Dr. Vikrant Sharma

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जो अलसी खाए वो गाये जवानी ज़िंदाबाद, और बुढ़ापा बाये बाये।-अलसी - एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजनजब से परिष्क...
04/10/2021

जो अलसी खाए वो गाये जवानी ज़िंदाबाद, और बुढ़ापा बाये बाये।
-अलसी - एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन
जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।
अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है । अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते है।
- ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।
- आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।
- अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
- अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।
- अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।
- सिम का मतलब सेरीन या शांति, इमेजिनेशन या कल्पनाशीलता और मेमोरी या स्मरणशक्ति तथा कार्ड का मतलब कन्सन्ट्रेशन या एकाग्रता, क्रियेटिविटी या सृजनशीलता, अलर्टनेट या सतर्कता, रीडिंग या राईटिंग थिंकिंग एबिलिटी या शैक्षणिक क्षमता और डिवाइन या दिव्य है।
- त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोता है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।
- लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है। लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।
- जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ­­ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।
- कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
- अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
- 1952 में डॉ. योहाना बुडविग ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल, पनीर, कैंसररोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था जो बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। यह कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है। उन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा है, वे एक या दो धंटे ही जी पायेंगे सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।
अलसी सेवन का तरीकाः- हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।
अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये. इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये. भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है .
अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।
अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।
बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।
अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।
इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।
डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)

आज 23 नवम्बर 2020 को कार्तिक शुक्ल नवमी यानि  #अक्षय/  #आंवला नवमी है इस दिन को शास्त्रों में  #धातृ या  #धात्री और  #आं...
23/11/2020

आज 23 नवम्बर 2020 को कार्तिक शुक्ल नवमी यानि #अक्षय/ #आंवला नवमी है इस दिन को शास्त्रों में #धातृ या #धात्री और #आंवलानवमी भी कहा जाता है। इस दिन #आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि #अक्षयनवमी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु एवं शिव जी का निवास होता है। इसलिए अक्षय नवमी के दिन प्रातः उठकर धातृ के वृक्ष के नीचे साफ-सफाई करनी चाहिए। आंवले के वृक्ष की पूजा दूध, फूल एवं धूप से करनी चाहिए। यह पर्व हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। #अक्षय_नवमी का शास्त्रों में वही महत्व बताया गया है जो वैशाख मास की तृतीया का है। शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता है। इस दिन जो भी शुभ कार्य जैसे दान, पूजा, भक्ति, सेवा किया जाता है उनका पुण्य कई-कई जन्म तक प्राप्त होता है। इसी प्रकार इस दिन कोई भी शास्त्र विरूद्घ काम किया जाए तो उसका दंड भी कई जन्मों तक भुगतना पड़ता है इसलिए अक्षय नवमी के दिन ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी को कष्ट पहुंचे।इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर ब्राह्मणों को खिलाना चाहिए इसके बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। भोजन के समय पूर्व दिशा की ओर मुंह रखें। शास्त्रों में बताया गया है कि भोजन के समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो यह बहुत ही शुभ होता है। थाली में आंवले का पत्ता गिरने से यह माना जाता है धातृ के वृक्ष की पूजा एवं इसके वृक्ष के नीचे भोजन करने की प्रथा की शुरूआत करने वाली माता लक्ष्मी मानी जाती हैं।
इस संदर्भ में #कथा है कि एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि #तुलसी एवं #बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को। आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिन्ह मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले की वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन #कार्तिकशुक्ल #नवमी तिथि थी। इसी समय से यह परंपरा चली आ रही है। अक्षय नवमी के दिन अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव नहीं हो तो इस दिन से आंवला जरूर खाना प्रारंभ कर देना चाहिए। क्योंकि इस समय से आंवला आना प्रारम्भ हो जाता हैं जो कि आंवला एकादशी (होली से 4 दिन पहले ) तक हरा मिलता है इस समय ताजे कम से कम 1 आंवले का सेवन जरूर करे इसके बाद एकत्रित कर रख ले व अगले आमलकी नवमी तक मुरब्बे या सुखाकर नित्य प्रयोग करना चाहिए क्योकि आमला एक ऐसी औषधि है जो आपको बुढापा नहीं आने देती हैं
#चरक संहिता के अनुसार आंवला खाने से महर्षि #च्यवन को फिर से #जवानी यानी #नवयौवन प्राप्त हुआ था। इसीलिए आंवले से बना योग #च्यवनप्राश कहलाता है
#आमलकी_वयःस्थापनानाम्।
Promotes long and healthy life

#आंवला_क्या_है?

