15/08/2026
"उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम, भारती यत्र संततिः।।"
आज जब हम स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव से आगे बढ़कर 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब हृदय गर्व और कृतज्ञता से भर उठता है। भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, अपितु एक जीवंत सनातन चेतना है। इसकी आत्मा में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का दिव्य भाव रचा-बसा है। यही भाव आज वैश्विक पटल पर पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और स्वीकार्य हो रहा है। सम्पूर्ण विश्व अब भारत के आध्यात्मिक मूल्यों, ज्ञान-आलोक, आर्षविद्या, योग और आयुर्वेद की ओर आकृष्ट हो रहा है। ये केवल प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने वाले शाश्वत सूत्र हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस प्रकार सर्वसमर्थ और सशक्त राष्ट्र के रूप में अपना स्थान सुदृढ़ किया है, वह ऐतिहासिक है। रक्षा, अंतरिक्ष, डिजिटल क्रांति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा सांस्कृतिक कूटनीति सभी दिशाओं में हमारी प्रगति स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है। विश्व मंच पर भारत का स्वर अब अधिक प्रभावी, आत्मविश्वासपूर्ण और मार्गदर्शक बन चुका है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों की गहराई और आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रमाण है। परन्तु यह यात्रा अभी अधूरी है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति, समरसता और आत्मनिर्भरता की प्राप्ति है।
आओ ! हम सब एकजुट होकर संकल्प लें कि हमारा भारत अजेय बने; किसी भी चुनौती के सामने झुकने वाला नहीं। समरस बने; जहाँ विविधता में एकता का दिव्य संगीत गूँजे। सुसम्पन्न बने; जहाँ प्रत्येक नागरिक समृद्धि और अवसर का अधिकारी हो। सुसंस्कृत बने; जहाँ ज्ञान, नैतिकता और संस्कार जीवन का आधार हों और सबसे बढ़कर आत्मनिर्भर बने; जो अपनी शक्ति से विश्व का मार्गदर्शन करे, न कि किसी पर निर्भर रहे।
"स्वतंत्रता दिवस" केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य का आह्वान है। आइए ! हम सब मिलकर उस भारत का निर्माण करें जिसका स्वप्न हमारे पूर्वजों ने देखा था; एक ऐसा भारत जो ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ हो, करुणा का सागर हो और विश्व-कल्याण का ध्वजवाहक बनकर विश्व का नेतृत्त्व करे।
80वें "स्वतंत्रता दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जय हिन्द ! वन्देमातरम् !!
– डा. एकता सिंह