Dr.Yadunath Vishwakarma

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Dr.Yadunath Vishwakarma doctor

24/09/2026

आई.आई.टी. मुम्बई जैसे उच्च शिक्षण संस्था में दलित समाज के होनहार छात्र द्वारा ‘आत्महत्या’ की अति-दुखद घटना यह साबित करती है कि जातिवाद चरम पर है तथा शासन, प्रशासन व विश्वविद्यालय व्यवस्था सुधारने को तैयार नहीं है।
डॉ यदुनाथ विश्वकर्मा ।।

🔥 *विश्वकर्मा समाज के कथित मठाधीशों से सीधा सवाल*! 🔥सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड, प्रतापगढ़ में न्याय की आवाज बुलंद करने वा...
16/09/2026

🔥 *विश्वकर्मा समाज के कथित मठाधीशों से सीधा सवाल*! 🔥

सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड, प्रतापगढ़ में न्याय की आवाज बुलंद करने वाले इंजी. संदीप विश्वकर्मा जी के विरुद्ध दर्ज मुकदमे के खिलाफ लखनऊ ईको गार्डन में आज सातवें दिन भी धरना जारी है।

लेकिन सवाल है—
समाज के बड़े-बड़े संगठन कहाँ हैं?राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने वाले लोग कहाँ हैं? 12 महीने रसीद काटकर समाज की सेवा का दावा करने वाले आज इस संघर्ष में कहाँ हैं?

जब एक साथी विश्वकर्मा समाज के हक और सम्मान के लिए संघर्ष करते हुए अपना जीवन दाव पर लगा दिया, तब भी चुप्पी क्यों?

👉 अब तक देवदूत विश्वकर्मा सेना ने इस आंदोलन का समर्थन किया है। *बाकी संगठन विश्वकर्मा ब्रिगेड, विश्वकर्मा आर्मी, विश्वकर्मा सेना, द विश्वकर्मा मित्र ........ प्रदेश के 5 हजार संगठन कहा गए? कब तक समाज को मूर्ख बनाओगे*? राष्ट्रीय अध्यक्ष से सवाल जरूर कीजिये ।

💥 फैसला अब विश्वकर्मा समाज को करना है—कौन सिर्फ समाज के नाम पर राजनीति करता है और कौन वास्तव में समाज के हक की लड़ाई लड़ता है।

जो न्याय के संघर्ष में साथ खड़ा है, वही समाज का सच्चा साथी है बाकी ।

🚩 जय विश्वकर्मा | जय विज्ञान ✊

07/09/2026
07/09/2026

जनपद हरदोई, कन्नौज,औरैया, इटावा, फर्रुखाबाद और मैनपुरी क्षेत्र का भ्रमण।

02/09/2026

शोचनीय?????? भारत में 823 मेडिकल कॉलेजों में MBBS की सीटों की संख्या आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड 1,36,939 तक पहुँच गई है।

माना जा रहा है कि हम देश में डॉक्टरों की कमी को दूर कर रहे हैं। लेकिन अगर आप बारीकियों पर ध्यान दें, तो एक बहुत ही निराशाजनक सच्चाई सामने आती है।

इस साल शुरू की गई 9,911 नई सीटों में से सिर्फ़ 2,111 सीटें सरकारी कॉलेजों की हैं, जबकि प्राइवेट मेडिकल संस्थानों में 7,800 सीटें जोड़ी गई हैं।

भारतीय इतिहास में पहली बार, देश की कुल MBBS सीटों में से 54% प्राइवेट कॉलेजों के पास हैं। इससे साबित होता है कि भारत शिक्षा का विस्तार नहीं कर रहा है, बल्कि ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाली एक स्कीम चला रहा है।