भारत में हर कोई आंवला से परिचित है एवं यह सबसे प्राचीन आयुर्वेदिक औषधियों में से एक माना जाता है। भारत में शायद ही ऐसा कोई व्‍यक्‍ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी आंवले का नाम न सुना हो। अपने औषधीय गुणों के कारण वैश्विक स्‍तर पर भी आंवला लोकप्रिय है।

घरेलू नुस्‍खों में आंवले का इस्‍तेमाल बहुत ज्‍यादा किया जाता है और आपने भी कभी न कभी आंवले के औषधीय गुणों का लाभ जरूर उठाया होगा। आंवले में जीवाणु-रोधी और पोषक तत्‍व मौजूद होते हैं जिन्‍हें नज़रअंदाज कर पाना मुश्किल है।

आयुर्वेद का कहना है कि आंवला #एंटीऑक्‍सीडेंट और पोषक तत्‍वों का प्रचुर स्रोत है। जिसमें औषधीय और पोषक गुण मौजूद हैं।

आयुर्वेद के दो सबसे प्रमुख ग्रंथों चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में आंवला को #ऊर्जादायक जड़ी बूटी के रूप में वर्णित किया गया है।

आंवला के बारे में तथ्‍य:
वानस्‍पतिक नाम: फिलैंथस एंबैलिका

, also known as emblic, emblic myrobalan, myrobalan, Indian gooseberry, Malacca tree, or amla from Sanskrit amalaki is a deciduous tree
Family Phyllanthaceae.
वंश: फिलैंथेसी
सामान्‍य नाम: भारतीय गूज़बैरी, आमलकी
संस्‍कृत नाम: धात्री, अृमत, अमृतफल
उपयोगी भाग: फल (ताजा और सूखा दोनों), बीज, छाल, पत्तियां, फूल
भौगोलिक विवरण: भारत के अलावा चीन और मलेशिया में पाया जाता है।
गुण: आंवलों को शरीर में त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) में संतुलन लाने के लिए जाना जाता है। आंवले में शीत, भारी, रुखा, धातुवर्द्धक और डायबिटीज को दूर करने वाले गुण होते हैं। #विटामिन_सी से भरपूर आंवला, हर मौसम में लाभदायक होता है। यह #आंखों, #बालों और #त्वचा के लिए तो फायदेमंद है ही, साथ ही इसके और भी कई फायदे हैं, जो आपके शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। आमतौर पर आंवले का प्रयोग अचार, मुरब्बा या चटनी के रूप में किया जाता है,लेकिन इसका अलग-अलग तरह से सेवन आपके लिए बेहद उपयोगी है।
उपयोग
- #डायबिटीज के मरीजों के लिए आंवला बहुत काम की चीज है। पीड़ि‍त व्यक्ति अगर आंवले के रस का प्रतिदिन शहद या हल्दी के साथ सेवन करे तो बीमारी से राहत मिलती है।

#एसिडिटी की समस्या होने पर आंवला बेहद फायदेमंद होता है। आंवला का पाउडर, चीनी के साथ मिलाकर खाने या पानी में डालकर पीने से एसिडिटी से राहत मिलती है। इसके अलावा आंवले का जूस पीने से पेट की सारी समस्याओं से निजात मि‍लती है।

- पथरी की समस्या में भी आंवला कारगर उपाय साबित होता है। पथरी होने पर 40 दिन तक आंवले को सुखाकर उसका पाउडर बना लें, और उस पाउडर को प्रतिदिन मूली के रस में मिलाकर खाएं। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में पथरी गल जाएगी।

- रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी होने पर, प्रतिदिन आंवले के रस का सेवन करना काफी लाभप्रद होता है। यह शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होता है, और खून की कमी नहीं होने देता।

- आंखों के लिए आंवला अमृत समान है, यह आंखों की रौशनी को बढ़ाने में सहायक होता है। इसके लिए रोजाना एक चम्मच आंवला के पाउडर को शहद के साथ लेने से लाभ मिलता है और मोतियाबिंद की समस्या भी खत्म हो जाती है।

- बुखार से छुटकारा पाने के लिए आंवले के रस में छौंक लगाकर इसका सेवन करना चाहिए, इसके अलावा दांतों में दर्द और कैविटी होने पर आंवले के रस में थोड़ा सा कपूर मिला कर मसूड़ों पर लगाने से आराम मिलता है।

- शरीर में गर्मी बढ़ जाने पर आंवल सबसे बेहतर उपाय है। आंवले के रस का सेवन या आंवले को किसी भी रूप में खाने पर यह ठंडक प्रदान करता है। हिचकी तथा उल्टी होने की पर आंवले के रस को मिश्री के साथ दिन में दो-तीन बार सेवन करने से काफी राहत मिलेगी।

- याददाश्त बढ़ाने में आंवला काफी फायदेमंद होता है। इसके लिए सुबह के समय आंवला के मुरब्बा गाय के दूध के साथ लेने से लाभ होता है, इसके अलावा आप प्रतिदिन आंवले के रस का प्रयोग भी कर सकते हैं।

- चेहरे के दाग-धब्बे हटाकर उसे खूबसूरत बनाने के लिए भी आंवला आपके लिए उपयोगी होता है। इसका पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा साफ, चमकदार होती है और झुर्रियां भी कम हो जाती हैं।

- बालों को काला, घना और चमकदार बनाने के लिए आंवले का प्रयोग होता है, इसके पाउडर से बाल धोने या फिर इसका सेवन करने से बालों की समस्याओं से निजात मिलती है।
भावप्रकाश-पूर्वखण्ड-मिश्रप्रकरण - २. हरीतक्यादिवर्ग में निम्न वर्णन प्राप्त होता हैं
- त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलाऽमृता |
हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः |
रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ||३६||
हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः |
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ||३७||
यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् |
तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ||३८||

Some Research on Emblica officinalis
1. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/21317655
2.https://pdfs.semanticscholar.org/15b1/65c634fc82d9186ab98700769a4ce01ef23a.pdf
3. https://www.researchgate.net/publication/287524229_Current_trends_in_the_research_of_Emblica_officinalis_Amla_A_pharmacological_perspective
4. https://examine.com/supplements/emblica-officinalis/
5. https://www.hindawi.com/journals/tswj/2014/378473/
6. http://ijpsr.com/bft-article/a-review-on-medicinal-importance-of-emblica-officinalis/?view=fulltext
7. http://www.jorr.org/article.asp?issn=2249-4987;year=2015;volume=7;issue=2;spage=65;epage=68;aulast=Grover
8. https://greenpharmacy.info/index.php/ijgp/article/view/272/283

🙏
डॉ. विक्रांत शर्मा

नेत्र यानि आँखें हमारी सुंदरता के साथ प्रकृति प्रदत्त ज्ञानेंद्रिय भी है जिसका स्वस्थ रहना  अति आवश्यक है अगर आँखों में ...
24/05/2020

नेत्र यानि आँखें हमारी सुंदरता के साथ प्रकृति प्रदत्त ज्ञानेंद्रिय भी है जिसका स्वस्थ रहना अति आवश्यक है अगर आँखों में कोई समस्या हो जाए तो इस सुन्दर प्रकृति को देख पाने में समस्या उत्पन्न हो जाती है और मन हमेशा उदास सा रहने लग जाता है परन्तु कुछ उपायों के द्वारा इनका निवारण किया जा सकता है जिसमे से एक है नेत्र तर्पण या अक्षि तर्पण

