07/09/2023
ऐसे थे हमारे योगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र भगवान
आर्यावर्त में श्री राम और श्री कृष्णा ऐसे दो महापुरुष हुए हैं जिन्हे राष्ट्र पुरुष और इतिहास पुरुष की दृष्टि से अद्वितीय कहा जा सकता है। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं। पुरुषोत्तम दोनों हैं। पुरुषोत्तम अर्थात उत्तम पुरुष अर्थात आर्य। महर्षि दयानंद ने सदाचार निर्माणार्थ जिस सत्पुरुष की गणना सर्वप्रथम की है, वह योगेश्वर श्री कृष्ण ही हैं। उन्होंने लिखा है श्री कृष्ण का जीवन आप्त ( श्रेष्ठ ) पुरुषों के सदृश है- देखो श्री कृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अति उत्तम है उनके गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश हैं। जिसमें कोई धर्म का आचरण श्री कृष्ण ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो ऐसा कहीं नहीं लिखा और इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं, जिनको पढ़-पढ़ा , सुन-सुन के अन्य मत वाले श्री कृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत ना होता तो श्री कृष्ण जी के सदस्य महात्माओं की झूठी निंदा क्यों कर होती!
आओ जाने योगेश्वर के महान चरित्र के विषय में-
सन्ध्या और यज्ञ के प्रति श्री कृष्ण की निष्ठा
श्री कृष्णा ईश्वर के बहुत बड़े उपासक थे। किसी भी परिस्थिति में उन्होंने संध्या एवं यज्ञ का परित्याग नहीं किया। युद्ध काल में भी वह निरंतर संध्या यज्ञ करते थे। दूत कर्म पर जाते हुए रास्ते में सांझ हो गई तो वे संध्या के लिए रुक गए। हस्तिनापुर में प्रातः काल सभा में जाने से पहले संध्या तथा अग्निहोत्र से निवृत हुए हैं । अभिमन्यु के वध के दिन सायं काल अपने शिविर में जाने से पूर्व श्री कृष्णा और अर्जुन दोनों ने संध्या की है।
अवतीर्य रथात् तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि।
रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविशेष ह।।
(महाभारत उद्योग पर्व- ८३/२१)
श्री कृष्णा अपने समय के एक अद्वितीय विद्वान थे। वे वेद वेदंगों के ज्ञाता, दान, दया, बुद्धि, शूरता, शालीनता, चतुराई, नम्रता, तेजस्विता, धैर्य, संतोष, आदि सभी गुणों में अनुपम थे। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय भीष्म पितामह शिशुपाल को उत्तर देते हुए कहते हैं कि ये श्री कृष्ण बल, बुद्धि, वेद वेदंगों के ज्ञान, चरित्र में अद्वितीय हैं। आज संपूर्ण भारतवर्ष में उनके जैसा योद्धा, उनके जैसा विद्वान, उनके जैसा बुद्धिमान, उनके जैसा चरित्रवान कोई दूसरा नहीं है।
वेदवेदांगविज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा।
नृणां लोके हि कोSन्योसस्ति विशिष्ट: केशवाद्रिते।।
दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्री: कीर्तिर्बुद्धिरुत्तमा।
सन्नति: श्रीधृतिष्तुष्टि: पुष्टिश्च नियताच्युते।
( महाभारत सभा पर्व-३८/१९-२०)
वास्तव में श्री कृष्ण के समान प्रगलभ, बुद्धिशाली, कर्तृत्ववान, प्रज्ञावान, व्यवहार कुशल, ज्ञानी एवं पराक्रमी पुरुष आज तक संसार में नहीं हुआ। सत्य निष्ठा के समान ही वे कुटिल राजनीति के भी उपदेष्टा थे। ग्रहस्थ जीवन के प्रेमी होने के साथ-साथ अत्यंत संयमी और योग विद्या पारंगत योगेश्वर भी थे। संक्षेप में यह निशंकोच कहा जा सकता है कि श्री कृष्णा भारत की संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता तथा राष्ट्र धर्म के मूर्तिमन्त प्रतीक हैं।
पुराणों ने "चोर-जार शिखमणि" के रूप में जिस कृष्ण का चित्रण किया है उसका अनुमोदन महाभारत में कहीं नहीं है वह केवल पुराणों की लीला है। और इसके पीछे व्यक्तिगत वासनाओं की पूर्ति के लिए अवचेतन मन में छिपी मनोग्रंथियों का काव्यात्मक चोले में विकृत चित्रण मात्र है।
यह देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि कृष्ण का वह विकृत रूप तो घर-घर में प्रचलित है और जो महाभारत वर्णित शुद्ध स्वरूप है जो राष्ट्र के लिए अक्षय प्रेरणा का स्रोत बन सकता है उसकी चर्चा दुर्लभ है।
पुराणौं की इस लीला के कारण हमने अपने पूर्वज को कलंकित करने की कोई और कसर नहीं छोड़ी है। इस प्रसंग में आज निम्न पंक्तियां सत्य सिद्ध होती प्रतीत होती है-----
"आओ कृष्ण पर कलंक लगायें।
तुम भी नाचो, हम भी नाचे,
मिलकर के सब रास रचाएं।
तुम एक बार राधा बन जाओ,
और कृष्ण हम स्वयं बन जाएं।।
आओ कृष्णा पर कलंक लगाएं।
चुनरी खींचे, चूड़ी बेचें, मनिहार हम सब बन जाए,
संध्या- यज्ञ बंद करो सब,
वेद ताक् पर रख दो सारे।
दधि- माखन हम खूब चुराएं। चोर-जार सारे बन जाएं। आओ कृष्ण पर कलंक लगायें।।
कंस वध की बात करो ना,
दूत कर्म हमसे ना होगा।
धर्म सारथी बनना छोड़ो,
आओ अपने ऐब छुपाएं।
धर्म युद्ध निर्णायक बनकर हम क्यों अपनी जान फसायें।
आओ कृष्ण पर कलंक लगाएं।"
योगेश्वर के चरित्र को हम स्वयं महाभारत के माध्यम से जाने और उनके चरित्र के शुद्ध स्वरूप को घर-घर पहुंचाएं और अपने उस महान पूर्वज को हम कलंकित न करें, ना होने दें क्योंकि महाभारत के विषय में एक युक्ति है-
' धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।
' जो कुछ महाभारत में है वहीं अन्य ग्रन्थों में है, और जो इसमें नहीं है तो फिर कहीं भी नहीं है।' लोक में तत्वज्ञान संबंधी ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो इस महाभारत में विद्यमान ना हो।
आओ हम सभी मिलकर योगेश्वर श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को आज शुद्ध रूप से मनायें। संध्या एवं यज्ञ करें और प्रतिदिन करने का संकल्प लें। जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने विषम परिस्थितियों में भी संध्या में यज्ञ का परित्याग नहीं किया, हम भी संध्या एवं यज्ञ को अपने जीवन का अंग बनाएं।और योगेश्वर के इस जन्मदिवस पर उनके उत्तम चरित्र का यश गान करें।
धन्यवाद
डॉ . सीमा शर्मा (Naturopath Physician)
वैदिक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र,
M. 8126789235