अगर आपने कभी सफ़ेद कोट पहनने का सपना देखा है, तो फ़्री मार्केट के पास आपके लिए एक अच्छी खबर है: अब आपको NEET में नामुमकिन लगने वाले 99.9 परसेंटाइल स्कोर की ज़रूरत नहीं है। बस आपको एक ऐसे परिवार की ज़रूरत है जो अपनी पुश्तैनी संपत्ति बेच सके, अपने म्यूचुअल फंड बेच सके और चचेरे भाई के घर को गिरवी रखकर लोन ले सके। एक डिग्री के लिए ₹1 करोड़ की औसत प्राइवेट फ़ीस के हिसाब से, सिर्फ़ एक बैच से ही उन 7,800 नई प्राइवेट सीटों से प्राइवेट कॉलेज ट्रस्टों के पास लगभग ₹7,800 करोड़ से ₹11,700 करोड़ आएँगे। जब पाँचों बैच एक साथ चल रहे होंगे, तो प्राइवेट मेडिकल ट्रस्टों के पास इतनी पक्की कमाई होगी कि बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियाँ भी जलने लगेंगी। किसे पता था कि बीमारों का इलाज करना कॉलेज मैनेजमेंट के लिए इतना ज़्यादा मुनाफ़े वाला काम होगा?

अगर आप सोच रहे हैं कि प्राइवेट कॉलेज राज्य की फ़ीस की सीमा और रिज़र्वेशन कोटे से कैसे बचते हैं, तो तमिलनाडु में चल रहे इस 'मास्टरक्लास' को देखिए।

कई प्राइवेट कॉलेजों ने 'डीम्ड यूनिवर्सिटी' का दर्जा हासिल कर लिया, जिससे वे राज्य की काउंसलिंग और फ़ीस के नियमों से आसानी से बच गए।

जैसे ही कोई संस्थान "डीम्ड" बनता है, वह सेंट्रल काउंसलिंग सिस्टम में चला जाता है जहाँ मार्केट रेट के हिसाब से ट्यूशन फ़ीस लगती है। इससे फ़ीस राज्य कोटे के रेगुलेटेड रेट से बढ़कर पूरे कोर्स के लिए ₹90 लाख से ₹1.45 करोड़ तक पहुँच जाती है।

तो, आपने साढ़े पाँच साल का समय बिताया, अपने माता-पिता का रिटायरमेंट फ़ंड खर्च किया और MBBS की डिग्री हासिल कर ली। आपको लग सकता है कि अब मोटी कमाई शुरू करने का समय आ गया है, लेकिन इतनी जल्दी भी नहीं। भारत में हर साल लगभग 137,000 MBBS ग्रेजुएट निकलते हैं, लेकिन पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) के लिए सिर्फ़ 75,000 से 80,000 सीटें ही उपलब्ध हैं। इससे एक ऐसी मुश्किल स्थिति पैदा हो जाती है जहाँ 40% से ज़्यादा ग्रेजुएट बिना आगे की पढ़ाई के रह जाते हैं। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, एक बिना स्पेशलाइज़ेशन वाले MBBS डॉक्टर की शुरुआती सैलरी लगभग उतनी ही होती है जितनी एक नए B.Com ग्रेजुएट की—यानी साल के करीब ₹5 लाख। इसलिए, आपको PG स्पेशलाइज़ेशन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। आपके पास बहुत आसान विकल्प हैं: NEET-PG क्लियर करने के लिए कोचिंग सेंटर में दो साल और बहुत सारा पैसा खर्च करें, प्राइवेट PG सीट के लिए ₹1 से ₹2 करोड़ और दें, या फिर किसी मेट्रो शहर के अस्पताल में ₹45,000 महीने की नौकरी करें, जबकि आपके लोन की EMI ही ₹60,000 हो। गणित के हिसाब से, अगर आप साल के ₹5 लाख कमाने के लिए ₹1.5 करोड़ खर्च करते हैं, तो आपकी लागत वसूलने का समय 30 साल होगा—यानी आप अपनी रिटायरमेंट पार्टी के समय ही अपनी लागत वसूल पाएंगे।