अक्षितर्पण दो शब्दों से मिलकर बना है – अक्षि + तर्पण |

अक्षि से तात्पर्य है आँख और तर्पण का अर्थ है भरना या तृप्त करना |

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के भाग पंचकर्म में आँखों के स्वास्थ्य के लिए इस विधा का इस्तेमाल किया जाता है | अक्षितर्पण नेत्रों के स्वास्थ्य को बनाये रखने और रोगों से दूर रखने की एक कला है | मुख्यतया आँखों की कमजोरी , नेत्रअभिष्यंद ( आँखे आना ), पलके ठीक से न खुलना , ग्लूकोमा आदि रोगों में अक्षि तर्पण किया जा सकता है एवं इसके परिणाम भी बहुत अच्छे प्राप्त होते है |

नेत्र तर्पणः आंखों पर औषधियुक्त घृत अथवा तेल डालने को नेत्रतर्पण कहा जाता है. यह क्रिया आंखों से धुंधला दिखना, आंखों का दुखना, रूक्षता, रतौंधी तथा वात व पित्ज अक्षि रोगों में अत्यंत लाभकारी है. रोगानुसार इस नेत्र तर्पण क्रिया में त्रिफलाधृत आदि का प्रयोग किया जाता है. यह क्रिया दृष्टिवर्धन का कार्य भी करती है

यदि आप निम्न नेत्र की परेशानियों से जूझ रहे हों जैसे:-

‪आँखों के सामने अँधेरा छाना (Blurring of vision)
टेढ़ी आँख (Obliquation)
‪Conjunctivitis
‪पलके ठीक से न खुलना (Ptosis)
‪वात पर्याय (Inflammation of the eyes)
‪‎दृष्टीदोष(Myopia or Hypermetropia)
‪अर्जुन (Subconjuctival hemorrhage/Mole/Melanoma)
‪Belepherospasm
‪Glaucoma आदि

तो नेत्र तर्पण आपके लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है

नेत्र तर्पण की विधि
अक्षितर्पण करने से पहले रोगी के शरीर का शोधन कर लेना चाहिए | रोगी को द्रोणी या टेबल पर पीठ के बल सीधे लेटा दिया जाता है | अब रोगी के आँखों के चारो और उड़द के आटे से बनी पिष्टी से दो अंगुल ऊँची दीवार ( पाल ) बना दी जाती है | रोगी की प्रकृति और रोग के अनुसार चयनित औषध घृत को एक कटोरी में डालकर गरम पानी के द्वारा पिघलाया जाता है | इस औषध घृत को रोगी के नेत्रकोशो पर पलकों के बाल तक भर दिया जाता है | घृत भरने के बाद रोगी को आंखे खोलने और बंद करने को कहा जाता है | इस प्रकार यह क्रिया अलग – अलग रोग एवं प्रकृति के अनुसार आधे मिनट से 4 मिनट तक करवाई जाती है |

सम्यक तरीके से अक्षितर्पण होने पर उड़द के आटे की बनाई गई पाल में छेद कर के औषध सिद्ध घृत को बाहर निकाल लिया जाता है | अक्षितर्पण के पश्चात विरेचन या आयुर्वेदिक धूमपान करवाया जाता है ताकि घृत के कारण बढे हुए कफ दोष का शमन हो सके |

स्वच्छ नेत्रों में यह घृत 500 गिनती बोलने तक
कफज नेत्र रोग में 600 गिनती तक
पित्तज नेत्र रोग में 800 गिनती तक
और वातज नेत्र रोगों में 1000 गिनती बोलने तक नेत्र तर्पण करना चाहिए |

अक्षितर्पण में सावधानिया
नेत्र तर्पण करते समय विशेष ध्यान रखने योग्य बात यह है की दोनों आँखों की पाल अलग अलग बनानी आवश्यक है |
नेत्र तर्पण करने के बाद जब ओषध सिद्ध घृत को निकलो तब विशेष ध्यान रखे की एक आँख का घृत दूसरी आँख में नही जाना चाहिए |
यदि ऐसा हो जाता है तो एक आँख का इन्फेक्शन दूसरी आँख में फैलने का खतरा बढ़ जाता है |

