18/06/2026
"गुरु की एक कृपादृष्टि वर्षों की साधना का फल दे देती है" — यह वाक्य गुरु-तत्त्व की महिमा को दर्शाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि साधना व्यर्थ है, बल्कि यह कि साधना साधक को उस पात्रता तक ले जाती है जहाँ गुरु की कृपा उतर सके। जब गुरु की कृपादृष्टि पड़ती है, तो साधक के भीतर वर्षों से संचित संस्कार, तप, जप और आंतरिक शुद्धि एक साथ फलित होने लगते हैं।
कहा गया है कि:
"साधना मार्ग बनाती है, गुरु-कृपा मंज़िल के द्वार खोल देती है।"
गुरु की कृपादृष्टि से—
#मन की अनेक गांठें सहज खुल जाती हैं।
#आत्मबोध की दिशा स्पष्ट होने लगती है।
#साधना में आने वाली सूक्ष्म बाधाएँ दूर होने लगती हैं।
#साधक को वह अनुभव प्राप्त हो सकता है जिसके लिए वह वर्षों से प्रयासरत था।
किन्तु कृपा भी उसी पात्र पर बरसती है जो विनम्रता, श्रद्धा और समर्पण से स्वयं को तैयार करता है। इसलिए साधना और गुरु-कृपा एक-दूसरे के पूरक हैं।
जब साधक का समर्पण पूर्ण होता है, तब गुरु की एक दृष्टि केवल आशीर्वाद नहीं रहती, वह चेतना के भीतर एक मौन जागरण बन जाती है।