समाज आज भी मेडिकल की तैयारी करने वालों को ऐसे देखता है जैसे उन्हें लग्ज़री कारों का काफिला मिलना तय हो, लेकिन इकोनॉमिक सर्वे ने इस गलतफहमी को पूरी तरह तोड़ दिया है। सर्वे से पता चलता है कि डॉक्टर अब पक्की दौलत के लिए इस फील्ड में नहीं आ रहे हैं, बल्कि सामाजिक रुतबे के लिए "प्रतिष्ठा का टैक्स" (prestige tax) चुका रहे हैं। उम्मीद के मुताबिक ₹20 लाख की सालाना शुरुआती सैलरी के बजाय, नए ग्रेजुएट को साल के ₹5 लाख मिलते हैं; इंटर्नशिप के दौरान वे महीने के सिर्फ़ कुछ हज़ार रूपयों (जो की अलग अलग राज्यो में अलग अलग )के भत्तों में 36 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं और उन्हें अधेड़ उम्र तक MBBS लोन का ब्याज चुकाने की कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ता है।

सिस्टम खराब नहीं है; यह बिल्कुल वैसा ही काम कर रहा है जैसा इसे बनाया गया था—एक बहुत अच्छी तरह से चलने वाली मशीन, जो मिडिल क्लास के सपनों को इंस्टीट्यूशनल रियल एस्टेट और ज़िंदगी भर के कर्ज़ में बदल देती है।
Dr. Yadunath vishwakarma
MD. PDCC. FICM.

01/09/2026
21/08/2026

सौरभ विश्वकर्मा प्रतापगढ़ हत्याकांड के मामले में पहुंचे लोकजन सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ वीरेंद्र विश्वकर्मा जी के साथ जिस तरह से पुलिस प्रशासन के अधिकारी ने उनके गले से गमछा खींचकर अभद्र व्यवहार करते हुए सम्मान को ठेस पहुंचाया विश्वकर्मा समाज के लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है पुलिस प्रशासन लोगों की सुरक्षा के लिए होती हैं न की किसी तरह का दुर्व्यवहार करने के लिए नही होती जिसको लेकर पुलिस प्रशासन एवं माननीय मुख्यमंत्री जी से निवेदन करता हूं की उस पुलिस अधिकारी के ऊपर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए नहीं तो विश्वकर्मा समाज आने वाले समय में अच्छी तरह जवाब देने के लिए तैयार रहेगा ।

प्रतापगढ़ के सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड में न्याय की आवाज़ बुलन्द करने वाले  इंजी संदीप विश्वकर्मा राष्ट्रीय प्रवक्ता लोह...
20/08/2026

प्रतापगढ़ के सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड में न्याय की आवाज़ बुलन्द करने वाले इंजी संदीप विश्वकर्मा राष्ट्रीय प्रवक्ता लोहिया वाहिनी के विरुद्ध BJP के सामंती गुंडों के इशारे पर
साजिश के तहत हत्या का प्रयास (धारा 307) एवं SC/ST एक्ट के तहत फर्जी मुकदमा दर्ज किया।

परसो रात प्रतापगढ़ पुलिस इनके पिताजी और भाई के साथ गाली गलौज मार- पीट करते हुए जेठवारा थाने पर ले गए। यही रामराज है?