अक्षितर्पण के पश्चात रोगी को सभी अपथ्य के बारे में अच्छे से समझा देना चाहिए |
रोगी को धुल , धुप या अधिक प्रकाश वाले स्थान पर बिलकुल नही जाने देना चाहिए |
तर्पण के तुरंत बाद आँखों के पानी नही लगाना चाहिए |
बताए अनुसार पथ्य-अपथ्य का भलीभांति सेवन करना चाहिए |

अक्षितर्पण के फायदे
नेत्र आँखों से सम्बन्धित सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी |
आँखों के नीचे काले घेरे (dark circle) को मिटाने में चमत्कारिक परिणाम
दूर दृष्टि दोष
निकट दृष्टि दोष
नेत्र ज्योतिवर्द्धक
चश्मे का नंबर कम होता है
लगातार नजर गढ़ा कर किसी बारीक़ काम को करने , कंप्यूटर मोबाइल , लिखने पढ़ने टी.वी. देखने से आँखों में उत्पन्न होने वाले ड्राईनेस को ठीक करता है |
आँखों के सामने झुंझलापन |
आँखों में लालिमा |

कब तक करायें अक्षितर्पण:-

‪‎वर्त्म‬ Disease associated with Eye lids में -लगभग 30 से 32 सेकेण्ड

‪नेत्र‬ संधि(Junction of the anatomical part of eyes) के रोगों में-लगभग डेढ़ मिनट

दृष्टि रोगों में (Visionary impairment)-लगभग साढ़े 4 मिनट

अधिमंथ(Glaucoma) में-लगभग 5 मिनट 4 सेकेण्ड

‪वातज‬ व्याधियों में-लगभग 30 सेकेण्ड

‪पित्तज‬ व्याधियों में-लगभग 3 मिन

‪‎कफज‬ एवं स्वस्थ व्यक्ति में-लगभग 3 मिनट तक नेत्र तर्पण कराना चाहिये।

वातिक रोगियों में प्रतिदिन नेत्र तर्पण कराना चाहिये।

पैत्तिक रोगियों में एक दिन छोड़कर नेत्र तर्पण कराना चाहिये।

कफज एवं स्वस्थ व्यक्तियों में दो-दो दिन छोड़कर नेत्र तर्पण कराना चाहिये।

कब समझें कि नेत्रतर्पण ठीक हुआ है :-

जब आँखों में प्रकाश को सहने की क्षमता तथा हल्कापन प्रतीत हो रहा हो तो समझें की तर्पण ठीक हुआ है और इसके ठीक विपरीत लक्षण उत्पन्न होने पर इसे ठीक न होंने का indication मानें।

कब नेत्र तर्पण न करायें:

अत्यधिक गर्मी,अत्यधिक ठण्ड,रोगी तनाव में हो,बादल लगे हों तो अक्षि तर्पण न करायें ।
अक्षि तर्पण के उपरान्त रोगी के चेहरे को साफ़ कर गुनगुने जल से कुल्ला करवा कर हल्का भोजन देना चाहिये।

तर्पण में सम्यक , हीन और अतियोग के लक्षण
सम्यक – तर्पण ठीक प्रकार से होने पर रोगी के आँखों में प्रकाश सहने की शक्ति आ जाती है एवं आँखे निर्मल दिखाई पड़ती है |

हीन – तर्पण अगर हीन हुआ है तो इसके विपरीत असर दिखाई पड़ता है |

अतियोग – अधिक तर्पण होने पर कफज विकार उत्पन्न हो जाते है | रोगी की आंखे भारी और सिरदर्द की शिकायत भी हो सकती है |
क्या करें : -

अगर आप की भी आँखे कमजोर है | निकट द्रष्टि दोष , दूर द्रष्टि दोष , आँखों से पानी पड़ते रहना , कमजोर आँखे , जल्दी – जल्दी आँखों में इन्फेक्शन होना , धुंधलापन आदि रोगों में अक्षितर्पण एक बेहतरीन विकल्प है | इसलिए इन रोगों में एक बार अपने नजदीकी आयुर्वेदिक क्लिनिक से अक्षितर्पण करवाके देखे |

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