई होती है तो ऐसे लोगों को अपनी वासना को भी काबू में रखने की कोशिश करनी चाहिए। *अधिक जानकारी और उपचार के लिए हमारे व्हाट्सप्प 7981472646 पर संपर्क करें।

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19/02/2026

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24/01/2026

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03/01/2026

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