राक्षस राज चरम पर है और क्या अब विश्वकर्मा समाज हिंदू नहीं है?
बहुजन धर्म का नशा अपने आप से उतारकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़े।

14/08/2026

प्रतापगढ़ में बेखौफ दबंगों का तांडव: लक्ष्मणपुर ब्लॉक के संविदा कर्मी की निर्मम हत्या, शरीर पर मिले गहरे जख्म और चोट के निशान
- मामूली विवाद में धारदार हथियारों और लाठी-डंडों से किया जानलेवा हमला;
- अस्पताल में इलाज के दौरान तोड़ा दम, मौत से पहले का वायरल वीडियो बना पुलिस के लिए गले की फांस
प्रतापगढ़। लीलापुर थाना क्षेत्र के लक्ष्मणपुर ब्लॉक में तैनात संविदा कर्मचारी सौरभ विश्वकर्मा (निवासी: चमरूपुर) की दबंगों ने बेरहमी से हत्या कर दी। मामूली कहासुनी के बाद रसूखदार दबंगों ने कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया।
गंभीर रूप से घायल सौरभ को लहूलुहान हालत में अस्पताल भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद सामने आई तस्वीरों में मृतक के शरीर पर अत्यधिक बर्बरता के स्पष्ट निशान दिखाई दे रहे हैं—पिंडली और घुटने के पास धारदार हथियार के गहरे घाव हैं, जबकि पीठ और शरीर के ऊपरी हिस्से पर लाठी-डंडों की बेदर्दी से की गई पिटाई के काले-नीले निशान (चोट) पड़े हुए हैं।

*परिजनों का पूर्व ब्लॉक प्रमुख के रिश्तेदारों पर सीधा आरोप*
वारदात के बाद मृतक के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। परिजनों ने लक्ष्मणपुर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख 'बड़े तिवारी' के भाई व कोटेदार सोनू तिवारी के बेटे सौरभ पर हत्या का सीधा आरोप लगाया है। परिजनों का कहना है कि सत्ता और रसूख के नशे में चूर दबंगों ने बिना किसी डर के इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया है।

*'डाइंग डिक्लेरेशन' ने बढ़ाई पुलिस-प्रशासन की मुश्किलें*
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे सौरभ का 'मौत से पहले का बयान' (Death Bed Statement) सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वायरल वीडियो में पीड़ित द्वारा दिए गए बयान के बाद प्रशासनिक तंत्र की नीव हिल गई है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

*भारी पुलिस बल के साथ पहुंचे ASP, क्षेत्र में तनाव*
घटना की संवेदनशीलता और स्थानीय लोगों के भारी जनाक्रोश को देखते हुए अपर पुलिस अधीक्षक (ASP बृजनंदन राय) भारी पुलिस बल के साथ मौके और अस्पताल पहुंचे। एहतियात के तौर पर लक्ष्मणपुर ब्लॉक और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

*प्रशासन के सामने खड़े तीखे सवाल*

-ब्लॉक जैसे सरकारी परिसर के पास संविदा कर्मी पर इतना भीषण हमला कैसे हो गया?
-परिजनों द्वारा नामजद आरोपियों और रसूखदार दबंगों पर पुलिस कब तक सख्त कार्रवाई करेगी?
-शरीर पर बर्बरता के साफ निशान और वायरल बयान के बाद क्या पीड़ित परिवार को त्वरित न्याय मिल पाएगा?

07/08/2026

मंडल दिवस: ओबीसी को धर्म की अफीम चटाकर, ‘शूद्र क्रान्ति’ (ओबीसी लोकतांत्रिक क्रान्ति) को RSS-BJP ने कैसे रोका? कैसे ओबीसी को ही आगे करके कमंडल ने मंडल के रथ को उलट दिया?

आरएसएस के मुख पत्र आर्गेनाइज ने लिखा “संभावित शूद्र क्रांति ( सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण) से होने वाले नुकसान का मुकाबला करने के लिए तुरंत नैतिक और आध्यात्मिक ताकतें गठित करना जरूरी है।" और जब मंडल-II ( उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण) लागू हुआ, तो उसी अखबार ने तर्क दिया कि "केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार योग्यता के अंतिम गढ़ को भी ध्वस्त करने पर आमादा है .....।"

(आरएसएस मुख पत्र आर्गेनाइज स्रोत- क्रिस्टॉफ जैफ्रेलॉट, दी इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख)

डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में दलित लोकतांत्रिक क्रांति के बाद यदि भारत में ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने वाली कोई लोकतांत्रिक क्रांति हो सकती थी, तो वह थी- ओबीसी क्रांति (शूद्र क्रांति)। यदि दलित लोकतांत्रिक क्रांति के बाद ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति इस देश में संपन्न हो जाती तो ब्राह्मणवाद का करीब-करीब खात्मा हो जाता।

ब्राह्मणवाद मतलब सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में तथाकथित उच्च जातियों का नियंत्रण, प्रभुत्व और वर्चस्व।

भारत में ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति ( शूद्र क्रांति) का एक रूप तमिलनाडु में दिखाई देता है, भले ही उसकी कई सारी सीमाएं हो। यदि तमिलनाडु जैसी पिछड़ा वर्ग की लोकतांत्रिक क्रांति भी पूरे भारत में हो जाती, तो भारत सच्चे अर्थों में एक लोकतांत्रिक देश बन जाता और कम से कम सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में आज की तुलना में बहुत ज्यादा समता, स्वतंत्रता और बंधुता होती।

यदि तमिलनाडु जैसी भी पिछड़ा वर्ग की क्रांति पूरे भारत, विशेषकर हिंदी पट्टी ( गाय पट्टी) में हो जाती, तो भारत की राजनीतिक सत्ता पूरी तरह कब्जा करने की आरएसएस की मंशा कभी पूरी नहीं होती। आरएसएस का आनुषांगिक संगठन ( भाजपा) कभी भी भारत की केंद्रीय सत्ता पर कब्जा नहीं कर पाता।

दलित लोकतांत्रिक क्रांति की तुलना में आरएसएस को ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति से ज्यादा डर लगता था, क्योंकि दलित इस देश में अल्पसंख्यक हैं, जबकि ओबीसी बहुसंख्यक हिस्सा ( 50 प्रतिशत से अधिक) हैं, यदि दलितों की तरह ही भारत का यह बहुसंख्यक हिस्सा भी ब्राह्मणवाद से बगावत कर देता, तो इस देश से तथाकथित उच्च जातियों का वर्चस्व का खात्मा हो जाता और इसके साथ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का आरएसएस का ख्वाब भी धूल-धूसरित हो जाता।

आरएसएस को ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति (शूद्र क्रांति) से कितना डर लगता है, इसका अंदाज मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने ( व्यवहारिक अर्थ में पूरे भारत के स्तर पर ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति शुरूआत) की वी. पी. सिंह की घोषणा के बाद आरएसएस की उस प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है, जिसमें उसने मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा को ‘शूद्र क्रांति’ की संज्ञा दी और उसे किसी भी कीमत पर रोकने की रणनीति बनाने का आह्वान किया था। ‘शूद्र क्रांति’ ( ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति) रोकने लिए आरएसएस ने अध्यात्मिक क्रांति ( धार्मिक क्रांति) शुरू करने का बात कही।

मंडल कमीशन की 40 सिफारिशों में से एक सिफारिश ( सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण) को जब वी. वी. सिंह ने लागू करने की घोषणा की और दूसरी सिफारिश ( उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण) लागू करने की जब अर्जुन सिंह ने घोषणा की तो आरएसएस मुख पत्र आर्गेनाइज की प्रतिक्रिया थी कि “संभावित शूद्र क्रांति ( सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण) से होने वाले नुकसान का मुकाबला करने के लिए तुरंत नैतिक और आध्यात्मिक ताकतें गठित करना जरूरी है।" और जब मंडल-II ( उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण) लागू हुआ, तो उसी अखबार ने तर्क दिया कि "केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार योग्यता के अंतिम गढ़ को भी ध्वस्त करने पर आमादा है .....।" ( स्रोत- क्रिस्टॉफ जैफ्रेलॉट, दी इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख)

मंडल कमीशन की एकमात्र सिफारिश को लागू करने के बाद ( आरएसएस के शब्दों में शूद्र क्रांति की शुरूआत) आरएसएस ने इस क्रांति को रोकने के लिए भारत को धार्मिक क्रांति ( भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की परियोजना) की शुरूआत की। ओबीसी के बीच अपने हक के लिए उभर रही व्यापक चेतना और आकांक्षा ( जो तथाकथित उच्च जातियों के वर्चस्व को तोड़ देती) को धार्मिक दिशा देकर, मुस्लिम विरोध में बदल दिया गया और पिछड़ों के नेतृत्वकारी समूह को एक बड़े हिस्से को राममंदिर अभियान में लगा दिया गया है।

इसकी पहली खेप के रूप में कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार जैसे लोग सामने आए। फिर तो ऐसे लोग की बाढ़ ही आ गई, तो जो पद और नेतृत्व प्राप्त की आकांक्षा में आरएसएस का मोहरा बन गए। ऐसे मोहरों ने ओबीसी समुदाय के ध्यान को अपने वास्तविक हकों की तरफ से मोड़ दिया और उन्हें हिंदुत्व के रक्षक सेना में तब्दील कर दिया।

2014 में आरएसएस के लिए सबसे बड़े मोहरे के रूप में नरेंद्र मोदी मिले, जिन्होंने अन्य पिछड़े वर्गों की चेतना एवं आकांक्षा का पूरी तरह हिंदुत्ववादीकरण कर दिया और उन्हें भाजपा के वोट बैंक में तब्दील कर दिया तथा संभावित ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को हिंदुत्वादी प्रतिक्रांति में तब्दील कर दिया। इसके सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आरएसएस के किसी भी पिछड़े वर्ग के नेता ने कभी मंडल कमीशन की शेष 38 सिफारिशों को लागू करने बात भी कभी मुंह से नहीं निकाली, जो ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति का ठोस आधार मुहैया कराती है।

जिन ओबीसी नेताओं को ओबीसी क्रांति ( आरएसएस की भाषा में शूद्र क्रांति) संपन्न करनी थी, वो हिंदुत्व की प्रतिक्रांति ( उच्च जातियों-उच्च वर्गों के वर्चस्व को बनाए रखने वाली क्रांति) संपन्न करने लगे। इस प्रक्रिया में ओबीसी समुदाय के वोटरों का भी बड़े पैमाने पर हिंदुत्वीकरण किया गया और उनके मतों का हिंदुत्ववादी प्रतिक्रांति के लिए इस्तेमाल किया गया।

इसका परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है, एक ओर जहां एक-एक करके ओबीसी के जायज मांगों को खारिज किया जा रहा है, वही उन्हें उनके वाजिब हकों से भी वंचित किया जा रहा है। इसके साथ ही संविधान और लोकतंत्र भी खतरें में पड़ गया है।

ओबीसी के साथ न्याय करने के लिए सबसे आधारभूत मांग जाति जनगणना को नरेंद्र मोदी ( तथाकथित पिछड़े) की सरकार ने खारिज कर दिया है। ओबीसी के पिछड़ेपन की वास्तविक आंकड़े न होने के नाम पर सुप्रीमकोर्ट ओबीसी को विभिन्न राज्यों द्वारा दिए जा रहे आरक्षण को खारिज कर रहा है। आज कोई भी पार्टी या नेता ( जिसमें पिछड़े वर्ग के नेता और पार्टी भी शामिल हैं) मंडल कमीशन की शेष 38 सिफारिशों को लागू करने बात नहीं कर रहा है, चारो ओर इस मुद्दे पर चुप्पी है, सिर्फ ओबीसी समाज के कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी ही इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं।

अपने को पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधि कहने वाली हिंदी पट्टी की पार्टियां भी हिंदुत्ववादी प्रतिक्रांति के दबाव में ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति के प्रश्न पर चुप्पी साधे हुए हैं।

ओबीसी क्रांति को अंजाम तक ले जाने के लिए जाति जनगणना पहला प्रवेश द्वार है। यही कारण कि भारत का शासक वर्ग ( उच्च जातीय-उच्च वर्गीय मर्द) और वर्तमान सत्ताधारी दल ( भाजपा) जाति जनगणना किसी भी सूरत में नहीं होने दे रहे हैं, क्योंकि जाति जनगणना ओबीसी क्रांति का रास्ता खोल देगी, जो हिंदुत्व की पूरी परियोजना को खतरे में डाल देगा। ओबीसी क्रांति के लिए दूसरी जरूरत है- मंडल कमीशन की शेष सिफारिशों को लागू करना।

इसके लिए जरूरी है कि ओबीसी की वर्तमान सामाजिक-शैक्षिक और आर्थिक स्थिति के आंकड़े मौजूद हों। जाति जनगणना से यह तथ्यात्मक तौर पर पता चल जाएगा कि कैसे तथाकथित उच्च जातियों ने देश के अधिकांश संसाधनों और पदों पर कब्जा कर रहा है और वे मुख्यत: ओबीसी के हकों को ही छीने हुए हैं।

जिस ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति ( शूद्र क्रांति) को आरएसएस रोकना चाहता था, उसमें वह पूरी तरह सफल हुआ है और यह कार्य उसने ओबीसी के नेताओं के हाथों ही संपन्न कराया है, जिसके सबसे बड़े चैम्पियन नरेंद्र मोदी है। भारत के इतिहास में ओबीसी के हितों को ओबीसी का होने के नाम पर नरेंद्र मोदी से अधिक नुकसान पहुंचाने वाला कोई व्यक्ति नहीं पैदा हुआ है। नरेंद्र मोदी स्वयं ही राममंदिर आंदोलन की पैदाइश हैं।

ओबीसी क्रांति ( शूद्र क्रांति) सिर्फ ओबीसी के लिए ही न्याय नहीं दिलाती,बल्कि पूरे भारत के वंचित तबकों को न्याय का आधार मुहैया कराती।

ओबीसी क्रांति एक न्यायपूर्ण, समतामूलक, बंधुता आधारित लोकतांत्रिक भारत की अनिवार्य शर्त है, यह लोकंतत्र की रक्षा के लिए भी जरूरी है। जहां ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति को दार्शनिक-वैचारिक आधार जोतीराव फुले, शाहू जी महराज, ई. वी. रामसामी पेरियार, नारायण गुरु, चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’, पेरियार ललई सिंह यादव, जगदेव बाबू, कर्पूरी ठाकुर, रामस्वरूप वर्मा आदि ने मुहैया कराते हैं, वहीं उसे ठोस लोकतांत्रिक क्रांति में बदलने का व्यवहारिक प्रस्ताव मंडल कमीशन की रिपोर्ट ने प्रस्तुत किया।

हिंदुत्ववादी प्रतिक्रियावादी विचारधारा, राजनीति और कार्यक्रम को पराजित करने के लिए इस देश में दलित लोकतांत्रिक क्रांति के साथ ही ओबीसी लोकतांत्रिक क्रांति की भी जरूरत है, इस क्रांति के बिना न तो आरएसएस को पराजित किया जा सकता और न ही भाजपा को निर्णायक तौर पर सत्ता से बेदखल किया जा सकता है।

इसके लिए जरूरी है कि धर्म की अफीम चाटकर नशे में हिंदुत्व का रथ हांक रहे ओबीसी समुदाय को अफीम के नशे से मुक्त किया जाए और ओबीसी के नाम पर हिंदुत्व की राजनीति करने वाले नरेंद्र मोदी और उन जैसे अन्य नेताओं की वास्तविक हकीकत से अन्य पिछड़े वर्ग को रूबरू कराया जाए।
डॉ यदुनाथ विश्वकर्मा।।।।

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